NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
तिरछी नज़र : आहत भावनाओं का खौल कर बह जाना
आज-कल भावना बहुत ही अधिक होशियार, समझदार और संवेदनशील हो गई है। पहले जिन बातों से उसे जरा भी फर्क नहीं पड़ता था, जिन बातों की वह सुनी-अनसुनी कर  देती थी, उन्हीं को आज गौर से सुनती है, तवज्जो देती है और आहत हो जाती है। 
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
14 Mar 2021
तिरछी नज़र : आहत भावनाओं का खौल कर बह जाना
'प्रतीकात्मक तस्वीर' फोटो साभार :Sabrang India

देश में अपराध बहुत बढ़ रहे हैं। अपराध पहले भी होते रहे हैं और आज-कल भी हो रहे हैं। अपराधों में चोरी-चकारी, डाका डालना, खून-खराबा, दंगा-फसाद, ये सब पहले भी होते थे, आज भी हो रहे हैं। पर आज-कल एक नया अपराध भी अपराधों में शामिल हो गया है, वह है भावना का आहत होना।

अभी कल ही की बात है, मेरा मित्र राम थोड़ी दूर खड़ा था। मैंने उसे बुलाना चाहा। मैंने जरा जोर से आवाज लगाई 'ऐ राम, जरा इधर आ'। जब उसने नहीं सुना तो मैंने और जोर से आवाज लगाई। मैंने ध्यान दिया कि बराबर खड़े व्यक्ति की भोंहें तन गईं, वह बोला, 'क्या यह नहीं बोल सकते हो कि श्री राम चंद्र जी, कृपया जरा इधर आईये'। मैं समझ गया कि उसकी भावना आहत हो गई है। यह तो अच्छा हुआ कि वह व्यक्ति न तो पुलिस के पास गया और न ही कोर्ट की शरण में। नहीं तो मैं आज मैं जेल में होता, और किसी की भावना आहत करने के जुर्म में मुकदमा लड़ रहा होता।

ये भावना के आहत होने का अपराध तो भारतीय दंड संहिता में पहले से ही है। पर अन्य अपराधों की तरह यह अपराध भी अब ज्यादा ही होने लगा है। पहले यह भावना बात-बात पर, इतनी जल्दी, इतनी आसानी से आहत नहीं होती थी। भावना को आहत करने वाली जो बातें आज होती हैं पहले भी होती ही रहती होंगी पर उस समय यह भावना जरा बेवकूफ़ सी थी, जरा दिमाग से कमजोर थी। समझती ही नहीं थी कि किस बात से आहत होना है और किस से नहीं। 

पर आज-कल भावना बहुत ही अधिक होशियार, समझदार और संवेदनशील हो गई है। बेवकूफ़ तो वह हरगिज ही नहीं रह गई है। पहले जिन बातों से उसे जरा भी फर्क नहीं पड़ता था, जिन बातों की वह सुनी-अनसुनी कर  देती थी, उन्हीं को आज गौर से सुनती है, तवज्जो देती है और आहत हो जाती है। कैसी नाजुक हो गई है ये हमारी भावना। आजकल तो भावना आहत हो जाती है, किसी भी लेख से, कार्टून से, किसी फिल्म के नाम से, किसी भी फिल्मी डायलॉग से, या फिर किसी भी ओटीटी के कन्टेंट से। और तो और मेरे द्वारा अपने मित्र को जोर से बुलाने से भी।

भावनाएं आहत होने के अलावा उद्वेलित भी हो जाती हैं, यानि कि खौल जाती हैं। अब एक नारा है, 'जिस हिन्दू का खून न खौले, खून नहीं वह पानी है'। इस नारे को लगाने से बहुत सारे हिन्दुओं की भावनाएं उद्वेलित हो जाती हैं, खौल जाती हैं। लेकिन ये भावनाएँ पेट्रोल या रसोई गैस की कीमतों के बढ़ने पर नहीं खून नहीं, पानी ही बनी रहती हैं। और न ही खून बनती हैं नौकरी न मिलने से। ये भावनाएं बढ़ते बलात्कार के मामलों से भी पानी बनी रहती हैं, खौलती नहीं हैं। वे तो बस खून बन कर खौलती हैं एक धर्म विशेष के खिलाफ। ऐसा इसलिए क्योंकि वह किसी विशेष को 'सूट' करता है।

भावनाएँ आहत होने और खौलने के अलावा कई बार अपने साथ बहा भी ले जाती हैं। वे खुद नहीं बहती हैं, उन्हें बहाया जाता है। उनमें तूफ़ान लाया जाता है। और भावनाओं में तूफान लाने का काम ठेकेदारों का है, चाहे धर्म के हों या फिर राजनीति के, या फिर दोनों के घालमेल के। भावनाओं में बह कर किये गये अपराधों को कानून भी कम कर के आंकता है। कानून सोचता है कि यह अपराध तो भावना में बह कर हो गया, और यदि अपराधी भावना में नहीं बहा होता तो अपराध होता ही नहीं। और कानून भावना को तो सजा सुना नहीं सकता, इसलिए अपराधी को छोड़ देता है। ठीक ही तो है, घृणा पापी से नहीं पाप से करनी चाहिए। 

