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अमेरिका
ट्रम्प हमें युद्ध में धकेल रहे हैं, मगर हम इस संकट की अनदेखी कर रहे हैं
अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ़ कर दिया है कि अमेरिकी संविधान और लोकतंत्र की किसी भी क़ीमत पर उनका इरादा सत्ता से चिपके रहने का है।
सोनाली कोल्हटकर
13 Oct 2020
ट्रम्प

अपने राष्ट्रपति काल की शुरुआत से ही डोनाल्ड ट्रम्प दायरे से आगे बढ़ते रहे, संविधान का उल्लंघन करते रहे, और नियमों और मानकों की धज्जियां उड़ाते रहे हैं। लेकिन,पिछले साल के दौरान उन्होंने इस देश पर अपने हमलों को इस क़दर काफ़ी बढ़ा दिया है कि हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हो गये हैं, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति देश को युद्ध में झोंक रहे हैं, भले ही हममें से बहुतों को इसका एहसास तक न हो

कोरोना वायरस से जूझते हुए वाल्टर रीड नेशनल मिलिट्री मेडिकल सेंटर से ट्वीट करते हुए ट्रम्प ने वफ़ादार सैनिकों की भर्ती को लेकर ट्विटर पर एक संदेश पोस्ट किया था। उन्होंने उस पोस्ट में अपनी एक तस्वीर लगायी और उस तस्वीर के साथ उनके शब्द कुछ इस तरह थे, “राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए लड़ें!” यह "आर्मीफ़ॉरट्रम्प डॉट कॉम" नामक पेज से जुड़ा हुआ था। फिर से चुने जाने को लेकर ट्रम्प के अभियान के तहत मार्च 2020 में इस वेबसाइट को लॉन्च किया गया था और "पैट्रियटस ओनली" को धन जुटाने को लेकर ईमेल भेजे थे, और उन्हें बताया था कि वे "ट्रम्प आर्मी के लिए एक उत्कृष्ट परिशिष्ट बनायेंगे।" युद्ध के मुद्दे को और आगे ले जाते हुए इस अभियान ने चंदे के बदले में ट्रम्प के अभियान के नारे के साथ यह कहते हुए आर्मी टोपियां भेजने का वादा किया था कि "राष्ट्रपति चाहते हैं कि आप और हमारे विशिष्ट ट्रम्प आर्मी के हर सदस्य के पास ख़ुद की पहचान को लेकर कुछ न कुछ उसी तरह की चीज़ होनी चाहिए", जिस तरह सैनिक अपने बिल्ले या वर्दी से पहचाने जा सकते हैं। और इस अभियान संदेश के मुताबिक़, ट्रम्प के समर्थकों से उम्मीद की जा रही है कि “जब लिबरल टोली से भिड़ने की बात आये, तो वे राष्ट्रपति की रक्षा की पहली पंक्ति बनें।

इस तरह की ज़बान भी अगर पर्याप्त रूप से परेशान करने वाली नहीं दिखती हो, तब तो इस बात पर ग़ौर करना अहम हो जाता है कि वास्तविक मुक़ाबले को लेकर ट्रम्प के पास उनकी तरफ़ से लड़ने वाले बड़ी संख्या में वफ़ादार सशस्त्र दक्षिणपंथी समूहों की सेना पूरी तरह तैयार हैं। डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार,जो बिडेन के साथ 90 मिनट तक चली अपनी पहली बहस के दौरान ट्रम्प महज़ एक बार तब डगमगाये थे, जब मॉडरेटर क्रिस वालेस ने उन पर साफ़ तौर पर श्वेत वर्चस्व का आरोप लगाया था। जब वालेस ने ग्रुप प्राउड बॉयज़ का नाम लिया था, तो ट्रम्प ने पहले तो यह कहा कि उन्हें "पीछे हट जाना" चाहिए, लेकिन इसके बाद इस बात को जोड़ने से ख़ुद को नहीं रोक सके कि "और तैनात रहो", जो कि किसी भी लिहाज़ से उनकी मदद के लिए तैयार रहने का एक मात्र संकेत है। यह सच्चाई है कि ट्रम्प ने अपने तरह के आदेशों को जारी करते हुए प्राउड बॉयज़ के साथ अपनी सहजता को महसूस किया था और जब हम ऐसा सोचते हैं, तो हमें गहरे तौर पर परेशान होने ज़रूरत है कि यह समूह श्वेत वर्चस्ववादी, महिलाओं से नफ़रत करने वाले और सशस्त्र पुरुषों से बना समूह है।

