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चुनाव 2022
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लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग राय थी। इसके अलावा पेट्रोल- डीज़ल और रसोई गैस की बढती कीमतें सभी का मुद्दा था।
असद रिज़वी
24 Feb 2022
up elections

विधानसभा चुनाव के चौथे चरण में राजधनी लखनऊ (ज़िला) की 09 सीटों पर 23 फ़रवरी को 60 प्रतिशत मतदान हुआ। प्रदेश की राजधानी में ज़्यादातर सीटों पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और समाजवादी पार्टी (सपा) में सीधा मुक़ाबला देखने को मिला।

कई पोलिंग बूथ पर हंगामे की खबरें भी प्राप्त हुईं। वहीं वोटर लिस्ट में नाम नहीं आने से मतदाता नाराज़ भी नज़र आये। इसके अलावा कई लोगों ने शिकायत करी कि उनके पहुँचने से पहले उनका वोट डाला जा चुका था।

लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग राय थी। इसके अलावा पेट्रोल- डीज़ल और रसोई गैस की बढती कीमतें सभी का मुद्दा था।

मतदाताओं से बात करने पर मालूम हुआ कि बिकारु कांड में माफिया विकास दुबे के शूटर अमर दुबे की पत्नी ख़ुशी दुबे के जेल में होने से लोगों में नाराज़गी है। वहीं लखीमपुर कांड में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र “टेनी” के बेटे आशीष मिश्र की ज़मानत के मुद्दे का असर लखनऊ तक में दिखा।

हालाँकि कोई भी मतदाता “साम्प्रदायिकता” के मुद्दे पर बोलता नज़र नहीं आया। अयोध्या में कोर्ट के आदेश से बन रहे राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, मथुरा और “हिजाब” की चर्चा मतदाताओं के बीच नहीं दिखी। गौ:वंश की रक्षा  का मुद्दा भी से शहरों नदारत था। जबकि ग्रामीण इलाकों में आवारा पशु एक बड़ा मुद्दा दिखाई दिया।

लखनऊ में बुधवार 09 सीटों लखनऊ उत्तर, लखनऊ पच्शिम, लखनऊ पूर्व, लखनऊ मध्य, लखनऊ “कैंट”, मलीहाबाद, बक्शी का तालाब, मोहनलालगंज, सरोजनीनगर और मलीहाबाद में हुए मतदान में कुल 60.05 प्रतिशत वोट पड़े, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है । इस से पहले सर्वाधिक 58.61 प्रतिशत मतदान हुआ था। ग्रामिण इलाकों में  सबसे अधिक  बक्शी का तालाब में 69.00 प्रतिशत वोट डाले गए। वहीं शहरी इलाकों में  लखनऊ पच्शिम में 58.21 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने अधिकार का प्रयोग किया।

दिनभर प्रत्याशी अपने बनते बिगड़ते समीकरण पर नज़र बनाये रहे। हालाँकि ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि मुकाबला सीधा बीजेपी और सपा के बीच है। सबसे ज्यादा चर्चा  लखनऊ पच्शिम और लखनऊ मध्य पर हुई। लखनऊ पच्शिम जिसे बीजेपी का गढ़ माना जाता है, वहाँ सताधारी पार्टी के अनजनी श्रीवास्तव को सपा के अरमान कड़ी चुनौती देते नज़र आये। वहीं लखनऊ मध्य के बीजेपी के उमीदवार पार्षद रजनीश गुप्ता को पूर्व मंत्री रविदास मेह्लोत्र से सीधा मुकाबला देखने को मिला।

उधर ग्रामिण इलाकों में सबसे ज्यादा चर्चित चुनावी लड़ाई प्रवर्तन विभाग के पूर्व अधिकारी राजेश्वर सिंह और अखिलेश यादव के क़रीबी रहे पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्र के बीच रही। राजनीतिक जानकर मानते हैं कि इस बार किसी की लहर नहीं थी, लेकिन अनुमान यह है कि तीन शहरी सीटों और तीन ग्रामीण सीटों पर बीजेपी और सपा के बीच कड़ा मुकाबला हुआ है।

