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अमेरिका से आया (गया) मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम (नमस्ते) करो!
मोदी जी के मित्र अंकल ट्रम्प आ कर चले भी गये। हमारे लिए तो वे चॉकलेट भी नहीं लाये। पर हम मेहमान को खाली हाथ तो नहीं ही भेज सकते थे। सो, हमने उनसे अरबों रुपये का रक्षा सौदा कर लिया।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
01 Mar 2020
modi trump
प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार : Times of IndiaKG

अमेरिकी दोस्त पधार कर जा भी चुके हैं। जी हां, मोदी जी के अमरीकी दोस्त, अंकल ट्रम्प जी बीते सप्ताह ही भारत आ कर गये हैं। अंकल ट्रम्प भारत में नमस्ते करने आये थे। बहुत लोगों का यह भी मानना है कि अंकल ट्रम्प जी भारत में नमस्ते लेने आये थे। खैर जो भी हो, हमारे देश में उनके आने का संबंध "नमस्ते"  से ही था। इससे पहले मोदी जी भी अमरीका जा कर "हाउडी मोदी" कार्यक्रम में बता कर आये थे कि भारत में सब ठीक है। अब अंकल ट्रम्प जी भारत में नमस्ते करने या लेने आये हैं। अब दोनों दोस्त एक दूसरे से बदले की दोस्ती निभा रहे हैं। 

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अंकल ट्रम्प तो आने से पहले ही कह चुके थे कि भारत ने उनके साथ अच्छा नहीं किया है इसलिए भारत उन्हें पसंद नहीं है। तो इसलिए वे बस अपने मित्र मोदी से मिलने आये थे। यह उनका दुर्भाग्य है कि उनका मित्र एक ऐसे देश में रहता है जो उन्हें अच्छा नहीं लगता है। पर क्या करें, जब एक खास मित्र से मिलना है तो नापसंद जगह भी जाना पड़ सकता है। 

लेकिन अंकल ट्रम्प जी का मित्र मोदी भी यारों का यार निकला। अपने दोस्त की खातिरदारी में कोई कसर बाकी नहीं रखी। अंकल ट्रम्प, अपनी पत्नी ट्रम्प आंटी को तो साथ लेकर आये ही थे, अपनी बेटी और दामाद को भी साथ लेकर आये थे। जिन लोगों को आज तक बेटी-दामाद से दिक्कत रहती आई है, वे भी अमेरिकी बेटी-दामाद के लिये पलकें बिछाये बैठे थे। आखिर भारतीय दामाद और अमेरिकी दामाद में बहुत फर्क होता है।

अब जब अंकल ट्रम्प हमारे देश में आये थे तो उनका पूरा सत्कार होना ही चाहिए था, और किया भी गया। हमारी तो परंपरा ही है, "अतिथि देवो भवः"। हम तो अतिथि को देवता ही मानते हैं। विशेष रूप से अगर अतिथि अंग्रेज हो। हमारी निगाह में अंग्रेज केवल अंग्रेज ही नहीं, सभी यूरोपीय और अमेरिकी भी अंग्रेज ही हैं। अब यह अतिथि देव पर निर्भर है कि वह कुछ लेकर आता है या फिर सिर्फ जुबानी जमाखर्च करने आता है। अंकल ट्रम्प ने तो आने से काफी पहले ही बता दिया था कि मैं सिर्फ जुबानी जमा खर्च करने के लिए आ रहा हूं। इसके बावजूद भी हमने मेहमान नवाजी में कोई कसर नहीं बाकी रहने दी।

अंकल ट्रम्प पहले सीधे अहमदाबाद पहुंचे। मोटेरा स्टेडियम में ट्रम्प अंकल भारत सरकार के नहीं, किसी एनजीओ के मेहमान थे। पर फिर भी देखिये, सरकार ने मेहमान नवाजी के लिए अपने खजाने खोल दिये। यहां तक कि झोंपड़-पट्टी देख अंकल ट्रम्प का मन न खराब हो, उसके लिए एक दीवार तक बनवा दी जो विश्व प्रसिद्ध हो गई। पूरे विश्व में तीन चार दीवारें ही प्रसिद्ध हैं। जैसे चीन की दीवार, बर्लिन दीवार (जो अब टूट चुकी है), मैक्सिको और अमेरिका के बीच की दीवार (जिसका एक भाग ट्रम्प वाल कहलाता है)। अब भारत की अहमदाबाद वाली दीवार (मोदी दीवार) भी उतनी ही प्रसिद्ध हो गई है।

