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यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं
राज्य भर के हज़ारों परिवारों को मुआवज़ा मिलने के कोई आसार नहीं हैं, क्योंकि लोगों के पास स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच नहीं है और इसलिए, कोविड-19 संक्रमण के कारण हुई मौत का वे "सबूत" नहीं दे सकते।
तारिक़ अनवर
15 Feb 2022
Gyana devi
ज्ञाना देवी

नई दिल्ली/बांदा (उत्तर प्रदेश): वह बोलने की कोशिश तो करती हैं, लेकिन उनकी आवाज़ निकल नहीं पाती। एक गहरी सांस लेते हुए वह फिर से कोशिश करती हैं, लेकिन नहीं बोल पाती हैं। वह अपने चेहरे पर लुढ़कते आंसुओं को छिपाने के लिए नज़रें मिलाने से बचती हैं। लंबे समय तक भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ रहती हैं और आख़िरकार वह टूट जाती हैं। 30 साल की कुसुम कली अपने 35 साल के पति श्याम लाल की मौत के बाद पैदा हुई परिस्थितियों से बहादुरी के साथ लड़ रही हैं। लेकिन, कभी-कभी पति की याद में वह विह्वल हो उठती हैं।

उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले के अतर्रा के राज नगर के रहने वाले लाल एक दिहाड़ी मज़दूर थे। हर दिन 1,000 से 1,200 रुपये कमा लेते थे। उनमें मई, 2021 के आख़िरी हफ़्ते में कोविड -19 के लक्षण दिखने शुरू हो गये थे।

कली ने बताया, "एक शादी समारोह में शामिल होने के बाद वह बीमार पड़ गये थे। उन्हें कुछ दिनों से खांसी और जुकाम था। चूंकि उस समय कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर चल रही थी, इसलिए एक स्थानीय एमबीबीएस डॉक्टर से उन्होंने सलाह ली, और डॉक्टर ने उन्हें वायरस का परीक्षण करवाने के  लिए कहा। डॉक्टर को आशंका थी कि परिवार समारोह में वह किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आये होंगे। ”

डॉक्टर की सलाह के मुताबिक़ वह अगले दिन सरकारी अस्पताल में टेस्ट करवाने गये। कली ने बताया, “खांसी और सर्दी के अलावा, उन्हें और कोई समस्या नहीं थी। रास्ते में उन्हें सांस लेने में तकलीफ़ की शिकायत होने लगी। जब हम अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें सांस लेने में काफ़ी दिक़्क़त हो रही थी। लेकिन, अस्पताल में ऑक्सीज़न नहीं थी। अगले कुछ घंटों में ही 31 मई, 2021 को उनकी मौत हो गयी।”

हालांकि, उनके मृत्यु प्रमाण पत्र में साफ़ तौर पर इस बात का ज़िक़्र नहीं है कि उनकी मौत कोविड-19 से हुई थी, लेकिन उनकी मौत की जो परिस्थितियों थीं, उनसे और कोई दूसरा निष्कर्ष निकाला भी नहीं जा सकता था।

उनके परिवार में उनकी पत्नी, 10 साल की तीन बेटियां और 14 साल का एक बेटा है। जैसा कि पिछले साल अक्टूबर में राज्य सरकार की ओर से कोविड-19 से मरने वालों के लिए सहायता अनुदान राशि की घोषणा की गयी थी, लेकिन उनके परिवार को यह 50,000 रुपये की सहायता राशि नहीं मिल पायी है। सरकार को ऐसे परिवारों को वित्तीय सहायता दिये जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इसका ऐलान करना पड़ा था।

कली को मुआवज़ा की वह राशि पाने के लिए उस मृत्यु प्रमाण पत्र को पेश करने की ज़रूरत थी, जिसमें एक निर्धारित फ़ॉर्मेट में इस बात का ज़िक़्र होना चाहिए था कि उनकी मौत की वजह कोविड -19 थी। उन पैसों का दावा करने के नियमों के मुताबिक़, यह मौत टेस्ट में बीमारी पोज़िटिव पाये जाने के 30 दिनों के भीतर होनी चाहिए। लेकिन,बाद में जब इसे लेकर शोर-शराबा हुआ और बाक़ी रोगियों(जो 30 दिनों तक अस्पताल में थे, लेकिन छुट्टी के बाद मर गये थे)  के परिजन को भी बाद में इस राशि को पाने की मंज़ूरी दे दी गयी। इसके अलावे, अगर मृत्यु प्रमाण पत्र में कारण के रूप में कोविड का ज़िक़्र नहीं किया गया हो, तो एक आरटी-पीसीआर या रैपिड एंटीजन परीक्षण या संक्रमण को साबित करती जांच ही पर्याप्त थी।

लेकिन, इन दिशानिर्देशों से भी कली की मदद नहीं होने वाली है। वह जांच में पोज़िटिव पाये जाने, अस्पताल में दाखिल होने के सुबूत या कोविड -19 की पुष्टि करते मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना दावा नहीं कर सकतीं।

