NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
यूपी चुनाव : वे मुद्दे जो भाजपा के लिए बन सकते हैं मुसीबत! 
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का “हिंदुत्व” का मुद्दा चलता दिख नहीं रहा है। भगवा पार्टी अब विपक्षियों के सहयोगियों को तोड़ने या कम से कम उन्हें लेकर लोगों के मन में शक डालने की कोशिश कर रही है।
असद रिज़वी
01 Feb 2022
Yogi

किसान आंदोलन के असर का सामना कर रही भाजपा के सामने छात्रों का आंदोलन एक नई चुनौती बन कर खड़ा हो गया है। प्रदेश में विज्ञापनों के माध्यम से विकास के दावे करने में योगी आदित्यनाथ ने पानी की तरह पैसा ख़र्च किया। लेकिन आज नौजवान सरकार के दावों को स्वीकार नहीं कर रहा है।

राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) को समझौते के लिए बुलाने का साफ़ अर्थ यह निकाला जा रहा है कि भाजपा स्वयं मान रही है कि वह कमज़ोर पड़ रही है। जयंत चौधरी का भगवा पार्टी से हाथ मिलाने से इंकार, पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है।

विधानसभा चुनाव 2022 की घोषणा से पहले ही अयोध्या, मथुरा, और काशी के नाम पर भगवा पार्टी ने “ध्रुवीकरण” की योजना बनाना शुरू कर दी थी। भाजपा “हिंदुत्व” के नाम पर बहुसंख्यक “हिन्दू” को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है

लेकिन विपक्ष ने भाजपा के समने कई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।ग्रामीण संकट, महिला उत्पीड़न से लेकर सामाजिक न्याय के मुद्दों पर विपक्ष ने सत्तारूढ़ दल को घेर लिया है।

देश में महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में चुनावों का महौल अचानक बदला, जब सुहेलदेल भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) से हाथ मिला लिया। इससे साफ़ संदेश गया कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव अखिलेश यादव की नज़र “ग़ैर-यादव ओबीसी” वोटों पर भी है।

सुभासपा के नेता ओपी राजभर की 4 प्रतिशत “राजभर” समाज के वोटों पर अच्छी पकड़ है। विधानसभा चुनाव 2017 में वह भाजपा के साथ थे। सपा और सुभासपा का गठबंधन, भाजपा के लिए पूर्वांचल में पहला झटका था।

उधर किसान आंदोलन ने भाजपा को पश्चिम में कमज़ोर कर दिया।लोकसभा चुनाव 2014 से पहले 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर-शामली में  हुए साम्प्रदायिक दंगों ने वहाँ जाट-मुस्लिम को धर्म के आधार पर बाँट दिया था। जिसका सबसे बड़ा फ़ायदा भाजपा को लोकसभा चुनाव 2014-2019 और विधानसभा चुनाव 2017 में हुआ।

इन दंगों के बाद से राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का अस्तित्व ख़तरे में था। लेकिन विवादास्पद कृषि क़ानून (जो अब वापिस हो चुके हैं) के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन ने जाट-मुस्लिम को एक बार फ़िर क़रीब ला दिया। 

अब माना यह जा रहा है कि 7-8 साल के बाद पश्चिम में “धर्म” नहीं बल्कि “ग्रामीण संकट” पर चुनाव होगा। विपक्ष के वोटों का बिखराव रोकने और भाजपा को शिकस्त देने के लिए सपा और रालोद ने हाथ मिला लिया है। क्योंकि जाट रालोद के और मुस्लिम सपा के परंपरागत समर्थक रहे हैं। पश्चिम में चुनाव के नतीजों में इन दोनों की अहम भूमिका रहती है।

इन दोनों गठबंधन के बाद “अयोध्या, काशी और मथुरा” के नाम पर राजनीति कर रही भाजपा को भी संकट नज़र आने लगा था। जबकि अभी तक भाजपा सत्ता विरोधी लहर को रोकने के लिए “सांप्रदायिकता” को सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल कर रही थी। 

भाजपा के लिए सांप्रदायिकता के अलावा विपक्ष का बिखराव भी फ़ायदेमंद था। लेकिन चुनाव की घोषणा होते ही लगातार स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई क़द्दावर नेताओं ने भाजपा को अलविदा कह दिया। 

ग़ैर-यादव वोटों विशेषकर “मौर्य समाज” में पकड़ रखने वाले मौर्य भी सपा में शामिल हो गये। जिसके बाद चुनाव की तस्वीर और बदलने लगी है। इसके अलावा भगवा ख़ेमे को एक और झटका तब लगा जब उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल की माँ कृष्णा पटेल भी सपा में शामिल हुईं।

