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भारत
राजनीति
यूपी चुनाव: योगी आदित्यनाथ बार-बार  क्यों कर रहे हैं 'डबल इंजन की सरकार' के वाक्यांश का इस्तेमाल?
दोनों नेताओं के बीच स्पष्ट मतभेदों के बावजूद योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी के नाम का इसतेमाल करने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि नरेंद्र मोदी अब भी जनता के बीच लोकप्रिय हैं, जबकि योगी आदित्यनाथ को लेकर ऐसा नहीं कहा जा सकता है।
रोहित घोष
25 Feb 2022
yogi

हालांकि, 'डबल इंजन की सरकार' वाला यह वाक्यांश प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का गढ़ा हुआ है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस वाक्यांश का इस्तेमाल उनसे कहीं ज़्यादा करते हैं। मोदी यह वाक्यांश इसलिए लेकर आये थे, क्योंकि इससे दो लोकोमोटिव से संचालित होने वाली ट्रेन और केंद्र और एक राज्य,दोनों की सत्ता में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के बीच मिलते जुलती एक धारणा बनती थी। इस वाक्यांश से उनका यही मतलब था कि जिस तरह दो इंजन मिलकर किसी ट्रेन को कहीं ज़्यादा कुशलता के साथ खींच सकते हैं; उसी तरह अगर राज्य और केंद्र दोनों की सरकारें भाजपा की हों, तो राज्य में कहीं ज़्यादा विकास होगा।

मोदी 2014 में प्रधान मंत्री बने। तब से उन तमाम राज्यों में जहां भाजपा सत्ता में नहीं थी, उन्होंने विधानसभा चुनावों के दौरान प्रचार करते हुए 'डबल इंजन की सरकार' की आह्वान करते हुए वोट मांगे थे।

भले ही आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री के बीच मतभेद मौजूद हों,लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चल रहे विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र अपने ट्वीट्स में बार-बार इस  वाक्यांश का इस्तेमाल करते हैं।

आइये,इस सिलसिले में आदित्यनाथ के पिछले साल के कुछ ट्वीट्स पर नज़र डालते हैं -

22 मार्च

डबल इंजन की भजपा सरकार के नियोजित प्रयासों से उत्तर प्रदेश देश निवेश का उत्कृष्ट गणव्य बन कर उभरा है  

भजपा की डबल इंजन की सरकार समग्र समाज के उत्थान व उन्नयन हेतू संकल्पित है  

मार्च 21

डबल इंजन की भजपा सरकार प्रदेश में शैक्षिक विस्तार हेतू प्रतिबद्ध है

भजपा की डबल इंजन की सरकार प्रदेश में सुदृढ़ यातायात व्‍यवस्‍था हेतु तीव्रत से कार्य कर रही है

मार्च 20

डबल इंजन की भजपा सरकार प्रदेश की बहनों और बेटियों के उन्नयन हेतू संकल्पित है

डबल इंजन की भजपा सरकार में जनपद लखीमपुर-खीरी में नागरीकों का भाग्योदय हो रहा है

मार्च 19

डबल इंजन की भजपा सरकार ने नारी सशक्तिकरण हेतू अप्रतिम कार्य किये हैं

डबल इंजन की भजपा सरकार ने गांव-गांव को रोशन कर जन-जन के जीवन को प्रकाशमान किया है

मार्च 18

उच्च शिक्षा और बेहतर इलाज डबल इंजन की भजपा सरकार का ध्येय है

डबल इंजन की भाजपा सरकार जन कल्याण हेतू समर्पित है

*****

सवाल है कि अदियानाथ तक़रीबन अपने हर ट्वीट में मोदी के गढ़े इस वाक्यांश का बार-बार इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं, जबकि दोनों नेताओं के बीच के रिश्ते कड़वे नहीं, तो सौहार्दपूर्ण तो नहीं ही कहे जा सकते हैं?

