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तिरछी नज़र: क्या से क्या हो गया, बेवफ़ा तेरे प्यार में 
महबूबा उसी श्मशान के सामने, जो उससे उसके उसी महबूब ने नारे लगवा कर बनवाये थे, शव वाहनों में लेटी लाश के रूप में अपनी बारी का इंतजार कर रही है। और उसका महबूब लाशों का उत्सव मना रहा है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
25 Apr 2021
कोरोना
फोटो साभार : down to earth

पुरानी फिल्म 'पत्थर के सनम' का गाना है 'महबूब मेरे, महबूब मेरे… तू है तो दुनिया कितनी हसीं है। जो तू नहीं तो कुछ भी नहीं है।' हमने तो 2012-13 में ही यह गाना शुरू कर दिया था। हमारा उस समय का महबूब नीरस था। प्यार करना जानता था, प्यार करता था, पर जताता नहीं था। 'आई लव यू' नहीं बोलता था। महबूब मोहब्बत करे न करे, पर 'आई लव यू' न बोले यह तो सही नहीं है न।

और हमें मिल भी गया। हमें 'आई लव यू' कहने वाला महबूब मिल गया। हमें ढूंढना भी नहीं पड़ा और मिल भी गया। हमारे सामने आया, और आया क्या, बड़े जोर शोर से लाया गया। इतने गाजे बाजे, शो ऑफ के साथ प्रेजेंट किया गया कि करोड़ों लोग एक साथ बोल उठे 'आई लव यू'। वह भी बोला 'आई लव यू' । ढेर सारी मेहबूबाओं ने उसे अपना महबूब मान लिया।

बिल्कुल यही लगा कि 'तू है तो दुनिया कितनी हसीं है' और 'जो तू नहीं तो कुछ भी नहीं है'। महबूबा को क्या चाहिए, महबूब। जो महबूब कहे वही सच। महबूब ने कहा तुम्हारे दादा-दादी, नाना-नानी, मां-बाप, सब नरक की जिंदगी जी रहे थे। मैं तुम्हें स्वर्ग की जिंदगी दिखाऊंगा। हम सब मान गये। वे सब, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची तो तयैब अली थे, प्यार के दुश्मन थे। महबूब ने कहा तो हमने मान लिया कि वे तो सचमुच ही नरक में जिये थे। महबूब कोई झूठ थोड़ी ही न बोलेगा। वैसे भी उसको काले कव्वे ने नहीं काटा था, तो हम समझ गए कि उसने झूठ नहीं बोला है। यह तो बहुत बाद में पता चला कि 'महबूब तो स्वंय ही काला कव्वा है, उसे काला कव्वा क्या काटता'।

महबूबा तो प्यार करती रही और महबूब प्यार करवाता रहा। महबूब ने पूछा, मुझसे प्यार करती हो। महबूबा ने कहा, हां! मैं तुमसे सचमुच प्यार करती हूँ, बेइंतहा प्यार करती हूँ। महबूब बोला, मुझसे प्यार करती हो तो बाकी सब से घृणा करो, नफरत करो। पुराने से भी घृणा करो, नये से भी घृणा करो। अड़ोसी से भी घृणा करो, पड़ोसी से भी घृणा करो। मन से मोहब्बत को निकाल दो। बस महबूब से मोहब्बत कर। महबूबा तो प्यार में दीवानी थी ही। महबूब की यह बात भी मान ली। मोहब्बत की खातिर ही नफरत की बात भी मान ली। महबूब की मोहब्बत में डूब कर ही प्यार में डूबे दिल में नफरत ही नफरत बो दी।

