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नागरिकता संशोधन क़ानून से आदिवासियों को डर
आदिवासी बुद्धिजीवियों और संगठनों का कहना है कि उन आदिवासी धर्मावलंबियों का क्या होगा जिनका उल्लेख सीएए में नहीं है। यानी 2011 की जनगणना के अनुसार जो हिंदू, जैन, सिख, ईसाई, पारसी या बौद्ध नहीं हैं।
अश्विनी कुमार पंकज
21 Dec 2019
aadiwasi and NRC
Image courtesy: SabrangIndia

भाजपा की केंद्र सरकार और राज्य सरकारें देश की जनता को यह समझाने में जुटी है कि नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं है। वहीं दूसरे सामाजिक-राजनीतिक संगठन कह रहे हैं कि यह मुस्लिमों के साथ-साथ सभी के लिए ख़तरनाक है। लेकिन असम के लोग कह रहे हैं ये मामला हिंदू-मुस्लिम का नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व का है। क्योंकि पड़ोसी देशों से भारत में तथाकथित धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर आए सबसे ज्यादा लोग पूर्वोत्तर के असम में ही हैं।

सीएए को लेकर एक तीसरी आशंका आदिवासियों की है। आदिवासी बुद्धिजीवियों और संगठनों का कहना है कि उन आदिवासी धर्मावलंबियों का क्या होगा जिनका उल्लेख सीएए में नहीं है। यानी 2011 की जनगणना के अनुसार जो हिंदू, जैन, सिख, ईसाई, पारसी या बौद्ध नहीं हैं।

आदिवासियों का सवाल यह भी है कि जब संविधान की छठी अनुसूची में शामिल आदिवासी क्षेत्रों को इससे मुक्त रखा गया है तो फिर पांचवीं अनुसूची के इलाकों को क्यों छोड़ दिया गया है? क्या इसलिए कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जो पांचवीं अनुसूची में आते हैं वहां शरणार्थियों और घुसपैठियों को सरकार बसा सके? जैसा कि भारत-पाक विभाजन और बांग्लादेश के उदय के बाद से सरकार करती रही है?

गौरतलब है कि असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के आदिवासी इलाक़े व इनर लाइन के अंदर आने वाले अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड के आदिवासी क्षेत्रों को सीएए की परिधि से बाहर रखा गया है। इसके अंतर्गत कार्बी आंगलॉन्ग (असम), गारो हिल्स (मेघालय), चकमा डिस्ट्रिक्ट (मिजोरम) और त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज डिस्ट्रिक्ट आते हैं। साथ ही पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड के वे इलाक़े जो बंगाल ईस्टर्न रेग्युलेशन्स, 1873 के तहत ‘इनर लाइन परमिट’ (आईएलपी) से रेग्युलेट होते हैं, उन पर भी यह क़ानून लागू नहीं होगा। आईएलपी एक विशेष परमिट होता है जिसे भारत के दूसरे हिस्सों के नागरिकों को भी इनर लाइन वाले राज्यों अथवा क्षेत्रों में यात्रा करने तथा वहां प्रवास करने के लिए लेना जरूरी होता है।

‘ऑल इंडिया चकमा सोशल फोरम’ (त्रिपुरा) के सुहास चकमा सीएए- 2019 को असंवैधानिक क़रार देते हुए कहते हैं, ‘क्यों केवल संविधान की छठी अनुसूची के तहत जनजातीय स्वायत्त ज़िला परिषद क्षेत्रों को ही छूट दी गई है, इसे पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों तक क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता है? यदि बगैर आदिवासी बहुमत वाले पूरे मणिपुर को छूट मिल सकती है तो फिर इनर लाइन एरिया के रूप में घोषित असम और त्रिपुरा भी पूरी तरह से इस कानून से बाहर रखा जा सकता है।’

अरुणाचल की आदिवासी लेखिका जोराम यालाम नाबाम लिखती हैं, ‘हम उत्तर पूर्व के लोग धर्म-वर्म की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। हम कह रहे हैं कि अब हम अपना घर और ज़मीन नहीं बांटना चाहते ‘अवैध विदेशियों’ के साथ, वह चाहे हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो, चाहे ईसाई हो, चाहे बौद्ध!! अपने ही घर में हम सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं!!’

