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चुनाव 2022
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
यूपी चुनाव: राज्य के वित्तीय कुप्रबंधन की एक तस्वीर
जहां एक तरफ़ राज्य पर क़र्ज़ को बोझ बढ़ गया है, वहीं दूसरी तरफ़ यूपी सरकार के पास जो पैसे थे,वह उसे भी ख़र्च नहीं कर पा रही थी।
सुबोध वर्मा
25 Jan 2022
UP Polls

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार बाज़ार से इतना ज़्यादा उधार लेती रही है कि उसका कुल बकाया क़र्ज़ पांच सालों में तक़रीबन 40% तक बढ़ गया है। हैरानी की बात यह है कि इससे लोगों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ है। शिक्षा पर होने वाले ख़र्च में गिरावट आयी है, और स्वास्थ्य पर होने वाले ख़र्च में राजस्व व्यय के हिस्से के रूप में मामूली रूप से इज़ाफ़ा हुआ है।

इससे भी ज़्यादा अजीब हक़ीक़त तो यह है कि राज्य सरकार पांच में से चार सालों में उस पूरी बजट राशि को भी ख़र्च नहीं कर पायी, जिससे राजस्व अधिशेष (Revenue Surplus) हो गया। यह उसकी सोच के साथ-साथ व्यवहार के बीच के फ़र्क को भी दिखाता है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की ओर से योगी आदित्यनाथ की सरकार को दिया गया पूर्ण समर्थन, यानी कथित 'डबल इंजन' से मिला फ़ायदा भी इस वित्त या योजना के मामले में मदद नहीं कर पायी है।

राज्य सरकार पर तेज़ी से बढ़ता कर्ज़…

राज्य सरकार के वित्त का संकलन करने वाले भारतीय रिज़र्व बैंक के पास उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक़, जैसा कि वित्तीय साल 2021-22 में राज्य के बजट में अनुमान लगाया गया है कि यूपी सरकार पर 6.5 लाख करोड़ रुपये की बक़ाया देनदारियां हैं। यह 2017 में जब यह सरकार सत्ता में आयी थी, उस समय इसे विरासत में 4.7 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ मिला था,जो इस समय बढ़कर 38.3% ज़्यादा हो गया है। (नीचे चार्ट देखें)

इस क़र्ज़ का एक भारी भरकम हिस्सा बैंकों जैसे वित्तीय संस्थानों का है। इन्हें बाज़ार ऋण कहा जाता है और इन्हें भारी ब्याज़ दरों पर लिया जाता है। लेकिन, भुगतान भविष्य के लिए कुछ समय बाद किया जाता है, और भाजपा सरकार 'भविष्य के बजाय इस समय' के लिए ही यह क़र्ज़ ले रही है। मगर, इसे भविष्य की चिंता नहीं है। मिसाल के तौर पर, वित्त पर पिछले महीने जारी यूपी सरकार के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019-20 के आख़िर में कुल सार्वजनिक ऋण का 1.99 लाख करोड़ रुपये (या कुल का 47.7%) सात सालों के बाद देय होगा।

कैग की रिपोर्ट में हिसाब-किताब की गड़बड़ियां उजागर…

पहले जिस कैग रिपोर्ट का ज़िक़्र किया गया, उसमें चौंकाने वाला ख़ुलासा हुआ है। योगी सरकार ने मार्च 2020 में अपने बहीखाते में अवैध रूप से एक डूबती हुई निधि (Sinking Fund) से 71,000 करोड़ रुपये अपने “ग़ैर-कर राजस्व” मद में स्थानांतरित कर दिये। नियमों के मुताबिक़ इसे कहीं और लगाया जाना चाहिए था।

सीएजी ने इस खुलेआम हुए उल्लंघन की पूरी तरह आलोचना करते हुए सिफारिश की है कि "इस निधि (डूबती हुई निधि) से किये गये हस्तांतरण को बतौर राजस्व प्राप्तियां नहीं माना जाना चाहिए और चुकाये गये क़र्ज़ के बराबर की राशि वाले ऋण की अदायगी पर डूबती निधि से प्रमुख मदों 8680 (विविध सरकारी खाता) में स्थानांतरित की जानी चाहिए।

इस 'गड़बड़ी' वाले हिसाब-किताब का असर यह रहा कि वास्तव में कोई नक़दी हस्तांतरित नहीं हुई थी, बल्कि राजस्व प्राप्तियों को सिर्फ़ बहीखातों में बढ़ाया गया था। यही अगले साल के राजस्व अधिशेष (नीचे देखें) का कारण था।

…बल्कि सरकार तो ख़र्च भी करना नहीं जानती

कुछ राज्यों की यह ख़ासियत होती है कि उनके वित्तीय साल अपने बजटीय आवंटन की बड़ी राशि को बिना ख़र्च किये ही बीत जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि a) वे नहीं जानते कि किस पैसे को किस तरह ख़र्च करना है; और b) जितना संभव हो, उतना सरकारी धन को बचाये जाने की कोशिश वाली उनकी हठधर्मिता ने उनकी सोच को ग़ुलाम बना रखा है। ख़ासकर ग़रीब और पिछड़े राज्य इस विकृत सोच के शिकार होते हैं। उत्तरप्रदेश इसका कोई अपवाद नहीं है।

