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चुनाव 2022
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राजनीति
यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
रवि शंकर दुबे
09 Mar 2022
यूपी चुनाव:  इस बार किसकी सरकार?

उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार होगी?... इसका जवाब महज़ कुछ घंटों बाद मिल जाएगा। नतीजों से पहले सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं। इस बार उत्तर प्रदेश में औसतन 60.31 प्रतिशत वोटिंग हुई है, जो पिछली बार से कुछ कम है। ऐसे में इतिहास के आंकड़े ये बताते हैं कि कम वोटिंग का मतलब है सत्ताधारी पार्टी का सत्ता में बने रहना। और अगर ऐसा होता है तो उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में कई दशकों बाद ये पहली बार होगा।

ख़ैर उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल 14 मई 2022 को पूरा हो रहा है, ऐसे में 14 मई से पहले हर हाल में विधानसभा और नई सरकार के गठन की प्रकिया पूरी होनी है। पिछली बार के आंकड़ों पर नज़र डालें तो भाजपा ने पूरी तरह से विपक्ष को साफ कर दिया था।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 384 सीटें पर चुनाव लड़ी थी, जबकि 309 पर जीत हासिल की थी। वहीं पिछले चुनावों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ था, जिसमें सपा ने 47 और कांग्रेस ने महज़ 7 सीटें जीती थीं।

 

पिछले चुनावों में भले ही भाजपा ने विपक्ष को पूरी तरह से साफ कर दिया हो लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं, फिर चाहे वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो या फिर पूर्वाचल... यही कारण है कि हर चरण में मतदान भी कहीं न कहीं विपक्ष के पक्ष में जाता हुआ नज़र आया। चरणवार कहां किस ज़िले में कितने प्रतिशत मतदान हुए।

 

 उत्तर प्रदेश में भले ही भाजपा सरकार ने ज़मीनी हकीकत से दूर राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाया हो लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हैं जो सरकार को धराशाई कर सकती हैं। हालांकि भाजपा के लिहाज़ से मुद्दे राम मंदिर, आतंकवाद, राष्ट्रवाद, बुल्डोज़र, लोगों के शरीर का तापमान आदि हैं। जबकि इन मुद्दों का वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। क्योंकि अयोध्या से लेकर वाराणसी तक किसानों की फसल बर्बादी का मंज़र है। हालांकि राशन और लाभार्थी

कार्ड का बीजेपी को ज़रूर फायदा मिल सकता है, लेकिन ओल्ड पेंशन बहाली का मुद्दा सीधे-सीधे समाजवादी पार्टी के पक्ष में जा सकता है। इनके अलावा भी कई मुद्दे हैं जो सरकार बनाने और बिगाड़ने में अहम रोल अदा करेंगे।

·   पिछले कुछ सालों में जिस तरह से आवारा पशुओं ने किसानों की खेती बर्बाद कर उनकी रीढ़ तोड़ी है, इसका ख़ामियाज़ा ज़रूर भाजपा को भुगतना पड़ेगा। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की नाराज़गी पर बात ज़रूर बोल दी कि 10 मार्च के बाद छुट्टा जानवरों से जुड़ी समस्याओं का पुख्ता इंतज़ाम किया जाएगा। लेकिन किसानों को मनाना भाजपा के लिए यह टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

·  ये कहना ग़लत न होगा कि भाजपा सरकार में जब-जब युवाओं ने रोज़गार मांगा है तब उन्हें सिर्फ लाठियां ही मिली हैं। हाल ही में हुई प्रयागराज की घटना को कौन भूल सकता है जहां हॉस्टल में घुस-घुसकर छात्रों को बुरी तरह पीटा गया था। यानी साफ है कि बेरोज़गारी के कारण भाजपा गच्चा ज़रूर खा सकती है।

·  बेरोज़गारी के अलावा लोगों में महंगाई को लेकर भी बहुत ज्यादा गुस्सा है, घरेलू गैस से लेकर रसोई का सामान तक लोगों के लिए आफत बनी हुई है।

·  योगी सरकार भले ही माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करने की बात करती रही हो, लेकिन सरकार बनाने के लिए अपराधी से नेता बनने की फिराक में बैठे लोगों के दर माथा टेकना ही पड़ेगा। अयोध्या के गोसाईगंज में बबलू सिंह और आरती तिवारी में संघर्ष हो चुका है। सुल्तानपुर में भी माफिया सरगना आमने-सामने हैं तो चित्रकूट के मानिकपुर में दस्यु सम्राट रहे ददुआ के बेटे वीर सिंह पटेल चुनाव मैदान में हैं। प्रतापगढ़ के कुंडा से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजाभैया व अमेठी में डॉ. संजय सिंह मैदान में हैं। इन दोनों को अपने रजवाड़ों की लाज रखनी है।

·  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की परेशानी भला कौन भूल सकता है जो एक साल से ज़्यादा तक दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर प्रदर्शन करते रहे। अपने हक के लिए गुहार लगाते रहे लेकिन सरकार ने उन्हें बदले में नुकीली कीलें दी। इतना ही नहीं करीब 750 किसानों की शहादत का खामियाज़ा भी सरकार को भुगतना पड़ सकता है।

· किसानों से ही जुड़ा मुद्दा है लखीमपुर खीरी कांड। जिस तरह केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा ने किसानों पर गाड़ी चढ़ाई और जिस तरह ऐन चुनाव के समय उसे बेल मिली, उसने भी किसानों को और नाराज़ करने का काम किया।

·  योगी सरकार को विपक्ष सबसे ज्यादा हाथरस में दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले पर घेरता रहा है। मामले को जिंदा रखने के लिए समाजवादी पार्टी हर महीने 'हाथरस की बेटी स्मृति दिवस' मना रही है। बाकी आपको तो याद ही होगा कि इस मामले के बाद कांग्रेस की ओर से कैसे प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने पीड़िता के घर जाकर उन्हें ढांढस बंधाया था और योगी सरकार पर आरोप मढ़े थे।

·  बिकरू कांड, विकास दुबे पुलिस एनकाउंटर और उसके एक सहयोगी अमर दुबे की पत्नी खुशी दुबे को जेल भेजा जाना भी अहम मुद्दा है। जिसके जरिए विपक्ष ने योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी साबित करने की कोशिश की। कांग्रेस ने खुशी दुबे की बहन नेहा तिवारी को नारायणपुर से टिकट दिया है।

· विपक्ष की तरह भाजपा कन्नौज में इत्र कारोबारी पीयूष जैन के यहां से मिले 250 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी और उसके कथित समाजवादी पार्टी के कनेक्शन का मुद्दा उठा रही है। हालांकि इसी मुद्दे पर सपा की ओर से भी भाजपा पर हमला किया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार में कानून व्यवस्था की इतनी दुहाई दी जाती है तो इतने रुपये कहां से आए?

आलू किसान देगा भाजपा को जवाब?

अन्य किसानों के साथ आलू किसान भी आवारा पशुओं से बहुत ज्यादा परेशान है। यहां आलू की खेती यादव समाज ही नहीं बल्कि शाक्य और कुर्मी समुदाय के लोग भी बड़ी तादाद में करते हैं, जिन्हें बीजेपी का हार्ड कोर वोटर माना जा रहा है। लेकिन अगर इन सीटों पर बसपा और सपा का जातीय समीकरण फिट बैठ जाता है, तो भाजपा को बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।

UP ELections 2022
AKHILESH YADAV
Yogi Adityanath

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