मोदी और आदित्यनाथ के बीच के मतभेदों की ख़बरें अख़बारों में तब सुर्खियां बनी थीं, जब नरेंद्र मोदी के क़रीबी माने जाने वाले एक नौकरशाह ए.के. शर्मा को एक साल पहले दिल्ली से यूपी भेजा गया था।

गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी और पूर्वी यूपी के रहने वाले शर्मा ने 20 साल तक मोदी के साथ पहले अहमदाबाद और फिर दिल्ली में काम किया था।

इस बात को लेकर ज़बरदस्त अटकलें थीं कि मोदी अदियानाथ सरकार के कामकाज से बहुत ख़ुश नहीं थे और लखनऊ में एक अहम पद पर वह अपना एक विश्वासपात्र को बैठाना चाहते थे। लेकिन,आदित्यनाथ शर्मा को इसलिए यह अहम पद देने के लिए तैयार नहीं थे,क्योंकि उन्हें ख़ुद के महत्वहीन हो जाने का डर सता रहा था।

हाल ही में आदियानाथ पर एक किताब का सह-लेखन करने वाले लखनऊ के एक अनुभवी पत्रकार अतुल चंद्र का कहना है, "बतौर मुख्यमंत्री मोदी के पास लम्बे समय का प्रशासनिक अनुभव है, और अब वह प्रधान मंत्री हैं। आदित्यनाथ का अनुभव एक मंदिर के प्रशासन और मठ की महंथी तक सीमित है। मोदी शायद महसूस कर रहे थे कि यूपी के शासन में सुधार की गुंज़ाइश है और इसलिए शर्मा को राज्य का उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे।"

चंद्र ने बताया कि आदिनाथ ने शायद महसूस कर लिया हो कि उनकी स्थिति को कमज़ोर किया जा रहा है, और शर्मा को कैबिनेट में शामिल कराके मोदी लखनऊ में एक और शक्ति केंद्र बनाना चाह रहे हों।

चंद्र ने कहा, "शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाना तो दूर की बात रही, आदित्यनाथ ने लखनऊ पहुंचने पर उनसे मिलने से भी इनकार कर दिया। शर्मा को लखनऊ में चार दिनों तक इंतज़ार करना पड़ा, इसके बाद ही आदित्यनाथ ने उन्हें मिलने का समय दिया।"

उनका कहना है कि मोदी ने उस बुरे व्यवहार को इसलिए सह लिया,क्योंकि आदित्यनाथ पिछले कई सालों में हिंदुत्व के प्रतीक के रूप में उभरे हैं और चुनाव से पहले पार्टी के सामने किसी तरह की कोई अप्रत्याशित चीजें सामने आये,इसका जोखिम नहीं उठाया जा सकता था।

चंद्र ने बताया, "बतौर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को मोदी और केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है। मोदी प्रधानमंत्री हैं और पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। वह यूपी में प्रचार करने से इनकार नहीं कर सकते।"

लेकिन, राज्य के घटनाक्रमों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों के बीच सब कुछ ठीक ठाक है।”

चंद्र का कहना है कि मोदी यूपी में अपना काम इसलिए करते जा रहे हैं, क्योंकि उनकी नज़र 2024 के आम चुनावों पर है। उनका मानना है कि 2024 के आम चुनावों के नतीजे मौजूदा यूपी चुनावों के नतीजों पर निर्भर करेंगे।

चंद्रा ख़ुद ही पूछते हैं कि  "अब सवाल यह है कि आदिनाथ मौजूदा चुनावों में मोदी पर निर्भर क्यों हैं?"

जवाब देते हुए कहते हैं,"आदियानाथ नतीजे देने में नाकाम रहे हैं। यूपी से निवेश और नौकरियां दोनों नदारद हैं। कोविड की दूसरी लहर में बड़ी संख्या में लोगों की मौतें हुई थीं,जिससे इस सूबे की साख को नुक़सान पहुंचा था। गंगा नदी लाशों से अटी-पड़ी थी। आख़िर कोई भी व्यक्ति कब तक इस तरह की चीज़ों को ढक सकता है या छिपा सकता है ? इससे आदित्यनाथ की छवि को नुक़सान पहुंचा है, जबकि मोदी की छवि बरक़रार है। मोदी अब भी जनता के बीच लोकप्रिय हैं, जबकि अदित्यनाथ अति-दक्षिणपंथी बनकर रह गये हैं। इसलिए, आदियानाथ मोदी के वाक्यांश, 'डबल इंजन की सरकार' का बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं।"

