NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूपी जनसंख्या विधेयक : मनगढ़ंत बुराइयों से जंग
सभी धर्मों के लोगों के बीच बढ़ती आबादी में पहले के मुक़ाबले गिरावट दर्ज की जा रही है। ऐसे में यह विधेयक महज़ अलगाव को बढ़ावा देने का ही काम करेगा।
सुबोध वर्मा
16 Jul 2021
यूपी जनसंख्या विधेयक : मनगढ़ंत बुराइयों से जंग
Image Courtesy: FII

भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली भाजपा सरकार की ओर से लाया गया प्रस्तावित यूपी जनसंख्या नियंत्रण विधेयक जनसंख्या वृद्धि की किसी भी चिंता के बजाय काल्पनिक डर से ज़्यादा प्रेरित दिखायी देता है। पिछले कुछ दशकों के आंकड़ों से साफ़ दिखाई देता है कि प्रशासनिक कार्रवाई या निष्क्रियता के बावजूद जनसंख्या वृद्धि धीमी हो रही है। ऐसा पूरे भारत में हो रहा है और यूपी भी इसका अपवाद नहीं है।

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ या उनकी पार्टी की तरफ़ से आधिकारिक तौर पर तो नहीं कहा गया है, लेकिन इस क़दम के पीछे का जो असली मकसद माना जा रहा है, वह है — मशहूर, लेकिन बहुत बदनाम सिद्धांत, जिसके मुताबिक़ मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। और यह आबादी आने वाले दिनों में हिंदू आबादी से आगे निकल सकती है। आख़िर यह कैसे हो सकता है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध प्रामाणिक आंकड़ों से तो ऐसा बिल्कुल प्रमाणित नहीं होता। लेकिन, इस सिलसिले में महज़ चिंता को बढ़ा देने से ही शायद राजनीतिक या चुनावी उद्देश्यों को पूरा करने में मदद मिल जाती है। यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि इस हौवे को फिर से ज़िंदा कर दिया गया है।

क्या कहते हैं यह आंकड़े?

समय के साथ आबादी में बढ़ोत्तरी या कमी को मापने का सर्वोत्तम पैमानों में से एक पैमाना है- कुल प्रजनन दर (TFR), या किसी महिला के पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या। आइये, इस सिलसिले में यूपी के आंकड़ों पर नज़र डालते हैं। ये आंकड़े राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के विभिन्न दौरों की रिपोर्टों से उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से 2019-20 में आयोजित नवीनतम (पांचवें) दौर के लिए यूपी का यह आंकड़ा अभी इसलिए उपलब्ध नहीं है क्योंकि महामारी की वजह से इसे संग्रहित करने में बाधा पहुंची है।

नीचे दिया गया चार्ट 1998-99 में यूपी में हिंदुओं, मुसलमानों और कुल आबादी के टीएफ़आर को संक्षेप में प्रस्तुत करता है, जो 2015-16 तक हुए चौथे दौर में एनएफएचएस का दूसरा दौर था। मुस्लिम महिलाओं में प्रति महिला पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या 1998-99 में 4.76 से तक़रीबन 35% गिरकर 2015-16 में 3.1 हो गयी थी। यह गिरावट हिंदू महिलाओं के पैदा होने वाले औसत बच्चों की उस संख्या में आने वाली गिरावट से ज़्यादा है, जो कि 3.87 से गिरकर 2.67 हो गयी थी, यानी लगभग 31% की कमी आयी थी।

इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि यूपी की कुल आबादी भी पहले की तरह तेज़ी से नहीं बढ़ रही है। इन 17 सालों में इस सूबे में पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या तक़रीबन चार (3.99) से घटकर 2.74 हो गयी है।

बढ़ती जागरूकता और शिक्षा, बच्चों के मरने के ख़तरे में कमी, गर्भनिरोधक विधियों की बेहतर उपलब्धता और सबसे अहम बात कि ज़्यादा बच्चे होने से उनके आर्थिक हितों पर नाकारात्म असर पड़ता है, इन सब कारणों ने मिलकर जनसंख्या वृद्धि में कमी की इस सामाजिक घटना को जन्म दिया है। यह अहसास सभी धर्मों में व्याप्त है।

आबादी बढ़ोत्तरी के पीछे का कारण ग़रीबी और शिक्षा की कमी

इन एनएफ़एचएस सर्वेक्षणों में एक अहम जानकारी मिला करती थी, जिसे अज्ञाक कारणों से 2005-06 के बाद से साफ़ तौर पर बंद कर दिया गया था। वह जानकारी थी-प्रजनन दर और महिला/परिवार की आर्थिक स्थिति के बीच का रिश्ता।

