NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूपी: डूबती भाजपा को तालिबान का सहारा!
भाजपा को चुनाव में तालिबान के मुद्दे का सहारा लेना पड़ रहा। इससे साफ़ है कि उसे अपनी जमीनी स्थिति का अंदाजा हो गया है।
अफ़ज़ल इमाम
24 Aug 2021
यूपी: डूबती भाजपा को तालिबान का सहारा!
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार: The Financial Express

तालिबान के बहाने गोदी मीडिया जिस तरह से भारतीय मुसलमानों पर सवाल खड़े कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को खाद-पानी देने की कोशिश में जुट गया है, उससे लगता है कि सरकार को अपने कामकाज पर भरोसा नहीं है और वह किसानों के आंदोलन से दहली हुई है। दूसरे कोरोना काल में जान-माल का भारी नुकसान झेल चुकी आम जनता अब बेतहाशा बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी त्रस्त है। भविष्य में भी उसे अपनी तकलीफें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। सरकार और भाजपा के रणनीतिकार इस जमीनी सच्चाई को अच्छी तरह समझ रहे हैं।

ध्यान रहे कि जब से किसानों ने यह घोषणा की है कि वे चुनाव के दौरान यूपी के गांव-गांव में अपना अभियान शुरू करेंगे, तब से गोदी मीडिया में उन सभी गैरजरूरी मुद्दों पर बहस तेज हो गई है, जो ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए जमीन तैयार करते हैं।

पिछले तीन माह के दौरान छोड़े गए शगूफों पर एक नजर डालें तो पूरी तस्वीर अपने आप साफ हो जाती है। मसलन जून के पहले हफ्ते में सहारनपुर में एक हैंडपंप को हिंदू- मुस्लिम का विवाद बना दिया गया और इस पर खूब हंगामा हुआ। फिर इसी बीच गाजियाबाद में एक बुजुर्ग दाढ़ी काटने की घटना हुई और साथ ही साथ यूपी में रोहिंग्या घुसपैठ का भी मामला उछाला गया। इसके बाद उमर गौतम और मुफ्ती जहांगीर कासमी नाम के दो लोगों की गिरफ्तारी हुई और धर्मांतरण पर जोरशोर से बहस शुरू हो गई। दावा किया गया कि धर्मांतरण का रैकेट बहुत बड़ा है, जिसमें 100 लोग शामिल थे और करीब 1,000 लोगों का धर्म परिवर्तन कराया गया है, लेकिन वे कौन लोग थे और इस मामले की जांच में क्या निकला? किसी को पता नहीं है। वैसे धर्मांतरण व लव जिहाद गोदी मीडिया के प्रिय व सदाबहार मुद्दे हैं, जिन पर हर तीसरे-चौथे दिन एक सोची-समझी रणनीति के तहत टीवी डिबेट कराई जाती है।

बहरहाल, इसके बाद जुलाई के पहले हफ्ते में यूपी एटीएस ने काकोरी में दो लोगों को पकड़ा जिनके बारे में बताया गया कि अलकायदा से जुड़े आतंकवादी हैं। ठीक इसी समय पर जनसंख्या नीति का ड्राफ्ट भी आ गया और फिर इन दोनों मुद्दों पर जोरशोर से खबरों व डिबेट्स का सिलसिला शुरू हो गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि आतंकवादी या डाकू पकड़े जाते हैं या कोई अन्य घटना होती है तो उसकी खबरें देना और विश्लेषण करना मीडिया का काम व उसका अधिकार है, लेकिन जब उसकी आड़ में राजनीतिक एजेंडा चलाया जाता है और वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए समाज के किसी वर्ग को निशाना बनाया जाता है तो उससे सामाजिक एकता तो चोट पहुंचती है। वर्तमान में तो तालिबान मुद्दा है, लेकिन करीब 3 माह पहले फिलिस्तीन था।

मई में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जब देश में आक्सीजन के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी तो ठीक उसी समय इजरायल ने हमास को निशाना बनाने के बहाने फिलिस्तीन पर बड़े हमले किए थे, जिसमें वहां के कई मासूम नागरिकों और बच्चों की भी जाने गई थीं। उस समय भारत में कुछ टीवी चैनल निहत्थे फिलिस्तीनियों को आतंकवादी और इजरायलियों को महान व शूरवीर साबित करने में जुटे थे। वे यह भी भूल गए कि फरवरी 2018 में ही पीएम मोदी ने फिलिस्तीन का दौरा किया था, जिसमें दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत बनाने की बात हुई थी। दूसरे आज तक किसी फिलिस्तीनी की जुबान से भारत के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुना गया है। फिर फिलिस्तीनियों को प्रति नफरत का यह भाव क्यों?