न्यूज़क्लिक ने कुछ मतदाताओं से बात करी और उनसे इनके चुनावी मुद्दों को जानने की कोशिश करी। कुछ मतदाताओं ने नाम न लिखने की शर्त पर अपने विचार साँझा किये। सरोजनीनगर में एक महिला मतदाता ने कहा कि उसके लिए सबसे बड़ा मुद्दा “पुरानी पेंशन” का है। वहीं एक मेहनतकश ने कहा कि कोविड-19 की तालाबंदी से अब तक उनको काम नहीं मिल पाया है। इसलिए “रोज़गार” उनका सबसे बड़ा मुद्दा है।

सरकार द्वारा दिया जा रहा “फ्री राशन” चुनाव पर कोई ख़ास प्रभाव डालता नहीं दिखा। पोलिंग बूथ से दूर खड़े एक नौजवान का कहना था कि फ्री राशन नहीं “रोज़गार चाहिए।” नौजवान  ने बताया कि राशन के लिए चार-पांच घंटे लाइन में खड़ा होना पड़ता है। इतने समय में वह 500 रुपये कमा सकता है। लखनऊ पच्शिम की रीना का भी कहना है कि राशन तो मिलता है, लेकिन उनके पति के पास रोज़गार नहीं है।

एक महिला वोटर कहती हैं कि हम उनसे सुरक्षा की उपेक्षा नहीं करते जो उन्नाव में कुलदीप सिंह सेंगर के साथ खड़े थे और हाथरस की “बेटी के हत्यारों” को बचा रहे थे। बक्शी का तालाब में रहने वाली वंदना रॉय, लॉ एंड आर्डर पर कहती हैं कि जो बलात्कारी बाबा राम रहीम को ज़ेड प्लस की सुरक्षा दे रहे हैं, उनसे महिला सुरक्षा की क्या उम्मीद की जा सकती है?

इसी इलाक़े के मटयारी की माया कहती हैं आवारा पशु ने बहुत बड़ा नुकसान किया है। अब गौ वंश की रक्षा पर राजनीती बंद करने का समय आ गया है ।  

पुराने लखनऊ में मतदान करने आये प्रिंस मस्से भी मानते हैं कि पुरानी पेंशन का मुद्दा बहुत एहम है। उनके साथ खड़े उनके मित्र अरुण कुमार रस्तोगी  कहते हैं कि वह इस बात से संतुष्ट हैं कि मौजूदा सरकार में लॉ एंड आर्डर बहुत अच्छा है। रस् महंगाई को मुद्दा मानते है लेकिन इसके लिए सरकार को दोषी नहीं बल्कि बढती आबादी को ज़िम्मेदार मानते है।

वहीं नापियर कॉलोनी के  राहुल सिंह चौहान कहते हैं कि महंगाई से बड़ी समस्या कोई और नहीं है, पेट्रोल 100 प्रति लीटर के क़रीब है।  चौहान से जब फ्री वैक्सीन पर बात करी, तो उन्होंने कहा कि, "सबको मालूम है कि फ्री कुछ नहीं है, सब करदाताओं का पैसा है। हमेशा से वैक्सीन मुफ्त ही रही है, सबको मालूम है। लेकिन खाने का तेल इससे पहले कभी 200 प्रति किलो नहीं बिका।"

वहीं एक और युवक का कहना था कि मंत्री के बेटे को ज़मानत मिल सकती है, लेकिन ख़ुशी दुबे जिसकी “बिकरु कांड” से कुछ दिन पहले ही शादी हुई थी, अभी तक जेल में है। यह कैसा इंसाफ़ है?