कानपुर के एक राजनीतिक विश्लेषक मनोज त्रिपाठी का कहना है, "आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री हैं, और ऐसे में विधायक उनके ही निर्देशों का पालन करेंगे। शर्मा दिसंबर में एक समारोह में भाग लेने के लिए कानपुर गये थे, लेकिन, सालिल विश्नोई को छोड़कर शहर में उनसे मिलने या उनकी आगवानी करने कोई भी विधायक नहीं आया था। ऐसे में फिर कोई क्या निष्कर्ष निकाले ? विश्नोई ने समारोह में भाग इसलिए लिया था, क्योंकि उनके पास मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का प्रभार भी है।"

उन्होंने कहा कि मोदी आदित्यनाथ के प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं थे और इसीलिए वह लखनऊ में ऐसा आदमी चाहते थे,जो उनके इशारे पर काम करे।

त्रिपाठी ने कहा, "मोदी शर्मा को बतौर उपमुख्यमंत्री चाहते थे, लेकिन आदिनाथ ने उस योजना पर पानी फेर दिया था, और आज शर्मा महज़ विधायक परिषद के सदस्य और राज्य भाजपा इकाई के 17 उपाध्यक्षों में से एक उपाध्यक्ष होकर रह गये हैं।"

दोनों नेताओं के बीच ये मतभेद सरेआम नहीं हों,इसके लिए उन्होंने मोदी की ओर से 16 नवंबर को सुल्तानपुर ज़िले में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के मौक़े पर होना मुनासिब समझा था।लेकिन मतभेद के संकेत यहां भी दिखे।

त्रिपाठी बताते हैं, "मोदी का विमान एक्सप्रेसवे पर उतरा। विमान से बाहर निकलते ही अदियानाथ ने मोदी का स्वागत किया। मोदी तुरंत एक कार में सवार हो गये, जो उन्हें उस मंच तक ले गयी, जहां उद्घाटन समारोह होना था। दूसरी ओर, अदियानाथ को ऊपर मंच तक चलकर जाना पड़ा। दोनों के बीच के मतभेदों को समझना होगा।"

त्रिपाठी के मुताबिक़ आदित्यनाथ के कई फ़ैसलों ने उन्हें अलोकप्रिय बना दिया है।

त्रिपाठी ने बताया, "आदियानाथ ने भले ही गायों के वध पर रोक लगा दी हो, लेकिन राज्य के ग्रामीण इलाक़ों में जानवर क़हर बरपा रहे हैं। इन चुनावों में यह एक बड़ा मुद्दा है। इसके अलावा, आदित्यनाथ की छवि एक ठाकुर समर्थक और ब्राह्मण विरोधी की हो गयी है। यूपी के मतदाताओं का 10% ब्राह्मण हैं, लेकिन वे बहुत प्रभावशाली हैं।"

त्रिपाठी बताते हैं,"लोग पूछ रहे हैं कि आदित्यनाथ ने सरकार ब्राह्मण विकास दुबे के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में इतनी जल्दीबाज़ी क्यों थी, लेकिन वहीं उन कुलदीप सिंह सेंगर, धनंजय सिंह और राजा भैया जैसे आपराधिक रिकॉर्ड वाले दूसरे प्रभावशाली राजनेताओं पर उनकी नरम क्यों रही है, जो कि ठाकुर हैं।"  

उनका कहना है कि अदित्यनाथ ने महसूस कर लिया है कि इन चुनावों में उनकी संभावनायें बहुत उज्ज्वल नहीं हैं और इसलिए 'डबल इंजन की सरकार' के वाक्यांश को बार-बार दोहरा रहे हैं।

लेकिन,ऐसा नहीं कि अदित्यनाथ का शर्मा को अपने कैबिनेट में शामिल नहीं करना ही दोनों नेताओं के बीच की कथित दरार की एकलौती वजह रही है।

