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भारत
राजनीति
एक और ‘इवेंट’: यूपी में भाजपा का नया चुनावी दांव ‘चलो काशी’ 
भाजपा का नया नारा है, "दिव्य काशी, भव्य काशी, चलो काशी।" यह नारा ऐसे वक्त में गढ़ा गया है जब पीएम नरेंद्र मोदी काशी विश्वनाथ मंदिर के लोकार्पण के लिए बनारस आ रहे हैं। इसी के ईर्द-गिर्द बुना गया है एक “मेगा इवेंट”।
विजय विनीत
05 Dec 2021
 Kashi Vishwanath Temple
काशी विश्वनाथ मंदिर का नया गेट

समाज के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करने वाले जागरण युग के अग्रदूत कबीर ने अपने जीवन के आखिरी दौर में नारा दिया था, “काशी से चलो”। इसके ठीक सात सौ साल बाद बनारस में एक नया नारा उछला है, “चलो काशी”। यह नया नारा गढ़ा है भाजपा ने। दरअसल, भाजपा को लगता है कि चुनाव जिताने में नारों का रोल सबसे अहम है। ये नारे सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश ही नहीं भरते, बल्कि जनमानस के मन में पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में बहुत कारगर हथियार होते हैं। भाजपा की सोच है कि “चलो काशी” का यह नारा यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए ट्रिगर प्वाइंट होगा।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनावी अभियान छेड़ा था। उस समय नारा दिया था “सबका साथ, सबका विकास”। यह नारा न सिर्फ हिट हुआ, बल्कि एनडीए को प्रचंड बहुमत दिलाने में मददगार रहा। यूपीए सरकार के समय भाजपा ने नारा दिया था, बहुत हुई महंगाई की मार, “अबकी बार मोदी सरकार”। यह नारा भी जनमानस पर छा गया और मोदी पहली बार पीएम पद पर सत्तासीन हो गए। भाजपा का नया नारा है, "दिव्य काशी, भव्य काशी, चलो काशी।" यह नारा ऐसे वक्त में गढ़ा गया है जब पीएम नरेंद्र मोदी काशी विश्वनाथ मंदिर के लोकार्पण के लिए बनारस आ रहे हैं। सत्तारूढ़ दल को लगता है कि यह नारा पालिटिक्स का गेम चेंजर साबित होगा।

यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में चलो काशी का नारा कितना असरदार साबित होगा, यह तो वक्त बताएगा।  लेकिन कोई भी नारा तभी अच्छा लगता, जब पब्लिक का पेट भरा हुआ होता है। वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीति विश्लेषक प्रदीप कुमार कहते हैं, " चलो काशी, अभियान कम, एलगार ज्यादा है। भाजपा के दूसरे नारों की तरह इसमें भी छिपा हुआ है एक बड़ा मकसद, जिसके नेपथ्य में है चुनावी ध्रुवीकरण। साल 2022 में यूपी में होने वाले चुनाव के मद्देनजर हिन्दू मतों को अपने फेवर में करने का मकसद। शायद भाजपा नेतृत्व को अच्छी तरह समझ में आ गया है कि यूपी के विधानसभा चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बगैर सत्ता में लौट पाना संभव नहीं है। भाजपा इसे ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है। “चलो काशी” सिर्फ नारा नहीं, इसमें निहित है पूर्वांचल को साधने का सियासी खेल। भाजपा को पता है कि योगी सरकार हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुई है। चाहे महंगाई का मुद्दा हो, बेरोजगारी का, या फिर भ्रष्टाचार और लचर कानून व्यवस्था का। ये मुद्दे जनता के बीच ज्वलंत सवाल बने हुए हैं और इसका कोई माकूल जवाब भाजपा के पास नहीं है। इन मुद्दों को दबाने के लिए धार्मिक नारों, आडंबरों और ढोल-नगाड़ों के बीच दबाने की कोशिश की जा रही है। इसका चरम स्वरूप विश्वनाथ कारिडोर के रूप में देखने को मिलेगा।"

