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भारत
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यूपी: फिर मंडराया बाढ़ का ख़तरा, कई ज़िले हर साल होते हैं बुरी तरह प्रभावित, ग्रामीण झेलते हैं विस्थापन का दर्द
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि नदी के कटाव से हर साल भारी नुकसान होता है। खेत-खलियान, घेर-घर समेत गांव के गांव जलमग्न हो जाते हैं।
अब्दुल अलीम जाफ़री
23 Jun 2021
यूपी: फिर मंडराया बाढ़ का ख़तरा, कई ज़िले हर साल होते हैं बुरी तरह प्रभावित, ग्रामीण झेलते हैं विस्थापन का दर्द
तस्वीर साभार: बिजनेस स्टैंडर्ड

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में राप्ती नदी के पास स्थित जगदीशपुर गाँव में पिछले दस सालों में बाढ़ के कारण सौ से अधिक घर बाढ़ में जलमग्न हो चुके हैं, जिसके चलते कई परिवारों को कहीं और जाकर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यूपी के कई ज़िलों में नदियों के किनारे बसे गांवों की हर साल की यही कहानी है। बरसात में नदी का जलस्तर बढ़ता है और गांव के गांव जलमग्न हो जाते हैं। खेत-खलियान, मकान सब बर्बाद हो जाते हैं।

गोरखपुर के जगदीशपुर गांव में तकरीबन 125 घर थे, जिनमें से 105 घर पिछले 10 वर्षों में राप्ती नदी के तेज बहाव में जलमग्न हो चुके हैं। कई वर्षों से नदियों के इस कटाव ने बाकी के बचे घरों और आसपास के गाँवों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है, क्योंकि नदी की धारा की दूरी अब इन घरों से मात्र 10 से 15 मीटर की रह गई है।

ग्रामीणों का दावा था कि प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं द्वारा कई दफा गाँव का दौरा किया जा चुका है, मानो यह कोई “पिकनिक स्पॉट” हो, लेकिन पिछले 10 वर्षों में गाँव और उनके जीवन को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो उनके गाँव का अस्तित्व खतरे में नहीं होता।

गाँव के एक निवासी संतोष भारती ने न्यूज़क्लिक को बताया “दस वर्षों की अवधि कोई कम समय नहीं होता, हमारी आँखों के सामने एक-एक करके अकेले जगदीशपुर गाँव में 105 घर जलमग्न हो गये। इस घोर लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा?” उन्होंने आगे बताया कि किसी समय वे बड़े किसान थे लेकिन नदी के कटाव और “सरकारी नीतियों” ने उन्हें भूमिहीन बना दिया है, जिसके चलते अब वे लुढ़ककर प्रवासी मजदूरों की श्रेणी में पहुँच गए हैं।

भारती ने कहा कि जिला प्रशासन ने एक बार फिर से ग्रामीणों को गाँव खाली करने और कहीं और जाकर शरण लेने के लिए कहा है। भारती आगे बताते हैं “प्रशासन हर बार यही कहता था कि गाँव को बचाने के प्रयास किये जा रहे हैं और कभी-कभार वे इस बात का भी दावा करते हैं कि लोगों को कहीं और ले जाकर बसाया जायेगा। इस बचाने और बसाने की प्रक्रिया में सारा गाँव तबाह हो गया है।”

एक प्रवासी श्रमिक, रामाश्रय जिनका घर बहराइच जिले में घाघरा नदी के पास है ने बताया, “पिछले दस वर्षों में हमने दो अलग-अलग जगहों पर शरण ली है और अब बाढ़ और सरकार की विफलता के कारण हम एक बार फिर से कहीं और जाकर बसने के लिए मजबूर हैं।”

बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि कटाव से सबसे पहले कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा और अब यह उनके आवासीय भूमि के लिए खतरा बना हुआ है। बाराबंकी के एक अन्य ग्रामीण सतेन्द्र, जो कुछ इसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया “पहले ही हम दो बार अपने घर को स्थानांतरित कर चुके हैं। गरीबी और खानाबदोशों की तरह जीवन बिताना अब हमारी जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है।”

उन्होंने आगे बताया “मैंने चार साल पहले अपनी मेहनत की कमाई से जमीन के कुछ छोटे-छोटे टुकड़े ख़रीदे थे, लेकिन नदी ने उस जमीन को निगल लिया।”

बाराबंकी, सीतापुर और बहराइच जिले भी कुछ इसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं, जहाँ सरयू और घाघरा नदियों ने पिछले कुछ वर्षों में भारी तबाही मचा रखी है। भूमि के कटाव के चलते पलायन में तेजी से वृद्धि हुई है क्योंकि खेती योग्य भूमि सिकुड़ चुकी है। जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के मुताबिक, लगभग 70% से 80% लोग अपनी आजीविका की खातिर पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों में पलायन करते हैं।

सीतापुर स्थित एक सामाजिक कार्यकर्ता, ऋचा सिंह ने न्यूज़क्लिक को बताया “शारदा और घाघरा नदियों का जलस्तर कम से कम 42 गावों को नुकसान पहुंचा रहा है। रविवार (20 जून) को रेउसा ब्लॉक के फौजदार पुरवा में कम से कम पांच घर पानी में जलमग्न हो गए, और उसी दिन गाँव के पांच परिवारों के सदस्य एक सुरक्षित स्थान के लिए पलायन कर गए थे।” उनका कहना था कि 2013 में उन्होंने ‘जल सत्याग्रह’ की शुरुआत की थी, लेकिन न तो तत्कालीन अखिलेश सरकार और ना ही वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने नदियों के पास बसे ग्रामीणों के लिए कुछ खास काम किया है। 

इस बीच, वर्तमान में बहराइच, बलरामपुर, गोरखपुर, लखीमपुर खीरी, कुशीनगर, महाराजगंज, पीलीभीत, श्रावस्ती, सीतापुर, बाराबंकी और सिद्धार्थनगर जैसे जिलों के 22 गाँव नदी के उफनते जलस्तर से प्रभावित चल रहे हैं।

राहत आयुक्त रणवीर प्रसाद ने मीडिया को विवरण देते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि “राज्य सरकार बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए पूरी तरह से चौकस है, और एनडीआरएफ की 10 टीमों को तैनात किया गया है।” उन्होंने आगे बताया कि इन 10 जिलों के 22 गाँव पानी में जलमग्न थे।

बहराइच में ग्रामीणों के अनुसार, रविवार को जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने बताया कि नेपाल द्वारा अपने तीन बैराजों से नदियों में पानी छोड़े जाने के बाद से जिले के 60 से अधिक गाँव जलमग्न हो गये हैं।

बाढ़ प्रबंधन सूचना प्रणाली केंद्र (एफएमआईएससी) के द्वारा जारी सूचना के अनुसार, बदायूं के कछला घाट और बलिया में भी गंगा खतरे के निशान पर बह रही है। इसके अलावा राप्ती नदी श्रावस्ती में राप्ती बैराज के साथ-साथ गोरखपुर और बलरामपुर जिलों में भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल ख़बर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

UP: Hundreds of Houses in Gorakhpur, Sitapur, Lakhimpur Submerge Due to Flood, Many Forced to Seek Shelter

UP flood
Soil Erosion in UP
Agricultural Land Erosion
Rapti River
Gorakhpur Flood
Yogi Adityanath Government
Flood Management

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