कोविड-19 की दूसरी लहर ने पिछले साल अप्रैल से जुलाई तक पूरे देश में क़हर बरपा दिया था। यह उस पहली लहर के मुक़ाबले घातक थी, जो मार्च 2020 से शुरू हुई थी। एक अनुमान से पता चलता है कि जून 2020 और जुलाई 2021 के बीच 32 लाख लोगों की कोविड से हुई मौतों में से 27 लाख मौतें अप्रैल-जुलाई 2021 में हुई थीं। उस अध्ययन के हिसाब से सितंबर 2021 तक भारत में कोविड से हुई कुल मौत आधिकारिक रिपोर्ट के मुक़ाबले छह से सात गुना ज़्यादा थी।

इसमें इस बात का विश्लेषण किया गया कि "भारत की आधिकारिक संख्या में इन मौतों की पर्याप्त रूप से कम रिपोर्टिंग" हुई थी। जहां देश भर में मौत की इन संख्याओं को कम करके बताया गया, वहीं इस विश्लेषण में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में तो इन मौतों की संख्या और भी बहुत बड़ी थी। उत्तर प्रदेश के 75 ज़िलों में से 24 ज़िलों में कोविड-19 से हुई मौत आधिकारिक संख्या((मार्च 2021 के अंत तक 4,537) से 43 गुना ज़्यादा थी।  

हालांकि, सरकार इससे इनकार करती है। यहां तक कि 12 फ़रवरी, 2022 तक कोविड से मरने वालों की संख्या 5,07,981 तक पहुंच गयी है।

हालांकि,सरकार ने पहले ही दिशानिर्देश जारी कर दिये हैं, लेकिन कली जैसे लोग, जिन्हें इस मुआवज़े की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, इस मुआवज़े से वंचित रह सकती हैं।

पति की मौत के बाद वह गुज़ारा करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं। वह इस समय एक निर्माण मज़दूर के रूप में काम कर रही हैं और उन्हें हर दिन 250 रुपये मिलते हैं। लेकिन, उन्हें रोज़-रोज़ काम नहीं मिलता है। उन्होंने बताया,“औसतन मुझे महीने में 10 दिन से ज़्यादा का काम नहीं मिलता। पांच लोगों के परिवार का भरण-पोषण करने के लिहाज़ से यह मज़दूरी बहुत कम और अपर्याप्त है।”

कली का बड़ा बेटा ग्यारहवीं में पढ़ता है। बाक़ी तीन बच्चे भी एक स्थानीय प्राइवेट स्कूल में जाते हैं। उन्होंने बताया,"जहां तक हो सकीन, हम कोशिश करी हौं, पढाई हों (मैं उनकी शिक्षा जारी रखने के लिए हर संभव कोशिश करूंगी)।" साहस बटोरते हुए उन्होंने कहा कि वह अपने सभी बच्चों को कम से कम हाई स्कूल की पढ़ाई को सुनिश्चित करेंगी।

40 साल के भीकम उम्र के प्रजापति उर्फ़ श्रवण भी कोविड-19 के परीक्षण में पोज़िटिव पाये गये थे, लेकिन उन्हें सरकारी अस्पताल में दाखिला नहीं मिला। उन्हें बांदा के अतर्रा के लालथोक स्थित उनके घर पर आइसोलेशन कर रखा गया था, जहां उन्हें नगर निगम की ओर से शुरुआती दवायें और स्वास्थ्य सेवा उपबल्ध करायी गयी थी। लेकिन,15 दिनों  बाद (28 मार्च, 2021) ही उनका निधन हो गया।

उनकी 35 साल की विधवा, ज्ञान देवी के पास यह साबित करने वाले दस्तावेज़ होने के बावजूद अब तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है कि भीकम प्रजापति,उर्फ़ श्रवण की मौत कोविड-19 संक्रमण के बाद हुई थी। दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करने वाले श्रवण को स्थानीय मंडी (बाज़ार) में अनाज की भारी बोरी ढोने के दौरान हुई दुर्घटना के बाद एक साल से लकवा मारे हुआ था।

देवी अब आठ लोगों के परिवार की वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करती हैं। वह रोज़ाना 200-500 रुपये कमाने के लिए सब्ज़ियां बेचती हैं। उनका सबसे बड़ा बेटा, शिव मोहन प्रजापति एक दिहाड़ी मज़दूर हैं और वह सब्ज़ियों की ख़रीदने और ढोने में अपनी मां की मदद करते हैं।

उनके दूसरे बेटे परशुराम प्रजापति एक सरकारी स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ते हैं। परिवार की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें भी कभी-कभी निर्माण मज़दूर के तौर पर काम करना पड़ता है।

पूरे परिवार ने 2017 के विधानसभा चुनाव और 2014 और 2019 के संसदीय चुनावों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) को वोट दिया था। सरकार पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा,’हमें इस फ़ैसले पर अफ़सोस है, क्योंकि सरकार ने ज़रूरत के समय में हमारे जैसे गरीब और वंचित लोगों को पूरी तरह से हालात के हवाले छोड़ दिया। "

उनकी 20 साल की इकलौती बेटी पुष्पा को दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी।

