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चुनाव 2022
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भारत
राजनीति
यूपी का रण, तीसरा चरण:  बीजेपी को उसके पिछले प्रदर्शन से रोक पाएंगे अखिलेश?
तीसरे चरण के चुनाव बेहद अहम होने वाले हैं, क्योंकि यहां कई ऐसे दिग्गज चेहरे मैदान में हैं जिनकी साख दांव पर लगी है। इसके अलावा हाथरस, बिकरू कांड और आलू किसान चुनावी गणित को और ज्यादा कठिन बना सकते हैं।
रवि शंकर दुबे
19 Feb 2022
up elections

उत्तर प्रदेश में दो चरणों के बाद जाटलैंड से होते हुए ये राजनीतिक पारा अब यादवलैंड और बुंदेलखंड की ओर पहुंच गया है। तीसरे चरण के बारे में कहते हैं कि 16 ज़िलों की ये वो 59 सीटें हैं जहां मतदान संपन्न होते ही धुंधला ही सही लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा दिखने लगता है। जिसके लिए राजनीतिक पार्टियों को पूरी तरह ओबीसी वर्ग पर निर्भर होना पड़ता है। कहने का अर्थ ये कि 59 सीटों पर यादव, लोधी और सैनी समाज के मतदाताओं के हाथ में जीत की कमान होगी। जबकि खुद अखिलेश यादव की साख भी दांव पर होगी।

16 जिलों की जिन 59 सीटों पर वोटिंग होनी है, यहां करीब दो करोड़ 15 लाख 75 हजार 400 वोटर हैं। जिसमें एक करोड़ 16 लाख 12 हजार 10 पुरुष, 99 लाख, 62 हजार 324 महिला और एक हजार 96 ट्रांसजेंडर हैं।

तीसरा चरण: 16 ज़िले, 59 सीटें

हाथरस- हाथरस (एससी), सादाबाद, सिकंदराराऊ

फिरोजाबाद- टूंडला(एससी), जसराना, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, सिरसागंज

कासगंज- कासगंज, अमांपुर, पटियाली

एटा- अलीगंज, एटा, मारहरा, जलेसर(एससी)

मैनपुरी- मैनपुरी, भोगांव, किशनी(एससी), करहल

फर्रुखाबाद- कायमगंज(एससी), अमृतपुर, फर्रुखाबाद, भोजपुर

इटावा- जसवंतनगर, इटावा, भरथना(एससी)

कन्नौज- छिबरामऊ, तिर्वा, कन्नौज(एससी)

औरैया- बिधूना, दिबियापुर, औरैया(एससी)

कानपुर देहात- रसूलाबाद(एससी), अकबरपुर-रानिया, सिकंदरा, भोगनीपुर

कानपुर नगर- बिल्हौर(एससी), बिठूर, कल्याणपुर, गोविंद नगर, सीसामऊ, आर्य नगर, किदवई नगर, कानपुर छावनी, महाराजपुर, घाटमपुर(एससी)

जालौन- माधोगढ़, कालपी, उरई(एससी)

हमीरपुर- हमीरपुर, राठ(एससी)

महोबा- महोबा, चरखारी

झांसी- बबीना, झांसी नगर, मौरानीपुर(एससी), गरौठा

ललितपुर- ललितपुर, महरौनी(एससी)

पिछले चुनावों में प्रदर्शन

तीसरे चरण की 59 सीटों पर जहां भाजपा अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने की कोशिश करेगी, तो समाजवादी पार्टी अपने ही गढ़ में फिर वापसी की उम्मीदें बांधे बैठी है। साल 2017 विधानसभा चुनावों की बात करें तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, इसके बावजूद वो अपने गृह क्षेत्र में बुरी तरह से मात खाए थे। सबसे अहम बात ये थी कि जिस यादव वोट बैंक पर उन्हें सबसे ज्यादा विश्वास था, वो भी उनसे दूर हो गया था। इसी का परिणाम था कि सपा सिर्फ 6 सीटें ही जीत पाई थी। वहीं दूसरी ओर भाजपा ने गैर यादव ओबीसी कार्ड का दांव चलकर लोधी, शाक्य जातियों का भरोसा जीत लिया था। जबकि 2012 के चुनावों में अखिलेश ने 59 में 37 सीटें जीती थीं।