अशरफाबाद के अमर नाथ का कहना है कि पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों पर वह बात नहीं करना चाहते हैं। उनका कहना है कि गरीबों को राशन देकर सरकार ने बड़ा काम किया है। आर के मिश्र कहते हैं कि कोविड-19 अंतर्राष्टीय आपदा थी, इसमें सरकार कुछ नहीं कर सकती है। हालांकि वे मानते हैं कि “पुरानी पेंशन” सिर्फ एक चुनावी वादा है, ऐसा करना किसी राजनीतक दल के लिए संभव नहीं है।

भवानीगंज के मुज़फ्फर हुसैन कहते हैं कि महंगाई उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। वह कहते हैं कि ख़राब “स्वास्थ सेवा” भी  एक बड़ा मुद्दा है। हुसैन के अनुसार कोविड-19 में सारी दुनिया ने देखा कि हमारे प्रदेश में लोग ऑक्सीजन की कमी से मरे हैं । शाहगंज  के अंजुम अब्बास कहते हैं कि इस वक़्त “महंगाई और बेरोज़गारी” से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। पिछले 5 सालों में सिर्फ धर्म के नाम पर राजनीती हुई है। विकास के प्रश्न पर वह (गिरधारा सिंह) पोलिंग सेंटर के समने पड़े कूड़े के ठेर को दिखते हुए कहते हैं, विकास आप ख़ुद देख लीजिए।

वहीं कई मतदातों ने शिकायत भी की कि “बीएलओ” उनको मतदाता सूचि में नाम शामिल करने में मदद नहीं कर रहे थे। शिया डिग्री कॉलेज (गर्ल्स) में वोट डालने आये वरिष्ठ नागरिक ज़मीन जैदी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि बीएलओ ने उनसे कहा कि उनका नाम वोटर सूची में नहीं है। जबकि उनकी पत्नी ने जब सूची देखी तो उनका वोट था। वहीं यूनिटी कॉलेज में वोट डालने गये फ़िरोज़ आगा का आरोप है कि उनके मतदाता केंद्र आने से पहले ही उनका वोट डाला जा चुका था। अलीगंज की इंदु शर्मा को भी मालूम हुआ कि उनका वोट पहले ही बैलट के जरिए डाला जा चुका है।

बक्शी का तालाब के कैलाश चन्द्र शर्मा, राजेश गुप्ता और कैंट में उर्दू शायर मुनव्वर राणा आदि समेत कई इलकों से मतदाताओं के नाम सूची से गायब हो गए। नाम की स्पेल्लिंग में ग़लती से भी कई लोग वोट नहीं डाल सके।

गिरधर सिंह इंटर कॉलेज (लखनऊ पच्शिम) और शिया डिग्री कॉलेज (डालीगंज) लखनऊ उत्तर, द मॉडल स्कूल (सरोजनीनगर) आदि से वोटिंग मशीन में गड़बड़ी की खबरें मिली। वहीं अयोध्या रोड पर रामाधीन इंटर कॉलेज पर मतदाताओं की घड़ी-घड़ी चेकिंग को लेकर हंगामा हुआ। वहीं घंटा घर पर स्थित हुसैनाबाद ट्रस्ट के पोलिंग बूथ पर सपा कार्यकर्ताओं ने बीजेपी पार्षद पर हंगामा काटने और अपत्तिजनक नारे लगाने का आरोप लगाया है।

इन चुनावों का फैसला तो 10 मार्च को होगा । लेकिन माना जा रहा है कि इस चरण का असर आगे के तीन चरणों में भी होगा। लखनऊ में समीकरण का अंदाज़ा लेते हुए बीजेपी ने क़ानून मंत्री ब्रिजेश पाठक का टिकट लखनऊ मध्य से काट कर पार्टी के लिए सुरक्षित समझी जाने वाली कैंट सीट पर किया। वहीं 2012 के बाद अब सपा की लखनऊ की चुनावी लड़ाई में वापसी होती नज़र आ रही है।

(नोट: नाम केवल उन मतदाताओं के लिखे गये हैं जिन्होंने इसकी अनुमति दी है)

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