भले ही ट्रम्प को अचानक बहस के एक दिन बाद याद आया हो कि उन्हें साफ़ तौर पर यह पता नहीं है कि प्राउड ब्यॉज़ कौन हैं, लेकिन इस समूह ने तुरंत इस बात का ऐलान कर दिया था इस समूह को ट्रम्प की सेवा करने में ख़ुशी होगी, और उस समूह ने राष्ट्रपति से मिले अपने किसी सैनिक को रवाना करने वाले नये आदेशों को दर्शाते हुए एक नया लोगो भी जारी कर दिया। अगर ऐसा ही परिदृश्य किसी अन्य राष्ट्र में चल रहा होता, तो अमेरिकी विदेश विभाग और अमेरिकी मीडिया घराने इन्हीं प्राउड ब्यॉज़ को ऐसे "सशस्त्र दक्षिणपंथी अर्धसैनिक" समूह के तौर पर दर्शा रहे होते, मानों उसका आह्वान देश का नेता तख्तापलट की धमकी देने के लिए कर रहा हो।

जिस दिन ट्रम्प व्हाइट हाउस लौटे, वह बीमार थे, लेकिन ज़ाहिर तौर पर तब भी 15 अक्टूबर को बिडेन के साथ एक निजी स्तर पर चलने वाली किसी बहस को आगे बढ़ाना चाहते थे। जब राष्ट्रपति पद के दावेदारों के बीच बहस कराने वाले आयोग ने इस बात का ऐलान किया कि कोरोनोवायरस की चिंताओं को देखते हुए वर्चुअल बहस आयोजित की जायेगी, तो ट्रम्प ने फ़ॉक्स बिजनेस को दिये गये साक्षात्कार में कहा था, “मैं किसी वर्चुअल बहस पर अपना वक़्त बर्बाद नहीं करने जा रहा हूं।” उन्होंने आयोग पर "बिडेन को बचाने की कोशिश करने" का आरोप लगाया। दरअसल, इस परिदृश्य में ट्रम्प ने बिडेन के ख़िलाफ़ ख़ुद को किसी जैविक हथियार की तरह पेश कर दिया है, और इस बात को भी कुछ इस तरह से पेश कर दिया है कि उनके अपने स्टाफ़ के सदस्य और गुप्त सेवा एजेंट अस्पताल से उनकी समय से पहले चले आने और व्हाइट हाउस लौट आने के मद्देनज़र "सामानांतर नुकसान" पहुंचा रहे हैं, जबकि वह शक्तिशाली स्टेरॉयड ले रहे थे। ट्रम्प, बिडेन की तरफ़ से किये जाने वाले कथित टाल-मटोल को एक घातक बीमारी के डर से अपने प्रतिद्वंद्वी (क़ानूनी) के ख़िलाफ़ ट्रंप अपनी ताक़त दिखाने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल करते हुए दिखते हैं।

शायद प्रांत-दर-प्रांत के हो रहे चुनावों के बाद जो बिडेन की लोकप्रियता ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, ऐसे में कई अमेरिकी मतदान के ज़रिये ही ट्रम्प को हराने का भरोसा कर सकते हैं। अगर देश किसी ऐसे राष्ट्रपति और किसी ऐसी पार्टी पर भरोसा करे,जो लोकतंत्र के नियमों से खिलवाड़ करता है, तब तो ट्रंप के लिए  यही स्थिति ठीक होगी। लेकिन ट्रम्प के लिए "एकमात्र मतदान, जो मायने रखता है, वह है चुनाव के दिन किये गये लोगों का मतदान।"

मतदान के नतीजों को बार-बार "फ़र्ज़ी" (हर कहीं) होने का बार-बार आरोप लगाते हुए और ग़ैर-मौजूद "मतदाता वाली धोखाधड़ी" को लेकर बार-बार झूठ बोलते हुए वह एक झूठे विश्वास से प्रेरित होने वाले अपने समर्थकों की फ़ौज के बीच ज़मीनी स्तर पर झूठ बोले जा रहे हैं। वे आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उनके राष्ट्रपति पद की एक वैध जीत से वंचित किया जा रहा है और चुनाव के दिन वे बचाव की स्थिति में आ जायें, इसके लिए तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं।