भारत में अमिताभ बच्चन की "दीवार" के अलावा अभी तक कोई भी दीवार इतनी प्रसिद्ध नहीं हुई थी जितनी अब मोदी जी की यह दीवार हो गई है। "दीवार" फिल्म में एक डायलॉग था "मेरे पास मां है"। यह डायलॉग शशि कपूर ने अमिताभ बच्चन पर तब दे मारा था जब अमिताभ बच्चन ने कहा था "मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है,...... क्या है, क्या है तुम्हारे पास"। पूरी फिल्म में दबा दबा सा रहा शशि कपूर इसी एक डायलॉग से छा गया था। 

अब अगर अंकल ट्रम्प कहते "मेरे पास दौलत है, रक्षा सामग्री है, इनवेस्टमेंट है,......क्या है, क्या है तुम्हारे पास"। तब हमारे मोदी जी भी डायलॉग मार ट्रम्प अंकल पर छा सकते थे, "मेरे पास झोपड़ पट्टी है, उसमें रहने वाली जनता है"। पर मोदी जी ने अपनी जनता विरोधी नीतियों से झोंपड़ पट्टी में रहने वाली जनता को तो पहले से ही अपने से दूर कर चुके थे, यह मोदी दीवार बना कर डायलॉग मार कर छा जाने का जो मौका उन्हें मिला था वह भी छोड़ दिया।

अखबार और टीवी बता बता कर थक नहीं रहे थे कि अंकल ट्रम्प और मोदी जी ने अहमदाबाद में कितनी बार हाथ मिलाया और कितनी बार एक दूसरे के गले पड़े। कोरोना वायरस के इस सीजन में यह वास्तव में ही हिम्मत का काम है। बार बार हाथ मिलाना और गले पड़ना, कोरोना वायरस के डर के बावजूद, सच्चे दोस्त ही कर सकते हैं।

उधर दिल्ली में ट्रम्प आंटी दिल्ली के सरकारी स्कूल में खुशहाली (हैप्पीनेस) कक्षा देखने गयीं। उन्हें आश्चर्य हुआ होगा कि हैप्पीनेस का भी सिलेबस होता है और उसकी भी कक्षा लगती है। इसीलिए उन्होंने हैप्पीनेस क्लास देखने में रूचि दिखाई होगी। उनके आने से पहले से ही टीवी पर हैप्पीनेस कक्षा के बारे में बताया जाने लगा। मुझे भी ऐसे एक दो शो देखने का मौका मिला। एक टीवी एंकर ने जब बच्चों से पूछा कि उन्हें इस हैप्पीनेस कक्षा से क्या लाभ है। बच्चों का जवाब था "इस हैप्पीनेस क्लास के बाद हम ब्लैक बोर्ड से कापी में उतारते हुए कम गलती करते हैं"। हमारे देश में यही है हैप्पीनेस की परिभाषा। हैप्पीनेस में भी पढ़ाई का टेंशन। जब हैप्पीनेस सिलेबस से कक्षाओं में पढ़ाया जायेगा तो उसका यही हाल होगा। 

सुना है अगले सेशन से दिल्ली के सरकारी स्कूलों में देशप्रेम का भी सिलेबस तैयार होगा। देशप्रेम की भी कक्षाएं लगेंगी। कक्षा में पढ़ा कर देशप्रेम सिखाया जायेगा। बच्चों को देशप्रेमी बनाया जायेगा। वह भी ऐसा ही देशप्रेम होगा जैसी यह कक्षा में पढा़ई गई खुशहाली (हैप्पीनेस) है। देशप्रेम की कक्षा में बताया जायेगा कि आप क्या क्या न करें जिससे कि आप देशद्रोही न कहलाये जायें। देशभक्ति के गीत सिखाये जायेंगे। देशभक्ति के नारे लगवाये जायेंगे। कभी कोई विदेशी अतिथि भारत घूमने आयेगा तो उसे आश्चर्य होगा कि यहां देशभक्ति का भी सिलेबस है। स्कूलों में देशभक्ति की भी कक्षा लगती है। वह देशभक्ति की कक्षा देखने भी आयेगा।

खैर, मोदी जी के मित्र अंकल ट्रम्प आ कर चले भी गये। हमारे लिए तो वे चॉकलेट भी नहीं लाये। पर मोदी जी को उन्होंने कुछ हवाई जहाज और तोपें टैंक आदि दिखा दिये। हमें कुछ मिला हो या न हो पर हम दोस्त को खाली हाथ तो नहीं ही भेज सकते थे। सो, हमने उनसे अरबों रुपये का रक्षा सौदा कर लिया। मेहमान थे, भले ही खाली हाथ आये थे, पर हमने उन्हें खाली हाथ नहीं भेजा। खाली हाथ जाते तो अमेरिका जाकर अपने देशवासियों को क्या मुंह दिखाते। आखिर उनके यहां इसी वर्ष चुनाव हैं।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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