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यूपी: लॉकडाउन से चिकनकारी और ज़रदोज़ी के कारीगर हुए बर्बाद, व्यापारी भी संकट में
लॉकडाउन के चलते लखनऊ में चिकनकारी और ज़रदोजी का काम पूरी तरह से बंद हैं। इसके चलते हजारों की संख्या में कारीगर बेरोज़गार हो गए हैं और व्यापारी आर्थिक संकट की चपेट में हैं।
असद रिज़वी
01 May 2020
 लॉकडाउन से चिकनकारी और ज़रदोज़ी के कारीगर

अवध (लखनऊ) का प्रसिद्ध ज़रदोज़ी और चिकनकारी का काम लॉकडाउन में पूरी तरह ठप हो गया है। कारीगरों से व्यापारियों तक सभी आर्थिक मार का सामना कर रहे हैं। दिहाड़ी पर काम करने वाले कारीगरों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आर्थिक सहायता की मांग भी की है। दिनभर मेहनत कर के दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करने वाले दिहाड़ी कारीगरों (शिल्पकार) के सामने घर चलाने का संकट पैदा हो गया है। तो वहीं व्यापारियों का कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से पैदा हुए संकट से बाहर निकलने में एक-दो वर्ष लग सकते हैं। व्यापारियों का कहना है, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और कोरोना के लॉकडाउन ने कारोबार को लगभग ख़त्म कर दिया है।

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गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के अलावा देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों में भी लखनऊ के ज़रदोज़ी और चिकन वस्त्रों की भारी मांग है। लखनऊ आने वाले पर्यटक यहाँ की ऐतिहासिक स्मारकों के बाद सबसे ज्यादा रुचि यहां के ज़रदोज़ी और चिकन के काम में दिखाते हैं।

व्यापारियों की माने तो यहाँ चिकन और ज़रदोज़ी के मिलाकर क़रीब 100 बड़े उद्यमी और 4000-5000 के लगभग छोटे और मंझले उद्यमी है। जिनका 80-90 प्रतिशत कारोबार विदेशी पर्यटकों से या निर्यात से होता है। इनमे प्रत्येक व्यापारी लाखों से करोड़ों रुपये प्रति वर्ष का कारोबार करता है।

इसके साथ 150-400 रुपये प्रति दिन पर काम करने वाले लखनऊ, हरदोई, मलीहाबाद, सीतापुर, उन्नाव, लखीमपुर, काकोरी और रायबरेली आदि के लाखों कारीगरों की फ़ौज जुडी हुई है। इन कारीगरों का कहना है कि उनके कारख़ाने जो उनकी रोज़ी रोटी का एकमात्र ज़रिया हैं, वो लॉकडाउन की वजह से बंद है।

इन कारीगरों का कहना है कि बॉलीवुड की अभिनेत्रियों से लेकर विदेशियों तक के लिए वह ज़रदोज़ी के वस्त्र तैयार करते हैं। उनकी बनाई हुईं साड़ियां, लहंगे और सूट सारी दुनिया में जाते हैं। लेकिन इस समय विदेश से मिलने वाले आर्डर भी नहीं आ रहे हैं और पैसे का लेन-देन बिल्कुल बंद है। ऐसे में घर का ख़र्चा चलना बहुत मुश्किल होता जा रहा है।

सन् 2000 से ज़रदोज़ी का काम कर रहे आसिफ अली कहते हैं कि लखनऊ और आस-पास में ज़रदोज़ी कारीगरों की तादात लाखों में है और सभी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। हालांकि इनमें से 15 हज़ार कारीगर वस्त्र मंत्रालय (हस्तशिल्प) में पंजीकृत भी है।

वो सवाल उठाते हैं कि सरकार मज़दूरों और ई-रिक्शा चालकों को आर्थिक सहायता दे रही है तो ज़रदोज़ी कारीगरों के साथ सौतेला रवैया क्यूँ है? सरकार कम से कम मंत्रालय में पंजीकृत कारीगरों की एक हज़ार रुपये से सहायता तो कर सकती है।

बता दें कि ज़रदोज़ी कारीगर प्रतिदिन 11 से 13 घंटे तक काम करने पर 300 से 400 रुपये प्रतिदिन कमाता है। इनको कारोबारी सप्ताह के अंत में शनिवार को एक साथ पूरे सप्ताह भुगतान करते हैं।

एक दूसरे कारीगर परवेज़ बताते है कि अभी उनको और बड़ी आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि लॉकडाउन खुलते ही तुरंत काम शुरू होना संभव नहीं है। अभी पुराना तैयार माल ही कारख़ानों में पड़ा है। जिसकी मज़दूरी का अभी तक भुगतान भी नहीं हुआ है। अब तक पहले का रुका भुगतान नहीं होगा हम भी नया काम शुरू नहीं करेंगे।

वो कहते हैं कि अचानक लॉकडाउन की घोषणा वजह से हज़ारों ज़रदोज़ी कारीगरों पुराना भुगतान भी बाक़ी है।

अंजुमन ज़रदोज़ान (ज़रदोज़ी कारीगरों का संगठन) कहता है कि मज़दूरों की तरह काम करने वाले कारीगरों को सरकार ने संकट के समय नज़रअंदाज़ कर दिया है। संगठन के अध्यक्ष जियो आगा उर्फ़ नूर कहते हैं ज़रदोज़ी पहले से ही जीएसटी की मार का सामना कर रही थी। अब अनियोजित लॉकडाउन ने कारीगरों की कमर तोड़ दी है। वे कहते हैं कि अगर केंद्र और प्रदेश सरकार ने मदद नहीं की तो ज़रदोज़ी की कला ज़्यादा बच नहीं सकेगी और हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी।

