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फ़िलीस्तीनी प्रतिरोध को तुर्की का साथ, फिर से शुरू हो सकती है अरब क्रांति की लहर
आने वाले दिनों को इस बात को भांपते हुए एर्दोगान ने एक सधी हुई चाल चली है कि यूएई और इजरायल के बीच अमेरिका द्वारा प्रायोजित समझौते के पीछे का एक मक़सद पश्चिम एशिया में एक नये क्षेत्रीय व्यवस्था का निर्माण है।
एम. के. भद्रकुमार
28 Aug 2020
फ़िलीस्तीनी प्रतिरोध को तुर्की का साथ, फिर से शुरू हो सकती है अरब क्रांति की लहर
इस्तांबुल में 22 अगस्त, 2020 को तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगान (बीच में) ने इस्माइल हन्नीह (बायें) के नेतृत्व में हमास के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की।

तुर्की ने यूएई और इज़राइल के बीच हालिया समझौते के बाद क्षेत्रीय बिसात पर उस समय अपनी पहली यह चाल चल दी थी, जब 22 अगस्त को इस्तांबुल में राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगान ने फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध समूह, हमास के एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया था, जिसमें हमास के नेता, इस्माइल हनियाह और उप-नेता सालेह अल-अउरी भी शामिल थे।

 इस्तांबुल के वाहदतीन पैलेस के बंद दरवाज़ों के भीतर आयोजित उस बैठक में तुर्की की खुफ़िया सेवा के प्रमुख, हकन फिदान और एर्दोगान के दो प्रमुख सहयोगी-संचार निदेशक,फहार्तिन अल्तुन और राष्ट्रपति के प्रवक्ता, इब्राहिम कालिन भी मौजूद थे। 

उस घटना का प्रतीकवाद अपने आप में बहुत गहरा है। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस्माइल हनियह और सालेह अल-अउरी को आतंकवादियों के रूप में नामित किया हुआ है और उनके सिर पर 5 मिलियन डॉलर का इनाम रखा हुआ है। कोई शक नहीं कि हमास के साथ तुर्की के सम्बन्ध इजरायल के साथ एक दुखद बिंदु रहे हैं और इसने दोनों देशों के बीच हाल के दशक में बेक़ाबू होते हालात के बीच पारंपरिक रूप से क़रीबी रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया है।

इस सबके बीच, हमास मुस्लिम ब्रदरहुड की एक ऐसी शाखा है, जिसके साथ तुर्की की सत्तारूढ़ इस्लामवादी पार्टी का वैचारिक सम्बन्ध है, लेकिन अमिरात की सरकार उसे अपने वजूद के लिए किसी दुश्मन के रूप में देखती है।

निश्चित रूप से, एर्दोगान ने आने वाले दिनों का यह अंदाज़ा लगाते हुए एक सधी हुई चाल चली है कि यूएई और इजरायल के बीच अमेरिका द्वारा प्रायोजित समझौते के पीछे का एक मक़सद पश्चिम एशिया में एक नये क्षेत्रीय व्यवस्था का निर्माण है, यहां तक कि मध्य पूर्व के इस क्षेत्र से अमेरिकी मोर्चाबंदी पहले ही शुरू हो सकती थी।

एर्दोगान को इस बात की आशंका है कि यूएई-इज़राइल समझौते का असली निशाना तुर्की है। एर्दोगन ने 2016 में अपनी सरकार को उखाड़ फेंकने के मक़सद से अमेरिका के नेतृत्व में हुई नाकाम तख़्तापलट की कोशिश में यूएई को सक्रिय भागीदारी करते हुए पाया था। वह इस बात को लेकर भी बेहद सचेत हैं कि अमेरिका, इज़रायल और यूएई अलगाववादी कुर्द समूहों के भी संपर्क में हैं।

तुर्की और यूएई लीबिया संघर्ष में विरोधी पक्षों को बढ़ावा दे रहे हैं और हाल ही में यूएई ने पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ग्रीस और तुर्की के बीच बढ़ते तनावों की पृष्ठभूमि में ग्रीस का साथ देना शुरू कर दिया है। (यूएई के फ़ाइटर जेट्स इस समय ग्रीस में एक प्रशिक्षण अभ्यास में भाग ले रहे हैं।)

अमेरिकी विदेश विभाग ने हमास के नेताओं के साथ एर्दोगान की मुलाक़ात को लेकर उनपर प्रहार किया है। लेकिन,कुछ ही घंटों के भीतर अंकारा ने भी जवाबी प्रहार किया। तल्ख़ पलटवार करते हुए तुर्की के विदेश मंत्रालय ने हमास की वैधता पर सवाल उठाने को लेकर वाशिंगटन को खरी-खोटी सुनायी और कहा, "हमास लोकतांत्रिक चुनावों के ज़रिये गाजा की सत्ता में दाखिल हुआ है और हमास इस क्षेत्र की एक हक़ीक़त है।"