प्रदीप कुमार यह भी कहते हैं, " हमें लगता है कि भाजपा को काम पर नहीं, नारों पर ज्यादा भरोसा है।  साल 2017 में भाजपा ने जो वादे किए थे उनका बीस फीसदी भी पूरा कर दिया गया होता तो जवाब देने की स्थिति में होते। फिजूल के नारों व प्रतीकों को गढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। साल 2017 में यूपी के लोगों ने भाजपा के नारों और उनके नेताओं की बातों पर भरोसा किया था। मोदी के नेतृत्व में एक बार भाजपा को मौका देने की कोशिश की गई, लेकिन जनता को समझ में आ गया है कि आखिर इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी? हो सकता है कि विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में कोई ऐसा नारा गढ़ दिया जाए, जिससे बनारस की गंगा-जमुनी संस्कृति तार-तार हो जाए।"

बनारस का विश्वनाथ मंदिर परिसर जिसके लोकार्पण के लिए बनारस में डेरा डालेंगे पीएम मोदी

प्रदीप के तर्क और दावों में दम इसलिए नजर आता है कि देश की जनता “अच्छे दिन आने वाले हैं” जैसे नारों के पीछे लट्टू हो गई थी और मोदी-योगी का युग लौट आया। साल 2019 के चुनाव में “मैं हूं चौकीदार” और “मोदी है तो मुमकिन है” ने भाजपा को दोबारा सत्तासीन करने में खासी भूमिका निभाई थी। ये दोनों ही ऐसे नारे थे, जिसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉन्च किया था। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने जब "चौकीदार चोर है" का नारा लगाया तो उसके जवाब में मोदी के भक्तों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर अपने अकाउंट से “मैं भी चौकीदार” का कैंपेन शुरू कर दिया था। एयर स्ट्राइक के बाद भाजपा ने नारा गढ़ा था, "मोदी है तो मुमकिन है।" इस नारे ने भी सोशल मीडिया पर खूब ट्रैंड किया था।

“चलो काशी” का नारा नया है और भाजपा को लगता है कि यह ऐसा ब्रह्मास्त्र जिसके दम पर वह फिर यूपी की सत्ता पर काबिज हो जाएगी।

इस मुद्दे पर जाने-माने साहित्यकार रामजी यादव कहते हैं, "भाजपा के पास कोई एजेंडा नहीं है, इसलिए उसका जोर नारों को गढ़ने पर है। जनता को समझना चाहिए कि भाजपा सरकार की प्राथमिकता कल्याणकारी योजनाओं को संचालित करना है, न टैक्स पेयर के पैसे से मंदिर का निर्माण कराना। साफतौर पर दिख रहा है कि पिछले सात सालों में भाजपा सरकार ने बेरोजगारी और महंगाई दूर करने की दिशा में कोई काम नहीं किया। भावनाओं में बहकर यह कोई नहीं समझ पा रहा है कि सरकार का असल काम क्या है और मोदी का जोर किन बातों पर है? नंगा सच यह है कि विकास के मुद्दे पूरी तरह पूरी फेल हो चुकी भाजपा सरकार की नैया डूब रही है। इसीलिए उसने नारा गढ़ा है, "काशी चलो।"

रामजी यह भी कहते हैं, " सिर्फ क्रूर सत्ता ही नारे गढ़ती है और तमाशे करती है। ठीक वैसे ही जैसे, जब रोम जल रहा था तब तानाशाह शासक नीरो बंसी बजा रहा था। आसमान छूती महंगाई और मुंह बाए खड़ी बेरोजगारी ने समाज के आखिरी आदमी का जीना हराम कर दिया है। अगर पीएम और सीएम का नजरिया मानवीय होता तो आंदोलन करने वाले सात सौ किसानों को शहादत नहीं देनी पड़ती। देशभक्त नागरिक उस मंजर को आज तक नहीं भूल पाए हैं जब कोरोनाकाल में लोग तिल-तिलकर मर रहे थे और भाजपा सरकार ढूंढे नहीं मिल रही थी। महामारी के समय अपने घरों के लिए निकले लाखों मजदूर यह देख चुके हैं कि इस सरकार ने उनके साथ किस तरह का अमानवीय और क्रूरतापूर्ण सुलूक किया। कोरोना की चपेट में जो लोग आए, उन्हें आक्सीजन तो दूर, पैरासिटामाल की गोलियां तक मयस्सर नहीं हुईं। यह भी कह सकते हैं कि संकट के दौर में सरकार लापता हो गई थी। जब लौटी तो बेशर्मी के साथ कह दिया कि देश में आक्सीजन की कमी के चलते किसी की मौत हुई ही नहीं। दरअसल, भाजपा के एजेंडे में जनता नहीं, सिर्फ नारा है और तमाशा है। जो लोग यह सोचते हैं कि “चलो काशी” इस बार भी चर्चित नारा बन जाएगा, उनकी सोच पर जनता को तरस खाना चाहिए। भाजपा के साथ सिर्फ वही लोग हैं जो अंधविश्वासियों की तरह किसिम-किसिम के झांसे वाले शगूफों पर विश्वास करते हैं।"

