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यूपी: पंचायत चुनाव में गांव-गांव बह रहे हैं शराब के परनाले!, मिलावटी शराब से मौतों का भी सिलसिला
वोट से पहले मतदाताओं, खासकर पुरुष मतदाताओं को लुभाने के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गयी है शराब। चुनाव और शराब का गठजोड़ एक तरफ़ अवैध शराब के कारोबार को बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ़ मौतों का सबब बन रहा है।
सरोजिनी बिष्ट
10 Apr 2021
यूपी: पंचायत चुनाव में गांव-गांव बह रहे हैं शराब के परनाले!, मिलावटी शराब से मौतों का भी सिलसिला
प्रयागराज के करेली क्षेत्र का सैदपुर गांव। यहां पुलिस और आबकारी विभाग ने छापा मार अवैध और कच्ची शराब ज़ब्त की। साभार : नवभारत टाइम्स

प्राचीन कथाओं में गांवों में दूध दही की नदियां बहने की बात कही जाती थी अब इसमें कितनी सच्चाई थी इसका तो पता नहीं, लेकिन इन दिनों उत्तर प्रदेश में शराब की नदियां जरूर बह रही हैं। कच्ची और जहरीली शराब के परनाले भी उफन रहे हैं और शराब की इस बाढ़ के पीछे है पंचायत चुनाव।

प्रदेश में इन दिनों पंचायत चुनाव की सरगर्मियां तेज हैं। आरक्षण का निर्धारण और चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही गांव-गांव उम्मीदवारों और उनके समर्थकों द्वारा प्रचार का काम भी जोर शोर से शुरू हो गया है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक राज्य में चार चरणों में सभी ग्राम पंचायतों के प्रधानों व सदस्यों, सभी क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव होंगे।

मतदान 15 अप्रैल, 19 अप्रैल, 26 अप्रैल, 29 अप्रैल को होगा जबकि मतगणना दो मई को होगी। हर तरफ चुनाव का शोर है, दावेदार लोगों के द्वार तक पहुंचने लगे हैं। जैसे जैसे मौसम का पारा चढ़ रहा है, वैसे वैसे पंचायत चुनाव की गर्मी भी बढ़ रही है। एक तरफ उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ शराब माफिया भी सक्रिय हो गए हैं।

बीते दिनों उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में मिलावटी शराब पीने से कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। पंचायत चुनाव के मद्देनजर मिलावटी शराब के कारोबार ने तेजी पकड़ी है। किसी भी तरह से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए उम्मीदवारों द्वारा यही मिलावटी शराब ग्रामीण पुरुष मतदाताओं को परोसी जा रही है, जिसका नतीजा बहुतों के मौत के रूप में सामने आया।

पिछले दिनों मौतों की जितनी खबरें विभिन्न जिलों से सामने आईं, उन सब में एक बात समान रूप से देखी गई कि ग्राम प्रधान पद के दावेदारों द्वारा दी जाने वाली पार्टी में मरने वाले ग्रामीण शामिल थे और वहां जो शराब दी गई थी सबने उसका सेवन किया था। इतना ही नहीं कच्ची शराब भी अवैध रूप से बनाने की खबरें गांवों से सामने आ रही हैं।

हालांकि लगातार कार्रवाई से शराब माफियाओं में हड़कंप तो मचा है, बावजूद इसके अभी भी कारोबार चरम पर है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, हरियाणा सहित अन्य प्रांतों की कच्ची शराब खपाने के लिए शराब माफिया जुट गए हैं।

सिर पर पंचायत चुनाव हैं तो भला ऐसे में शराब माफिया इस सुनहरे मौके को हाथ से कैसे जाने दें, और जब बहुत सस्ते में शराब उपलब्ध हो जा रही हो तो दावेदार भी भला पीछे क्यों रहें, और रही शराब शौकीनों की बात तो मुफ्त की शराब उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं। चुनाव और शराब का यही गठजोड़ एक तरफ़ अवैध शराब के कारोबार को बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ़ मौतों का सबब बन रहा है।

पिछले दिनों चित्रकूट, प्रयागराज, बरेली, बदायूं, प्रतापगढ़, मिर्जापुर आदि जिलों से मिलावटी शराब पीने के चलते कई ग्रामीणों की मौत की खबरें सामने आईं। बदायूं के मूसाझाग थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक गांव में तो न केवल मिलावटी शराब पीने से दो ग्रामीणों की मौत हुई बल्कि एक व्यक्ति की आंखों की रोशनी तक चली गई। खबर के मुताबिक गांव में प्रधान के संभावित उम्मीदवारों ने होली के मौके पर शराब का वितरण किया था।

