NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
यूपी चुनाव: अयोध्यावादियों के विरुद्ध फिर खड़े हैं अयोध्यावासी
अयोध्या में पांचवे दौर में 27 फरवरी को मतदान होना है। लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है और धर्म केंद्रित विकास की जगह आजीविका केंद्रित विकास की मांग हो रही है—एक विश्लेषण।
अरुण कुमार त्रिपाठी
24 Feb 2022
ayodhya

अयोध्या विधानसभा सीट का चुनाव परिणाम तो 27 फरवरी को मतदान के दिन ईवीएम में बंद हो जाएगा और उसकी जानकारी 10 मार्च को उजागर होगी। लेकिन एक बात तय है कि लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है। अयोध्यावासी वह मतदाता और नागरिक है जो अमन चैन से रहना चाहता है, अपनी रोजी रोटी कमाना चाहता है, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है और चाहता है कि समाज में धर्म, राजनीति, विज्ञान और कला सब अपनी अपनी जगह पर रहें, आपस में घालमेल कर एक दूसरे के अनुशासन को विकृत न करें। अयोध्यावादी वह नागरिक और मतदाता है जो अयोध्या को केंद्र में रखकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आख्यान रचता है, जोर जोर से जयश्रीराम के नारे लगाता है और उसी तरह से हिंदू धर्म को खतरे में बताता है जिस तरह से तमाम इस्लामवादी कहते हैं कि इस्लाम खतरे में है। वह बार बार बहुसंख्यक समाज के अपमान की बात करता है और इतिहास को पलटने, नए सिरे से लिखने और उन लोगों से बदला लेने की कोशिश करता है जिनका आक्रामण करने वाली शक्तियों से किसी तरह का धार्मिक निकटता का रिश्ता है।

अयोध्या का राममंदिर आंदोलन जब से शुरू हुआ तब से अयोध्या में दो तरह के लोग रहे हैं। एक वे जो चाहते थे कि किसी तरह से अयोध्या में  बाबरी मस्जिद राम मंदिर का विवाद स्थानीय विवेक से हल कर लिया जाए। निश्चित तौर पर उसे अदालत में लंबे समय तक लटकाकर रखने से सभी का नुकसान हुआ और स्थानीय लोग उसे निपटा नहीं पाए थे। थोड़े समय के लिए देश के प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर ने ऐसी स्थितियां बना भी दी थीं कि हिंदू और मुस्लिम नेता बैठकर इसका स्थानीय हल निकाल लें और इसे लेकर जो राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन चल रहा है वह शांत हो जाए। उसके लिए कांग्रेस के शासनकाल में भी प्रयास चल रहा था और इसमें मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह व स्थानीय शक्तियां यानी अयोध्यावासी सक्रिय थे।

इस बात का वर्णन करते हुए फैजाबाद के वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह ने अपनी पुस्तक अयोध्या---रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद का सच—में किया है। कहते है कि विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल 1987 में ही तैयार भी हो गए थे कि बाबरी मस्जिद को शिफ्ट कर दिया जाए और विवाद का अंत कर लिया जाए। लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से उन्हें डांट पड़ी कि हम अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए थोड़े ही आंदोलन चला रहे हैं। हमारा आंदोलन दिल्ली में सरकार बनाने के लिए चल रहा है। आखिर में जबरदस्ती बाबरी मस्जिद गिराई गई और देश में सांप्रदायिकता और हिंदुत्व का विस्फोट हुआ। उसी से निकले बहुसंख्यकवाद ने दिल्ली की सत्ता पर कब्जा किया और आज उसने देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की ठान ली है।

