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यूके ने अमेरिका के लिए रचा नया अफ़गान कथानक  
अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी ताकतों को उम्मीद है कि वे तालिबान को अपने खुद के हितों को ध्यान में रखते हुए उनके खिलाफ जाने के बजाय उनके साथ काम करने का फायदा उठा सकने की स्थिति में हैं। 
एम. के. भद्रकुमार
26 Jul 2021
यूके ने अमेरिका के लिए रचा नया अफ़गान कथानक  
दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन के विदेश मंत्रियों की ताजिकिस्तानी राष्ट्रपति एमोमाली रहमोन के साथ 14 जुलाई, 2021 में हुई बैठक की एक तस्वीर 

पिछले हफ्ते दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और अफगानिस्तान के साथ एससीओ कांटेक्ट ग्रुप के साथ हुई मंत्रीस्तरीय बैठक एक निराशाजनक निशानी के साथ समाप्त हुई। अफगानिस्तान पर एससीओ का बयान एक बेहद नन्हा कदम साबित हुआ है – हालांकि समूह के बढ़ते आंतरिक अंतर्विरोधों को देखते हुए यह एक महत्वपूर्ण कदम था। 

दोहा वार्ता में भी कोई प्रगति नहीं हुई है। इस बीच, पेंटागन ने तालिबान पर चुपचाप तरीके से हवाई हमले फिर से शुरू कर दिए हैं। अमेरिका ने भले ही जमीन पर बूट न रखे हों, लेकिन उसने शांति प्रक्रिया को अपने भू-राजनीतिक हितों के अनुकूल दिशाओं में ले जाने के लिए अपनी राजनीतिक-सैन्य शक्ति का पुनर्निर्माण करना शुरू कर दिया है।

प्रत्यक्ष तौर पर अमेरिकी छंटनी की प्रकिया ने क्षेत्रीय राज्यों की आँखों में धूल झोंकने का काम किया है। जहाँ तक रूस का प्रश्न है, तो उसने अपनी ओर से अपने त्रिगुट तन्त्र की छत्रछाया के तहत एक कॉलेजियम बनाने के लिए अमेरिका तक भी पहुँच बनाई थी। दोहा प्रक्रिया के अन्य प्रारूपों पर भी चर्चा की गई। ऐसा लगता है जैसे हर कोई राजनीतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के पक्ष में है। तेहरान ने हाल ही में अफगान सरकार और तालिबान के प्रतिनिधियों के लिए एक सम्मेलन की मेजबानी भी की। 

चीन ने अंतर-अफगान वार्ता के लिए “किसी भी क्षण” एक सूत्रधार बनने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन, रुसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव ने इस पर तत्काल सलाह दी “हमें लगता है कि ऐसा करने के लिए किसी नए समझौतों के साथ आने की आवश्यकता फिलहाल नहीं है। सबसे पहले, हमें सिर्फ वही लागू करने की जरूरत है जिसे पहले से ही (दोहा में) अफ़गान सरकार और तालिबान द्वारा अनुमोदित किया जा चुका  है।

ऐसा प्रतीत होता है कि रूस विकसित हो रही अफ़गान स्थिति को बेहतर तरीके से संभालने के लिए सुरक्षा वाहन के तौर पर एससीओ के बजाय सीएसटीओ को कहीं अधिक तरजीह देता है। लावरोव ने यह भी खुलासा किया कि त्रिगुट ने “विशेषकर, भारत और ईरान की उम्मीदवारी के बारे में चर्चा की है। मेरा मानना है कि इससे इस प्रारूप की क्षमताओं को विकसित करने में मदद मिल सकती है। हमें देखना होगा कि यह यहाँ से आगे कैसे बढ़ता है।” 

निश्चित तौर पर, ईरान को तालिबान और अफ़गान सरकार इन दोनों के साथ-साथ अफगानिस्तान में शिया समुदायों के बीच भी, विशेषकर हाज़रा के बीच में प्रभाव का श्रेय दिया जाता है। लेकिन ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लगता नहीं कि ईरान लंबे समय तक अफगानिस्तान में अमेरिकी भागीदारी के लिए अमेरिका के साथ एक मेज को साझा करना चाहेगा।

जहाँ तक भारत का प्रश्न है, वह हमेशा से ही अफगानिस्तान मामले में अमेरिकी बोगी के साथी मुसाफिर के तौर पर रहा है और एक स्वायत्त अफगान ईकाई के रूप में तालिबान की वैधता के बारे में बंद दिमाग के साथ काम करता रहा है। राष्ट्रपति अशरफ गनी के नेतृत्त्व वाली अफगान सरकार के साथ भारत के बेहतरीन संबंध रहे हैं। (अफगान सेना प्रमुख के अगले हफ्ते दिल्ली में उपस्थित रहने की उम्मीद है)

