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मज़दूर-किसान
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रोजगार के अभाव में दो तिहाई मज़दूर वापस शहर लौटना चाहते हैं: सर्वे
कई प्रतिष्ठित सामाजिक संस्थाओं द्वारा सोमवार को जारी एक सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि 29 फ़ीसदी प्रवासी मज़दूर अब तक शहर वापस आ चुके हैं जबकि 45 फ़ीसदी आने की तैयारी में हैं।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
04 Aug 2020
 मज़दूर वापस
image courtesy : Maharashtra Today

दिल्ली: केंद्र और राज्य सरकारों के रोजगार मुहैया कराने संबंधी तमाम दावों के बीच हकीकत यह है कि कोरोना महामारी की मार से शहर छोड़ अपने गांव लौटे प्रवासी मजदूर अब दोबारा वापस शहर लौटना चाह रहे हैं। एक सर्वे रिपोर्ट के मुतबिक वापस चले गए प्रवासी कामगारों में से करीब दो-तिहाई गांवों में कौशल आधारित रोजगार के अभाव में या तो शहरों को लौट चुके हैं अथवा लौटना चाहते हैं। सोमवार को जारी इस रिपोर्ट के अनुसार 29 फीसदी प्रवासी मजदूर अब तक शहर वापस आ चुके हैं जबकि 45 फीसदी आने की तैयारी में हैं।

कैसे हुआ सर्वे

यह अध्ययन आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम (भारत), ऐक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट, ग्रामीण सहारा, आई-सक्षम, प्रदान, साथी-यूपी, सेस्टा, सेवा मंदिर और ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन ने मिलकर किया है। इसका शीर्षक है ‘अंदरूनी क्षेत्रों में स्थिति अपनी पुरानी दशा में कैसे लौट रही है’। इस अध्ययन को सोमवार 3 अगस्त को ऑनलाइन वेबीनार के माध्यम से सार्वजनिक किया गया।

यह अध्ययन 24 जून से 8 जुलाई के बीच यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे 11 राज्यों के 48 जिलों में 4,835 परिवारों के त्वरित आकलन पर आधारित है। इसमें पता चला कि 29 फीसदी प्रवासी शहरों में लौट चुके हैं और 45 फीसदी शहरों में वापस आना चाहते हैं। इस अध्ययन ने कई गंभीर खुलासे किए और मज़दूरों की बदहाली को बताया और कहा लोगों को अब भोजन तो मिल रहा है परन्तु अभी वो गंभीर आर्थिक तंगी से गुजर रहे है।

सर्वे की मुख्य बातें

अध्ययन में कहा गया, ‘गांवों में कौशल आधारित रोजगार के अभाव की बात सामने आई है, जिसके चलते अपने घरों को लौटे करीब दो-तिहाई प्रवासी या तो शहरों में वापस आ गये हैं या आना चाहते हैं।’

रिपोर्ट में यह भी पता चला कि जो प्रवासी शहर लौटे हैं उनमें से 80 फीसदी से अधिक को गांवों में मजदूरी का काम मिला, जो दिखाता है कि ग्रामीण इलाकों में कौशल आधारित रोजगार की कमी है। एक चौथाई से अधिक प्रवासी श्रमिक अब भी गांवों में रोजगार की तलाश में हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, ‘एक चौथाई से अधिक प्रवासी श्रमिक अब भी गांवों में काम ढूंढ रहे हैं।’

झारखंड, मध्य प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान और त्रिपुरा के 48 जिलों में सर्वे के दौरान पता चला कि प्रवासियों के लौटने से महिलाओं का काम बढ़ गया है। अब उन्हें पानी और लकड़ी के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं क्योंकि प्रवासियों के लौटने से परिवार बढ़ गया है।

अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक चार परिवारों में से एक (24 फीसदी) अपने बच्चों को स्कूल से निकालने के बारे में सोच रहा है।

इसमें कहा गया है कि, ‘कठिनाइयां अभी बहुत हैं, ढांचागत बदलाव अब भी नजर नहीं आ रहा बल्कि ग्रामीण भारत में कोविड-19 का स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहा है।’

अध्ययन में पता चला कि 43 फीसदी परिवारों ने भोजन में कटौती की है और 55 फीसदी ने कहा कि उन्होंने खाने की वस्तुएं घटाई हैं। उसमें कहा गया है कि हालांकि लॉकडाउन की तुलना में बाद के समय में भोजन में सुधार आया है।

अध्ययन में सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान आर्थिक कठिनाइयों के चलते करीब छह फीसदी परिवारों ने घरों का सामान गिरवी रखा और 15 फीसदी को अपने मवेशी बेचने पड़े। करीब दो फीसद परिवारों ने दुधारू और गैर दुधारू मवेशी बेच दिये। करीब दो फीसदी परिवारों ने अपनी जमीन गिरवी रख दी। करीब दस फीसदी परिवारों ने अपने नाते-रिश्तेदारों से कर्जा लिया जबकि सात फीसदी लोग इसके लिए साहूकारों की शरण में गये।

इस पूरी रिपोर्ट और उस पर चर्चा नीचे देख सकते हैं

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ)

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