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भारत
राजनीति
ट्रैकर बैंड और CAA-NRC : दलितों को गुलाम बनाए रखने की नई साज़िशें
सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत अब एक नई तकनीक - सफाई कर्मचारियों के लिए - एक जीपीएस युक्त ट्रैकर बना रही है और सफाई कर्मचारियों को इसे पहनने के लिए बाध्य किया जा रहा है।
राज वाल्मीकि
24 Feb 2020
ट्रैकर बैंड

इस दौर-ए-सियासत का इतना-सा फ़साना है, बस्ती भी जलानी है मातम भी मनाना है।

वसीम बरेलवी का ये शेर आज के सन्दर्भ में दलितों के प्रति हो रही सियासत पर सटीक है। उनका शोषण भी करना है। उन पर अत्याचार भी करने हैं और दलित हितैषी होने का दिखावा भी करना है।

स्वच्छ भारत के नाम पर शौचालय भी बनाने हैं और सफाई कर्मचारियों को सीवरों में मरने के लिए विवश भी करना है।

जिस देश में सरकारों के पास मंगलयान और चंद्रयान के लिए आधुनिकतम तकनीकें हों, मगर इसके बावजूद सीवर की सफाई के लिए कोई विकल्प नहीं, कोई मशीनरी न हो, ये हैरत में डालने वाला है। इस इक्कीसवीं सदी में भी दलित वर्ग के सफाई समुदाय के लोगों को सीवर या गटर में उतारा जाता है। उन्हें अपनी जान देने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें यथास्थिति में बनाए रखने के लिए षड्यंत्र किया जाता है।

सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत अब एक नई तकनीक - सफाई कर्मचारियों के लिए - एक जीपीएस युक्त ट्रैकर बना रही है। सफाई कर्मचारियों को इसे पहनने के लिए बाध्य किया जा रहा है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सफाई कर्मचारी ठीक से काम नहीं करते इसलिए उन पर निगरानी के लिए जीपीस युक्त एक स्मार्ट बैंड उन्हें पहनाया जा रहा है। इस ट्रैकर में माइक्रोफोन है, वीडियो है। यानी ठेकेदार किसी महिला या पुरुष सफाई कर्मचारी से बात करना चाहता है उसे देखना चाहता है तो उसे देख सकता है। जाहिर है कि यह किसी भी सफाई कर्मचारी की निजता के अधिकार का उल्लंघन है। आधुनिक तरीके से गुलाम बनाए रखने की साज़िश है यह!

सवाल है कि क्या सफाई कर्मचारी इस देश के नागरिक नहीं हैं? क्या उन्हें निजता का अधिकार नहीं है? क्या उन्हें गरिमा के साथ जीने का अधिकार नहीं है?

काबिले-गौर यह भी कि आपके पास आधुनिक तकनीक से बनाए निगरानी बैंड हैं तो फिर सीवर साफ़ करने के लिए आधुनिक मशीने क्यों नहीं हैं – जिनसे सीवरों/मैनहोलों/सेप्टिक टैंकों की सफाई की जा सके। जिस से कि किसी इंसान की जान इनकी सफाई के दौरान न जाए। उन्हें बेमौत मरने से बचाया जा सके।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाडा विल्सन अपने एक ट्वीट में कहते हैं –“सफाई कर्मचारियों पर ट्रैकर लगाना छुआछूत और गुलामी को और अधिक मजबूती प्रदान करना है। जातिवादी मानसिकता की यह दबंगई लोकतान्त्रिक देश में अस्वीकार्य है।” वे सफाई कर्मचारियों के स्मार्ट बैंड बाँधने को लेकर प्रति प्रश्न करते हैं कि क्या वरिष्ठ सरकारी अधिकारीयों के कोई इस तरह का बैंड बांधेगा? क्या प्रधानमंत्री इस तरह का बैंड बांधकर काम करेंगे? क्या कोई जज या न्यायाधीश इस तरह के बैंड बाँध कर काम करेगा? क्या इन्हें कोई बैंड बाँधने का साहस दिखायेगा? सफाई कर्मचारियों के ऊपर ही ऐसे ट्रैकर क्यों थोपे जाते हैं? प्रशासनिक अधिकारीयों की जातिवादी मानसिकता को स्पष्ट तौर पर दर्शाता है यह कृत्य!