गठबंधन के सहारे प्रमुख पार्टियां

इतिहास रहा है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता में कभी कोई मुख्यमंत्री रिपीट नहीं हुआ है, यही कारण है... भले ही भाजपा ने पिछले चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन किया हो लेकिन इस चुनाव में गठबंधन का सहारा लेना पड़ा रहा है। 2017 के नतीजों को दोहराने के लिए भाजपा ने अपना दल (सोनेलाल पटेल) के साथ गठबंधन कर रखा है। वहीं सपा ने शाक्य वोटरों को लुभाने के लिए महान दल के साथ गठबंधन कर रखा है। और इस बार अखिलेश यादव के पास चाचा शिवपाल सिंह यादव का भी साथ है। पिछली बार चाचा-भतीजे में अनबन होने से दोनों की राहें अलग हो गई थीं। इस वजह से भी अखिलेश यादव को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

जो सबसे अहम मुद्दे हैं

पहले और दूसरे चरण में किसान और मुस्लिम फैक्टर के कारण भले ही भाजपा ने प्रचार में पूरा दम न लगाया हो, लेकिन जैसे-जैसे चुनावी रेलगाड़ी मध्य और पूर्वी यूपी की ओर बढ़ रही है, भाजपा की ओर से ताबड़तोड़ प्रचार किया जा रहा है, जिसका एक कारण तीसरे चरण की कुछ सीटों पर ऐसे मुद्दे हैं जो भाजपा को परेशान कर रहे हैं। जिसमें तीन मुद्दे बेहद अहम हैं:

* योगी सरकार को विपक्ष सबसे ज्यादा हाथरस में दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले पर घेरता रहा है। मामले को जिंदा रखने के लिए समाजवादी पार्टी हर महीने 'हाथरस की बेटी स्मृति दिवस' मना रही है। बाकी आपको तो याद ही होगा कि इस मामले के बाद कांग्रेस की ओर से कैसे प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने पीड़िता के घर जाकर उन्हें ढांढस बंधाया था और योगी सरकार पर आरोप मढ़े थे।

* बिकरू कांड, विकास दुबे पुलिस एनकाउंटर और उसके एक सहयोगी अमर दुबे की पत्नी खुशी दुबे को जेल भेजा जाना भी अहम मुद्दा है। जिसके जरिए विपक्ष योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी साबित करने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस ने खुशी दुबे की बहन नेहा तिवारी को नारायणपुर से टिकट दिया है।

* इसके अलावा विपक्ष की तरह भाजपा कन्नौज में इत्र कारोबारी पीयूष जैन के यहां से मिले 250 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी और उसके कथित समाजवादी पार्टी के कनेक्शन का मुद्दा उठा रही है। हालांकि इसी मुद्दे पर सपा की ओर से भी भाजपा पर हमला किया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार में कानून व्यवस्था की इतनी दुहाई दी जाती है तो इतने रुपये कहां से आए?

आलू किसान देगा भाजपा को जवाब?

वैसे 16 ज़िलों की 59 सीटों पर तीन मुद्दे बेहद अहम होने वाले हैं लेकिन बृज और अवध के क्षेत्र को आलू बेल्ट भी कहा जाता है। यानी 59 में से 36 सीटें आलू बेल्ट में आती है, जो आवारा पशुओं के काफी परेशान है। यहां आलू की खेती यादव समाज ही नहीं बल्कि शाक्य और कुर्मी समुदाय के लोग भी बड़ी तादाद में करते हैं, जिन्हें बीजेपी का हार्ड कोर वोटर माना जा रहा है। लेकिन अगर इन सीटों पर बसपा और सपा का जातीय समीकरण फिट बैठ जाता है, तो भाजपा को बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।

बहुतों की साख दांव पर

पहली बार चुनावी मैदान में अखिलेश

तमाम मुद्दों और जातीय समीकरण के अलावा यहां से कई ऐसे बड़े चेहरे हैं जिनकी साख भी दांव पर लगी हैं, जिनमें सबसे बड़ा नाम सपा प्रमुख अखिलेश यादव का है, अखिलेश यादव पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं, जिसके लिए इन्होंने अपने पिता यानी मुलायम सिंह का गढ़ मानी जाने वाली करहल विधानसभा सीट को चुना है। आपको बता दें कि करहल विधानसभा सीट अखिलेश यादव के पारिवारिक गांव सैफई से सटी हुई और मैनपुरी लोकसभा में आती है, मुलायम सिंह यादव यहां से सांसद भी हैं। इतना ही नहीं मुलायम सिंह यादव ने यहीं से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी और बतौर शिक्षक नौकरी भी की थी।

