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क्या डूब जाएगा बनारस का ख़ूबसूरत ढाब आईलैंड?
मोदी सरकार के अनियोजित विकास की ज़िद के चलते दरक रहा है पूर्वांचल के इकलौते आबाद टापू का अस्तित्व
विजय विनीत
11 Jun 2021
क्या डूब जाएगा बनारस का ख़ूबसूरत ढाब आईलैंड?

वाराणसी यानी बनारस को विकास के नए मॉडल के रूप में विकसित करने की मोदी सरकार की जिद के चलते पूर्वांचल के इकलौते आबाद ढाब आईलैंड का अस्तित्व दरकने लगा है। इस आईलैंड पर बसे पांच खूबसूरत गांव बसे हैं। ये गांव हैं रमचंदीपुर, गोबरहां, मोकलपुर, मुस्तफाबाद (आंशिक) और रामपुर (आंशिक)। कुछ ही सालों में ये सभी गांव गंगा में समा सकते हैं। ढाब आईलैंड को गंगा तेजी से काट रही हैं तो माफिया और ठेकेदार भी इसका वजूद मिटाने में जुट गए हैं। बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध खनन के खेल और पोकलेन की गरज से इस टापू के बाशिंदे दहल गए हैं। बनारस के राजघाट से ढाब आईलैंड की दूरी महज साढ़े छह किमी और आबादी करीब 38 हजार है। ये पूर्वांचल का वो ग्रामीण इलाका है जहां के बाशिंदे सर्वाधिक विदेशी मुद्रा कमाते हैं।

ऐसा दिखता है ढाब

बनारस और चंदौली के बीच गंगा नदी के दो पाटों के बीच सात किमी लंबा आईलैंड सालों पहले रेत पर बसा था। बारिश के दिनों में यह आईलैंड पहले समूची दुनिया से कट जाता था। सावन-भादों में न बिजली मिलती थी और न मोबाइल नेटवर्क। बनारस के नक्शे पर इस टापू के गांव दिखते ही नहीं थे। अखिलेश सरकार ने मुस्तफाबाद के पास एक शानदार पुल बनाकर ढाब आईलैंड के लोगों की मुश्किलें थोड़ी आसान की, लेकिन दुशवारियां कम नहीं हुई हैं। इस आईलैंड को गंगा दोनों ओर से काट रही है। इस वजह से यह टापू सिकुड़ता जा रहा है। कुछ महीनों से ठेकेदार और माफिया भी इस आईलैंड का अस्तित्व मिटाने में जुट गए हैं। रिंगरोड के विकास के नाम पर टापू के किनारे पोकलेन लगाकर चौतरफा बड़े पैमाने पर अवैध ढंग से मिट्टी निकाली जा रही है।

ढाब इलाके से गुज़रने वाला निर्माणाधीन पुल, लेकिन इलाके के लोगों के लिए रास्ता नहीं

मुस्तफाबाद के पूर्व प्रधान राजेंद्र सिंह कहते हैं, 'हालात बेहद भयावह है। ढाब आईलैंड के सामने सोता में जमा बालू का ढेर ग्रामीणों की तबाही की पटकथा लिख रही है। अनियोजित तरीके से गंगा में होने वाली ड्रेजिंग और पारंपरिक तरीके से बालू निकासी पर लगे प्रतिबंध से बनारस का खूबसूरत टापू पहले से ही सिकुड़ रहा था। इस आईलैंड के समीप से गुजरने वाले रिंग रोड के लिए अब इसे उजाड़ा जा रहा है। रिंग रोड के लिए इसी टापू की मिट्टी खोदी जा रही है। हालात ऐसे ही रहे और सरकार ने ढाब आईलैंड को बचाने के लिए कवायद शुरू नहीं की तो यह टापू कुछ ही सालों में हमेशा के लिए जलमग्न हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इन गांवों को ऐसे लोगों की जन्मस्थली के रूप में याद रखा जाएगा जो पूर्वाचल में सबसे पहले किसी खूबसूरत टापू पर विस्थापित हुए थे।'

