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विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
विधानसभा चुनाव: एक ख़ास विचारधारा के ‘मानसिक कब्ज़े’ की पुष्टि करते परिणाम 
पंजाब में सत्ता विरोधी लहर ने जहां कांग्रेस सरकार को तहस-नहस कर दिया, वहीं उत्तर प्रदेश में ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस पहेली का उत्तर मतदाताओं के दिमाग पर असर डालने वाली पार्टी की विचारधारा की भूमिका में निहित है।
स्पंदन प्रत्युष
13 Mar 2022
voting

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हाल ही में पांच विधानसभाओं के चुनाव नतीजों का गवाह बना है। इनमें मणिपुर, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड समेत देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जहां की विधानसभा में 403 सीटें हैं। उत्तर प्रदेश, देश की आबादी के सातवें हिस्से के साथ, देश की राजनीति को आकार देने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है और राजनीति से जुड़े सभी लोग इसका अनुसरण करते हैं। इस चुनाव में भाजपा को ऐतिहासिक जीत हासिल हुई है। योगी आदित्यनाथ विगत 37 वर्षों में राज्य में लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने वाले पहले मुख्यमंत्री हैं। ऐसा करते हुए योगी ने राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों को गलत करार दिया है। उनके विश्लेषणों में पार्टी की लंबे समय से चली आ रही विचारधारा की चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने की संभावना को गौण कर दिया था, जबकि ये तथ्य इंगित करते हैं कि मतदाताओं के मन-मस्तिष्क पर इनका कब्जा रहा है। 

भारत में चुनाव के बारे में एवं इसके मैदान में उतरने वाले राजनीतिक दलों के बारे में एक आम व्यक्ति की यह सामान्य धारणा है कि चुनाव प्रचार के दौरान पार्टियां आकर बड़े-बड़े वादे करेंगी और फिर अगले पांच साल तक घोड़े के सींग की तरह गायब हो जाएंगी। यह लगभग सभी दलों के बारे में सार्वभौमिक धारणा रही है। ऐसे में सवाल है कि इसी वातावरण में कैसे एक पार्टी लगातार जीतती जा रही है? इसको समझने के लिए हमें पहले तथ्यों और आंकड़ों को देखना होगा, जो सभी एक अनदेखी रुझान की ओर इशारा करते हैं। जनता के बीच पहले कायम आर्थिक दुश्वारियों के मुद्दों समेत अपने कुशासन के साथ-साथ किसी सूबे या केंद्र में मौजूदा सत्ताधारी दल हमेशा हमारी संसदीय प्रणाली में एक सत्ता विरोधी रुझान पैदा करते हैं। 

अगर इस नजरिये से हम पंजाब विधानसभा चुनाव परिणाम का विश्लेषण करें तो हम इसमें एक सत्ताविरोधी लहर की जीत देखते हैं। इस राज्य में किसान आंदोलन सबसे महत्त्वपूर्ण आंदोलन था, जो मुख्य रूप से केंद्र सरकार के खिलाफ शुरू हुआ था, जो उसकी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संभावना पर प्रभावी ढंग से चोट कर रहा था और जिसके चलते अकाली दल ने भाजपा के साथ उसके गठबंधन को तोड़ दिया था। लेकिन उसी समय, राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी, कांग्रेस पंजाब की सत्ता में थी। यहां ठोस वर्ग राजनीति का पुनरुत्थान हुआ, जहां किसानों ने अपनी पहचान की परवाह किए बिना बड़े एकाधिकारवादी हितों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और राज्य में सत्ता विरोधी लहर को भी मजबूत किया। यह लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाने और अपने को विपक्ष में होने पर सत्ताविरोधी संघर्ष को मजबूत करने की सभी दलों की रणनीति भी रही है, भले ही वे केवल विशेष पहचान के हित का प्रतिनिधित्व करते हों। 