बनारस के प्रबुद्ध नागरिकों को लगता है कि पीएम मोदी “चलो काशी” के नारे के साथ उस महान संरचना को समर्पित करने आ रहे हैं, जिसे काशी के धरोहरों के मलबे पर खड़ा किया गया है। यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में जब लोग विश्वनाथ मंदिर में मत्था टेकने आएंगे तो विदेशी कंपनियों के गाइड बताया करेंगे कि कभी यहां 400-500 साल पहले प्राचीन नगरी की सभ्यता और आधा दर्जन से अधिक मुहल्ले हुआ करते थे। सदियों पुरानी तमाम मंदिरों की श्रृंखलाएं हुआ करती थी। ऐसी घुमावदार और पेचदार गलिया हुआ करती थीं, जिनके चप्पे-चप्पे पर दर्ज था सदियों पुराना इतिहास। वह इतिहास जिसे देखने के लिए दुनिया भर के सैलानी काशी आया करते थे।

वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य कहते हैं, " हर दौर में सनकी हुक्मरां होते रहे हैं। मौजूदा दौर में भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है। बनारस में आस्था का सबसे बड़ा केंद्र और समूची धरोहरें सिर्फ एक हुक्मरां की सनक की भेंट चढ़ गया है। सनक भी ऐसी-वैसी नहीं। खुद को महारानी अहिल्याबाई के समक्ष खड़ा करने की सनक बता रही है कि वह एक रानी थीं और मैं एक राजा हूं। रानी ने वास्तुविदों और मनीषियों की सलाह से विश्वनाथ मंदिर का पुनरुद्धार तो कराया, लेकिन कोई विध्वंस नहीं किया। एक राजा यह हैं जिन्होंने धरोहरों की कब्रों पर चलो काशी के नारे के उद्घोष के साथ उसी मंदिर को नया आकार दिया। ऐसा आकार जिसमें न तो वास्तु का ख्याल रखा गया और न ही आस्था का।

विश्वनाथ मंदिर का नया लुक

काशी विश्वनाथ मंदिर में धर्म की भावना से ज्यादा मंदिर की भव्यता पर जोर दिया जा रहा है। आस्थावान श्रद्धालुओं से ज्यादा पर्यटकों को अहमियत दी जा रही है। बनारसियों को समझाया जा रहा है कि अब काशी में धर्म और आस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण है पर्यटन।"  

पत्रकार विनय कहते हैं, " मरते वक्त कबीर ने अपने शिष्यों से कहा था, चलो, अब मेरे जाने का वक्त करीब आ गया है। अब दूर निकल चलो काशी से और वह दूर हो गए काशी से। धर्म में मरने की नहीं, जीने की बात है। जीने की स्थितियां और अंतर्दशा होनी चाहिए। भक्त अगर कबीर की सुनेंगे तो उनकी बुद्धि में अड़चन आ जाएगी। कबीर और बुद्ध क्या कहते हैं, यह बात नहीं जचेंगी। अगर कुछ जंचेगा तो पंत प्रधान का नारा और जुमला। बनारस का ज्ञात इतिहास पांच हजार साल पुराना है। धर्म और अध्यात्म में आस्था रखने वाले सदियों से बनारस आ रहे हैं और विश्वनाथ मंदिर में मत्था भी टेक रहे हैं। चलो काशी के नारे से आस्था की कोई नई गंगा नहीं बहने वाली।"