आज इस चुनाव में अयोध्या में एक बार फिर अयोध्यावासी खड़े हो गए हैं। उनका कहना है कि अयोध्या में धर्म केंद्रित परजीवी किस्म का विकास पनप रहा है। यहां का प्रशासन पहले से कहीं ज्यादा भ्रष्ट है। रिश्वत की दरें बढ़ गई हैं। थानों में एफआईआर नहीं होते और कहा जा रहा है कि भयमुक्त और माफिया मुक्त समाज बन गया है। राम मंदिर के नाम पर जमीनें हथियाई जा रही हैं और उन्हें ऊंचे दामों पर बेचा जा रहा है। बड़े बड़े भूमि घोटाले हो रहे हैं। जहां एक ओर ग्रामीण जनता के खेतों में अनुशासनहीन सांड़ घूम रहे हैं वहीं दूसरी ओर शहर की सड़कों पर अनुशासित बुलडोजर मकान गिरा रहे हैं। विकास का यह मॉडल न तो देश के हित में है और न ही अयोध्या के हित में। इससे खेती भी तबाह हो रही है, पशुओं की दर्दनाक मौतें हो रही हैं, लोगों के घर बार उजड़ रहे हैं और उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है। एक ओर पुराने जर्जर मंदिरों के साधुओं को अपने मंदिरों के ध्वंस का डर सता रहा है तो दूसरी ओर संकरी सड़कों पर व्यापार करने वालों को अपनी आजीविका का डर। वहां पुराने किस्म के वाहन चलाने वाले भी भयभीत हैं कि कब उनका डीजल वाहन शहर से बाहर कर दिया जाएगा और वे बेरोजगार हो जाएंगे।

एक ओर भारतीय जनता पार्टी के निष्क्रिय और वृद्ध प्रत्याशी वेद प्रकाश गुप्ता लोगों को अयोध्या के विश्व स्तरीय पर्यटन केंद्र बनने का स्वप्न दिखा रहे हैं तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के युवा प्रत्याशी लोगों के सुख दुख को ध्यान में रखकर अयोध्या के विकास का मॉडल पेश कर रहे हैं।

अयोध्या का विवाद तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शांत हो चुका है लेकिन उस विवाद से निकले आख्यान को भाजपा और संघ परिवार जिंदा रखना चाहता है और उसके बहाने लंबे समय तक शासन करना चाहता है। इस बहाने वे इतिहास की नई नई व्याख्या और उस पर समाज में विवाद खड़ा करने का बहाना ढूंढते रहना चाहते हैं।

दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो अयोध्या को आज भी सर्वधर्म समभाव की ओर ले जाना चाहते हैं। वे वहां की दूसरी परंपरा को जीवित भी करना चाहते हैं जिसमें बौद्ध, जैन, सिख और इस्लाम की आस्था के केंद्र सरयू के इस तट पर बनी इस नगरी में सम्मान पूर्वक सिर उठाए खड़े हैं। जहां तुलसीदास भी मांग कै खइबो मसीद में सोइबो वाली बात कहते हैं।

सात हजार मंदिरों वाले इस शहर का आर्थिक मॉडल परजीविता, पलायन और तमाम आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा है। निश्चित तौर पर धर्म समाज की सबसे पुरानी संस्था है और उसके पास धन और साख अभी भी है। लेकिन वह धन किसानों, मजदूरों, कारीगरों की मेहनत और दानखाते से आता है। भले ही उसमें पूंजीपतियों की भी हिस्सेदारी होती हो लेकिन आम गृहस्थ की हिस्सेदारी कम नहीं होती। लेकिन समाज की दृष्टि में त्याग करने वाले संतों महंतों की संपत्ति और सांसारिक सुख की लालसा किसी भी गृहस्थ से कई गुना ज्यादा है। अगर ठीक से तहकीकात की जाए तो तमाम महंत संपत्ति के विवाद, उसके लिए बल प्रयोग और अपराध करने में शामिल पाए जाएंगे। उन्होंने दुनिया से पलायन भले कर लिया हो लेकिन वे निजी संपत्ति के लोभ से मुक्त नहीं हैं। लेकिन कोई भी उत्पादक काम करने से कतराते हैं।