भाजपा, कैराना से हिंदू पलायन, धर्म परिवर्तन, विश्वनाथ कॉरिडोर, औरंगजेब और शिवाजी जैसे मुद्दे उठाकर बहुसंख्यक “हिन्दू समाज” को गोलबंद करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन तेज़ी से ओबीसी नेताओं के सपा में पलायन ने चुनाव की हवा “ सांप्रदायिकता” से “मंडल-कमंडल” की तरफ़ पलट गई। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा की चुनाव 80 बनाम 20 का है। माना जा रहा है उनका इशारा साफ़ था 80 प्रतिशत हिंदुओं बनाम 20 प्रतिशत मुसलमान। लेकिन विपक्ष ने फ़ौरन इसका पलटवार किया और कहा कि चुनाव 85 बनाम 15 का है, यानी “पिछड़ा बनाम अगड़ा”।

क्योंकि अभी तक प्रदेश में हुए चुनावों के विश्लेषण से यह मालूम होता है कि “ सांप्रदायिकता” भगवा पार्टी का ट्रम्प कार्ड रहा है, लेकिन “पिछड़ा बनाम अगड़ा” की हवा में उसका यह कार्ड काम नहीं करता है।

उधर कांग्रेस ने महिला मुद्दों पर सत्तारूढ़ दल को घेर लिया। कांग्रेस की महासचिव लगातार महिला सुरक्षा को लेकर आक्रामक हैं। प्रियंका ने 40 प्रतिशत महिलाओं के टिकट देकर यह संदेश देने की कोशिश करी है कि योगी सरकार में महिलाओं पर उत्पीड़न हुआ है, और उनकी आवाज़ को सुना भी नहीं गया है।

उन्नाव और हाथरस की घटनाओं में सरकार द्वारा करवाई में देरी और उससे पीड़ितो को हुए कष्ट को कांग्रेस अपने प्रचार “लड़की हूँ-लड़ सकती हूँ” में उठा रही है। कांग्रेस ने उन्नाव कांड की पीड़िता को टिकट भी दिया है। जिससे एक बार फ़िर चुनावों में महिला उत्पीड़न का मुद्दा चर्चा में है। इस तरह भाजपा महिलाओं के प्रति दिखाई गई उदासीनता के मुद्दे पर भी घिर रही है।

हाल में ही प्रयागराज में रेलवे भर्ती में गड़बड़ी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठी-चार्ज भी सरकार को महँगा पड़ सकता है। सभी विपक्षी दल जो पहले से ही योगी सरकार को रोज़गार पर घेर रहे थे और अब एक साथ छात्रों के पक्ष में खड़े हो गये हैं।

भाजपा सरकार से इस्तीफ़ा देकर सपा में आये स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना है- हम छात्रों के साथ खड़े हैं। मौर्य का कहना हैं एक तरफ़ “आरक्षण” की अनदेखी हो रही, दूसरी तरफ़ नौकरी माँगने वालों पर लाठीचार्ज हो रहा है।

कांग्रेस ने भी भाजपा को घेरा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू का कहना है “अगर सरकार नौकरी दे नहीं सकती है, तो विज्ञापन क्यूँ निकलती है”। वहीं छात्र भी सरकार के विरुद्ध गोलबंद हो रहे हैं, उनका कहना है कि हमको “फ़्री का राशन नहीं “सम्माजनक” नौकरी चाहिए है।

दूसरी तरफ़ ग्रामीण इलाक़ों में भी आवारा पशु, बिजली की क़ीमतें और एमएसपी के चारों तरफ़ चुनाव घूमता हुआ दिख रहा है। अवध के तराई वाले इलाक़े में लखीमपुर की घटना, भाजपा के “ सांप्रदायिकता” पर भारी है। किसान, पत्रकार और कुछ अन्य लोगों की हत्या की कथित साज़िश में केंद्र के मंत्री अजय मिश्रा “टेनी” के बेटे आशीष मिश्रा का नाम आने के बाद भी, मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं होने से किसान बेहद नाराज़ हैं। विपक्ष लखीमपुर कांड का समय-समय पर ज़िक्र करके, इस नाराज़गी को ख़त्म भी नहीं होने दे रहा है।

राजनीति के जानकार भी मानते हैं कि भाजपा इस बार “हिंदुत्व” को राजनीति के केंद्र में लाने में सफ़ल नहीं हो पा रही है। वरिष्ठ पत्रकार मुदित माथुर कहते हैं इस बार चुनाव महँगाई, किसान और बेरोज़गारी के मुद्दों पर होता दिख रहा है। माथुर के अनुसार “भाजपा की “सांप्रदायिकता”, विपक्ष द्वारा ओबीसी समाज की गोलबंदी और जन-मानस से जुड़े मुद्दों के आगे कमज़ोर हो गई है।”