बारिश के दिनों में ढाब का नज़ारा

टापू के अस्तित्व पर संकट के बादल

बनारस में गंगा ने इकलौते टापू पर कई पीढ़ियों से हजारों परिवारों को शरण दे रखी है, लेकिन पिछले एक दशक में गंगा तेजी से इस टापू का अस्तित्व मिटाने में जुटी हैं। गोबरहां के पास गंगा तेजी से आईलैंड को काट रही हैं। इसी तरह का कटान मुस्तफाबाद में भी हो रहा है। रमचंदीपुर के पूर्व प्रधान बद्रीनारायण सिंह यादव बताते हैं, 'अफसरों की देहरी पर अनगिनत मर्तबा गुहार लगाने के बावजूद ढाब को बचाने के लिए कोई सार्थक पहल शुरू नहीं हुई। हालात यह है कि बाढ़ की विभीषिका के चलते रमचंदीपुर, गोबरहां, मोकलपुर, मुस्तफाबाद और रामपुर गांव में सैकड़ों बीघा जमीन गंगा लील चुकी है। हालात ये हैं कि इन गावों पर अब खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। रेत की दीवारें अब इन गावों की सरहद को बचाने में सक्षम नहीं रह गई हैं। ढाब आईलैंड का आकार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। वाराणसी जिला प्रशासन गंगा कटान रोकने के लिए कामचलाऊ इंतजाम भी नहीं कर पा रहा है।'

ख़ूबसूरत आईलैंड को इस तरह खोदा गया

ढाब आईलैंड को गंगा ने तब से ज्यादा रेतना शुरू किया है जब से जलपोत चलाने के लिए नदी की ड्रेजिंग कराई गई। रिंग रोड बननी शुरू हुई तो भ्रष्टाचार में डूबी सरकारी मशीनरी ने विकास के बहाने ठेकेदारों और माफियाओं को मिट्टी के अवैध खनन की छूट दे दी। सामाजिक कार्यकर्ता सुनील यादव बताते हैं, 'बनारस को विकास के नए माडल के रूप में विकसित करने की जिद इस टापू पर रहने वाले लोगों पर भारी पड़ती नजर आ रही है। गंगा के किनारों से शुरू किया गया अवैध खनन अब आबादी की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। तटबंध बनाने के बजाय ढाब आईलैंड को उजाड़ने की कवायद लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है।'

ढाब में ऐसे हैं ख़ूबसूरत स्थान

2035 तक रहने लायक नहीं रह जाएगा यह टापू

बनारस में कई मर्तबा बाढ़ और शक्तिशाली तूफान आए, लेकिन ढाब के बाशिंदों को सुरक्षित ठौर पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। लगता है कि अब इस टापू में रहने वालों को कुछ सालों बाद नए ठौर की तलाश करनी पड़ सकती है। सुनील कहते हैं, 'अनुमान है कि साल 2035 तक ढाब के खूबसूरत गांव रहने लायक नहीं रह जाएंगे। ढाब के बाशिंदों की व्यथा गंगा नदी के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों से अलग नहीं है। अवैध खनन के अलावा गंगा का जलस्तर बढ़ने और तटीय इलाकों के क्षरण से इस टापू पर खतरा मंडरा रहा है।'

ख़ूबसूरत आईलैंड को इस तरह खोदा गया

गोबरहां के पूर्व प्रधान कृपाशंकर सिंह कहते हैं, 'ढाब आईलैंड को बचाने के लिए यथाशीघ्र तटबंध नहीं बनाए गए तो गंगा कटान की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।' वो बताते हैं कि ढाब के बाशिंदों के अस्तित्व को बचाने के लिए चार-पांच करोड़ रुपये खर्च आ सकता है। इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि ये धनराशि सरकारी खजाने से ढाब में आ पाएगी। रमचंदीपुर के जनप्रतिनिधि रहे जोखन सिंह कहते हैं, 'ढाब के मूल निवासी उस समस्या की कीमत चुका रहे हैं जो उन्होंने खड़ी नहीं की है।' उन्होंने कहा, 'अगर हम दस साल बाद भी यहां रहे तो हम मिट जाएंगे या फिर दूसरी जगह विस्थापित होना पड़ेगा। सरकार ने हम पर अपनी समस्या लादी और अब वह चाहती है कि हम खुद ही सब कुछ उठाकर यहां से चले जाएं। ये किस तरह की सरकार है? '

ढाब का जनजीवन

ढाब आईलैंड के ज्यादातर लोग बागवानी करते हैं या फिर पशुपालन। ये धंधा भी अब आसान नहीं रह गया है। जंगली सुअर और घड़रोज बाग-बगीचे और सब्जियों की फसलें बर्बाद करने लगे हैं। रमचंदीपुर के राजकुमार यादव ने कहा, 'अगर हमें अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो खुद को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना होगा, लेकिन गंगा कटान और अवैध खनन न रुक पाने का मतलब है अब मुश्किलें थमने वाली नहीं हैं।'

बारिश में क़हर ढाती है गंगा

आख़िर कौन आएगा गंगा कटान रोकने?