यहां तक कि भाजपा, जो लगातार हिंदू मतदाताओं से अपने प्रति समर्थन की अपील करती रही है और चुनाव के दौरान इस आधार पर बने या बनाए गए ध्रुवीकरण का उपयोग करती है, उसने भी बड़े पैमाने पर मतदाताओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति, काले धन और नौकरियों के मसले को उठाया था, इन्हीं मुद्दों ने उसे 2014 में केंद्र की सत्ता में बिठाया था। इसके अलावा, पंजाब में सत्ताधारी कांग्रेस के भीतर भी संघर्ष छिड़ा था। इसी का फायदा चुनाव में कांग्रेस की सबसे बड़ी विरोधी आम आदमी पार्टी ने उठाया और एग्जिट पोलों में जाहिर उम्मीदों को पार करती हुई राज्य में एक शानदार जीत दर्ज की। कांग्रेस से संबंधित राजनीतिक विश्लेषण ने इस चुनाव में पराजय के लिए उसके नेतृत्व के अभाव और आंतरिक कलह को जिम्मेदार ठहराया है। यही पिछले तीन वर्षों में हुए सभी विधानसभा चुनावों में चलन रहा है, जहां अधिकतर पार्टियां अपनी बढ़त दिखाने से अधिक अपने जनाधार को खो चुकी हैं। 

इसके बाद अगर हम अन्य राज्यों की ओर रुख करें,जहां भाजपा ने सत्ताधारी दल होने के बावजूद जीत दर्ज की है। पहले से चले आ रहे राष्ट्रीय आर्थिक मसले कोविड-19 बाद तो और भी बिगड़ गए। उत्तर प्रदेश में तो कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान तो सरकार का सबसे खराब कुप्रबंधन देखा गया। गंगा नदी में तैरते शव थे, जिनके विजुअल्स आज भी जनता के जेहन में हैं, उन्हें कुत्ते खा रहे थे। हाथरस की जातिवादी बलात्कार एवं हत्या, और लखीमपुर खीरी में विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को भाजपा के मंत्री-पुत्र की गाड़ी से कुचल कर मारे जाने की घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा था। इससे यूपी सरकार को काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश तो पंजाब और हरियाणा के अलावा, किसान आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान बूचड़खाने बंद होने के कारण सरप्लस आवारा मवेशियों के मुद्दे से परेशान थे। इसी समय, जनता बेरोजगारी और मुद्रास्फीति से बुरी तरह पीड़ित हो गई, एक वर्गीय मुद्दा जो रेलवे निजीकरण के खिलाफ छात्रों के विरोध में दिखाई दिया; चुनाव से ठीक पहले शुरू हुई इस मुहिम के साथ पुलिस ने जिस क्रूरता से निपटी, वह प्रदेश के लिए राष्ट्रीय शर्म का विषय बना। 

इन सभी मुद्दों के बावजूद, विश्लेषण कहता है कि उत्तर प्रदेश में एक मजबूत सत्ता विरोधी लहर नहीं थी। लेकिन अगर हम दूसरी सबसे बड़ी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) और राज्य में उसके गठबंधन का विश्लेषण करें, जो चुनाव लड़ रहा था, तो इन दलों ने लोगों को छूने वाले आम मुद्दे को उठाया, जिनका वे रोजाना के स्तर पर सामना कर रहे थे, इससे सपा का वोट शेयर गत चुनाव के 21.82 फीसदी से बढ़कर इस चुनाव में 32.05 फीसद तक पहुंच गया। यह पार्टी के लिए एक रिकॉर्ड है, यह उसका अब तक का सबसे अधिक वोट प्रतिशत है।

संदर्भ के लिए, 2012 में सपा ने विधानसभा की कुल 403 सीटों में से 224 सीटें जीती थीं, तब उसका वोट फीसद लगभग 29 फीसदी था। इसी तरह, समाजवादी पार्टी वाले गठबंधन में, शामिल राष्ट्रीय लोकदल की सारी ताकत किसान आंदोलन से पैदा हुई थी, उसने भी 7 सीटें हासिल कीं और उसका वोट शेयर 1.78 फीसदी से बढ़कर 2.86 फीसदी हो गया है। मौजूदा चुनाव में सपा की सीटों की हिस्सेदारी भी 2017 में मिली महज 47 सीटों से बढ़कर 111 हो गई है। 