बिना नाम लिए अमेरिकी नीतियों का ज़िक़्र करते हुए तुर्की के बयान में आगे कहा गया है, "और तो और, एक देश ऐसा है,जो खुले तौर पर पीकेके का समर्थन करता है, आतंकवादी संगठनों की अपनी सूची जारी करता है और एफ़ईटीओ (इस्लामवादी प्रचारक,फ़तुल्लाह गुलेन की अगुवाई वाले समूह) के सरगना की मेजबानी करता है।" इस मामले पर तीसरे देशों को कुछ भी कहने का कोई हक़ नहीं है।”

 दुख जताते हुए कहा गया है कि अमेरिका ने "हमारे क्षेत्र की हक़ीक़त से ख़ुद को अलग कर लिया है", तुर्की के उस बयान में अमेरिका से अपनी कार्यप्रणाली को दुरुस्त करने का आग्रह किया गया है और इस क्षेत्र, ख़ास तौर पर इज़रायल के हितों में अपनी शक्ति और प्रभाव का इस्तेमाल करने के बजाय "ईमानदारी से संतुलित नीतियों का पालन करते हुए अंतर्राष्ट्रीय क़ानून, न्याय और बराबरी के आधार पर इज़रायल-फ़िलिस्तीनी संघर्ष के समाधान की दिशा में काम करने" का आह्वान किया गया है। 

वक़्त के इस मोड़ पर एर्दोगान का हमास के साथ अपने रिश्ते को मज़बूती से पेश करना उनकी रणनीति का हिस्सा है। तुर्की का अनुमान है कि अमेरिका के समर्थन वाले इस संयुक्त अरब अमीरात-इज़राइल समझौते का मक़सद मध्य पूर्व में ज़मीनी स्तर पर नयी वस्तुस्थितियों का निर्माण करना है, जो कि इज़रायल और उसके सबसे अमीर खाड़ी पड़ोसियों के बीच बेरोक दूरसंचार, सफ़र मान्यता देना है। लेकिन,यह सब पूरी तरह से फ़िलिस्तीनी समस्या को दरकिनार करते हुए और इस ख़ुशफ़हमी को मानते हुए किया जा रहा है कि फ़िलिस्तीनी नेतृत्व के आत्मसमर्पण का सफ़ेद झंडा लहराना तो बस समय की ही बात रह गयी है।

इसके विपरीत, तुर्की ज़्यादातर स्वतंत्र क्षेत्रीय पर्यवेक्षकों (और समझ रखने वाले पश्चिमी विश्लेषकों) के आकलन को साझा करते हुए कहता है कि जो फ़िलिस्तीन सात दशकों से अपने राजनीतिक अधिकारों को नहीं छोड़ पाया है, वह आत्मसमर्पण करने का इरादा कैसे कर सकता है। सच्चाई तो यह है कि लोकप्रिय फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध की थकान का कोई संकेत तक नहीं दिख रहा। फ़िलिस्तीनी नेताओं ने यूएई शासन की निंदा करने के लिए बहुत ही तीखी ज़बान का इस्तेमाल किया है। ग़ुस्से की वह लहर राजकुमार मोहम्मद बिन ज़ायद द्वारा किये गये विश्वासघात की गहरी भावना से भरी हुई है।

फ़तह और हमास, जो गाजा में 2007 के गृह युद्ध के बाद से एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे हैं, उन्हें यह ग़ुस्सा एक साथ ला खड़ा करने और संयुक्त राजनीतिक कार्रवाई की ज़रूरत पर चर्चा करने के लिए प्रेरित कर रहा है। महमूद अब्बास, जो कल तक फ़िलिस्तीन शासन में किसी भी भागीदार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था, आज हमास के साथ काम करने के लिए तैयार है। पिछले हफ़्ते, फ़तह के महासचिव,जिब्रील राजौब ने हमास के उप प्रमुख,सलेह अउरी के साथ एक मंच साझा किया था, जो इस बात का संकेत है कि दोनों की दोस्ती परवान चढ़ रही है।