अयोध्या के नाम पर रामराज्य का जो मुहावरा चलाया गया उस पर भी उस नगरी में कोई बहस नहीं है। अगर अयोध्या और रामराज्य हमारे राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श में आया है तो रामराज्य और लोकतंत्र के रिश्तों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। महात्मा गांधी का रामराज्य वह नहीं था जो योगी आदित्यनाथ का रामराज्य है। महात्मा गांधी कहा भी करते थे कि चूंकि रामराज्य का मुहावरा लोगों के समझ में आसानी से आता है इसलिए वे इसका प्रयोग करते हैं। लेकिन उनके लिए इसका अर्थ दशरथ पुत्र राम के राज्य तक सीमित नहीं है। वे उसका अर्थ रैदास के बेगमपुरा (यानी जहां कोई गम न हो), बाइबल के परमेश्वर के राज्य, इस्लाम के खलीफा के राज्य से जोड़ते थे। उनके लिए सच्चा स्वराज वहीं हैं जहां न तो पुलिस की धौंस हो न ही पूंजीपतियों की और न ही धर्मगुरुओं की धौंस हो। वहां व्यक्ति स्वातंत्र्य होना चाहिए। वहां तर्क होना चाहिए, वहां विवेक होना चाहिए और अध्यात्म की सच्ची महत्ता होनी चाहिए। वास्तव में अयोध्यवासियों की परंपरा सत्यवादी राजा हऱिश्चंद्र की परंपरा है जहां पर अपने वचन के लिए अपना राज्य त्याग देने का साहस दिखाया जाता है। वहां राम की परंपरा है जहां पिता के वचन को रखने लिए हंसी खुशी से राजतिलक की जगह पर वनवास स्वीकार किया जाता है।

इसके ठीक विपरीत रामराज्य का एक ऐसा मॉडल पेश किया जा रहा है जहां विरोध करने पर कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। कड़े से कड़े कानून की धारा लगाई जा सकती है। आंदोलन करने पर घर की संपत्ति कुर्क की जा सकती है। जुर्माना वसूला जा सकता है। शहर के बीचों बीच आपको बदनाम करने के लिए पोस्टर लगाए जा सकते हैं कि आपने सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान किया है। विपरीत विचारधारा होने पर आपको देशद्रोही घोषित किया जा सकता है। धर्म के नाम पर बड़ी जातियों या एक जाति विशेष की सत्ता कायम की जा सकती है क्योंकि मुख्यमंत्री कह भी चुके हैं कि भगवान राम का जन्म भी तो क्षत्रिय जाति में हुआ था। इसी के साथ लोकतंत्र की मर्दायित भाषा भूल कर विपक्षी पार्टी को तमंचावादी और आतंकवादी बताया जा रहा है।

आज अगर अयोध्या में अयोध्यावादियों के आगे अयोध्यावासी खड़े होने का साहस दिखा रहे हैं तो निश्चित तौर पर यह रामराज्य की श्रेष्ठ भावना की वापसी है। यह नकली मुद्दों की बजाय असली मुद्दों की वापसी है। यह भारतीय संविधान की भावना की वापसी है। लेकिन यह वापसी आसान नहीं है क्योंकि अयोध्यावादियों ने पूरे देश को अपने घेर में ले रखा है। अयोध्या में समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार भले ही भाजपा के उम्मीदवार से ज्यादा लोकप्रिय हो लेकिन उसे मालूम होना चाहिए और शायद इसका एहसास भी होगा कि उसकी लड़ाई एक तूफान से है और वह उसके सामने एक दीए जैसा है। यही कारण है जहां भाजपा का उम्मीदवार निश्चिंत होकर घर पर बैठा रहता है और उसके लिए पूरे संघ परिवार ने कमान संभाल रखी है। वह रामरज और मिश्री बांट कर लोगों को जहा रहा है। वहीं सपा का उम्मीदवार घर घर चक्कर काट रहा है हर मतदाता के आगे झुक रहा है उसके हर मुद्दे पर लड़ने को तैयार रहा है। सपा पर भले परिवारवाद का आरोप लगाया जाए लेकिन उसके उम्मीदवार की लड़ाई संघ परिवार की महाशक्ति से है। यह परिवारवाद ज्यादा खतरनाक है। लेकिन अगर अयोध्यावादियों के आगे अयोध्यावासियों की विजय होती है तो इसे धर्म और राजनीति के झगड़ालू गठजोड़ को थकते हुए देखा जा सकता है।