 गोबरहां के पूर्व प्रधान भोलाराम कहते हैं, 'ढाब आईलैंड की धरती बेहद उपजाऊ है। बनारस में दूध और सब्जियों की सर्वाधिक आपूर्ति इसी ढाब से ही होती है। इस टापू के ढाई हजार नौजवान गल्फ में नौकरी करते हैं जिससे सर्वाधिक विदेशी मुद्रा बनारस पहुंचती है।' उन्होंने कहा, 'सच्चाई ये है कि यह आईलैंड विकास की राह पर है। सवाल है कि गंगा कटान रोकने के लिए कौन प्रमुख भूमिका निभाएगा? हम चाहते हैं कि यूपी और केंद्र सरकार दोनों मिलकर ये भूमिका निभाएं, क्योंकि ग्रामीणों की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।'

गोबरहां के पूर्व प्रधान लालजी यादव कहते हैं कि संसाधनों के दोहन और पर्यटन के नजरिये से इस आईलैंड को विकसित किया जाए तो ढाब आने वाले दिनों में एक आकर्षक क्षेत्र बन सकता है। इसे पर्यटक विलेज के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई अर्जियां भेजी जा चुकी हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात साबित हुए।

रिंग रोड, जो ढाब की तबाही की शर्त पर बनाई जा रही है!

विकास की ज़िद बनी, विनाश की ज़िद

यूं तो ढाब आईलैंड चंदौली लोकसभा सीट का हिस्सा है, लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से बिल्कुल सटा हुआ है। इस इलाके के सांसद हैं भाजपा के डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय। डॉ. पांडेय केंद्र सरकार के काबीना मंत्री भी हैं, लेकिन टापू के लोग इनके दर्शन के लिए तरस जाते हैं। इलाकाई विधायक अनिल राजभर भी यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री हैं, लेकिन इन्हें भी ढाब आईलैंड के कोई चिंता नहीं है।

मुस्तफाबाद के डॉ. शशिकांत सिंह कहते हैं, ‘इलाकाई सांसद और विधायक विकास की जिद, इस टापू के लोगों के लिए विनाश की जिद बनती जा रही है। लगता है कि आईलैंड पर अवैध खनन करने वालों के सिर पर सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं का हाथ है। जब भी कोई चुनाव आता है तो ढाब आईलैंड पर रहने वाले ग्रामीणों को लुभाने के लिए नेताओं का रेला जुटता है, लेकिन मुसीबत के समय कोई दिखता ही नहीं है। गंगा के रास्ते ढाब आईलैंड से बनारस शहर कुछ मिनट का रास्ता है, लेकिन सरकार ने आवागमन का कोई इंतजाम नहीं किया है।'

डॉ. सिंह कहते हैं, ‘ढाब इलाके के लोग चाहते हैं कि रिंग रोड से इस टापू को भी जोड़ दिया जाए, लेकिन उनकी आवाज सरकार तक नहीं पहुंच पा रही है। सालों से आवागन की दुश्वारियां झेल रहे ढाब इलाके के लोग खासे भयभीत हैं और इन्हें उजाड़ने अथवा विकास के बहाने उजाड़े जाने का डर सता रहा है। कटान रोकने के लिए तटबंध बनाने की बात तो दूर, माझी समुदाय पर पारंपरिक तरीके से बालू निकालने पर रोक लगा दी गई है। नतीजा, ढाब आईलैंड के साथ ही इससे सटे चंदौली जिले के कुरहना, कैली, महडौरा, भोपौली समेत कई गांवों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।'

पूर्वांचल के इकलौते आईलैंड में बरसती हैं विदेशी मुद्राएं

ढाब आईलैंड के करीब एक हजार से अधिक लोग खाड़ी देशों में नौकरी करते हैं। इनमें ज्यादातर युवा हैं, जो अपने परिवार को छोड़कर दुबई, शारजाह, मस्कट, दोहा-कतर, लीबिया आदि देशों में मजूरी करते हैं। कुछ लोग वहां मकान बनाने का काम करते हैं तो कुछ मिट्टी-गारा ढोने का। ढाब के लोगों को मकानों की सेंटरिंग और बढ़ईगीरी के हुनर के उस्ताद माने जाते हैं। ढाब बनारस का ऐसा इलाका है, जहां यूपी में सर्वाधिक विदेशी मुद्राएं आती हैं। लेकिन आज भी विकास यहां सपना है।

सभी फोटो: विजय विनीत

(बनारस स्थित विजय विनीत वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं।)

इसे भी पढ़ें : गुजरात के बाद बनारस मॉडल : “भगवान बचाए ऐसे मॉडल से” 

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