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भारत
राजनीति
80/20 : हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई है यूपी चुनाव
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठीक ही कहते हैं कि यह 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत की लड़ाई है। बस वे इसकी व्याख्या ग़लत तरीके से करते हैं। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी का विचार-विश्लेषण
अरुण कुमार त्रिपाठी
11 Jan 2022
AKHILESH AND YOGI

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठीक ही कहते हैं कि यह 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत की लड़ाई है। बस वे इसकी व्याख्या गलत तरीके से करते हैं। वे कहते हैं कि एक ओर अस्सी प्रतिशत वे लोग हैं जो माफिया राज और गुंडा राज से मुक्ति और विकास चाहते हैं जबकि बीस प्रतिशत वे लोग हैं जो गुंडागीरी चाहते हैं और पिछड़ापन चाहते हैं। वास्तव में उनका कानून व्यवस्था और कानून के राज से कोई लेना देना नहीं है। वे उसका अर्थ पुलिस राज, एक पार्टी और व्यक्ति के एक छत्र राज से लेते हैं।

उनका विकास भी लोगों में मुफ्तखोरी और भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देने वाला है। उनके भीतर हक हुकूक की चेतना और अपने विकास का रास्ता स्वयं निर्धारित करने वाला नहीं है। वे परोक्ष रूप से हिंदू राष्ट्र के लिए देश के अस्सी प्रतिशत हिंदुओं को गोलबंद करना चाहते हैं। पर क्या वैसा हो पाएगा यही सवाल उत्तर प्रदेश के चुनाव और इस देश की आगामी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल है।

योगी आदित्यनाथ, नरेंद्र मोदी, संघ परिवार और उसके आनुसंगिक संगठन जिन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं वे शक्तियां हिंदू समाज के भीतर पिछले दो सौ सालों में पैदा हुई वैज्ञानिक चेतना, लोकतांत्रिक चेतना, बराबरी की दृष्टि और उदारता सभी को खत्म कर देना चाहती हैं। वे हिंदू समाज की पुरानी शक्तियां हैं जो नए रूप में प्रकट हुई हैं।

निश्चित तौर पर संघ परिवार की यह राजनीति  विज्ञान का अर्थ प्रौद्योगिकी से लगाती है जिसमें सबसे ऊपर हिंसक हथियार हैं और उसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी और दूसरी चीजें हैं। वह टेक्नालाजी को तो रखेगी क्योंकि उसे धर्म और सांप्रदायिकता से जोड़कर लोगों के मानस पर कब्जा करना है लेकिन वह उससे पैदा होने वाली उदार और आधुनिक दृष्टि को मारेगी क्योंकि वही हिंदू राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा अवरोध है।

हिंदू समाज अपने सुधारकों के साथ क्या व्यवहार करता है इस बारे में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1929 में ही अपने पत्र `बहिष्कृत भारत’ में साफ तौर पर लिखा था। वे लिखते हैं, ``हिंदू समाज के पेट की आग में बुद्ध जल कर खाक हो गए, महावीर खाक हो गए, बसव खाक हो गए, चक्रधर खाक हो गए और भागवत संप्रदाय भी खाक हो गया। हिंदू समाज की इस आग में नानक कबीर की भी वही दशा हुई, राम मोहन राय, दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, विष्णु बाबा ब्रह्मचारी , ज्योतिबा फुले, रानाडे, भंडारकर, विवेकानंद, रामतीर्थ, श्रद्धानंद, लाजपत राय आदि को हिंदू समाज ने उसी रास्ते से लगा दिया या लगाने की चेष्टा की जा रही है। महात्मा गांधी, रामानंद चटर्जी आदि जैसे लोगों को वे पचा लेंगे, इस तरह की धमक हिंदू समाज में है। हिंदू समाज को यह कला बहुत अच्छी तरह से हासिल है कि व्यक्ति की महानता को बढ़ाना और उसकी शिक्षा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसे नकारना और अपने अपने रीति रिवाजों को पूर्ववत जारी रखना, यह कला हिंदू समाज को अच्छी तरह से हासिल है।”

