NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
शर्मनाक: कार्टून नहीं, किसानों को बीजेपी की खुली धमकी!
यह कार्टून देखिए। यह बीजेपी उत्तर प्रदेश के ऑफिशयल ट्विटर हैंडल पर 29 जुलाई को प्रसारित किया गया और अभी तक बरकरार है। इसे देखकर कोई भी कह सकता है कि यह सीधे-सीधे किसान नेता राकेश टिकैत को धमकी है।
मुकुल सरल
30 Jul 2021
शर्मनाक: अब धमकी की भाषा पर उतर आई है बीजेपी!

इसे क्या कहा जाए? किसान आंदोलन की मज़बूती या बीजेपी सरकार की बौखलाहट। किसानों को आतंकवादी, नक्सलवादी, खालिस्तानी और मवाली कहने के बाद सत्तारूढ़ बीजेपी सीधे-सीधे ‘देख लेने’ या ‘निपट लेने’ की धमकी दे रही है।

जी, हां, यह कार्टून देखिए। यह बीजेपी उत्तर प्रदेश के ऑफिशयल ट्विटर हैंडल पर 29 जुलाई को प्रसारित किया गया और अभी तक बरकरार है। इसे देखकर कोई भी कह सकता है कि यह सीधे-सीधे किसान नेता राकेश टिकैत को धमकी है। और “ओ भाई जरा संभल के जइयो लखनऊ में” के नाम पर साफ़ कहा जा रहा है कि उन्हें “बाल पकड़कर घसीटा जाएगा” और बाल पकड़कर घसीटने वाला भी कौन है ये भी कार्टून से स्पष्ट हो ही जाता है।

ओ भाई जरा संभल कर जइयो लखनऊ में...#BJP4UP pic.twitter.com/TKwrjaIXYz

— BJP Uttar Pradesh (@BJP4UP) July 29, 2021

आपको मालूम है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने ऐलान किया है कि वे अब उत्तर प्रदेश समेत पांच अन्य राज्यों में अगले साल 2022 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में सीधा हस्तक्षेप करते हुए बीजेपी को हराने का काम करेंगे। जैसा उन्होंने पश्चिम बंगाल के चुनाव में किया। इसी मुहिम: मिशन उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के तहत अभी 26 जुलाई को किसान नेता राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव लखनऊ पहुंचे, और दोनों राज्यों में बड़ा आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। यह आंदोलन 5 सिंतबर को मुज़फ़्फ़रनगर में होने वाली महापंचायत के साथ शुरू हो जाएगा। इसी दौरान राकेश टिकैत ने कहा कि अगर सरकार ने किसानों की मांगों को नहीं माना तो दिल्ली की तरह लखनऊ को भी घेरा जाएगा।

राकेश टिकैत की इसी टिप्पणी से बौखला कर शायद बीजेपी ने ये बेतुका कार्टून जारी किया है। दरअसल पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी के भीतर एक डर, एक बौखलाहट तो पैदा हुई ही है। भले ही बीजेपी के नेता इससे लाख इंकार करें। हालांकि वह भी जानते हैं कि किसान नेताओं की अपील का असर जब पश्चिम बंगाल के चुनाव में हुआ है, जहां सीधे तौर पर इस आंदोलन का असर यूपी से कम है तो जहां यह आंदोलन सीधे जुड़ा है तो उसका क्या असर होगा। आपको मालूम ही है कि राकेश टिकैत और उनकी भारतीय किसान यूनियन का पश्चिम उत्तर प्रदेश में कितना असर है। और गाज़ीपुर बॉर्डर पर भी आठ महीने से लगातार यूपी के किसानों का मोर्चा लगा है।

आपने अभी यूपी के पंचायत स्तर के चुनाव में भी इसका असर देखा। जिला पंचायत सदस्य के चुनावों में भाजपा, सपा से नीचे तीसरे नंबर पर खिसक गई। पहले नंबर पर निर्दलीय और दूसरे पर सपा रही। यह हाल तब है जब बीजेपी यूपी की सत्ता में है। आमतौर पर माना जाता है कि जिसकी सत्ता होती है पंचायत चुनाव में उसी का दबदबा रहता है। हालांकि फिर यही बात साबित करने के लिए तमाम छल-बल से बीजेपी ने ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में अपना कब्ज़ा बना लिया। यही ब्लॉक प्रमुख चुनाव में दोहराया गया। इस दौरान हिंसा और उत्पीड़न की जैसी तस्वीरें सामने आईं, जैसे वीडियो वायरल हुए, उसने दिल दहल दिया। इस कब्ज़ेदारी ने लोकतंत्र को शर्मसार ही किया।

इसे पढ़ें: महिला की साड़ी खींचने के मामले में तत्काल कार्रवाई करे यूपी पुलिस: महिला आयोग

अब यही डर है। दोनों ओर से। मतलब बीजेपी को हार का डर है और जनता और किसानों को डर है कि हार सामने देखकर योगी सरकार विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा और दमन का सहारा ले सकती है।

यह कार्टून शायद उसी की बानगी है...