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि, जमीन पर बिना बूट रखे ही, भारत ने तालिबान के “वैधता पहलू” पर अपना कड़ा रुख अपनाया हुआ है, जो कमोबेश गनी के कहे से मेल खाता है, अर्थात, तालिबान के मुख्यधारा में शामिल होने की प्रक्रिया को एक संवैधानिक, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से संपन्न किया जाना चाहिए।

जाहिरा तौर पर, ईरान और भारत को शामिल करने के लिए त्रिगुट का कोई भी विस्तार देने की कोशिश शुरूआती दौर में ही असफल सिद्ध होने जा रही है। बुनियादी तौर पर, अमेरिका अफगानिस्तान में खुद के शामिल रहने को लेकर दृढ है, और सेना की वापसी का मकसद सिर्फ गनी सरकार के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर कहीं अधिक जोर देने वाली नीतियों के नए सिरे से पुनर्संयोजन पर बने रहने वाला है। यही लुब्बो लुआब है। क्षेत्रीय शक्तियों के लिए इस हैरान कर देने वाली सच्चाई को समझने के लिए अभी भी पूरी तरह से नींद से जागना बाकी है।

बाईडेन प्रशासन के पास अफगान परिस्थिति पर चप्पू चलाने के लिए एक कंपास है, जिसमें ‘आगे बढ़ने की नीति” का समर्थन करने वाली एक यथावत स्थिति मौजूद है। सैन्य टुकड़ियों की वापसी का अर्थ है आने वाले समय में अमेरिकी हताहतों का खतरा न्यूनतम बना दिया गया है। इससे अमेरिका तालिबानी अधिग्रहण को रोकने के लिए पूरी ताकत से काम करने में सक्षम बन जाता है, जो अन्यथा वैश्विक स्तर पर राष्ट्रपति बिडेन की प्रतिष्ठा को ख़ाक में मिला सकती थी। इस प्रकार, वाशिंगटन गनी के साथ नए कामकाजी संबंध को संवारने में लगी है।

अमेरिका को निकट भविष्य में तालिबान के अफगान सैन्य बलों पर काबू पा लेने की क्षमता पर संदेह है। इससे अमेरिकी प्रतिक्रिया का पुनरावलोकन करने के लिए राहत की साँस लेने का मौका मिल जाता है। इस बिंदु पर अमेरिका के लिए युद्ध विराम की पेशकश करने की विशेष जरूरत लगती, क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में यह सिर्फ तालिबान के फायदे के लिए काम कर सकता है। वास्तव में देखें तो अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ हवाई हमले फिर से शुरू कर दिए हैं। 

रूस, चीन, ईरान असल में अमेरिका के साथ उलझे हुए हैं और वाशिंगटन का भविष्य का एजेंडा मुख्य रूप से चीन के बेल्ट एंड रोड को अवरुद्ध करने, मध्य एशिया में सत्ता परिवर्तन को बढ़ावा देने, उग्रवादी इस्लाम को भू-राजनीतिक औजार के तौर पर इस्तेमाल करने, और अपनी भारत-प्रशांत रणनीति के आदर्श नमूने के रूप में अफगानिस्तान में अपनी दीर्घकालिक उपस्थिति को मजबूत करने को लेकर है।

लेकिन कंपास की भी अपनी डिफ़ॉल्ट पोजीशन होती है। नव-निर्मित क्षेत्रीय चतुर्भुज कूटनीतिक मंच (अमेरिका-उज्बेकिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान) या क्वाड-2 (भारत-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व वाले क्वाड के साथ जुड़ना) तालिबान के सत्ता अधिग्रहण करने की स्थिति में नीतियों के पुनर्संयोजन करने के लिए एक खांचा मुहैय्या कराता है, जिसकी संभावना को पेंटागन अभी भी पूरी तरह से ख़ारिज करने की स्थिति में नहीं है। 

वाशिंगटन के लिए एक अवसर की खिड़की यहाँ पर खुलती दिखती है जिसमें पारंपरिक तौर पर पश्चिमी-रुख वाले पाकिस्तानी अभिजात वर्ग का फायदा उठाने और इस्लामाबाद को बीजिंग के बाहुपाश से दूर रखने की कोशिश की जा सकती है। निश्चित रूप से क्वाड-2 नए ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर इनिशिएटिव के साथ मेल खाता है, जिस पर ग्रुप ऑफ़ सेवन के नेताओं की 11 से 13 जून को इंग्लैंड के कॉर्नवेल में हुई बैठक में सहमति बनी थी। 