संघ परिवार के व्यापक और निरंतर बढ़ते प्रभाव और मोदी योगी की डबल इंजन की सरकार के माध्यम से हिंदू समाज अपने पेट की उसी आग का प्रदर्शन कर रहा है जहां बुद्ध से लेकर गांधी और डॉ. आंबेडकर और लोहिया जैसे महान समाज सुधारक हज्म किए जा रहे हैं। वहां भारतीय संविधान कब जल कर खाक हो जाए कहा नहीं जा सकता। विडंबना यह है कि आजादी के अमृत महोत्सव पर क्रांतिकारियों के बलिदान का स्मरण करने वाले बड़े जलसे करने वाले लोग यह याद नहीं दिला रहे हैं कि उन क्रांतिकारियों का एक बड़ा लक्ष्य हिंदू समाज और उसी के साथ भारतीय समाज को उदार, आधुनिक, समतामूलक और सद्भावपूर्ण बनाना था।

सवाल यह है कि क्या मोदी--योगी के समक्ष सशक्त विपक्ष बन चुके अखिलेश यादव और उनके नेतृत्व में समाजवादी पार्टी इस चुनौती का सामना कर पाएगी। निश्चित रूप से यह चुनौती कठिन है। लेकिन अखिलेश यादव की संवाद शैली और उनकी रैलियों में उमड़ती भीड़ से लग रहा है कि इस प्रदेश का बहुजन समाज उनके साथ जुड़ रहा है। यही वजह है कि अखिलेश यादव विकास के साथ ही डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया का नाम एक साथ ले रहे हैं। वे जान गए हैं कि आंबेडकरवादी विचारधारा पर दावा करने वाली बहन मायावती प्रचार करने के लिए नहीं निकलेंगी और उनके डिपुटी सतीश मिश्र तो प्रबुद्ध सम्मेलनों में लगे हुए हैं। यह एक विडंबना है और इसका गंभीर विश्लेषण होना चाहिए कि बहुजनों की राजनीति करने वाले एक दल का खेवनहार एक ब्राह्मण नेता बना हुआ है और वह किसी नए एजेंडा को आगे बढ़ाने की बजाय कुछ प्रतीकों के माध्यम से वोट बटोर रहा है।

महिलाओं, किसानों, युवाओं और कुछ उपेक्षित जातियों पर अपना ध्यान केंद्रित करने वाली कांग्रेस प्रियंका गांधी के नेतृत्व में रैलियां और आयोजन तो कर रही है लेकिन पार्टी संगठन के छिन्न भिन्न होने और मजबूत और अनुभवी नेतृत्व के अभाव में प्रदेश में खास प्रदर्शन कर पाएगी इसमें संदेह है।

ऐसे में धनबल और बाहुबल की अपार शक्ति से लैस भारतीय जनता पार्टी के सामने सिर्फ समाजवादी पार्टी ही है जो अगर अपनी वैचारिकता को मजबूत करती है तो उस बहुजन समाज को एकजुट कर सकती है जो बहन मायावती से निराश है और जिसे कांग्रेस में भरोसा नहीं बन पा रहा है और जो देश और प्रदेश में बढ़ती सवर्ण सत्ता से दुखी है। वह देख रहा है कि अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंदू राष्ट्र के आख्यान के माध्यम से सवर्णों की सत्ता फिर से वापस आ रही है। लंबे समय से चले समाज सुधार के माध्यम से वर्णव्यवस्था की जो पकड़ ढीली हुई थी वह धार्मिक प्रतीकों से माध्यम से फिर से लौट रही है और अब गांव देहात में सवर्ण खुलकर कहने लगे हैं कि अवर्ण हमारे बराबर कैसे हो सकते हैं। यह महज संयोग नहीं है कि भाजपा और संघ परिवार के पक्ष में सवर्ण शिक्षकों और पत्रकारों ने वैचारिक मोर्चा संभाल रखा है। इस पूरी राजनीति में उनकी श्रेष्ठता नए रूप में कायम हो रही है और पिछले तीस-चालीस सालों में आंबेडकरवादी और लोहियावादी दलों का जो उदय हो रहा है उनका पराभव और बिखराव हो रहा है।

