NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूपी : जनता बदलाव का मन बना चुकी, बनावटी भीड़ और मेगा-इवेंट अब उसे बदल नहीं पाएंगे
उत्तर-प्रदेश में चुनाव की हलचल तेज होती जा रही है। पिछले 15 दिन के अंदर यूपी में मोदी-शाह के आधे दर्जन कार्यक्रम हो चुके हैं। आज 16 नवम्बर को प्रधानमंत्री पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करने सुल्तानपुर आ रहे हैं, सुनते हैं उस पर जंगी जहाज़ उतरने का करतब दिखाया जाएगा!
लाल बहादुर सिंह
16 Nov 2021
UP
फाइल फोटो।

उत्तर-प्रदेश में चुनाव की हलचल तेज होती जा रही है। पिछले 15 दिन के अंदर यूपी में मोदी-शाह के आधे दर्जन कार्यक्रम हो चुके हैं। आज 16 नवम्बर को प्रधानमंत्री पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करने सुल्तानपुर आ रहे हैं, सुनते हैं उस पर जंगी जहाज़ उतरने का करतब दिखाया जाएगा!
 
एक्सप्रेस वे को विकास का मंत्र बताते बताते गोदी मीडिया की मदद से अचानक इसके उद्घाटन को युद्धोन्माद पैदा करने के अवसर में बदल दिया गया है। हमारे विशेष सन्दर्भ में पाकिस्तान विरोधी युद्धोन्माद सीधे सीधे देश के अंदर मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिक उन्माद में ट्रांस्लेट हो जाता है, इस तरह विकास, पाक-विरोधी युद्धोन्माद और सांप्रदायिकता के घालमेल से एक्सप्रेस वे में भाजपा के लिए चुनावी सम्भावनाएं तलाशी जा रही हैं! सचमुच कितने ख़तरनाक चक्रव्यूह में हम फंसे हैं।
 
बहरहाल, चुनाव में भाजपा-विरोधी ताक़तें भी पूरे जोश-खरोश के साथ उतर चुकी हैं।
 
मुख्य विपक्षी नेता अखिलेश यादव भी लगातार रैली और यात्राएं कर रहे हैं, जिन्हें भारी जनसमर्थन मिल रहा है। 16 को उनकी ग़ाज़ीपुर से आज़मगढ़ की विजय रथयात्रा पर प्रशासन द्वारा रोक की खबरें आ रही थीं, लेकिन अब लगता है बदले शेड्यूल के साथ उन्हें अनुमति मिल गई है। आने वाले दिनों में विपक्ष के चुनाव अभियान को बाधित करने के किसी बड़े खेल का यह ट्रेलर भी हो सकता है ।
 
उत्तर प्रदेश चुनाव में तीसरा प्रमुख ( नॉन-प्लेयिंग ) प्लेयर किसान-आंदोलन 22 नवम्बर को राजधानी लखनऊ में विशाल महापंचायत करके किसानों की हत्यारी भाजपा को हराने के अपने मिशन का ऐलान करने जा रहा है। 14 नवम्बर को लखीमपुर से लगे पीलीभीत के पूरनपुर में संयुक्त किसान मोर्चा ने विशाल सभा करके  भाजपाई मंत्रीपुत्र द्वारा कुचले गए किसानों के न्याय का सवाल फिर उठाया और उनके परिजनों को 10 लाख मुआवजा देने के समझौते को लेकर योगी सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया।
 
भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल गरमाने में लगी प्रियंका गाँधी ने 14 नवम्बर को बुलन्दशहर रैली में अलग लड़ने का एलान कर दिया। अखिलेश यादव तो पहले से ही कह रहे थे कि बड़े दलों से गठबंधन नहीं होगा। यह सब अगर अभी भी बार्गेनिंग पॉइंट न हो तो, अब करीब करीब तय होता जा रहा है कि  सपा कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं होगा, बसपा तो पहले से अलग थी ही, अर्थात तीनों प्रमुख विपक्षी दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, इसका ठीक-ठीक क्या असर होगा चुनाव-नतीजों पर, यह अभी साफ नहीं है। मसलन, क्या तमाम विपक्षी दलों में भाजपा विरोधी वोट बंट जाएगा और भाजपा की जीत का रास्ता साफ होगा अथवा कांग्रेस के लड़ने से भाजपा का अधिक नुकसान होगा और सपा की राह आसान होगी अथवा क्या यूपी बंगाल के रास्ते बढ़ेगा जहां दलों का मोर्चा न बनने के बावजूद भाजपा विरोधी मतदाताओं का मोर्चा बन जाएगा और भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देगा।
 