किसी भी कीमत पर, क्वाड-2 के प्रतिनिधियों के द्वारा शुक्रवार को एक संयुक्त बयान जारी किया गया था, जो उनकी “शांति एवं जुड़ाव को पारस्परिक रूप से प्रगाढ़ बनाने” के लिए उनकी आपसी सहमति पर आधारित था। तनाव चीन की बेल्ट एंड रोड पहल को लेकर है, जिसे अमेरिका, अफगानिस्तान और मध्य एशिया में संभावित रूप से बीजिंग के एक बेहद अनुषंगिक भू-राजनीतिक औजार के तौर पर मानता है। अमेरिका इस बारे में काफी हद तक आश्वस्त है कि तालिबान क्वाड-2 को अपने शासन को वैध बनाने और पश्चिमी देशों से सहायता प्राप्त करने के लिए एक मंच के पर आकर्षक पायेगा।

जाहिरा तौर पर वाशिंगटन ने रूस और चीन को कयास लगाते रहने पर ही छोड़ दिया है और एक अप्रिय आश्चर्य में डाल दिया है। मास्को बेहद गुस्से में है और वह अपनी पहली पूर्व स्थिति में वापस पहुँच गया है जिसमें वह वाशिंगटन पर आतंकवादी इस्लामिक समूहों को भू-राजनीतिक औजार के तौर पर अपनी रणनीति के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाता आया है। लेकिन इससे वाशिंगटन को फर्क नहीं पड़ने जा रहा है, क्योंकि क्वाड-2 रणनीति के पीछे डीप स्टेट मौजूद है।

अमेरिकी रणनीति हल्फोर्ड मेकिंडर के प्रसिद्ध हार्टलैंड सिद्धांत से उपजी है! और ब्रिटेन की भूमिका, जिसका गनी और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल बाजवा दोनों ही के साथ जबर्दस्त समीकरण है, की उपस्थिति भी करीब-करीब तय है। जैसा कि आधुनिक इतिहास में अक्सर होता है, ब्रिटेन, वाशिंगटन को कार्यवाही कने के लिए आधार मुहैय्या कराता आया है।

13 जुलाई को द डेली टेलेग्राफ़ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में ब्रिटिश रक्षा मंत्री बेन वालेस को एक विशेष साक्षात्कार में यह कहते हुए उद्धृत किया गया है “भले ही वर्तमान में कोई भी सरकार क्यों न हो, यदि वह कुछ निश्चित अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का पालन करेगी, तो यूके सरकार इसके साथ शामिल रहेगी।”

वालेस ने इस बात को स्वीकार किया कि ब्रिटेन के तालिबान के साथ काम करने की संभावना विवादास्पद हो सकती है। इसलिए उन्होंने इसके साथ एक चेतावनी जोड़ दी: “(तालिबान) असल में अंतर्राष्ट्रीय मान्यता पाने के लिए बैचेन हैं। उन्हें राष्ट्र निर्माण (के लिए) वित्तपोषण और सहयोग की दरकार है, और आप इसे आतंकवादी ठप्पे के साथ नहीं कर सकते हैं। आपको शांति के लिए भागीदार  बनने के लिए पहल करनी होगी, अन्यथा आप अलगाव में पड़ सकते हैं। अलगाव उन्हें उसी जगह पर पहुंचा देगा, जहाँ वे पिछली बार थे।”

स्पष्ट रूप से, एंग्लो-अमेरिकन कंपास के पास एक डिफ़ॉल्ट स्थिति है जिससे वे तालिबान के सत्ता अधिग्रहण के समायोजन को सुविधानुसार अनुकूलित कर सकते हैं और जैसा कि चीजें बनी हुई हैं, उसे किसी भी कयास से खारिज नहीं किया जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी ताकतें उम्मीद करती हैं कि तालिबान अपने स्वार्थ की खातिर उनके खिलाफ काम करने के बजाय उनके साथ बने रहकर काम करेगा। 

सभी दृष्टिकोण के लिहाज से, रूस बेहद गुस्से में है और कूटनीतिक स्तर (यहाँ, यहाँ और यहाँ) के साथ-साथ सैन्य दोनों ही स्तर पर जवाबी कार्यवाई के माध्यम से अपनी बोगियों को घेरने के लिए हाथापाई कर रहा है। क्या यह बेहद छोटा और बेहद विलंबित प्रयास नहीं है? लेकिन तब रूस के पास बाढ़ के लिए दरवाजे खोले जाने के बाद ही अपनी कार्यवाई को एकजुट होकर अंजाम देने का रिकॉर्ड रहा है। 

एमके भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक रहे हैं। आप उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत थे। व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं। 

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीच दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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