आप कह सकते हैं कि राकेश टिकैत का दिल्ली की तर्ज पर लखनऊ को घेरने का बयान भी तो सीधे-सीधे धमकी है!

लेकिन नहीं, धरना-प्रदर्शन, घेराव का अधिकार किसी का भी लोकतांत्रिक अधिकार है। यह अधिकार हमें हमारा संविधान देता है और उसकी पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फ़ैसलों में की है।

और चेतावनी दिल्ली की तरह घेराव की दी गई है। और आप जानते हैं कि दिल्ली की सीमाओं- सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन 8 महीने से चल रहा है, लेकिन इस दौरान न दिल्ली में कोई गतिविधि ठप हुई, न दिल्ली के बाहर से आवागमन बंद हुआ है। न किसी सामान की सप्लाई बाधित हुई है। आवश्यक सेवाएं ही नहीं अन्य सभी सेवाएं सुचारू ढंग से चल रही हैं। यानी किसानों ने इस बात का पूरा ख़्याल रखा है कि किसी के काम में कोई रुकावट न आए। बल्कि उन्होंने तो अन्य लोगों की मदद ही करने की कोशिश की है। कोरोना की पहली लहर में लंगर खिलाने से लेकर दूसरी लहर में ऑक्सीजन के लंगर लगाने तक।

अगर बीच-बीच में जो थोड़ी बहुत बाधाएं या रुकावट या शोरगुल की ख़बरें आईं हैं वो भी पुलिस-प्रशासन की सख़्ती या बीजेपी समर्थकों की कारस्तानियों की वजह से आई हैं। ये भी सच है कि जब इतना बड़ा और इतना लंबा जनांदोलन चलता है तो थोड़ी-बहुत दिक्कत तो उठानी भी पड़ जाती है। यहां हमें किसानों की दिक्कत का भी सोचना चाहिए जो आठ महीने से कभी सर्दी, कभी गर्मी और अब बरसात की मार झेल रहे हैं। इस दौरान न जाने कितनी शहादते हो चुकी हैं और वे तब भी लगातार डटे हैं। किस वजह से- कि सरकार ने किसानों से बिना विचार-विमर्श किए जो तीन कृषि क़ानून बनाए हैं, उन्हें रद्द कर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी दी जाए। ताकि खेती-किसानी कॉरपोरेट के चंगुल में न फंस जाए और भारत का किसान अपनी ज़मीन पर ही बंधुआ मज़दूर न बन जाए। साथ ही आम उपभोक्ता की थाली से भी रोटी गायब न हो जाए। टिकैत कहते भी हैं कि हमारा आंदोलन इस बात को लेकर है ताकि “रोटी तिजोरी में बंद न हो”।

यही नहीं राकेश टिकैत का मशहूर जुमला “बक्कल उतार देंगे” का मतलब भी सीधे-सीधे किसी हिंसा से नहीं है। इसे वे खुद कई बार साफ़ कर चुके हैं। बक्कल का शाब्दिक अर्थ यूं तो फल का छिलका या खोल से होता है, लेकिन सामान्य अर्थों में इसका मतलब सबक सिखाने, शासन-प्रशासन से लोहा लेने से लिया जाता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में इस तरह की शब्दावली बहुत प्रचलित है। लोग बात-बात पर कह देते हैं- तेरे बक्कल उतार दूंगा, तेरी खाल खींच लूंगा। ये आदतन भी होता है, लेकिन इसका वास्तव में वही अर्थ नहीं होता जो कहा जा रहा है। और अगर होता भी हो तो भी एक आम व्यक्ति, एक ग्रामीण, एक किसान नेता और एक सरकार या सत्तारूढ़ दल की शब्दावली में कुछ तो फ़र्क़ होना चाहिए। इसके साथ पोस्टर लगवाने की बात भी बड़े गौरव से कही गई है जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट योगी सरकार को कई बार बुरी तरह फटकार चुका है।

इसे पढ़ें : इलाहाबाद हाईकोर्ट सख़्त, योगी सरकार को हटाने ही होंगे सीएए हिंसा आरोपियों के होर्डिंग्स