एनएफ़एचएस-3 की रिपोर्ट में यह डेटा शामिल है, जिसे यूपी के सिलसिले में नीचे दिये गये चार्ट में संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। राज्य के लोगों को परिवारों के स्वामित्व वाली संपत्ति के आधार पर उन्हें निम्नतम (सबसे ग़रीब) से उच्चतम (सबसे अमीर) तक पांच स्तरों में बांटा गया है। जैसा कि साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि अमीरों के मुक़ाबले ग़रीब तबके में प्रति महिला ज़्यादा बच्चे पैदा होते हैं। सही मायने में सबसे अमीर तबके का टीएफआर सबसे ग़रीब तबके के टीएफआर के आधे से भी कम है।

इसके  पीछे के कारणों को आसानी से समझा जा सकता है। ऐसा वैश्विक स्तर पर देखा जाता है कि ग़रीबी, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन को लेकर कम जागरूकता, कम बच्चे पैदा करने के अधिकार में कमी और बच्चों की ज़्यादा मृत्यु दर साथ-साथ चलते हैं। ये तमाम कारण मिलकर ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करते हैं, जिसे भविष्य की सुरक्षा के तौर पर देखा जाता है।

जनगणना कार्यालय के नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) के हालिया आंकड़ों के आधार पर नीचे दिया गया चार्ट प्रजनन दर पर महिलाओं की शिक्षा के असर को दर्शाता है। अगर महिला ने बारहवीं कक्षा या उससे ऊपर तक की पढ़ाई की है, तो टीएफआर में एक तिहाई तक की गिरावट आ जाती है।

अगर कम महिला साक्षरता वाले राज्यों में टीएफ़आर की तुलना उच्च साक्षरता वाले राज्यों से किया जाये, तो महिलाओं की शिक्षा और उनके द्वारा पैदा होने वाले बच्चों की संख्या के बीच की कड़ी एकदम साफ़-साफ़ दिखायी देती है। 2019-20 में किये गये एनएफएचएस - 5 के मुताबिक़, असाम में महिला साक्षरता 75%  थी और टीएफ़आर 1.87 थी; केरल में 97.4% महिला साक्षरता थी और टीआरएफ़ 1.79 और पश्चिम बंगाल में महिला साक्षरता 72.9% थी, जबकि टीएफ़आर 1.64 थी।

दूसरी ओर, बिहार में 55% महिला साक्षरता और 2.98 की टीएफआर थी। यूपी के लिए नवीनतम आंकड़े उपलब्ध नहीं है, लेकिन 2015-16 में हुए एनएफ़एचएस - 4 डेटा से पता चलता है कि यूपी में महिला साक्षरता 61% थी और टीएफ़आर 2.74 थी। इससे तो यही पता चलता है कि साक्षरता (बारहवीं कक्षा या उससे आगे तक की पूरी पढ़ाई नहीं) भी महिलाओं के पैदा होने वाले बच्चों की संख्या को कम करने में मदद करती है। ग़ौर करने वाली बात है कि ऊपर जितने उदाहरण गिनाये गये हैं, वे सबके सब राज्य अपेक्षाकृत ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्य हैं।

निशाने पर मुसलमान और दलित

जाने-अनजाने यह प्रस्तावित यूपी बिल मुसलमानों और दलितों को सबसे ज़्यादा प्रभावित करेगा क्योंकि एनएफ़एचएस के आंकड़ों के मुताबिक़ इन दो समुदायों की प्रजनन दर अधिक है। ज़ाहिर है कि ये आंकड़े 2015-16 के हैं और चीज़ें तेज़ी से बदल रही हैं। लेकिन, इन सबसे वंचित समुदायों के निशाने पर आने की संभावना है। यूपी में दलित महिलाओं के पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या 3.09 थी, जो तक़रीबन मुसलमानों (3.1) के बराबर थी, और राज्य में यह औसत संख्या 2.74 से ज़्यादा थी।

दलित समुदायों (और आदिवासियों के बीच भी, लेकिन यूपी में आदिवासियों की एक बड़ी आबादी नहीं है) में इस टीएफ़आर के ज़्यादा होने का कारण वही है,जो मुसलमानों के बीच टीआरएफ़ ज़्यादा होने की वजह हैं और वे कारण हैं- अमूमन ख़राब आर्थिक स्थिति और शिक्षा की कमी का होना। हक़ीक़त तो यही है कि मुस्लिम और दलित समुदायों के भीतर भी इसके कई स्तर दिखायी देते हैं जिनके पास पिछली पीढ़ी के मुक़ाबले बेहतर आर्थिक स्थिति है, उनके बच्चे कम हैं।