झारखंड की आदिवासी लेखिका और संस्कृतिकर्मी वंदना टेटे के अनुसार सीएए से सबसे ज्यादा प्रभावित पांचवीं अनुसूची क्षेत्र वाला राज्य झारखंड होगा। जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। झारखंड बंगाल से सटा हुआ है और यहां पचास के दशक के विभाजन के समय से ही बड़ी संख्या में शरणार्थियों और घुसपैठियों को बसाया जाता रहा है। सीएए लागू होने के बाद झारखंड संवैधानिक रूप से ऐसे लोगों का स्वर्ग बन जाने वाला है। यही हाल पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों वाले दूसरे आदिवासी इलाकों का भी होगा। इसलिए हम चाहते हैं कि देश उस मूल सवाल पर बहस करे जो असम ने उठाया है। भाषा, संस्कृति और पहचान का सवाल। परंतु लोग इस सवाल पर बात नहीं करना चाहते। सबकी दिलचस्पी हिंदू-मुस्लिम विवाद में है।’

आईआईटी, मुम्बई के आदिवासी छात्र जावर भील कहते हैं, ‘यह एक ज्ञात तथ्य है कि आदिवासियों की धार्मिक मान्यताएं और प्रथाएं भारत में प्रचलित मुख्यधारा के धर्मों से काफी हद तक भिन्न हैं, विशेष रूप से उनसे जो सीएए में उल्लिखित हैं। झारखंड का उदाहरण लें। 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड की कुल आदिवासी आबादी 86,45,042 है। धार्मिक दृष्टि से देखने पर इसमें से 46.71 प्रतिशत आदिवासी वैसे हैं जो ‘अन्य धर्म’ और ‘धर्म उल्लेखित नहीं’ वर्ग में आते हैं। यह इस तथ्य को सामने लाता है कि झारखंड के लगभग आधे आदिवासी सीएए में वर्णित धर्मों से संबंधित नहीं हैं। ऐसा ही आंकड़ा भारत के दूसरे आदिवासी बहुल राज्यों में देखने को मिलेगा।’

जावर के अनुसार इसका मतलब यह हुआ कि यदि देशव्यापी एनआरसी एक वास्तविकता बन जाती है और इन श्रेणियों के लोगों को छोड़ दिया जाता है (जो कि संभवतः वे करेंगे) तो आदिवासियों की स्थिति ‘स्टेटलेस’ (राज्यविहीन) हो जाएगी क्योंकि सीएए भी उनके लिए कोई सुरक्षा वाल्व प्रदान नहीं करता है। आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को देखते हुए यह बहुत साफ है कि देशव्यापी एनआरसी से उन्हें बाहर करने की सीमा किसी भी अन्य समूह की तुलना में सबसे ज्यादा होगी। जो उनकी दुर्दशा को और बढ़ा देगा।

भारतीय फिल्म एवं टेलिविजन संस्थान, पूणे के पासआउट फिल्मकार रंजीत उरांव इसीलिए जोर देकर कहते हैं कि एनआरसी और सीएए मूल रूप से एक सांस्कृतिक सवाल है। रंजीत झारखंड के आदिवासी हैं और उनका मानना है कि ‘हमारी सांस्कृतिक और जातीय पहचान धार्मिक पहचान से ऊपर होती है। अक्सर जिसे हमलोग भ्रमवश एक ही मान लेते हैं। जबकि असम स्पष्ट रूप से समझता है कि घुसपैठिए कैसे उनके सांस्कृतिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा रहे हैं और सीएए भविष्य में राजनीतिक रूप से किस हद तक उनको प्रभावित करने वाला है। इसलिए वे सभी ग़ैरक़ानूनी अप्रवासियों का उनके धर्मों के बावजूद विरोध कर रहे हैं। हमें इसे केवल हिन्दू या मुस्लिम के अर्थ में नहीं देखना चाहिए जैसा कि हमें बताया जा रहा है। परंतु देशज और आदिवासी मानस भाषाई, सांस्कृतिक और जातीय आधार पर ही सीएए से बहस और मुठभेड़ करना चाहता है।’

रंजीत यह भी कहते हैं कि ‘हमें यह समझना होगा कि जो असम एनआरसी पर चुप था वह सीएए पर क्यों इतना उग्र है। इसलिए कि एनआरसी अवैध प्रवासियों को असम से बाहर करता था पर सीएए उन्हें भीतर करता है। सीएए से सबसे ज्यादा फायदा अवैध हिंदू प्रवासियों को होगा जिससे असम का देशी सांस्कृतिक ताना-बाना तो बिगड़ेगा ही नहीं वरन् वहां की राजनीतिक-आर्थिक संरचना भी भविष्य में उनके हाथ से निकल जाएगी। इस डर ने ही एनआरसी समर्थक असम को सीएए का धुर विरोधी बना दिया।’