सभी फ़ोटो: तारिक़ अनवर 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Uttar pradesh
UP Assembly Elections 2022
UP Polls 2022
ayodhya
Religion and Politics
BJP
RSS
Ram Mandir
Hindutva

Related Stories

हार्दिक पटेल का अगला राजनीतिक ठिकाना... भाजपा या AAP?

लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

विश्लेषण: विपक्षी दलों के वोटों में बिखराव से उत्तर प्रदेश में जीती भाजपा

‘’पोस्टल बैलेट में सपा को 304 सीटें’’। क्या रंग लाएगा अखिलेश का दावा?

विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया

पक्ष-प्रतिपक्ष: चुनाव नतीजे निराशाजनक ज़रूर हैं, पर निराशावाद का कोई कारण नहीं है

आर्थिक मोर्चे पर फ़ेल भाजपा को बार-बार क्यों मिल रहे हैं वोट? 

पांचों राज्य में मुंह के बल गिरी कांग्रेस अब कैसे उठेगी?

विचार: क्या हम 2 पार्टी सिस्टम के पैरोकार होते जा रहे हैं?


बाकी खबरें

  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 44,230 नए मामले, 555 मरीज़ों की मौत
    30 Jul 2021
    देश में कोरोना के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 15 लाख 72 हज़ार 344 हो गयी है।
  • प्रेफेट डफॉट (हैती), जनरल केन्सन, 1950
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    वाशिंगटन सत्ता परिवर्तन का ढोल पीटता रहता है, लेकिन क्यूबा अपनी क्रांतिकारी लय के साथ काम करता है
    30 Jul 2021
    1959 की क्यूबा क्रांति ग़ुलामी और औपनिवेशिक वर्चस्व के मनहूस इतिहास के ख़िलाफ़ थी। अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया थी? 19 अक्टूबर 1960 को देश पर आर्थिक नाकेबंदी लगा दी गई, जो कि आज भी जारी है।
  • Pegasus snooping row
    भाषा
    पेगासस जासूसी मामले में शीर्ष न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग करते हुए 500 लोगों, समूहों ने सीजेआई को लिखा पत्र
    29 Jul 2021
    पत्र में मीडिया में आई इन खबरों पर हैरानगी जताई है कि स्पाइवेयर का इस्तेमाल छात्राओं, विद्वानों, पत्रकारों, मानवाधिकार के पैरोकारों, वकीलों और यौन हिंसा पीड़िताओं की निगरानी के लिए किया गया।
  • आईसीएफ़
    बढ़ते मामलों के बीच राजद्रोह क़ानून को संवैधानिक चुनौतियाँ
    29 Jul 2021
    राजद्रोह का क़ानून जो भारत में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा लाया गया था, उसे इंग्लैंड ने निरस्त कर दिया है।
  • OBC got reservation under All India Medical Education Quota, student organizations said victory of struggle!
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटा के तहत ओबीसी को मिला आरक्षण, छात्र संगठनों ने कहा संघर्ष की हुई जीत!
    29 Jul 2021
    चिकित्सा अभ्यर्थियों की ओर से चिकित्सा शिक्षा के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण देने की लंबे समय से मांग की जा रही थी। कुछ दिनों पहले तक केंद्र सरकार इससे अपना पल्ला झाड़ रही तो और इसे न्यायलय में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License