अब देखो न, न तो गोली मारने का आव्हान करने वाले मंत्री जी को कानून ने कोई सजा सुनाई और न ही मंत्री जी के भाषण के बाद भावना में बह कर सीएए का विरोध कर रहे लोगों पर पिस्तौल तानने वाले व्यक्ति को ही कोई कठोर सजा मिली। ऐसे ही दिल्ली दंगों से एक दिन पहले ही भावनाओं में तूफान पैदा करने वाला छुट्टा घूम रहा है और जो दंगों में अधिक मरे, अधिक घायल हुुुए और जिनके मकान आदि जले, वे ही जेलों में बंद हैं। 

अब पश्चिमी बंगाल में ही देखो, सात तारीख को ही चुनावी सभा में प्रधानमंत्री जी ने वर्तमान मुख्यमंत्री जी के नंदीग्राम में स्कूटी के फिसलने से घायल होने की भविष्यवाणी की। कुछ भावना में बहने वाले व्यक्ति भावना में बह ही गये। उन्हें लगा, नंदीग्राम भी है और ममता बनर्जी भी हैं। स्कूटी पर सवार भले ही न हों लेकिन वाहन पर सवार तो हैं ही। और भविष्य-दृष्टा, भविष्य-वक्ता, देश का भविष्य बनाने-बिगाड़ने वाले की बात तो पूरी करनी ही है। अब अगर कुछ लोगों की भावनाओं ने जोर मारा और भावनाओं के ज्वार में बहे चार पांच लोगों ने वह भविष्यवाणी पूरी कर दी तो किम आश्चर्यम्! 

खैर इस भावना प्रधान देश में, जहाँ जरा सी बात पर भावनाएँ आहत हो जाती हैं। जहाँ बात बात पर हमारी भावनाओं को खौलाया जाता है। जहाँ हमें भावनाओं में बहा कर अपना उल्लू सीधा किया जाता है। वहाँ कोई हिन्दू राष्ट्र बनाने के नाम पर हमारी भावनाओं से खेल रहा है तो उसमें बुराई क्या है? 

(इस व्यंग्य स्तंभ के लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

tirchi nazar
Satire
Political satire
Hindutva
Hate Crimes
Religious Hate

Related Stories

इतवार की कविता: वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

विज्ञापन की महिमा: अगर विज्ञापन न होते तो हमें विकास दिखाई ही न देता

तिरछी नज़र: बजट इस साल का; बात पच्चीस साल की

…सब कुछ ठीक-ठाक है

तिरछी नज़र: ‘ज़िंदा लौट आए’ मतलब लौट के...

बना रहे रस: वे बनारस से उसकी आत्मा छीनना चाहते हैं

तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...

तिरछी नज़र: ...चुनाव आला रे


बाकी खबरें

  •  Punjab security lapse
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब में पीएम की "सुरक्षा चूक" पर पूरी पड़ताल!
    06 Jan 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे में आज अभिसार शर्मा चर्चा कर रहे प्रधानमंत्री के पंजाब दौरे की। साथ ही वे नज़र डाल रहे हैं कि किस तरह मीडिया द्वारा किसानों को टारगेट किया जा रहा है
  • fact check
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेक : संबित ने जर्जर स्कूलों को सपा सरकार का बताया, स्कूल योगी सरकार के निकले
    06 Jan 2022
    एक बार फिर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने ट्विटर पर फ़ेक न्यूज़ के ज़रिये विपक्ष पर निशाना साधने की कोशिश की है।
  • jnu
    रवि कौशल
    जेएनयू हिंसा के दो साल : नाराज़ पीड़ितों को अब भी है न्याय का इंतज़ार 
    06 Jan 2022
    ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस की जांच भटक चुकी है। अब तक दोषियों की पहचान तक नहीं की जा सकी है।
  • punjab security
    शंभूनाथ शुक्ल
    'सुरक्षा चूक' की आड़ में राजनीतिक स्टंट?
    06 Jan 2022
    प्रधानमंत्री को एयरपोर्ट में पंजाब के अधिकारियों को दिए बयान से बचना चाहिए था। और जो कुछ करना था, वह सीधे गृह मंत्रालय के आला अधिकारी करते तो भविष्य में ऐसी किसी भी चूक से प्रशासन सतर्क रहते। तथा…
  • election
    सौरभ शर्मा
    यूपी: युवाओं को रोजगार मुहैय्या कराने के राज्य सरकार के दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते हैं!
    06 Jan 2022
    लगभग 43 उम्मीदवारो को उत्तर प्रदेश में पिछले साल विभिन्न चिकित्सा विभागों द्वारा विभिन्न कोरोना लहरों के दौरान में रोजगार पर रखा गया था। बाद में इन्हें काम से मुक्त कर दिया गया। उन्होंने इस कदम के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License