48 साल के जगदीश प्रसाद गर्ग को भी वे ही तमाम लक्षण (बुखार, खांसी और सर्दी, और सांस लेने में मुश्किल) थे, लेकिन उनका परिवार भी इस बात का दावा नहीं कर सकता कि उनकी मौत कोविड -19 से ही हुई थी, क्योंकि स्थानीय सरकारी अस्पताल ले जाते समय एक-एक सांस से जूझते हुए उनकी मौत हो गयी थी।

बांदा ज़िले के अतर्रा ग्रामीण के ही गर्गन पुरवा के रहने वाले गर्ग सांस फूलने की शिकायत के बाद स्थानीय डॉक्टरों के पास चले गये थे। उनका किसी भी तरह के इलाज किये जाने से इनकार कर दिया गया और अतर्रा के सरकारी अस्पताल में रेफ़र कर दिया गया, जहां भर्ती होने से पहले ही उनकी मौत हो गयी थी।

उनके पास ऐसा एक भी ऐसा सहायक दस्तावेज़ नहीं है,जिससे कि यह साबित किया जा सके कि उनकी मौत कोविड -19 से हुई है, ऐसे में उनकी 46 साल की विधवा,रमा देवी को भी सरकार से एक पैसा नहीं मिल पाया है।

उनके परिवार में पांच लोग हैं। उनकी दो बेटियों की शादी होना अभी बाक़ी है। स्कूल बस चलाने वाला उनका इकलौता बेटा पिछले दो सालों से कोविड -19 लॉकडाउन के हिस्से के रूप में स्कूलों के बंद होने से बेकार बैठा है। उनका इकलौता पोता दिल की बीमारी से पीड़ित है।पोते के इलाज में परिवार की रही-सही बचत भी ख़त्म हो चुकी है और परिवार इस समय क़र्ज़ में है।

मृतक जहां अपनी छोटी सी पान की दुकान से रोज़-ब-रोज़ की ज़रूरतों के लिहाज़ से कुछ कमा लेता था, वहीं उनका 27 साल का बेटा बृजेश गर्ग 5,000 रुपये मासिक वेतन पर कहीं काम कर रहा था। परिवार के पास एक बीघा (0.61 एकड़) ज़मीन है।

रमा देवी ने अपने परिवार की बदहाली का ज़िक़्र करते हुए बताया, “उनके जाने के बाद मेरा जीने का आधार ही ख़त्म हो गया है। मैं अब बहुत बेबस महसूस कर रही हूं। जब तक वह ज़िंदा रहे, मैंने कभी भी गुज़ारे के लिए संघर्ष नहीं किया। महज़ दो साल के मेरे इकलौते पोते के इलाज पर होने वाले ख़र्च की वजह से हम पर 3 लाख रुपये के कर्ज के बोझ तले है। पिछले साल दिसंबर में लगातार बारिश हुई थी,इससे हमारी ज़मीन के छोटे से हिस्से पर बोयी गयी गेहूं की फ़सल तबाह हो गयी थी। सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिल पा रही है।"

रमा देवी

राज्य सरकार में उच्च पद पर बैठे एक अधिकारी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि सरकार से मुआवज़ा पाने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ पेश करना अनिवार्य है।उन्होंने कहा, “सरकार ने सिर्फ़ कोविड-19 से मरने वालों के लिए ही इस मुआवज़े का ऐलान  किया था। इसलिए, दावेदारों के लिए मौत के कारण को साबित करना अनिवार्य है, क्योंकि लोग तो दूसरी वजह से भी मरते हैं।”

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में भी टेस्टिंग हो रही थी। हालांकि, दूसरी कोविड लहर के दौरान राज्य के भीतरी इलाकों में परीक्षण सुविधाओं की कमी की ख़बरें ज़रूर थीं। लेकिन,मई 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परीक्षण और उपचार सुविधाओं और मरने वालों की संख्या को लेकर तथ्य छिपाने के सिलसिले मं राज्य की योगी सरकार को फटकार लगायी थी।

राज्य भर के हज़ारों परिवारों को इस मुआवज़े के मिलने के कोई आसार नहीं दिखते, क्योंकि लोगों के पास स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच ही नहीं है। ज़ाहिर है, ऐसे में सभी मौतें एक सी हो जाती हैं। लेकिन, कुछ मौतें तो दूसरों के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा ही समान होते हैं।

ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल की जनवरी 2022 की ‘इनइक्वलिटी किल्सट’ शीर्षक वाली रिपोर्ट से पता चलता है कि है कि भारत में 84 प्रतिशत परिवारों में महामारी की शुरुआत में उनकी आय में तेज़ी से गिरावट आयी थी। अमेरिका स्थित प्यू रिसर्च सेंटर की ओर से तैयार की गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2020 में देश के मध्यम वर्ग की संख्या में तक़रीबन 3.2 करोड़ की कमी आयी थी, जबकि इसमें अनुमान लगाया गया है कि 2 अमेरिकी डॉलर या उससे कम की दैनिक आय वाले ग़रीब लोगों की संख्या में 7.5 करोड़ का इज़ाफ़ा हो गया था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/elections-without-any-help-govt-covid-widows-struggle-make-ends-meet

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