छठी अनुसूची क्षेत्र के आदिवासी राज्य फिलहाल सीएए पर चुप हैं और पांचवीं अनुसूची के आदिवासी बहुत इलाक़े अभी इसको लेकर बहुत मुखर नहीं हुए हैं। झारखंड की राजधानी रांची, जमशेदपुर और पलामू में सीएए के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन हुए हैं उनमें आदिवासी संगठनों की भागीदारी नहीं के बराबर थी। इसीलिए इन प्रदर्शनों का मूल स्वर भाषाई-सांस्कृतिक पहचान की बजाय हिंदू-मुस्लिम और धर्मनिरपेक्षता ही थी। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पांचवीं अनुसूची वाले राज्य झारखंड में सीएए को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है। या कि छठी अनुसूची के आदिवासी सीएए की आड़ में चल रहे खेल को नहीं समझ रहें।

जोराम इस खेल का खुलासा करते हुए कहती हैं, ‘हिन्दू मुस्लिम के चक्कर में हम ही पिसने वाले है! त्रिपुरा का जो हाल हो गया है उसे देखने भर के लिए नहीं, समझने के लिए कभी आइए यदि आप में से कोई सच्चे देश भक्त है तो! त्रिपुरा और आसाम के लोग जो इस वाहियात क़ानून के विरुद्ध सड़कों पर उतर रहे हैं, उनमें 99 प्रतिशत हिन्दू ही हैं! जो लोग देश के सीमा पर नहीं रहते वे कभी समझ नहीं सकते कि देश क्या है! इसीलिए उनके पास अपने कैप्टन के साथ मिलकर धर्म-धर्म खेलते हुए समय बिताने का काफ़ी समय होता है।’

इस संदर्भ में ‘आदिवासी साहित्य’ के संपादक डॉ. गंगा सहाय मीणा का यह कहना बहुत मौजूं है कि ‘हम में से ज्यादातर लोग संयोग से भारतीय हैं। वे यहां पैदा हुए, इसलिए। किसी दूसरे मुल्क में पैदा होते तो वहां के हो जाते। लेकिन कुछ लोगों ने भारतीयता को चुना है। उनके पास विकल्प था। वक्त ये सवाल पूछ रहा है कि क्या भारतीयता को चुनना उनकी भूल थी?’

डॉ. मीणा का यह सवाल हमें आदिवासियों के सबसे बड़े नेता जयपाल सिंह मुंडा के उस वक्तव्य तक ले जाता है जो उन्होंने संविधान सभा की बहस के दौरान पचास के दशक में कहा था। उन्होंने कहा था कि ‘आदिवासी लोग इस देश के सबसे पहले नागरिक हैं और किसी भी भारतीय से पहले भारतीय हैं। वे इस विश्वास के साथ भारत को अपना रहे हैं कि आज़ाद होते नए भारत में आदिवासियों के लिए भी सबकुछ समान होगा।’ लेकिन पिछले सत्तर सालों का अनुभव यही है कि आदिवासियों को उनके पुरखा इलाकों से खदेड़ा गया और उस पर बाहरी राज्यों व अवैध प्रवासियों को बसाया गया।

पांचवीं अनुसूची वाले राज्यों के आदिवासी बुद्धिजीवी और संगठन ‘वाच और वेट’ की मुद्रा में हैं। वे यह अच्छी तरह से देख रहे हैं कि कैसे तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया ने असम के भाषाई, सांस्कृतिक और जातीय पहचान के मुख्य सवाल को सिर्फ हिंदू बनाम मुस्लिम का मुद्दा बना कर उसका अपहरण कर लिया है। साथ ही तथाकथित मुख्यधारा के समाज और मीडिया ने बड़ी सफाई से आदिवासियों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव पर चुप्पी साध ली है। सीएए को केवल धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता का मुद्दा बना दिया है। जबकि पांचवीं अनुसूची के आदिवासी एनआरसी और सीएए को अपने परंपरागत अधिकारों के लिए सबसे बड़े ख़तरे के रूप में देख रहे हैं।

(लेखक के निजी विचार हैं।)

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