जियो आगा आगे कहते हैं कि ज़रदोज़ी का काम बड़ी-बड़ी फैक्ट्री में नहीं छोटे-छोटे कमरों में किया जाता है, यही कारण है कि इसकी चमक शो-रूम में तो दिखती है लेकिन इसके पीछे कारीगरों की मेहनत किसी को नहीं दिखती है। लॉकडाउन शुरू होने के बाद से 2400 से 2500 सौ रुपये प्रति सप्ताह कमाने वाला कारीगर बड़ी मुश्किल से ज़िन्दगी गुज़ार पा रहा है। केवल राजधानी लखनऊ में कई हज़ार कारखाने बंद हैं और कई लाख कारीगर खाली बैठा है।

चिकन कारोबार भी मुश्किल में

उधर चिकन कारीगर और मैन्युफैक्चरर भी कारोबार के अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतित है। चिकन के लगभग सारे बड़े शोरूम लखनऊ में ही हैं। यहाँ हवाई अड्डे से लेकर पुराने शहर की तंग गलियों तक चिकन का कारोबार होता है।

चिकन कारोबार से जुड़े लोगों का अनुमान है कि कोरोना के चलते अब तक कुल दो हज़ार करोड़ का नुकसान हो चुका है। इसके अलावा इसके साथ जुड़े शोरूम में काम करने वाले कर्मचारियों से लेकर चिकन कारीगर तक आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।

लखनऊ की चौक चिकन बाजार के व्यापारी ने बताया कि चिकनकारी का 90 प्रतिशत काम महिलाएँ करती हैं जो लखनऊ और आस-पास ज़िलों और गावों में रहती हैं। इसमें नए काम करने वाले को 150 रुपये और अनुभवी कारीगर को अधिकतम 300 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं।

चिकन मैन्युफैक्चरर भी मानते हैं कि कारीगरों को पैसे देने में देरी हो रही है। व्यापारी सुनील खन्ना कहते हैं कि यह समस्या अभी अगले 5-6 महीने बनी रहेगी। क्योंकि दुकानों पर न ग्राहक आएंगे (ख़ासकर पर्यटक) और न ही निर्यात का आर्डर मिलेगा। दूसरे प्रदेशों के बड़े व्यापारी बाज़ार की ख़राब हालत देखकर मैन्युफैक्चरर का पैसा रोके हैं। यही वजह की कारीगरों का भुगतान नहीं हो रहा है।

उन्होंने कहा कि मैन्युफैक्चरर का तैयार माल भी कारीगरों के पास पड़ा है। लेकिन उनको भुगतान करने लिए पैसा नहीं है। इसलिए अभी वह माल वापिस नहीं लिया जा रहा है।  

लखनऊ की प्रसिद्ध कला चिकन के मैन्युफैक्चरर अब निराश नज़र आ रहे हैं। मैन्युफैक्चरर मुकेश रस्तोगी कहना है कि अभी कारोबार दोबारा ठीक होने में एक-दो साल लग सकते हैं।

तो वहीं, चिकन कारीगरी से जुड़ीं शमीम कहती हैं कि फिलहाल वह क़र्ज़ लेकर घर चला रही हैं। क्योंकि लॉकडाउन के चलते वह तैयार माल भी मैन्युफैक्चरर को नहीं भेज सकी हैं, जिससे उनका भुगतान नहीं हुआ है। उनका कहना यह (मार्च से मई) वह समय होता था जब पानी पीने की छुट्टी नहीं होती थी। लेकिन लॉकडाउन के चलते अब कमाई लगभग बंद है।

वहीं, चिकनकारी का काम करके घर चलने वाली रेशमा कहती हैं कि अभी तक काम की कमी नहीं थी और पैसा भी समय से मिलता था। लेकिन लॉकडाउन के बाद से काम और बक़ाया भुगतान दोनों नहीं मिला है। उनका कहना है कि वह 10-12 वर्षों से चिकन का काम बना रही हैं लेकिन ऐसा समय पहले कभी नहीं आया। जब घर में पैसे भी ख़त्म हो गए और काम भी नहीं मिल रहा है।

रेशमा कहती हैं कि वह एक नहीं तीन मैन्युफैक्चरर के साथ काम करती हैं। पहले अगर एक जगह काम नहीं मिलता था तो दूसरी जगह से काम मिल जाता था और गुज़ारा हो जाता था।लेकिन इस बार कोई उम्मीद नहीं है और तीन बच्चों का पालन पोषण अकेले करना है।

वही चिकनकारी से पहले कपड़े पर डिज़ाइन की छपाई करने वाले भी आर्थिक मार का सामना कर रहे है। छपाईकार रियाज़ अहमद कहते हैं कि घर में जमा पैसों से काम चल रहा है। नया कोई काम नहीं है। नए काम के लिए मालूम किया तो दुकानदार ने कहा जून 15 के बाद ही संपर्क करना। रियाज़ अहमद कहते हैं जब घर में पैसे ख़त्म हो जायेगे तो दो वक़्त की रोटी के लिए भी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

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