अगर अमीरात निर्वासित फ़िलिस्तीनी नेता,मोहम्मद दहलान (जो अबू धाबी में रहता है) को आने वाले दिनों में अरब राज्यों और इज़रायल के समर्थन से फ़िलिस्तीनी राष्ट्रपति के रूप में आगे बढ़ाने की सोच रहा था, तो यह अमीरात की वह परियोजना हक़ीक़त बनने से पहले ही ध्वस्त हो चुकी है। दहलान अब फ़तह और हमास के बीच की प्रतिद्वंद्विता का फ़ायदा नहीं उठा सकता है। पिछले हफ़्ते रामल्लाह में दाहलान और अमीरात के राजकुमार,बिन ज़ायेद के पुतले एक साथ जलाये गये थे।

 तुर्की क्षेत्रीय राजनीति में एक संभावित घटनाक्रम को लेकर यहां तक सचेत है कि फिलिस्तीनियों के साथ ज़ायेद के विश्वासघात से अरब के लोगों में व्यापक रूप से  ग़ुस्सा और आक्रोश है और यह समय के साथ बढ़ सकता है। अरब सेंटर फॉर रिसर्च एंड पॉलिसी स्टडीज द्वारा दोहा में आयोजित अरब ओपिनियन इंडेक्स के मुताबिक़, जहां 2011 में अरब के लोगों की राय का 84 प्रतिशत इजरायल को किसी भी तरह की राजनयिक मान्यता के विरोध में था, वहीं यह 2018 तक बढ़कर 87 प्रतिशत हो गया है।

इस अशांत क्षेत्रीय माहौल में एर्दोगान को फ़िलिस्तीनियों की मांगों को लेकर अरब दुनिया की सहानुभूति और समर्थन, और संप्रभुता और लोकतंत्र को लेकर उनकी कोशिश और निरंकुश शासकों से उनकी मुक्ति के बीच एक तालमेल की उम्मीद नज़र आती है। उनका ड्रीम प्रोजेक्ट एक ऐसे नये मध्य पूर्व के निर्माण का रहा है,जो मध्ययुगीन कुलीनवादियों से मुक्त हो और जिसकी जगह उसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों और लोगों के सशक्तिकरण के आधार पर प्रतिनिधि शासन मिले।

इज़राइल के साथ अमीरात के शासक के इस समझौते के बहाव के साथ एर्दोगन अरब की सड़कों पर किसी महापुरुष की तरह घूमते दिखते हैं और इस्तांबुल में हमास के नेताओं के साथ अपनी बैठक से उन तानाशाहों और कुलीन वर्गों के ख़िलाफ़ एक आम संघर्ष का ऐलान करते नज़र आते हैं, जो लोकतंत्र को दबाते रहे हैं और पूरे क्षेत्र में अपने लोगों पर ज़ुल्म-ओ-सितम करते रहे हैं। एर्दोगन की नज़रों में अरब लोकतंत्र को लेकर बिन ज़ायेद की अवमानना और नेतन्याहू का फ़िलिस्तीनी अधिकारों को रौंदना असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

एर्दोगान को महसूस होता है कि यूएई-इज़रायल समझौता बालू की भीत पर बना है और यह छुपे हुए उन विरोधाभासों के भार से चरमराने के लिए मजबूर है, जिसका अमेरिका के क्षेत्रीय प्रभाव और प्रतिष्ठा में अपेक्षित गिरावट और क्षेत्रीय राज्यों में तेल के बाद की नयी अर्थव्यवस्था की प्रसव-पीड़ा की बढ़ोत्तरी के मद्देनज़र उफ़ान का आना तय है।

तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इज़रायल जितनी कोशिश कर सकता है, कर चुका है? मिडिल ईस्ट आई के प्रधान संपादक,डेविड हार्टस्ट ने पिछले हफ़्ते लिखा था, “हालांकि इससे पहले, इज़रायल के नेता अरब दुनिया में तानाशाही की उथल-पुथल को लेकर अपनी समझदारी का दिखावा कर सकते थे, लेकिन इज़रायल (संयुक्त अरब अमीरात के साथ समझौते) के बाद अब यहूदी राज्य उसे निरंकुश और उसके चारों ओर दमन को बनाये रखने के लिए मजबूर है। ये दोनों अब "सख़्त पड़ोसी" के शिकार होने का नाटक भी नहीं कर सकते। वे ही तो इसके मुख्य आधार हैं। यह समझौता आभासी हक़ीक़त है। महज़ फिलिस्तीन ही नहीं,बल्कि पूरे अरब जगत में एक नये लोकप्रिय विद्रोह के सामने यह समझौता टिक नहीं पायेगा। यह विद्रोह वक़्त से पहले भी शुरू हो सकता है।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें:

Turkey Reboots Arab Spring with Palestinian Resistance

 

Turkey
Arab Spring
Palestinian resistance
Erdogan Hamas
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