इवेंट मैनेजमेंट  

बनारस में गोदी में मीडिया और गोदी के बाहर मीडिया की तेज धमक सुनाई दे रही है। जिन ब्लागरों को पहले कोई नहीं पूछता था, उनका कारवां बनारस आ रहा है। पहले सिर्फ इलेक्ट्रानिक चैनलों को ही मेगा इवेंट के समय बुलाया जाता था। मोदी-योगी के फेर में माहौल बनाने के लिए पहली मर्तबा देश भर के ब्लागरों को सरकारी खर्चे पर न्योता भेजा गया है। मोदी के कुशल इवेंट मैनेजमेंट के रचनाकार नई-नई कहानियां गढ़ रहे हैं। यह भी जताने की कोशिश कर रहे हैं कि अहिल्याबाई होल्कर के बाद अगर किसी ने बाबा विश्वनाथ को समझा है तो वह सिर्फ मोदी है, दूसरा कोई नहीं।

विश्वनाथ मंदिर में अगाध श्रद्धा रखने वाले नियमित दर्शनार्थी वैभव कुमार त्रिपाठी वर्षों से भाजपा से जुड़े हैं और मोदी के मेगा इवेंट से बेहद आहत हैं। वह कहते हैं, "वाहवाही लूटने की सनक की भी एक सीमा होती है। सरकार धर्म का व्यापार करना चाहती है। विश्वनाथ मंदिर को पांच सितारा सुविधाओं से लैस कर किए जाने से बाबा के भक्त दुखी हैं। विश्वनाथ मंदिर में कल भी लाइन लगती थी और आज भी लग रही है। भविष्य में भी लाइन लगती रहेगी। यह आसानी से समझा जा सकता है कि सितारा सुविधाओं का लाभ कौन उठाएगा और मुनाफा कौन कूटेगा? नेताओं, अफसरों और कारपोरेटरों की मौज जरूर हो जाएगी, लेकिन वर्षों से नंगे पैर मंदिर पहुंचने वालों को न बिनायक मिलेंगे, न ही दुर्लभ वटवृक्ष। जिस व्यासपीठ से पंचकोस यात्रा का संकल्प पूरा होता था, अब लोग उसे कहां ढूंढेंगे? आंसू बहाते हुए विश्वनाथ दरबार में आने वालों को पवित्र न्याय पीठ शिव की कचहरी कहां मिलेगी?"

काशी विश्वनाथ मंदिर के कुछ ही फासले पर रहने वाले समाजसेवी गणेश शंकर पांडेय भी बाबा धाम में मोदी के मेगा इवेंट से बेहद खफा हैं। वह कहते हैं, "गंगा घाटों को चौपाटी बनाया जा रहा है और आस्था के मंदिर को पर्यटन केंद्र। गंगा की जिस रेती पर लोग दिव्य स्नान का आनंद उठाया करते थे, अब वहां घुड़सवारों का रेला और मेला दिखता है। जुहू-चौपाटी जैसा मंजर नजरा आता है। पहले लोग धार्मिक भावना से ओत-प्रोत होकर काशी आते थे और अब सैर-सपाटे के लिए आने लगे हैं। विकास कम, चलो काशी के नारे का शोर और प्रचार ज्यादा है। स्मार्ट सिटी का काम आठ-दस वार्डों में हो रहा हैं और विकास का ढोल दुनिया भर में पीटा जा रहा है। बनारस की गलियों में जाकर देख लीजिए, कहीं भी कूड़े-कचरे का अंबार मिलेगा, तो कहीं उफनता हुआ सीवर। बनारस, भाजपा का गढ़ तब बना है जब कांग्रेस कमजोर हुई। विश्वनाथ मंदिर को अब व्यापार का बड़ा केंद्र बनाया जा रहा है। धन उगाही का माड्यूल विकसित करने के लिए ब्रिटेन की बदनाम कंपनी बुलाई है। पहले मंगला आरती का शुल्क सौ रुपये था और अब हजारों में हो गया है।"