बिना कोई मौक़ा गंवाते हुए ट्रम्प अपने सबसे सक्षम नेता और सीनेट के मेजोरिटी लीडर, मिच मैककोनेल के ज़रिये यह सुनिश्चित करने को लेकर काम कर रहे हैं कि उनके पास सुप्रीम कोर्ट में एक बदलाव विरोधी एक विशाल बहुमत है। सुप्रीम कोर्ट के अगले न्यायधीश से "संभावित रूप से अगले राष्ट्रपति को चुनने में किस तरह मदद मिलेगी", इस बारे में उनके समर्थकों के एक ट्वीट के जवाब में ट्रम्प ने एक रिट्वीट करते हुए अपने समर्थकों की उसी धारणा की पुष्टि की और अपनी हुक़ूमत की वापसी को लेकर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि न्यायाधीश अमे नोनी बैरेट के चुने जाने की कंन्फ़र्मेशन को तेज़ और आसान’ बनाने की कोशिश की जायेगी !"

सच्चाई को उजागर करते हुए और इस बारे में लिखते हुए क़ानून के प्रोफ़ेसर, मार्जोरी कोहन ने ट्रम्प के इन इरादों को "तख़्तापलट के प्रयास" के तौर पर दर्शाया है। इस बारे में मार्जोरी कोहन की स्पष्टवादिता भले ही अनूठी हो, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया घराने में रिपोर्टिंग करने वालों के बीच ट्रम्प के हमें युद्ध में उलझा देने की गंभीरता को लेकर बहुत कम संकेत मिलते हैं। “तख़्तापलट” और “अर्धसैनिक” जैसे शब्द तो अन्य देशों, यानी कथित नाकाम देशों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द हैं। लेकिन, अब समय आ गया है, जब यह शब्द संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए इस तरह के शब्द पहले से कहीं ज़्यादा उपयुक्त हो गया है।

दरअसल, सरकार में डेमोक्रेट्स को ट्रम्प के इस तानाशाही उन्माद के ख़िलाफ़ मज़बूत दीवार की तरह देखा जाता है, लेकिन अफ़सोसनाक बात है कि उनकी तरफ़ से इस चुनावी लड़ाई को जितनी गंभीरता से लेने की अपेक्षा की जा रही थी, वे उतनी गंभीरता से इसे नहीं ले रहे हैं। जब बैरेट की पुष्टि करने के लिए मैककॉनेल की समय सीमा को टाले जाने का मौक़ा दिया गया था, तो इस पर डेमोक्रेटिक पार्टी सीनेटर ख़ामोश रहे और उन्हें "सर्वसम्मति से सहमति" दे दी, जबकि उन्हें नामांकन के लिए सीनेट को दो सप्ताह के लिए स्थगित करने की आवश्यकता थी। ऐसे कई तरीक़े थे, जिनके ज़रिये डेमोक्रेट्स, मैककॉनेल के एजेंडे को धूल चटा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। डेमोक्रेट्स इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं या शायद इस बात का ध्यान नहीं दे पाते हैं कि राष्ट्रपति ट्रम्प, सरकार पर कब्ज़ा करने के लिए तैयार बैठे हैं।

अब सवाल है कि जो अमेरिका के जो लोग ट्रम्प की लड़ाई को लेकर चिंतित दिखायी पड़ते हैं,वे इस लड़ाई को कैसे लड़ पायेंगे? बेशुमार हथियारों का सामना कर रहा एक ऐसा देश, जहां ये हथियार ज़्यादतर उन लोगों के हाथों में रहा है, जो दूसरे संविधान संशोधन पर ख़ुश हो रहे थे, ऐसे में सवाल पैदा होता है कि क्या किसी राष्ट्रपति और उनके सशस्त्र अर्धसैनिकों से राष्ट्र को वापस जीतने का एक यही तरीक़ा तो नहीं बचा है? लेफ़्ट के कुछ लोगों ने भी ख़ुद को हथियारों से लैस करना शुरू कर दिया है, लेकिन इसका अंत तो और भी हिंसा में होगा। वाशिंगटन स्थित लेसी के माइकल रीनोहेल, जिसपर ट्रम्प समर्थक की हत्या का संदेह था, उसने अपने बारे में कहा था कि उसने अपने बचाव में गोली चलायी थी, लेकिन उससे संपर्क साधा गया और उसकी गिरफ़्तारी की गयी, और इसी  दौरान संघीय सैनिकों द्वारा उसे गोली मार दी गयी, मगर जनता के बीच जो धारणा बनी, उसके तहत उस गोली मारने वाली घटना को उसकी हत्या के तौर पर देखा गया। ट्रम्प ने इस न्याययेत्तर हत्या (जिस पर अब तक बहुत कम ध्यान गया है) को ‘बदले में की गयी हत्या” कहकर ख़ुशी ज़ाहिर की।