मगर, चूंकि योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस तरह के बुनियादी तथ्यों को लेकर मासूम बन जाते हैं इसलिए उन्होंने इस पूरे मामले से इन तथ्यों को नज़रअंदाज़ कर दिया है।

ज़ोर-ज़बरदस्ती कभी काम नहीं आती

भारत के कई सूबे ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को हतोत्साहित करते हैं। इनमें हरियाणा, राजस्थान, तेलंगाना, गुजरात आदि शामिल हैं। यूपी यह विधेयक लाकर इस समूह में शामिल होने की योजना बना रहा है, जो कि सभी सूबों में लाये गये विधेयकों में सबसे ज़्यादा सख़्त है। यह विधेयक न सिर्फ़ उन लोगों को सरकारी नौकरियां पाने से रोकता है जिनके दो से ज़्यादा बच्चे हैं, बल्कि इसमें यह इंतज़ाम भी है कि ऐसे लोगों को विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित कर दिया जायेगा।

दूसरी ओर, इस बिल में नसबंदी कराने वालों को प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव है। अगर आप सिर्फ़ एक बच्चे के बाद नसबंदी करवाते हैं तो ज़्यादा लाभ मिलेगा। यह बात विश्लेषण करने वालों को आपातकाल के  उन बुरे दिनों की याद दिला देती है जब बड़े पैमाने पर जबरन नसबंदी कराने की वजह से 1977 में कांग्रेस को नाटकीय चुनावी शिकस्त मिली थी।

आदित्यनाथ के इस विधेयक से ज़्यादा देरी से शादी, बच्चों के बीच ज़्यादा अंतराल और कम बच्चे पैदा करने की मौजूदा सामाजिक प्रवृत्ति सही मायने में ख़तरे में है क्योंकि लोगों पर इन विकल्पों में से किसी विकल्प को ज़बरदस्ती अपनाने के लिए मजबूर करने की किसी भी तरह की कोशिश ज़बरदस्त प्रतिक्रिया का कारण बन सकती है। भले ही अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में इसकी ज़बरदस्त राजनीतिक प्रतिक्रिया सिर्फ़ भाजपा के ख़िलाफ़ हो, लेकिन इसका वास्तविक ख़ामियाज़ा पूरे देश या राज्य को भुगतना पड़ सकता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

UP Population Bill: Fighting Imaginary Demons

Population Policy
up population control bill
Yogi Adityanath
BJP government
RSS
Population control
Disincentives for Population Control
Total Fertility Rate Among Muslims
National Family Health Survey

Related Stories

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

क्या वाकई 'यूपी पुलिस दबिश देने नहीं, बल्कि दबंगई दिखाने जाती है'?

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?

यूपी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच करोड़ों की दवाएं बेकार, कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • Victims of Tripura
    मसीहुज़्ज़मा अंसारी
    त्रिपुरा हिंसा के पीड़ितों ने आगज़नी में हुए नुकसान के लिए मिले मुआवज़े को बताया अपर्याप्त
    25 Jan 2022
    प्रशासन ने पहले तो किसी भी हिंसा से इंकार कर दिया था, लेकिन ग्राउंड से ख़बरें आने के बाद त्रिपुरा सरकार ने पीड़ितों को मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। हालांकि, घटना के तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने के…
  • genocide
    अजय सिंह
    मुसलमानों के जनसंहार का ख़तरा और भारत गणराज्य
    25 Jan 2022
    देश में मुसलमानों के जनसंहार या क़त्ल-ए-आम का ख़तरा वाक़ई गंभीर है, और इसे लेकर देश-विदेश में चेतावनियां दी जाने लगी हैं। इन चेतावनियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  • Custodial Deaths
    सत्यम् तिवारी
    यूपी: पुलिस हिरासत में कथित पिटाई से एक आदिवासी की मौत, सरकारी अपराध पर लगाम कब?
    25 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार दावा करती है कि उसने गुंडाराज ख़त्म कर दिया है, मगर पुलिसिया दमन को देख कर लगता है कि अब गुंडाराज 'सरकारी' हो गया है।
  • nurse
    भाषा
    दिल्ली में अनुग्रह राशि नहीं मिलने पर सरकारी अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने विरोध जताया
    25 Jan 2022
    दिल्ली नर्स संघ के महासचिव लालाधर रामचंदानी ने कहा, ‘‘लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल, जीटीबी हस्पताल और डीडीयू समेत दिल्ली सरकार के अन्य अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग…
  • student
    भाषा
    विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में, नयी हकीकत को स्वीकार करना होगा: रिपोर्ट
    25 Jan 2022
    रिपोर्ट के अनुसार महामारी के कारण उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों में विश्वविद्यालयों के सामने अनेक विषय आ रहे हैं और ऐसे में विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License