अखिलेश बनाम बघेल

अब अखिलेश यादव के पक्ष में इतने समीकरण होने के बावजूद भी ये सीट इसलिए अहम है क्योंकि यहां से भाजपा ने केंद्रीय कानून राज्य मंत्री और आगरा से सांसद एसपी सिंह बघेल को प्रत्याशी बना दिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि बघेल अखिलेश को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। माना जा रहा है कि एसपी सिंह बघेल आसपास की सीटों के सामाजिक और जातीय समीकरण पर असर डाल सकते हैं।

शिवपाल यादव

एक और चेहरा जो मतदान के दौरान फोकस में होगा वो है शिवपाल यादव का। यादव परिवार में हुई कलह के बाद शिवपाल यादव सपा से अलग एक पार्टी बना चुके थे, लेकिन अब उन्होंने अपने भतीजे यानी अखिलेश को माफ कर दिया है और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प भी ले लिया है। शिवपाल यादव अपनी इटावा की अपनी पारंपरिक सीट जसवंतनगर से चुनाव लड़ रहे हैं, इस सीट पर अधिकतर मुलायम कुनबे का ही कब्ज़ा रहा है, सिर्फ एक बार 1980 में यहां कांग्रेस का परचम लहराया था, 1996 से लगातार शिवपाल यादव यहां से विधायक चुने जा रहे हैं।   

सतीश महाना

योगी सरकार के मंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता सतीश महाना कानपुर के महाराजपुर विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में हैं। सतीश महाना पिछले 7 बार से विधायक हैं और अब आठवीं बार फिर से किस्मत आज़मा रहे हैं। इनका मुकाबला समाजवादी पार्टी के फतेह बहादुर सिंह गिल के साथ है। जबकि यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कनिष्ठ पांडेय भी इसी सीट से चुनाव लड़ा रहे हैं।

सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद फर्रुखाबाद सदर सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। इससे पहले 2002 मे लुईस खुर्शीद फर्रुखाबाद की कायमगंज विधानसभा सीट से विधायक रह चुकी हैं। 2007 में लुईस खुर्शीद चुनाव हार गई थीं, 2012 में लुइस खुर्शीद ने अपनी सीट बदली और फर्रुखाबाद सदर से चुनाव लड़ा लेकिन इस चुनाव में भी इनको कामयाबी नहीं मिल पाई। लुईस के सामने बीजेपी के मौजूदा विधायक सुनील द्विवेदी और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी सुमन मौर्य मैदान में है।

कन्नौज से पूर्व आईपीएस असीम अरुण

पुलिस कमिश्नर पद से वीआरएस लेकर बीजेपी में शामिल हुए सीनियर आईपीएस ऑफिसर असीम अरुण कन्नौज सदर विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे हैं। भाजपा के असीम अरुण का मुकाबला समाजवादी पार्टी के अनिल दोहरे से है, वही बहुजन समाज पार्टी ने इस सीट पर समरजीत दोहरे को चुनाव मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस ने रीता देवी को अपना उम्मीदवार बनाया है। कन्नौज की जनता की माने तो इस सीट पर भाजपा के असीम अरुण का सीधा मुकाबला समाजवादी पार्टी के अनिल दोहरे के साथ है।

327 उम्मीदवारों के लिए धुआंधार प्रचार

तीसरे चरण की कुल विधानसभा सीटों पर 327 उम्मीदवार मैदान में हैं। अपने-अपने प्रत्याशियों के लिए गृह मंत्री अमित शाह से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ रैलियां की हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भाजपा को फिर से सत्ता में लाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अखिलेश यादव ने सपा के कमान खुद के कंधो पर उठा रखी है, इसके अलावा कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी घर-घर जाकर प्रचार कर रही हैं और किसी तरह कांग्रेस को फिर खड़ा करने में लगी हैं। अब इतने प्रचारों के बीच जनता किसे पसंद करती है इसका फैसला 10 मार्च को होगा।

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