जहां तक भाजपा का सवाल है, तो इसके उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सिराथू सीट से चुनाव हार गए हैं। उत्तराखंड जैसे अन्य राज्य भी इसी तरह के मुद्दों से जूझ रहे हैं, जहां इसके मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद अपनी सीट हार गए हैं। 

यह भाजपा शासित राज्यों में एक मजबूत सत्ता विरोधी लहर का एक निश्चित संकेत है, और इनके बावजूद भाजपा को उत्तर प्रदेश में भाजपा का वोट शेयर 2017 के विधानसभा चुनाव के 39.67 फीसदी से बढ़ कर 41.29 फीसदी तक हो गया, जो उनके लिए एक रिकार्ड है। इसके साथ ही, भाजपा ने गोवा एवं मणिपुर में सत्ता विरोधी लहर के बावजूद अपने वोट प्रतिशत बढ़ाए हैं। 

भाजपा सत्ता विरोधी मतों में इतनी जबरदस्त वृद्धि के बावजूद अपने वोट शेयर बढ़ाने के लिए क्या कर रही है? विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों ने जबरदस्त पूंजी, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन और निजी मीडिया में एक मजबूत पैठ बनाने सहित लोकतांत्रिक संस्थानों के कमतर किए जाने के बारे में बात की है। लेकिन इन सब के बावजूद, ये मुद्दे उभर कर जनता के सामने आए हैं, और सत्ता विरोधी ताकतों ने उनका जबरदस्त लाभ उठाया है। तब फिर भाजपा को कहां फायदा हो गया? अन्य ताकतों, बसपा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, के वोट शेयर में काफी नुकसान हुआ है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के वोटों का शेयर 2017 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 22.23 फीसदी से गिर कर 12.88 तक पहुंच गया है। और कांग्रेस के वोटों का फीसद 2017 के 6.25 फीसदी की मुकाबले महज 2.33 फीसदी रह गया है। यद्यपि कांग्रेस ने पहले सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था और चुनाव पूर्व बने गठबंधन से वोटों में उसकी हिस्सेदारी बढ़ा दी होगी; फिर भी, यह एक महत्त्वपूर्ण कमी है।

इसके अलावा, बसपा के वोट शेयर में भारी गिरावट आई है, जिसका दलित वोटों में व्यापक आधार था, विशेष रूप से जाटव दलित वोटों में, अब भाजपा ने हालिया चुनावों में उसमें सेंध लगा दी है। भाजपा ने पहली बार 2017 में बसपा के इस वोट बैंक में सेंधमारी की थी और पार्टी के वफादार मतदाता वर्ग के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से पर कब्जा कर लिया था, जिसने पिछले चुनाव में उसके मत में 3.7 फीसद की गिरावट आई थी। लेकिन 2022 के चुनाव में इस मतदाता वर्ग में भाजपा के मतों की हिस्सेदारी बढ़ गई है। यह वह जगह है, जहां हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा तैयार किए गए जमीनी आधार काम आते हैं। 

ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के साथ एकजुटता विकसित करना और असंगठित श्रमिकों में उस विचारधारा की घुसपैठ करना जो उन्हें प्रेरित करती है और इसके एक हिस्से के रूप में, यह सुनिश्चित करना कि सरकार की योजनाएं बदलाव लाने की गरज से लोगों तक पहुंचे, यही कवायद वोटों में बदल गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार की योजनाएं हमेशा बनी रही हैं। भाजपा ने केवल उन योजनाओं पर अपनी पार्टी के नाम पर मुहर लगाई है, लेकिन यह वह चेतना है, जो केवल शिक्षित राजनीतिक विश्लेषकों के पास हो सकती है।

जमीनी स्तर पर यह अंतर वैचारिक रूप से संचालित पार्टी के कार्यकर्ता लाते हैं, जिन्होंने उन योजनाओं का धरातल पर कार्यान्वयन सुनिश्चित किया है। समाज के वंचित वर्ग को सांप्रदायिक विचारधारा को सिखाना आसान होता है। जब आप ऐसा करते हैं तो किसी भी विचारधारा को विकसित करना आसान होता है, और वास्तव में, सांप्रदायिक विचारधारा जो कई झूठों पर बनाई गई होती है, वह कुछ स्तर पर जनविरोधी होकर आत्म-विनाश करती रहती है। यही कारण है कि हमने 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 2019 के आम चुनावों में शहरी मध्यम वर्ग के मतदाता आधार में गिरावट देखी थी, जबकि यही वह प्रमुख वर्ग है, जिसने भाजपा को सत्ता में लाया था। 