अच्छी बात यह है कि तमाम उकसावे के बावजूद अल्पसंख्यक समाज खामोश है। उसने यह तो तय कर लिया है कि किसे वोट करना है लेकिन उसके भीतर एक तबका मौजूदा सत्ता के साथ कुछ सौदेबाजी कर रहा है तो दूसरा और बड़ा हिस्सा संविधान, कानून के राज और उदार हिंदू की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है। वह भयभीत है कि कहीं भारत अफगानिस्तान की तरह तालिबानी शासन की ओर न चला जाए। वह जानता है कि तालिबानियों ने जितना नुकसान अपने मुल्क के गैर मुस्लिमों को पहुंचाया है उससे ज्यादा मुस्लिमों और इस्लाम को पहुंचाया है। जाहिर है कि उससे भीतर भी कुछ लोग प्रतिक्रियास्वरूप उग्रवाद की ओर जाएंगे लेकिन वे अभी उसका प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। इन स्थितियों में अगर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव उदार हिंदू को गोलबंद करने में सफल होते हैं तो वे हिंदू राष्ट्र की स्थापना को रोकने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। उन्होंने इसके लिए विभिन्न पिछड़ी और दलित जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली छोटी पार्टियों से गठबंधन बनाया है और जाति जनगणना की मांग उठाते हुए उदार हिंदू के एजेंडा को बढ़ा रहे हैं। हालांकि प्रदेश के मौजूदा प्रतिक्रियावादी माहौल में उनके लिए जाति तोड़ने और जाति भेद के समूल नाश के डॉ. लोहिया और डॉ. आंबेडकर के रेडिकल एजेंडे को लेकर चल पाना संभव नहीं दिखता लेकिन उन्हें इस बात का अहसास होना चाहिए कि हिंदू राष्ट्र के विचार और खौफ से लड़ने में वे विचार बहुत दूर तक कारगर हो सकते हैं। उन विचारों को उन्हें अपने हृदय के भीतर रखना होगा। हालांकि वह पार्टी छापों के बीच एक छापामार लड़ाई जैसी लड़ती दिख रही है जिसके सामने एक ओर उसका अपना अस्तित्व है तो साथ ही भारतीय लोकतंत्र और संविधान को बचाने में कुछ योगदान दे पाने की चुनौती भी है।

अगर समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के इस चुनाव को हिंदू बनाम मुसलमान से हटाकर हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई बना सके और अपने साथ बहुजन समाज को एकजुट कर सके तो इससे भारतीय लोकतंत्र और संविधान के लिए एक उम्मीद कहा जा सकता है। फिर तो यह लड़ाई सचमुच 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत हो जाएगी। जहां एक ओर कट्टरता चाहने वाला सवर्ण समाज होगा तो दूसरी ओर उदारता चाहने वाला बहुजन समाज। इसी को मान्यवर कांशीराम अपनी कलम के प्रतीक से व्यक्त करते थे। जिसमें कलम की टोपी सवर्णों की होती थी और उसकी रिफिल और शरीर बहुजन समाज का होता था। वे खड़ी कलम को क्षैतिज कर देते थे और कहते थे कि हमें ऐसा समाज बनाना है।

हालांकि पश्चिम बंगाल, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र की तरह नवजागरण से वंचित और धार्मिक स्थलों के रूप में विख्यात उत्तर प्रदेश में ऐसा कर पाना आसान नहीं है लेकिन वैसा कर पाना असंभव भी नहीं है। यह बुद्ध की धरती है, कबीर की धरती है, रैदास की भूमि है। अतीत में यहां समाज सुधार के प्रयास हुए हैं। अगर वैसा हुआ तो वह हिंदू समाज की पेट की आग से अपने महापुरुषों और समाज सुधारकों को बचाने वाला महान कार्य होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

Uttar pradesh
UP Assembly Elections 2022
Yogi Adityanath
BJP
yogi government
Hindutva
Religion Politics
AKHILESH YADAV
SP

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