राजनीतिक पंडितों के मुतबिक़, संसद में लखीमपुर-खीरी निर्वाचन क्षेत्र की नुमाइंदगी करने वाले अजय मिश्रा टेनी को इन विधायी चुनावों से पहले ब्राह्मणों को ख़ुश करने के लिए ही पिछले कैबिनेट विस्तार में केंद्र के कैबिनेट में बतौर उप गृह मंत्री शामिल किया गया था।

लखीमपुर-खीरी में चार किसानों को कथित रूप से कुचले जाने के बाद आदियानाथ टेनी के बेटे आशीष मिश्रा के ख़िलाफ़ तत्काल कार्रवाई करना चाहते थे। वह यह भी चाहते थे कि टेनी को कैबिनेट से हटा दिया जाये। लेकिन, न तो आशीष मिश्रा को तत्काल गिरफ़्तार किया गया और न ही टेनी को मंत्रालय से हटाया गया।

जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे थे, ऐसी ख़बरें थीं कि आदिनाथ या तो हिंदुओं के लिए पवित्र मानी जाने वाली जगहें-अयोध्या या मथुरा से चुनाव लड़ेंगे। इन किसी भी स्थानों से उनकी जीत 2014 और 2019 के आम चुनावों में वाराणसी से खड़े मोदी की जीत के समान होती। वाराणसी भी हिंदुओं के लिए एक पवित्र शहर है। लेकिन, आदित्यनाथ के लिए पार्टी नेतृत्व ने उनके गृह क्षेत्र गोरखपुर को उनके निर्वाचन क्षेत्र के रूप में चुना।

गोरखपुर (सदर) निर्वाचन क्षेत्र में आदियानाथ का सामना समाजवादी पार्टी (सपा) की उम्मीदवार शुभावती शुक्ला से है, जो कभी गोरखपुर के लोकप्रिय भाजपा नेता दिवंगत उपेंद्र शुक्ला की पत्नी हैं। उपेंद्र शुक्ला का मई 2020 में 60 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था और शुभावती शुक्ला इस साल जनवरी में एसपी में शामिल हो गयी थीं।

त्रिपाठी कहते हैं, "गोरखपुर से जीत दर्ज कर पाना अदित्यनाथ के लिए आसान नहीं होगा। उपेंद्र शुक्ला भाजपा की स्थापना के समय से ही भाजपा के सदस्य थे, और इस परिवार के साथ अब भी गोरखपुर के लोगों की सहानुभूति है। इसके अलावा, शुभावती शुक्ला एक ब्राह्मण हैं और गोरखपुर सदर विधानसभा क्षेत्र में एक लाख से ज़्यादा ब्राह्मण मतदाता हैं।"

त्रिपाठी आगे बताते हैं, "हिंदुत्व के नये चेहरे के रूप में आदित्यनाथ मथुरा या अयोध्या से आसानी से जीत सकते थे, और उनका क़द क़रीब-क़रीब मोदी जैसा ही हो जाता। लेकिन, पार्टी ऐसा नहीं चाहती है, और इसलिए आदित्यनाथ को गोरखपुर के उस निर्वाचन क्षेत्र में ले जाया गया है, जहां उनके लिए जीत दर्ज कर पाना आसान नहीं है।"

उन्होंने कहा कि 2024 के आम चुनावों को देखते हुए मोदी के लिए इस विधानसभा चुनाव को जीतना ज़रूरी था। वह कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के दौरान पार्टी ने जो हमलावर तेवर दिखाया था,वह इस चुनाव में नदारद है।

त्रिपाठी का कहना है, "पश्चिम बंगाल में भाजपा के कार्यकर्ता जोश में थे। यूपी चुनाव में वह जोश ग़ायब है।"

त्रिपाठी ने बताया कि आदित्यनाथ को आख़िरकार यह एहसास हो गया लगता है कि वह सिर्फ़ अपनी लोकप्रियता के बूते ही वोट नहीं बटोर सकते। "हर चुनाव सामग्री, चाहे वह बैनर हो या पोस्टर या फिर अख़बारों के विज्ञापन, वहां मोदी की फ़ोटो के साथ-साथ अदियानाथ की भी फ़ोटो भी हैं। पहले ऐसा नहीं था।"

लेखक उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

UP Elections: Why is Yogi Adiyanath Repeatedly Using the Expression 'Double Engine ki Sarkaar'?

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