जैसा कि नीचे दिया गया चार्ट दिखाता है कि मुख्यमंत्री योगी की अगुवाई में पांच में से चार सालों में राजस्व अधिशेष 1.32 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ गया है!  ग़ौरतलब है कि वित्तीय साल 2021-22 के लिए दिया गया यह आंकड़ा बजट में पेश किया गया अनुमान मात्र है, और वास्तविक राशि इससे कहीं ज़्यादा भी हो सकती है। यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि डूबती निधि के पैसे को ग़ैर-कर राजस्व खाते में अवैध हस्तांतरण को छोड़कर यह घाटा और भी बड़ा होता।

साल 2020-21 कोविड महामारी का पहला साल था और कुछ अतिरिक्त ख़र्च हुआ था। ऐसे में राज्य सरकार ने वास्तव में अपने सभी आवंटित धन को ख़र्च कर दिया था और 13,161 करोड़ रुपये का एक छोटा सा घाटा चल रहा था।

बड़ा मुद्दा यह है कि उस भारी-भरकम क़र्ज़ का का क्या होगा, जिसे इन सालों में योगी सरकार ने अपने ऊपर लाद लिया है। एक ओर, यह भारी उधार ले रहा था, शायद इसलिए कि यह राज्य के विकास पर पैसा ख़र्च करने जा रहा था।

लेकिन,घोर आश्चर्य!  पांच सालों में 1.8 लाख करोड़ रुपये उधार लेने के बावजूद योगी सरकार ने 1.32 लाख करोड़ रुपये के संचित राजस्व अधिशेष, यानी बिना ख़र्च की गयी राशि के साथ अपना यह कार्यकाल पूरा कर लिया है! ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह ख़राब योजना का नीताजा है? या फिर पैसा कहीं और जा रहा है?

शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च

आइये, हम उन दो प्रमुख मुद्दों पर नज़र डालें, जहां सार्वजनिक ख़र्च सबसे ज़रूरी होता है, ये दो मद हैं- शिक्षा और स्वास्थ्य। कुल राजस्व व्यय के अनुपात के रूप में शिक्षा पर ख़र्च किया गया हिस्सा साल 2017-18 में ख़र्च किये गये अनुपात, यानी तक़रीबन 14.8% से कम हो गया है, उस साल योगी ने पदभार संभाला था और चालू वित्त वर्ष के लिए बजट अनुमान (BE) 12.5 फ़ीसदी था (नीचे चार्ट देखें)। उस दौरान योगी सरकार ने बहुत पैसा बचाया, जब 2020-21 में राज्य के छात्र महामारी के दौरान अपनी पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहे थे, स्कूल/कॉलेज और छात्रावास बंद थे और ऑनलाइन मोड ही पढ़ाई का अहम तरीक़ा बन गया था। दूसरा रास्ता तो यही होना चाहिए था कि छात्रों को हो रहे अकादमिक नुक़सान की भरपाई के लिए ज़्यादा ख़र्च किये जाने की ज़रूरत थी। दरअसल, शिक्षकों को वेतन नहीं दिया गया, कर्मचारियों को वेतन से वंचित कर दिया गया, मिड-डे मिल बंद कर दिया गया था। अब, जबकि अहम विधानसभा चुनाव सामने दिख रहे हैं, तो सरकार दो सालों तक भरपाई नहीं किये जाने वाले नुक़सान झेल चुके छात्रों को स्मार्ट फ़ोन और टैबलेट वितरित करने में व्यस्त है।

कुल राजस्व व्यय में स्वास्थ्य व्यय की हिस्सेदारी में 2017-18 के 5.3% से 2021-22 (BE) में 5.9% तक की मामूली बढ़ोत्तरी ज़्यादा परेशान करने वाली बात है। ग़ौरतलब है कि ये दो साल वे साल हैं, जिनमें महामारी के सबसे घातक क़हर देखे गये। सरकारी अनुमानों के मुताबिक़ 19 लाख से ज़्यादा लोगों के कोविड से संक्रमित होने की पुष्टि हुई और 23,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गयी। दूसरे स्वतंत्र अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि 24 ज़िलों में किये गये एक अध्ययन के मुताबिक़, यूपी में सिर्फ़ 2020 में कोविड से मरने वालों की संख्या 43 गुना ज़्यादा थी।

आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि महामारी से निपटने के लिए यूपी में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली दुखद रूप से नाकाफ़ी है। अगर योगी सरकार और अधिक धनराशि आवंटित करती और उसका इस्तेमाल करती, या फिर "डबल इंजन" वाली इस सरकार को केंद्र की मोदी सरकार के दूसरे इंजन से मदद मिल पाती,तो यह सब टाला जा सकता था।

इस बरपायी गयी तबाही के सिलसिले में यूपी की योगी सरकार की चली गयी इस गंदी चाल का परेशान करने वाला पहलू यह है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी मेडिकल कॉलेजों, रिसर्च सेंटरों, एक्सप्रेसवे और सिंचाई प्रणाली के शिलान्यासों और उद्घाटनों, छात्रों को बांटे जाने वाले टैबलेट की शुरुआत करते हुए ख़र्च की झरी लगाते चले गये। इस पर आने वाले ख़र्च का अनुमान 1 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है।

साढ़े चार साल तक राज्य की विशाल आबादी को बुनियादी सुविधाओं से वंचित करना और फिर आख़िरी वक़्त में ख़र्च करके उनके मन को जीतने की कोशिश करना, सही मायने में अवसरवाद की एक परेशान कर देने वाले रवैये को दिखाता है। आने वाले विधानसभा चुनाव से ही पता चल पायेगा कि लोग इस विडंबना भरी चीज़ों को लेकर क्या सोचते हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

UP Polls: State Finances – A Portrait of Mismanagement

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UP Education
CAG report
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