वैसे अभी भी, गठबंधन न हो तो भी, अंत आते-आते उन दलों के बीच जो भाजपा को हर हाल में हराना चाहते हैं, किसी tacit tactical understanding की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
 
हाल ही में एबीपी न्यूज-C वोटर का जो ताज़ा सर्वे आया है वह भाजपा के लिए  खतरे की घण्टी है।
 
यह सर्वे भाजपा-विरोधियों द्वारा प्रायोजित होगा, यह मानने का तो कोई कारण  है नहीं।

वैसे भी सर्वे में सरकार, अगर इस समय चुनाव हो जाय, तो खींचतान कर भाजपा की बनती दिख रही है, पर महीने दर महीने भाजपा की सीटों में गिरावट और मुख्य प्रतिद्वंद्वी सपा की बढ़त का जो ट्रेंड है, अगर वही दर जारी रहे तो अगले महीने दिसम्बर में सपा भाजपा से आगे निकल जायेगी और 4 महीने बाद चुनाव तक भाजपा बहुमत से बहुत नीचे 100 सीटों के अंदर सिमट जाएगी ! हालांकि आसार भाजपा की गिरावट के और तेज होने के ही हैं। अगर इसको चुनाव-पूर्व सर्वे के पुराने अनुभव से जोड़ कर देखा जाय कि , अगर वह एकदम निष्पक्ष ढंग से किया जा रहा हो तो भी, सत्तारूढ़ दल विशेषकर भाजपा जैसे दल के पक्ष में यथार्थ से अधिक झुका रहता है- यह सैंपल बेस के मिलान में अन्तर्निहित होता है और सत्ताधारी दल के प्रचार से प्रभावित होता है।
 
सर्वे में मतदाताओं की राय के बारे में ऐसे तथ्य सामने आये हैं जो बहुतों को चौंका सकते है और भाजपा की पूरी चुनाव रणनीति के खोखलेपन को उजागर करते है तथा भाजपा कितने कमजोर विकेट पर खड़ी है यह जाहिर कर देते हैं।
 
जब लोगों से पूछा गया कि चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा क्या है तो जिस राम मंदिर से भाजपा ने अपनी नैया के वैतरणी पार होने की उम्मीद लगाई थी, उसे सबसे कम-मात्र 14% लोगों ने सबसे बड़ा मुद्दा माना। इसी तरह जिस सुरक्षा, कानून-व्यवस्था के सवाल को योगी जी अपना यूएसपी बताते हैं, वह सर्वाधिक 30% लोगों के लिये सबसे बड़ा मुद्दा है।
 
लगभग आधे लोगों ( 47% ) ने -महंगाई (15%) बेरोजगारी (17%) किसान-आंदोलन(15%) -को सबसे बड़ा मुद्दा माना। जाहिर है जो आधे लोग महंगाई, बेरोजगारी और किसान-आंदोलन को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं, उनका वोट पाने की उम्मीद भाजपा नहीं कर सकती और ये तीनों ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे भाजपा के परम्परागत जनाधार को प्रभावित करते हैं।
 
मोदी जी ने रोजगार-सृजन के कितने सब्जबाग दिखाए थे, लोगों को लगता था कि भारत चीन की तरह मैन्युफैक्चरिंग हब बन जाएगा और यूपी के शहर सूरत बन जाएंगे जहां यूपी वालों को रोजी-रोटी के लिए भागना पड़ता है, याद करिये 2014, 17, 19 के चुनाव में मोदी-मोदी का उन्मादी कोरस करने वाले युवा ही थे जिनकी सारी उम्मीदें अब धूल-धूसरित हो गयी हैं और दुःस्वप्न में तब्दील हो चुकी हैं। बेरोजगारी का दंश दरअसल इतना गहरा है और उसे लेकर मोदी और योगी से युवाओं में निराशा इतनी घनीभूत और व्यापक है कि यह भाजपा के जनाधार वाले परिवारों के अंदर सीधे विभाजन करा सकता है-युवाओं और बुज़ुर्गों के बीच।
 
विपक्ष ने रोजगार के सवाल को अगर प्रतिबद्धता और सच्चाई के साथ संबोधित किया तो यूपी में भी वैसी ही लहर पैदा हो सकती है जैसी बिहार में 10 लाख नौकरियों के वायदे से महागठबंधन के पक्ष में हुई थी और हर परिवार में नई पीढ़ी के वोट भाजपा के ख़िलाफ़ विपक्ष की झोली में जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी छात्रों का सबसे बड़ा केंद्र इलाहाबाद लगातार नौकरियों के लिए आंदोलनरत युवाओं की हलचलों से सरगर्म है। 15 नवम्बर को शिक्षा संस्थान पर शिक्षक भर्ती के लिए छात्रों का विराट प्रदर्शन हुआ। आज 16 नवम्बर को भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निकट बालसन चौराहे पर प्रदेश में 5 लाख से ज्यादा रिक्त पदों को तत्काल विज्ञापित करने, लंबित भर्तियों को पूरा करने के मुद्दे पर छात्र-युवाओं का प्रदर्शन होने जा रहा है। 2 दिसम्बर को  लखनऊ मार्च का आह्वान है।
 