मोदी के कार्यक्रम के लिए विश्वनाथ मंदिर परिसर में जोर-शोर से चल रही तैयारी

विश्वनाथ मंदिर के पड़ोस में रहने वाले कन्हैया त्रिपाठी यह कहने में तनिक भी गुरेज नहीं करते कि मोदी-योगी पूरी तरह फेल हो गए हैं। वह कहते हैं, "विभाजित और भयभीत विपक्ष भाजपा को मनमानी करने का नया गलियारा दे रहा है। विश्वनाथ मंदिर आने वाले गरीबों की सुविधाएं छीनकर अमीरों को दिया जा रहा है। जिस पंचपंडवा धर्मशाला में गरीब तबके के लिए आश्रय पाते थे, वहां अब सितारा गेस्ट हाउस खड़ा कर दिया गया है। फटी बिवाई लेकर बाबा के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं को लाचारी में सड़क पर सोने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद कई उन रास्तों को भी पूरी तरह बंद कर दिया जहां से लोग सुगमता से आते-जाते थे। अब लाशें घूमकर जा रही हैं। चलो काशी के नारे के बीच झूठ का ढिंढोरा पीटा जा रहा है।"

कन्हैया के मन में इस बात की खदबदाहट है कि आस्था के केंद्र को पिकनिक स्पाट और पर्यटन केंद्र बनाया जा रहा है। कहते हैं, " विश्वनाथ परिसर में मंदिरों और विग्रहों पर बुल्डोजर चलते रहे और विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगने की हिम्मत नहीं दिखाई। मन बहुत दुखी है। दुख इस बात का ही कि समूची काशी मूक-बधिर सरीखी हो गई है। वह लोग भी मौन हैं जिनकी कई पीढ़ियां गंगा की गोद में पलती रहीं। लोग सोते थे तो विश्वनाथ मंदिर के घंटे-घड़ियाल सुनाई देते थे। नौबतखाने से बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की सुरीली स्वर लहरियां सुनाई देती थीं। सरकार ने बनारसियों को बाबा और गंगा से दूर कर दिया। पक्का महाल को दो हिस्सों में बांट दिया। सरकार अच्छा काम करे तब तो बड़ाई करें। काम पर नहीं, यहां तो सिर्फ नाटक और दिखावे पर जोर ज्यादा है। बनारस में 13 दिसंबर 2021 से एक महीने तक मेगा इवेंट चलेगा। कुछ लोग मुफ्त में टैबलेट और मोबाइल पाएंगे और आटा-चावल भी। चुनाव बाद जब दो सौ का कड़ुआ तेल तीन सौ में खरीदना पड़ेगा तब आटा-दाल का भाव पता चलेगा।"

बिना लाग-लपेट के हर सच बात आसानी से कह देने वाले 65 वर्षीय भाजपा नेता गौतम मुखोपाध्याय (दादा) इस बात से आहत हैं कि इस शहर से बनारसियत लुप्त होती जा रही है। वह कहते हैं, "आस्था के केंद्र को पर्यटन स्थल बनाए जाने से बनारसी खान-पान पर इडली-डोसा भारी पड़ने लगा है। तरक्की की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग नासूर बन चुके बनारस के जाम के झाम को खत्म नहीं कर सके। गोदौलिया और आसपास के इलाकों का कारोबार ही चौपट हो गया है। इसे विकास कहेंगे, या विनाश की पटकथा।"