दरअसल सफाई कर्मचारियों को इंसान ही नहीं समझा जाता। छुआछात और जातिभेद के कारण उनके प्रति इंसानों जैसा नहीं बल्कि गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है।

इसी प्रकार CAA-NRC दलितों को गुलाम बनाए रखने की दूसरी नई साज़िश है। इस बारे में सरकार दलितों को गुमराह कर रही है कि यह सिर्फ नागरिकता देने का कानून है। जस्टिस न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार विरोध नागरिकता दिये जाने की नीयत और उसके भेदभाव पूर्ण होने के खिलाफ है।CAA–NRC ब्राह्मणवाद की जड़ों को मजबूत करके मनुवादी व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की साजिश है!

एक अनुमान के अनुसार :

· 6।2 करोड़ दलित आजीविका की तलाश में अन्य जिलों या राज्यों में पलायन करते हैं।

· 7%दलित अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं।

· शहरी क्षेत्रों में रहनेवाले लगभग 75% आश्रयहीन लोगों में 36 % दलित वर्ग से हैं।

· लगभग 81% दलित आबादी भूमिहीन है।

· शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत से बहुत ही कम है।

· लगभग 95% सफाईकर्मी समुदाय के लोग अपने मूल स्थान से आजीविका के लिये लम्बे समय पहले ही शहरों में पलायन कर चुके हैं। इनमें से लगभग 75% लोगों का अपने मूल स्थान से किसी भी प्रकार का रिश्ता नहीं रह गया है।

यदि उक्त आंकड़ों की कसौटी पर केंद्र सरकार द्वारा पारित नागरिक संशोधन कानून (सीएए) का अध्ययन किया जाये तो दलित वर्ग का यह सबसे बड़ा हिस्सा इस कानून के तहत अपनी नागरिकता को साबित करने में पूर्ण रूप से असफल रह सकता हैl

इन तथ्यों के प्रति सरकार की अनदेखी दलितों के प्रति एक बड़ी साजिश का एहसास कराती है

काबिले-गौर है कि देश के गृहमंत्री अमित शाह कई अलग-अलग मंचों पर लगभग यह स्पष्ट कर चुके हैं कि NRC की प्रक्रिया के दौरान देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने मूल निवास एवं अपने व अपने माता – पिता (दोनों या किसी एक) के जन्म का साक्ष्य देना होगा। यदि आपके पास पैन कार्ड, बैंक पासबुक, राशन कार्ड, पहचान पत्र, आधार कार्ड आदि जैसे दस्तावेज हों तो भी आप अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर सकते।

आप असम की जाबेदा या जुबेदा का ही उदाहरण लीजिए - उन्होंने अपनी और अपने पति की नागरिकता को साबित करने के लिए 15 प्रकार के दस्तावेज दिए। यह महिला हाईकोर्ट तक गई। नागरिकता सिद्ध करने में आए खर्चे के लिए उन्हें अपनी तीन बीघा जमीन बेचनी पड़ी। मगर फिर भी वह अपने नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाईं। पति बीमार हैं। उनकी छोटी बेटी पांचवी में पढ़ती है। जुबेदा अभी दिहाड़ी-मजदूरी कर अपना, अपनी बेटी और पति का पेट पाल रही हैं। वह 150 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर काम करती हैं। इसमें घर का खर्च और पति के इलाज का खर्च अलग से - कैसे संवारे गृहस्थी? ऊपर से नागरिकता साबित न कर पाने के कारण घर से बेदखल होने का हर समय भय। उनको और उनके पति को वोट देने का अधिकार भी नहीं! यही स्थिति दलितों के बड़े तबके की होने जा रही है।