ट्रम्प और उनकी सेना के ख़िलाफ़ अहिंसक लड़ाई सही मायने में राजनीतिक, क़ानूनी और सांस्कृतिक लड़ाई है। मगर,अफसोस की बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों के पास इस लड़ाई को लड़ने के लिए ज़रूरी राजनीतिक भूख ही नहीं है। लेकिन, मतदान की सुरक्षा को लेकर लड़ी जाने वाले कई क़ानूनी लड़ाइयों के कुछ नतीजे भी सामने आये हैं, और जॉर्जटाउन लॉ के इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्स्टीट्यूशनल एडवोकेसी एंड प्रोटेक्शन (ICAP) के वक़ीलों ने मतदान पर नज़र रखने वालों सशस्त्र लोगों का सामना करने जा रहे 50 राज्यों के मतदाताओं के लिए सहायक फ़ैक्ट शीट बनाये हैं। पहली बार, अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में गंभीरता से शामिल हुआ है, "क्योंकि अमेरिका में नागरिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दे अविश्वसनीय तौर पर दांव पर लगे हुए हैं।”

सांस्कृतिक मोर्चे पर इस लड़ाई के प्रभावी अहिंसक साधनों में प्राउड बॉयज़ जैसे समूहों की शक्ति को कम करने के लिए हास्य का इस्तेमाल किया जा रहा है या फिर तर्कों से उसके दावे की हवा निकाली जा रही है, मिसाल के तौर पर एक्टिविस्ट और एक्टर जॉर्ज टेकी ने लेसबियन, गे, बाइसेक्सुअल एंड ट्रांसजेंटर क्वेस्चन (LGBTQ) जैसे संगठनों की जोड़ियों को उनके हैशटैग को क़ाबू करने के लिए प्रोत्साहित किया है। और इतना ही कहा जा रहा है कि देश में हम में से सभी के ख़िलाफ़ व्हाइट हाउस से जो लड़ाई लड़ी जा रहा है, उसका वाजिब जवाब दिया जाना बेहद अहम है।

अजीब बात तो यही है कि राष्ट्रपति अपने इरादों को छिपाने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। मीडिया घरानों, उदारवादी पंडितों और राजनीतिक हस्तियों को इस बात तात्काल आगे बढ़ाने की ज़रूरत है कि हम इस समय किसी बग़ावत की कगार पर हैं। अभी तक वे तमाम अमेरिकी, जो चुनाव में ट्रम्प को हराने की उम्मीद पाले हुए हैं, वे इस बात से भले ही ख़ुश हो लें, मगर वे इस बात से अनजान ही होंगे कि ट्रंप की तैयारी सत्ता से चिपके रहने को लेकर किस हद तक है, उदारवादी नेता सालों से इसी बयानबाज़ी से बेफ़िक़्र रहे हैं कि मतदान का निरंतर होते रहना ही राजनीतिक तौर पर एक अच्छा विकल्प है। मगर,ऐसा नहीं है, और हम इस बात को शायद चुनाव के दिन ही समझ पायेंगे कि ट्रम्प के सत्ता हथियाने के ख़िलाफ़ यह बयानबाज़ी कितना नाकाफ़ी साबित होने वाली है।

सोनाली कोल्हटकर एक टेलीविजन और रेडियो शो, "राइज़िंग अप विद सोनाली" की संस्थापक, होस्ट और कार्यकारी निर्माता हैं,यह शो फ़्री स्पीच टीवी और पैसिफ़िक स्टेशनों पर प्रसारित होता है।

यह लेख इकोनॉमी फ़ॉर ऑल की तरफ़ से प्रस्तुत किया गया था, जो इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टिट्यूट की एक परियोजना है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

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