वैसे यह मसला सिर्फ मुसलमानों व अन्य धर्मिक अल्पसंखयकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक उदाहरण दलितों और विशेषरूप से भीमा कोरेगांव के मामले में भी देखा जा सकता है। स्थिति तो अब यहां तक पहुंच गई है कि कानपुर में रिक्शा चालक की पिटाई हो य़ा दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुई भड़काऊ नारेबाजी, इस जैसी घटनाएं इतनी आम हो गईं हैं कि अब लोग भी इन पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देते हैं। जिलों व जगहों के नाम बदलना तो रूटीन के कार्यक्रम जैसा हो गया है। कहा जा रहा है कि सज्जाद नौमानी और शफीकुर्ररहमान बर्क जैसे लोगों ने अपनी दुकान चमकाने के लिए जो निजी टिप्पणियां की है, उससे मामले ने तूल पकड़ लिया है। वैसे इन दोनों लोगों ने कुछ न भी बोला होता तो भी इस चुनावी मौसम में किसी न किसी रूप में तो इसे होना ही था।

उपरोक्त मुद्दे भले ही पुराने व घिसे-पिटे लगते हों, लेकिन यह ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ाने के लिए ‘टूलकिट’ की तरह काम करते हैं, हालांकि कुछ राज्यों में यह विफल भी हुए हैं। दिल्ली और प. बंगाल विधानसभा चुनाव इसका बड़ा उदाहरण हैं। दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान ‘गोली मारो...’ जैसे नारे लगे और बटन दबाकर शाहीनबाग आंदोलन को करंट का झटका देने समेत तमाम किस्म की बातें कहीं गई, लेकिन जनता ने वही किया जो उसे बेहतर लगा। इसी तरह प. बंगाल के चुनाव में भी ध्रुवीकरण के लिए भरसक प्रयास किए गए, लेकिन जनता ने उसे उस पर कोई तवज्जों नहीं दी। अब यूपी जैसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य में चुनाव होने वाला है, जिसमें पीएम मोदी, सीएम योगी समेत समूची भाजपा की साख दांव पर लगी हुई है। यदि यहां वह चुनाव हार जाती है और अन्य राज्यों में भी उसकी सीटें घटती हैं, तो वर्ष 2022 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के प्रत्याशी की राह मुश्किल हो जाएगी।

यही कारण है कि पार्टी ने राज्य में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी है। एक तरफ उसने यूपी के कुछ ओबीसी व दलित नेताओं को केंद्र में मंत्री पद दिया है तो यूपी की योगी कैबिनेट को लेकर कुछ इसी तरह की तैयारी है। चर्चा है कि कुछ ब्राह्मण चेहरों को भी कैबिनेट में जगह दी जाएगी, ताकि इस वर्ग के वोटरों की नारजगी दूर हो सके। ओबीसी आरक्षण से संबंधित कानून भी पारित करवा दिया है। टीवी व अखबार से लेकर रेलवे और बस स्टेशनों पर 4 लाख नौकरी, मुफ्त राशन व वैक्सीन और यूपी नं-1 के नारे वाले के विज्ञापनों की भरमार है। यहां तक दूसरे राज्यों में भी यूपी सरकार की होर्डिंग लगवा दी गई हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद यदि भाजपा को चुनाव में तालिबान के मुद्दे का सहारा लेना पड़ रहा तो इससे साफ है कि उसे अपनी जमीनी स्थिति का अंदाजा हो गया है।

रहा सवाल अफगानिस्तान के घटनाक्रम का तो उसे लेकर भारत समेत पूरी दुनिया में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, बहुलवाद, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति तालिबान के बारे में चिंतित है। इसके इतिहास को देखते हुए कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि तालिबान अभी बदलने वाला है। पूरी दुनिया देख रही है कि वह अफगानों, विशेषकर महिलाओं और देश की विविध आबादी के साथ कैसा व्यवहार करता है, जो निश्चित रूप से इसके उदय का विरोध करेंगे।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

UttarPradesh
UP ELections 2022
BJP
Yogi Adityanath
TALIBAN
Afghanistan
communal politics
Religion Politics
Indian Muslims
Media
Godi Media

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल


बाकी खबरें

  • CARTOON
    आज का कार्टून
    प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?
    27 Apr 2022
    मुख्यमंत्रियों संग संवाद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य सरकारों से पेट्रोल-डीज़ल के दामों पर टैक्स कम करने की बात कही।
  • JAHANGEERPURI
    नाज़मा ख़ान
    जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी
    27 Apr 2022
    अकबरी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था न ही ये विश्वास कि सब ठीक हो जाएगा और न ही ये कि मैं उनको मुआवज़ा दिलाने की हैसियत रखती हूं। मुझे उनकी डबडबाई आँखों से नज़र चुरा कर चले जाना था।
  • बिहारः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए वाहनों में वीएलटीडी व इमरजेंसी बटन की व्यवस्था
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए वाहनों में वीएलटीडी व इमरजेंसी बटन की व्यवस्था
    27 Apr 2022
    वाहनों में महिलाओं को बेहतर सुरक्षा देने के उद्देश्य से निर्भया सेफ्टी मॉडल तैयार किया गया है। इस ख़ास मॉडल से सार्वजनिक वाहनों से यात्रा करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी।
  • श्रीलंका का आर्थिक संकट : असली दोषी कौन?
    प्रभात पटनायक
    श्रीलंका का आर्थिक संकट : असली दोषी कौन?
    27 Apr 2022
    श्रीलंका के संकट की सारी की सारी व्याख्याओं की समस्या यह है कि उनमें, श्रीलंका के संकट को भड़काने में नवउदारवाद की भूमिका को पूरी तरह से अनदेखा ही कर दिया जाता है।
  • israel
    एम के भद्रकुमार
    अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात
    27 Apr 2022
    रविवार को इज़राइली प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के साथ जो बाइडेन की फोन पर हुई बातचीत के गहरे मायने हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License