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज राय धूपचंडी भाजपा पर खुलेआम हमला करते है। कहते हैं, " भाजपा पहली ऐसी सरकार है जिसकी प्राथमिकता रोजगार और तरक्की नहीं, मंदिर है। टैक्सपेयर का जो पैसा जनकल्याणकारी कार्यों में लगना चाहिए, वह विश्वनाथ मंदिर को पांच सितारा सुविधाओं से लैस करने पर लगा रही है। राल्हूपुर में करोड़ों का बंदरगाह बदहाल हो गया, रेत में खोदी गई मोदी नहर मटियामेट हो गई और करोड़ों खर्च कर बुनकरों के लिए लालपुर में बना संकुल सफेद हाथी बन गया। रुद्राक्ष तो सरकारी कार्यक्रमों के आक्सीजन से संचालित किया जा रहा है। बनारस को ऐसे विकास की भला क्या जरूरत थी? चलो काशी का नारा उछालने से पहले बनारस की टूटी-फूटी सड़कों और जाम से जूझते बनारसियों की तकलीफों को दूर करते तो बात जंचती भी। भाजपा सरकार ने हमेशा नारा लगाकर अपनी असफताओं को छुपाया है। ऐसे में सिर्फ एक रास्ता बचता है हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण का। बनारस के लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि पुरातन शहर काशी में लोग खुद आते हैं, "चलो काशी" का नारा गढ़ने और मेगा इवेंट करने से नहीं। नेपथ्य में झांकेंगे तो पाएंगे कि आस्था के केंद्र की आड़ लेकर मोदी अपने कारपोरेट मित्रों को पैसा कमवाना चाहते हैं।"      

यूपी वालों पर मोदी को भरोसा नहीं!

पीएम मोदी से दो मर्तबा चुनावी मुकाबला करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय राय कहते हैं "चलो काशी" का नारा जनता को जंच नहीं रहा है। "चलो काशी" के जवाब में कांग्रेस अब "पेट भरो मेदी जी" का नारा लगाएगी। वह कहते हैं, "हर कोई महंगाई से त्रस्त है। सबका पेट खाली है। जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है। विश्वनाथ कारिडोर के बहाने चुनावी चौरस बिछाया जा रहा है। पंत प्रधान इतने जिद्दी और अधर्मी हैं कि उन्हें बाबा विश्वनाथ और सनातन परंपराओं की रवायत नहीं मालूम। बाबा के असली भक्तों पर अत्याचार किया जा रहा है। किसी ने नहीं सोचा था कि इतना बुरा दिन देखना होगा। पक्के महाल के लोग खुलेआम बोल रहे है कि मोदी ने बाबा का दरबार नहीं, "विश्वनाथ माल" बना दिया है।"

विश्वनाथ मंदिर में तब भी लाइन लगती थी और अब भी लग रही है

"अचूक संघर्ष" के संपादक अमित मौर्य कहते हैं, " काशी ने कभी नारा नहीं, गीत-संगीत और दुर्लभ कलाएं गढ़ी हैं। मोदी बनारस के सांसद हैं और प्रधानमंत्री हैं। वह सात साल में बनारस का सिस्टम तक ठीक नहीं कर पाए। पूरे शहर में सड़कों के बीचो-बीच बंबू लगा दिया है। सिर्फ सपना दिखाया। जो सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए वह सवाल गोदी मीडिया विपक्ष से पूछ रही है। मोदी को बनारसियों को भरोसा नहीं। अंट-शंट कर रहे हैं। न कोई बोलने वाला है, न रोकने वाला। ऐसा नहीं है कि बनारस में ईमानदार है नहीं। पंत प्रधान अपने चहेते गुजरातियों को ओब्लाइज करने के लिए टैक्स पेयर का पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं।"   

अमित यह भी कहते हैं, "यूपी का चुनाव नजदीक है, इसलिए सारा जोर आस्था को भुनाने पर है। वोटरों को भरमाने के लिए लोकार्पण समारोह के बाद विश्वनाथ मंदिर का प्रसाद हर बनारसी के घर में पहुंचाने की योजना है। भाजपा और उसके अनुसांगिक संगठनों के लोग प्रचार कर रहे हैं कि 352 साल बाद पीएम मोदी ने काशी विश्वनाथ धाम का पुनरुद्धार कराया है। इससे पहले अहिल्याबाई होल्कर ने साल 1669 में इस मंदिर का पुनरुद्धार कराया था। महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर फेल हो चुकी भाजपा सरकार का जोर अब हिन्दुत्व जगाने पर है। इसी साल नवंबर महीने में कनाडा से एक खंडित मूर्ति लाकर विश्वनाथ मंदिर में स्थापित का ढकोसला किया गया। खास एजेंडे के तहत बनारसियों को भरमाने की कोशिश तो बहुत हुई, लेकिन वह भाग नहीं जाग सका, जिसकी उन्हें बहुत उम्मीद थी।"

कैसा होगा मोदी का मेगा इवेंट?