ठीक इसी तरह महँगायी ने सबका जीना मुहाल कर दिया है, सभी तबकों में विशेषकर कमजोर तबकों और महिलाओं में भारी नाराजगी है। गरीबों को अनाज बांटकर सरकार ने लाभार्थी भावना का दोहन करके वोट बटोरने का जो मंसूबा पाला था, उसे आसमान छूती महंगाई ने न सिर्फ खारिज या प्रतिसन्तुलित कर दिया है बल्कि लोगों को सरकार के ख़िलाफ़  भी खड़ा कर दिया है।
 
सर्वे में सबसे अधिक (30%) लोग अगर कानून-व्यवस्था को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं तो यह योगी सरकार के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा है। अमित शाह का वह चर्चित जुमला कि अब 16 साल की बच्ची भी गहने लादकर रात 12 बजे भी स्कूटी से यूपी की सड़कों पर चल सकती है- यूपी में एक मजाक बन कर रह गया है। अभी दो दिन पहले पीलीभीत में कोचिंग पढ़ने गयी इंटर की छात्रा की बलात्कार-हत्या और उसके अगले दिन लखीमपुर में 16 वर्षीय बच्ची के साथ दरिंदगी की खबर आई है। यूपी में आये दिन लड़कियों, महिलाओं के  साथ बलात्कार, हत्या की घटनाओं की बाढ़ आई हुई है। सत्ता से जुड़े दबंगों-अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। शरीफ शहरी और समाज के कमजोर तबके इनके हमलों के शिकार हो रहे हैं। पुलिस हिरासत और मुठभेड़ में मौतों और लंगड़ा करने का कीर्तिमान बना रही है योगी-राज की पुलिस। 27 जुलाई को लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राष्‍ट्रीय मानवाध‍िकार आयोग के आंकड़ों के सहारे बताया कि हिरासत में मौत के मामलों में उत्‍तर प्रदेश पहले नंबर पर है. उत्‍तर प्रदेश में पिछले तीन साल में 1,318 लोगों की पुलिस और न्‍याय‍िक हिरासत में मौत हुई है। जाहिर है इनमें बहुसंख्य समाज के कमजोर तबकों के लोग और मुसलमान हैं।
 
मुसलमानों के खिलाफ सेलेक्टिव बेसिस पर की गई कार्रवाइयों को  मोदी-शाह-योगी मीटिंग-दर-मीटिंग अपनी उपलब्धि बताकर ध्रुवीकरण का कार्ड खेल रहे हैं। पर व्यापक हिन्दू जनमानस पर अब इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है, क्योंकि इनसे भंगमोह जनता जो अब इन्हें हटाने का मन बना चुकी है, वह अच्छी तरह समझ चुकी है कि यह सब वोट की राजनीति है। इसलिए अब पूरी तरह हिन्दू-मुस्लिम विभाजन पर केंद्रित हो चुकी संघ-भाजपा मशीनरी और मोदी-शाह-योगी तिकड़ी की साम्प्रदायिक बयानबाजी, जिन्ना और JAM की जुमलेबाजी, पूरी तरह बेअसर हो चुकी है।
 
दरअसल, पिछले 3 चुनावों में मोदी ने विकास के सब्जबाग, सांप्रदायिकता और सोशल इंजीनियरिंग का जो खतरनाक कॉकटेल तैयार किया था और उसके illusion में एक बड़ा सोशल गठबंधन बनाने में वे सफल हो गए थे, मोदी के साढ़े सात साल और योगी के 5 साल के कार्यकाल से सम्पूर्ण मोहभंग के बाद अपने अंतर्विरोधों के बोझ तले वह सोशल गठबंधन बिखर चुका है। यह मोहभंग दोनों ही स्तरों पर हुआ है, आर्थिक तबाही के कारण आम जनमानस के स्तर पर तो हुआ ही,  विभिन्न समुदायों के पावर ग्रुप्स के स्तर पर भी हुआ क्योंकि संघ-भाजपा के सत्ता के ढांचे के अन्तर्निहित चरित्र के कारण उनकी सत्ता में पावर शेयरिंग की उम्मीदें ध्वस्त हो गईं।
 