हमने पिछले चुनावों के मतदाता समूहों में भाजपा के खिलाफ उच्च स्तर की सत्ता विरोधी लहर देखी है। लेकिन इसके बावजूद, भाजपा निचले वर्गों में जमीनी स्तर पर एकजुटता के अपने काम जारी रखते हुए और उनमें अपनी पैठ बनाते हुए अधिकाधिक संख्या में नए-नए मतदाताओं को पार्टी के समर्थन में तलाशती रहती हैं। भाजपा के अलावा, सभी दल अपने लिए किसी परिभाषित विचारधारा या इसके प्रति प्रतिबद्धता न जताने की वजह से सारे चुनाव हार गए। उनका वोट शेयर कम हो रहा है और देश में सबसे शक्तिशाली वैचारिक शक्ति को जोड़ रहा है।

इसलिए, इन चुनावों के विश्लेषण में सबसे मजबूत बिंदु एक ऐसी विचारधारा का महत्त्व है, जिसे एक राजनीतिक दल ने बनाया है। और जब अधिकतम संसाधनों वाली सबसे बड़ी पार्टी एक निश्चित विचारधारा के साथ लड़ रही है, तो विपक्ष जो खुद को उसके एक विकल्प के रूप में पेश कर रहा है, वह फिर भी इसे हराने की उम्मीद नहीं कर सकता। मान लीजिए कि भाजपा के समक्ष विपक्ष फिर से खड़ा हो भी जाए। तब उस स्थिति में, जनहितैषी नीतियों के लिए लड़ने के लिए एक मजबूत वैचारिक प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए ताकि यह उजागर किया जा सके कि सांप्रदायिक नफरत की भावना को किस तरह एक प्रमुख विचारधारा में बदली गई है, जिसने आम तौर पर देश के लोगों की आजीविका बाधित की है। भाजपा व्यापक स्तर पर लोगों के एक वर्ग को यह समझाने और सांप्रदायिक बनाने में सफल रही है कि सभी मुद्दों को केवल तभी सहन किया जा सकता है, जबकि वह अल्पसंख्यकों को बहुमत के प्रति संयमित रखे। 

नफरत की एक विचारधारा यही कर सकती है। बड़े पैमाने पर लोगों की आजीविका के नष्ट होने के कारण विचारधारा लंबे समय तक नहीं चल सकती है, लेकिन वह लगातार बलवती होती गई है और यह तब तक जारी रहेगी, जब तक कि बिना वैचारिक प्रतिबद्धता वाली अन्य पार्टियां नष्ट नहीं हो जातीं। पिछले कुछ प्रमुख चुनावों ने भी शक्ति के मामले में यथास्थिति बरकरार रखी है लेकिन भारत की राजनीति को हम किस तरह देखते हैं, इस पर लगातार बदलाव आ रहा है, भले ही हमारा इस पर ध्यान न जाता हो। वे दिन गए जब पार्टियां बड़े तामझाम के साथ जनता से वादा करती थीं और फिर चुनाव होते ही रफ्फूचक्कर हो जाती थीं, अब यह ट्रेंड सत्ताविरोधी वैकल्पिक रूप में चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। 

एक सांप्रदायिक विचारधारा का तेजी से रिसाव हो रहा है और इससे केवल धर्मनिरपेक्षता के प्रति एक वैचारिक प्रतिबद्धता जता कर और वर्गीय मुद्दों पर लोगों को एकजुट कर के ही लड़ा जा सकता है। 

(लेखक अखिल भारतीय आईटी एवं आईटीईएस कर्मचारी संघ, दिल्ली एवं एनसीआर के संयोजक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।) 

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे गए लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: 

Election Results Reaffirm Ideology’s Stronghold over Indian Minds

UP elections
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