पीएम मोदी नरेंद्र मोदी 13 दिसंबर को आठ सौ करोड़ की लागत से बने विश्वानाथ कारिडोर का लोकार्पण करेंगे। इसी के साथ शुरू हो जाएगा "चलो काशी" अभियान, जो लगातार मकर संक्राति तक चलेगा। 14 दिसंबर को देश भर के आला अफसरों और अगले दिन 15 दिसंबर को भाजपा व उनके सहयोगी दलों के सभी मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन होगा। 16 दिसंबर को देश भर के मेयर बनारस आएंगे और अगले दिन 17 नवंबर को देश के जिला पंचायत अध्यक्ष। सम्मेलन के नाम पर इन्हें सरकारी खर्च पर बनारस बुलाया जा रहा है। इस बाबत बड़ी संख्या में लाइजन अफसर उन्हें मोदी के बनारस मॉडल से रुबरु कराएंगे। इसी क्रम में संत सम्मेलन के अलावा, टूर ऑपरेटरों, कारपोरेटरों और उद्योगपतियों का सम्मेलन होगा।  तमाम देशों के राजदूतों को भी काशी आने का न्योता दिया गया है। एक महीने तक बनारस में व्यापार और हस्तशिल्प मेला भी चलेगा।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीएम नरेंद्र मोदी दो या तीन दिन तक बनारस में ही रहेंगे। साथ ही देश भर के वीवीआईपी भी। मंदिर के लोकार्पण के बाद चलो काशी के नारे के साथ उत्सव मास की शुरुआत हो जाएगी। 18 दिसंबर को मशहूर ट्रैवेल संचालकों और देश के जाने माने ब्लॉग लेखकों का सम्मेलन होगा। 9 दिसंबर को काशी विश्वनाथ मंदिर के गौरवशाली इतिहास पर प्रबुद्धजनों का सम्मेलन होगा। 20 व 21 दिसंबर  को देश के प्रमुख एससी, एसटी विचारकों की मौजूदगी में सामाजिक समरसता सम्मेलन और 22, 23 और 24 दिसंबर को लोक विधाओं से जुड़े कलाकारों का समागम होगा। मोदी-योगी सरकार की ब्रांडिग करने के लिए 25 दिसंबर को सुशासन यात्रा शुरू होगी। 25 और 26 दिसंबर को यूपी के सभी स्वयं सहायता समूहों का सम्मेलन होगा।

27, 28 व 29 दिसंबर को फिल्म फेस्टिवल और काशी पर आधारित शूट की गई फिल्मों की प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। 30 व 31 दिसंबर को दलित इंडस्ट्रियल चैंबर ऑफ कॉमर्स के बैनर तले देश के अनुसूचित जाति के उद्यमियों का सम्मेलन होगा। 2 जनवरी को ओडीओपी कारीगरों और 3 व 4 जनवरी को देश भर के वास्तुविदों का सम्मेलन होगा। फिर 11 व 12 जनवरी को देशों भर के मंदिरों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन होगा। इन दोनों तिथियों पर देश के सभी महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं, एनएसए और अन्य संगठनों का यूथ फेस्टिवल होगा। सुशासन यात्रा का समापन 12 जनवरी 2021 को होगा। 

Uttar pradesh
banaras
Kashi Vishwanath Temple
Inauguration of Kashi Vishwanath Temple
Narendra modi
Yogi Adityanath
UP ELections 2022

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    20 Oct 2021
    बिहार विधानसभा की दो सीटों के लिए 30 अक्टूबर को उपचुनाव हो रहे हैं। ये दो सीटें हैं- कुशेश्वरस्थान और तारापुर। दोनों ही सीटें जद(यू) के खाते में थीं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जद(यू) अपनी दोनों…
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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License