और यह बातें एक डरे-घबराए बाहुबली के मुंह से कहलाई गईं हैं जबकि यूपी में किस तरह दबंगई और बाहुबल आज भी कायम है, सब जानते हैं। ये अलग बात है कि ज़्यादातर बाहुबली सीधे सत्ता से जुड़े हैं। इसे सबने अभी ज़िला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख चुनाव के दौरान अपनी आंखों से देखा है।

इसे पढ़ें : उत्तर प्रदेश: ब्लॉक प्रमुख चुनाव के नामांकन के दौरान 14 जिलों में हिंसक घटनाएं, पुलिस और प्रशासन बने रहे मूक दर्शक

इतना ही नहीं बलिया कांड को भी लोग अभी भूले नहीं हैं। जहां दिन-दहाड़े आला अधिकारियों की मौजूदगी में गोलियां चलती हैं। इसमें एक शख्स की मौत होती है। कई अन्य लोग घायल हो जाते हैं। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में मुख्य हमलावर वहां से फरार हो जाता है।

इसे पढ़ें : बलिया कांड: क्या बीजेपी ख़ुद अपनी फ़ज़ीहत कराने में लगी है?

कुल मिलाकर यह पूछा ही जाना चाहिए कि क्या एक सरकार या सरकार चला रहे दल को इस तरह की भाषा बोलने, ऐसे हिंसक कार्टून बनवाने और उसे जारी करने की इजाज़त होनी चाहिए। देश के अन्नदाताओं को मवाली कहने वालों को एक बार फिर सोचने की ज़रूरत है कि वे जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं।

UttarPradesh
BJP Uttar Pradesh
farmers protest
kisan andolan
Yogi Adityanath
yogi government
rakesh tikait
Lucknow

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

बेंगलुरु में किसान नेता राकेश टिकैत पर काली स्याही फेंकी गयी

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

क्या वाकई 'यूपी पुलिस दबिश देने नहीं, बल्कि दबंगई दिखाने जाती है'?

मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?

यूपी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच करोड़ों की दवाएं बेकार, कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के आदिवासी समूहों के सम्मेलन में क्या कहा गया?
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के आदिवासी समूहों के सम्मेलन में क्या कहा गया?
    30 Aug 2021
    40 अलग-अलग आदिवासी समूहों में से 120 पारंपरिक तौर पर स्वामित्व रखने वालों ने केर्न्स (ऑस्ट्रेलिया) में जलवायु परिवर्तन पर पाँच दिन तक चली नेशनल फ़र्स्ट पीपुल्स गैदरिंग में हिस्सा लिया।
  • अवनि लेखरा
    भाषा
    पैरालंपिक में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी निशानेबाज अवनि लेखरा
    30 Aug 2021
    यह भारत का इन खेलों की निशानेबाजी प्रतियोगिता में भी पहला पदक है। टोक्यो पैरालंपिक में भी यह देश का पहला स्वर्ण पदक है। पैरालंपिक खेलों में पदक जीतने वाली वह तीसरी भारतीय महिला हैं।
  • इज़रायल का गाज़ा के वीकेंड प्रदर्शन पर हवाई हमले सहित हिंसक कार्रवाई, 30 लोग घायल
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल का गाज़ा के वीकेंड प्रदर्शन पर हवाई हमले सहित हिंसक कार्रवाई, 30 लोग घायल
    30 Aug 2021
    गाज़ा पर 14 साल से चली आ रही इज़रायली नाकेबंदी को हटाने और वस्तुओं की आपूर्ति पर प्रतिबंधों में ढील देने की मांग को लेकर गाजा में फिलिस्तीनी पिछले कई दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
  • इतिहास बताता है कि अमेरिका भी तालिबान की तरह ही चरमपंथी है
    एजाज़ अशरफ़
    इतिहास बताता है कि अमेरिका भी तालिबान की तरह ही चरमपंथी है
    30 Aug 2021
    अमेरिकी नेता जब दुनिया में इंसाफ़ और जम्हूरियत को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो मुस्लिम जगत को यह बात प्रतिशोध और लोलुपता की तरह दिखायी-सुनायी देती है।
  • राजनीति: कांग्रेस अपने ही नेताओं के वैचारिक संकट और अवसरवाद की शिकार
    अफ़ज़ल इमाम
    राजनीति: कांग्रेस अपने ही नेताओं के वैचारिक संकट और अवसरवाद की शिकार
    30 Aug 2021
    हालत यह हो गई है कि अब सत्ताधारी भाजपा के साथ-साथ कुछ विपक्ष के नेता भी यह तंज कसने लगे हैं कि जब कांग्रेस खुद अपना घर नहीं ठीक कर पा रही है तो वह राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विपक्षी एकता कैसे बनाएगी?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License