महबूबा ने कसमें खाईं, वादे किए, प्यार के और वफ़ा के। महबूब ने कहा कि ये झूठी कसमें खाने से कुछ नहीं होगा। सब अपने नोट मेरे पास जमा करा दो। महबूब मांग रहा था, महबूबा मना करे तो कैसे करे। महबूबा ने अपने सारे के सारे नोट महबूब के पास जमा कर दिए। वर्षों की मेहनत से जमा किये नोट घंटों लाइनों में खड़े होकर जमा करा दिये। महबूबा ने मर मर कर जमा किए गये नोट मर मर कर महबूब के पास जमा करवा दिये। महबूबा ने महबूब से पूछा भी नहीं, बस जमा कर दिये। महबूबा को पता था कि प्यार में पूछा नहीं जाता है। और महबूब तो जानता ही था कि प्यार में बताया नहीं जाता है। इसीलिये तो वह प्यार करता था। महबूबा ने भी कहा 'नोट चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए। बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए'।

महबूब कहा मानने के लिए तो बना ही नहीं था लेकिन महबूब को जान लेने की बात जम गई। तो महबूब ने पूछा, श्मशान घाट चाहिए। महबूबा को लगा महबूब जान मांग रहा है। महबूबा ने जोर से कहा 'हां चाहिये' । मोहब्बत में महबूब जान मांगे और महबूबा मना कर दे, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। महबूबा के लिए तो वह दिन बहुत ही खुशी का दिन था जिस दिन महबूब ने नोट मांगे। और अब वह जान मांग रहा है। महबूबा के लिए तो उससे अधिक खुशी का दिन कोई हो ही नहीं सकता था जिस दिन महबूब ने उससे उसकी जान मांगी थी और उसके लिए बड़े बड़े आलीशान श्मशान घाट बनवाने का वायदा किया था। और ऐसा महबूब ने एक जगह नहीं कहा था, पूरे प्रदेश में कहा था। उसकी गूंज पूरे देश में उठी थी। और महबूबा तो खुशी से पागल ही हो गई थी। वह सबको बताती फिर रही थी कि उसका महबूब उसकी जान मांग रहा है, उसके लिए श्मशान घाट बनवा रहा है। वह सच में ही मोहब्बत में दीवानी हो गई थी।

लेकिन महबूब तो बेवफ़ा था। महबूब बेवफ़ा ही होता है और महबूबा बेवकूफ़। महबूब प्यार का नाटक तो महबूबा से कर रहा था, प्यार की कसमें तो वह महबूबा की खा रहा था, प्यार का दिखावा तो वह महबूबा के साथ कर रहा था। पर असलियत में प्यार तो महबूब किन्हीं औरों के साथ कर रहा था। प्यार की पींगे तो वह करोड़ों के साथ लगा रहा था पर प्यार वह सिर्फ किन्हीं दो चार के साथ कर रहा था। वहाँ वे दो महबूब थे और वह महबूब एक अकेला महबूबा था।

चौदह बीत गया और उन्नीस आ गया। महबूब चीख चीख कर बोल रहा था, 'नायक नहीं, खलनायक हूँ मैं'। 'नफरत का सौदागर हूँ मैं'। लेकिन महबूबा की मोहब्बत में कोई कमी नहीं आई। महबूबा तो मोहब्बत में अंधी होती है, दीवानी होती है, मस्तानी होती है। 'प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है.....'। महबूबा तो बस महबूब से मोहब्बत करती है, चाहे फिर वह आवारा हो, स्मगलर हो, मवाली गुंडा हो या फिर गुंडों का सरदार हो। या फिर चाहे बेवफ़ा ही क्यों न हो। मोहब्बत तो महबूबा के सिर पर चढ़ कर बोलती है, और वह बोली भी। चौदह से ज्यादा उन्नीस में बोली।

अब इक्कीस चल रहा है। महबूबा उसी श्मशान के सामने, जो उससे उसके उसी महबूब ने नारे लगवा कर बनवाये थे, शव वाहनों में लेटी लाश के रूप में अपनी बारी का इंतजार कर रही है। और उसका महबूब लाशों का उत्सव मना रहा है। वह तो चौबीस की प्लानिंग कर रहा है। और नैप्थय में गाना बज रहा है।

क्या से क्या हो गया, बेवफ़ा तेरे प्यार में ।

चाहा क्या, क्या मिला, बेवफ़ा तेरे प्यार में ।।

चलो सुहाना भरम तो टूटा,

जाना कि इश्क क्या है...

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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