इसीलिए पिछले 7 साल तक भाजपा से जुड़े रहे सोशल ब्लॉक्स की निर्णायक और मुकम्मल शिफ्टिंग हो रही है और भाजपा के गत 3 चुनावों के सामाजिक समीकरण का सिराजा पूरी तरह बिखर चुका है।
 
बौखलाई योगी सरकार ने अब अपनी रैलियों में भीड़ जुटाने का काम सरकारी प्रशासन को "आउटसोर्स" कर दिया है। अब जिलाधिकारी और जिला प्रशासन को सरकारी खजाने से जनता का पैसा फूंक कर बस जुटाने, भीड़ ले आने और बीजेपी की रैली कराने का जिम्मा सौंप दिया गया है। सुल्तानपुर, आजमगढ़, महोबा -हर कहीं एक ही कहानी है। दो दिन पूर्व आजमगढ़ में अमित शाह की रैली में भीड़ जुटाने के लिए  वहां डीएम ने पीडब्ल्यूडी से 40 लाख दिलवाए। इस खबर पर टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया, " सरकारी पैसा पार्टी की रैली में भीड़ जुटाने के लिए खर्च किया जा रहा है! इस डीएम को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए। किसी दिन इन अधिकारियों की जवाबदेही जरूर तय होगी।"
 
बहरहाल, यूपी में दीवार पर लिखी इबारत अब कोई भी पढ़ सकता है। समाज अब तेजी से राजनैतिक रूप से ध्रुवीकृत  होता जा रहा है। लोग अब अपनी राजनीतिक स्थिति के हिसाब से हर मुद्दे को देख रहे हैं, इसीलिए अब न अनाज बांटने से, न ही हिन्दू-मुस्लिम उन्माद फैलाने से कोई लाभ होने जा रहा है, न सरकारी खजाने और राज्य-मशीनरी का दुरुपयोग कर जुटाई गई भीड़ और मेगा-प्रचार या विज्ञापनों से कोई फर्क पड़ने जा रहा है। यूपी में 2022 की तकदीर लिखी जा चुकी है। जनता 22 में बदलाव का मन बना चुकी है, और शायद 24 में भी।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

UttarPradesh
UP ELections 2022
Narendra modi
Amit Shah
Yogi Adityanath
BJP
Purvanchal Express

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • unity
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    विशेष: एक हमारी और एक उनकी मुल्क में हैं आवाज़ें दो
    26 Jan 2022
    गणतंत्र दिवस के मौके पर आइए सुनते हैं जावेद अख़्तर की नज़्म...जो हमें बता रही है कि किस तरह मुल्क में दो आवाज़ें हैं—एक जो प्यार सिखाती है, आगे बढ़ना सिखाती है और दूसरी जो नफ़रत बढ़ाती, एक-दूसरे को…
  • republic day
    शलिनी दीक्षित
    इस गणतंत्र दिवस पर, भारत यादों पर कपट की जीत को भी मनाएगा 
    26 Jan 2022
    एक भ्रमित और बेचैन राष्ट्र को झूठे आख्यानों के माध्यम से निर्मित किया जा रहा है, जबकि मध्यम वर्ग अतीत के गौरव को पुनर्जीवित करने की कहानियों में खोया हुआ है। 
  • Republic Day Parade
    एम.जी. देवसहायम
    गणतंत्र दिवस के सैन्यकरण से मज़बूत लोकतंत्र नहीं बनता
    26 Jan 2022
    अक्सर यह सवाल उठता है कि गणतंत्र दिवस का जश्न परेड द्वारा मनाया जाना चाहिए या झांकियों के जुलूस द्वारा। यहां हम दोनों की परिभाषाओं पर नज़र डाल रहे हैं।
  • inflation
    न्यूज़क्लिक टीम
    महंगाई-बेरोज़गारी को ख़त्म करने में क्या फ़ेल हुई मोदी सरकार?
    25 Jan 2022
    एक मीडिया हाउस ने #MoodOfTheNation सर्वे के नतीजों में बताया है कि देश की जनता बढ़ती महंगाई से परेशान है और 67% से ज़्यादा लोगों को घर चलाने में मुश्किल हो रही है। न्यूज़क्लिक के इस विडियो में जानिए…
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    खोज ख़बरः देश के गणतंत्र को है किससे ख़तरा
    25 Jan 2022
    खोज ख़बर में देश के गणतंत्र पर मंडरा रहे ख़तरों के बारे में बात की वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने। संविधान के रखवालों और उसे ख़त्म करने वालों के बीच संघर्ष है ज़ारी। मुसलमानों के नरंसाहर की आशंका, उत्तर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License