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर साफ़ साफ़ कहते हैं –“यह कहा जा रहा है कि CAA कानून मुसलमान विरोधी है – यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि जहाँ CAA विदेशी मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करने की कोशिश है ,वहीं NRC देश की बहुत बड़ी आबादी से उसकी नागरिकता छीनने की कवायद है। हम कैसे भूल सकते हैं कि असम में जो 19 लाख लोग नागरिकता से हाथ धो बैठे हैं उनमे से 14 लाख हिंदू हैं। इसकी सबसे बुरी मार नोमेडिक ट्राइब यानी घुमंतू जनजातियों पर पड़ने वाली है जिनके पास न कोई जमीन है न कोई कागजात। आदिवासी, दलित, ओबीसी भी कागजात के अभाव में नागरिकता खो देंगे। और वे तमाम गरीब जिनके पास न जमीन का कागज है, न जन्म का प्रमाणपत्र, उन सब को उठाकर सीधे डिटेंशन कैम्प में डाल दिया जाएगा! ये सब नागरिकता से वंचित हो जायेंगे! ये सरकार बिलकुल सुनियोजित ढंग से मनुवाद लागू करना चाहती है।”

दलितों पर हाल ही में घटित कुछ घटनाएं दिल दहलाने वाली और बेहद चिंताजनक हैं। राजस्थान में किस तरह एक दलित युवक की पहले तो जमकर पिटाई की जाती है फिर उसके गुप्तांग में पेट्रोल डाला जाता है। और हँसते हुए उसका वीडियो बनाया जाता है। युवक पर बेबुनियाद आरोप लगाया जाता है कि जब वह अपनी बाईक की रिपेयरिंग करवाने आया था तब उसने मैकेनिक के रुपये चुराए थे। कानपुर देहात में 25-30 महिलाओं और पुरुषों की बर्बर तरीके से पिटाई की जाती है –उनका कसूर यह बताया जाता है कि वो हमारे देवी-देवताओं को न मान कर “भीम कथा” का आयोजन करते हैं। मध्य प्रदेश में दलित युवक के पानी पीते समय उसके छींटे सवर्ण युवक पर पड़ने की वजह से उसकी गोली मार कर हत्या कर दी जाती है।

सरकार सरकारी विभागों का निजीकरण कर वैसे भी आरक्षण को ख़त्म कर रही है। पदोन्नति में आरक्षण को सरकार के स्व-विवेक पर छोड़ा जा रहा है। यानी असल में सरकार आरक्षण को समाप्त कर रही है। दूसरी ओर सामान्य वर्ग को भी 10 प्रतिशत आरक्षण दे रही है। वोट की राजनीति करने के कारण यह कहने को भी विवश है कि आरक्षण को समाप्त नहीं किया जायेगा।

ब्राह्मणवादी व्यवस्था आधुनिक तरीकों से दलितों को फिर से गुलाम बनाए रखने की साज़िश रच रही है। ट्रैकर बैंड और NRC और CAA इसका ताजा उदाहरण है। सरकार NRC के नाम पर ऐसे-ऐसे दस्तावेज मांगेगी जो दलित उपलब्ध ही नहीं करा पायेंगे। इससे वे न केवल वोट से वंचित कर दिए जायेंगे बल्कि उनकी संपत्ति (यदि हुई तो) वह भी कुर्क कर ली जायेगी इसके साथ ही उन्हें डिटेंशन कैम्पों में भेज दिया जाएगा। इस तरह वे फिर उसी तरह गुलाम हो जायेंगे जिस तरह पांच हजार साल पहले थे।

संविधान को जलाने वाले और यह कहने वाले कि मोदी जी कोर्ट के माध्यम से मुसलामानों और दलितों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दो। इनकी नीयत साफ-साफ़ पता चल रही है कि ये संविधान को समाप्त कर मनुस्मृति वाले युग को फिर से लाना चाहते हैं। यही वजह कि वैज्ञानिक सोच वालों पर हमला हो रहा है। मुसलमानों, दलितों और महिलाओं पर हमले तेज हुए हैं। कुल मिलकर एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जहां एक खास वर्ग का ही वर्चस्व रहे और बाकी नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर गुलामों जैसा जीवन जीने को बाध्य कर दिया जाए। क्योंकि उनकी पारंपरिक सोच यही कहती है कि दलितों का जन्म उनकी सेवा करने के लिए हुआ है और वे समर्पित भाव से उनकी सेवा में लगे रहें। संविधान, समानता, स्वतंत्रता, समता और न्याय की बात न करें। अपने अधिकारों की बात न करें।

आज ऐसी साजिशों को समझने और उनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है।

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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