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाली राजनीतिक विश्लेषक शहिरा नईम मानती है, “हिंदुत्व” की राजनीति जो बहुत तेज़ी से ऊपर जा रही थी, उसका पतन शुरू हो गया है। शहिरा कहती हैं कि “जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है, लेकिन विपक्ष को लगातार बेरोज़गारी-महंगाई और योगी सरकार के कोविड-19 कुप्रबंधन पर बात करते रहना होगा। वरना भाजपा को मौक़ा मिलते ही “हिंदुत्व” का मुद्दा दोबारा उभार देगी।”

फ़िलहाल विपक्ष चुनावों में भाजपा के “हिंदुत्व” के एजेंडे के सामने प्रदेश में बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई, महिलाओं उत्पीड़न, बिजली की क़ीमतें और ग्रामीण संकट (एमएसपी-आवारा पशु) को मुद्दा बनाने में सफ़ल रहा है। इन चुनावों में विपक्ष 2014 से भाजपा के साथ खड़े ग़ैर-यादव ओबीसी और ग़ैर-जाटव दलितों की को भगवा ख़ेमे से बाहर निकलने का प्रयास भी कर रहा है। अगर विपक्ष इसमें सफ़ल होता हैं तो न सिर्फ़ 10 मार्च के नतीजों पर इसका असर दिखेगा, बल्कि आने वाले कई वर्षों तक और विशेषकर 2024 के आम चुनावों में भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के नतीजों का असर देखने को मिलेगा।

ये भी पढ़ें: स्वामी प्रसाद मौर्य का जाना: ...फ़र्क़ साफ़ है

Uttar pradesh
UP Assembly Elections 2022
UP ELections 2022
Yogi Adityanath
BJP
AKHILESH YADAV
SP
RLD-SP Alliance

Related Stories

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

उपचुनाव:  6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में 23 जून को मतदान

सियासत: अखिलेश ने क्यों तय किया सांसद की जगह विधायक रहना!

विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया

पक्ष-प्रतिपक्ष: चुनाव नतीजे निराशाजनक ज़रूर हैं, पर निराशावाद का कोई कारण नहीं है

यूपी चुनाव नतीजे: कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम रहा जीत-हार का अंतर

यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान

BJP से हार के बाद बढ़ी Akhilesh और Priyanka की चुनौती !

यूपी के नए राजनीतिक परिदृश्य में बसपा की बहुजन राजनीति का हाशिये पर चले जाना


बाकी खबरें

  • air pollution
    भाषा
    वायु प्रदूषण को काबू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को आपात बैठक करने का निर्देश
    15 Nov 2021
    प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण की अगुवाई वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब और दिल्ली के संबंधित सचिवों को अदालत की तरफ से बनाई गई समिति के समक्ष अपने प्रतिवेदन देने के लिए बैठक में भाग लेने का…
  • ALTAF
    शिवम चतुर्वेदी
    कासगंज: क्या अल्ताफ़ पर लड़की भगाने का आरोप झूठा था? 
    15 Nov 2021
    लड़की के पिता पर आरोप है कि उन्होंने अपनी बेटी को कहीं भेजकर, अल्ताफ़ के ऊपर लड़की भगाने का आरोप मढ़ दिया।
  • Annapurna
    विजय विनीत
    स्पेशल रिपोर्टः बनारस में अन्नपूर्णा की खंडित मूर्ति की ब्रांडिंग, काशी विश्वनाथ के भक्त आहत
    15 Nov 2021
    बनारस में अन्नपूर्णा की खंडित मूर्ति स्थापित करने के मंसूबों को देखें तो साफ पता चलता है कि इसे स्थापित करने और कराने वाले लोग हिन्दू समाज के लोगों के सैंटिमेंट को भुनाने का मकसद रखते हैं।
  • salman khurshid book
    अनिल जैन
    हिंदुत्व की तुलना बोको हरम और ISIS से न करें तो फिर किससे करें?
    15 Nov 2021
    सलमान खुर्शीद की किताब 'सनराइज ओवर अयोध्या’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने विवाद खड़ा कर दिया है।
  • The Indian Agricultural Situation Must Not Be Misread
    प्रभात पटनायक
    खेती के संबंध में कुछ बड़ी भ्रांतियां और किसान आंदोलन पर उनका प्रभाव
    15 Nov 2021
    इनमें पहली भ्रांति तो इस धारणा में ही है कि खेती किसानी पर कॉर्पोरेट अतिक्रमण तो ऐसा मामला है जो बस कॉर्पोरेट और किसानों से ही संबंध रखता है। यह ग़लत है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License