वोट से पहले मतदाताओं, खासकर पुरुष मतदाताओं को लुभाने के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गयी है शराब। मांग इतनी ज्यादा है कि गांव के ठेकों पर स्टॉक कम पड़ रहा है। शराब माफिया, तस्कर और अवैध शराब कारोबारी इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं।

मुनाफे की हवस में औद्योगिक स्प्रिट से बनी जहरीली शराब तक की सप्लाई कर दी जा रही है। पड़ोस के दूसरे राज्यों से भी तस्करी करके ऐसी शराब लायी जा रही है, जिसकी गुणवत्ता के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में पंचायत चुनावों की घोषणा के बाद से जहरीली शराब से दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, ग्राम प्रधान उम्मीदवारों की ओर से 'दावतों' का सिलसिला और पहले से शुरू हो चुका है।

गोरखपुर के राजघाट थाना क्षेत्र में पुलिस द्वारा छापेमारी कर अवैध कच्ची शराब पकड़ी गई। फोटो साभार: एबीपी

इसमें दो राय नहीं कि शराब तस्करी और अवैध शराब के कारोबार पर लगाम लगाने के लिए सरकार पुलिस महकमें को जितना हाईटेक करने की बात करती है, शराब तस्कर उससे ज्यादा ही हाईटेक होकर अपने काम को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। खबरों के मुताबिक ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस की मदद से शराब तस्कर मानिटरिंग कर पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी करने में सफल हो रहे हैं। बलिया में तो पुलिस द्वारा खबरी अभियान तक चलाया जा रहा है। इसके तहत प्रत्येक सौ पेटी अवैध शराब पकड़वाने पर मुखबिर को पुलिस की और से एक हजार की राशि दी जाएगी। उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में शराब माफियाओं पर शिकंजा कसने के लिए भले ही पुलिस ने कमर कस ली हो लेकिन सवाल यह उठता है कि इतनी चाक चौबंद होने के बावजूद आख़िर शराब माफिया कैसे अपने मंसूबों में सफल हो रहे हैं।

पिछले दिनों ग्रेटर नोएडा के अलग अलग थाना क्षेत्र में पुलिस और आबकारी की टीम द्वारा छापा मार कर दर्जन शराब तस्करों को गिरफ्तार किया गया। इनके पास से लग्जरी गाड़ियां और भारी मात्रा में अवैध शराब बरामद हुई। खबर यह सामने आई की जिला पंचायत और ग्राम प्रधान प्रत्याशी की डिमांड पर शराब माफिया साथ गांठ कर ग्रामीणों को लुभाने के लिए हरियाणा से शराब तस्करी कर रहे थे।

हर रोज अलग अलग जिलों से शराब माफियाओं की धरपकड़ की खबरें इन दिनों उतर प्रदेश की सुर्खियां बनी हुई हैं, लेकिन जितनी धरपकड़ हो रही हैं उससे कई गुना अवैध शराब विभिन्न जिलों तक पहुंच जा रही है, मात्र भदोही जिले में ही पुलिस ने पिछले छह महीने के दौरान करीब दो करोड़ का अवैध गांजा और तकरीबन एक करोड़ की अवैध शराब बरामद की है और पंचायत चुनाव के मद्देनजर तो इस आंकड़े के और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। चुनाव को देखते हुए अब प्रदेश में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए विशेष एंटी नार्कोटिक टास्क फोर्स गठन करने का फैसला लिया गया है।

जगह जगह पुलिसिया कार्रवाई तो हो रही है, इस बात से इंकार नहीं लेकिन सच यह भी है कि पुलिस की कार्रवाई में जब कच्ची शराब पकड़ी जाती है तो मात्र ड्राइवर और सहयोगी पर कार्रवाई कर पुलिस अपना काम पूरा समझ लेती है और जो इस अवैध कारोबार के संचालक या मास्टर माइंड होते हैं वे आबकारी विभाग और पुलिस की ढिलाई के कारण बच निकलते हैं। ठेके से मिलने वाली शराब से ये कच्ची शराब करीब पचास से साठ प्रतिशत सस्ती होती है। सस्ते के चक्कर में संभावित उम्मीदवार शराब माफियाओं के संपर्क में आ रहे हैं। पुलिस सूत्रों की माने तो शराब माफिया भूसा, फल और अनाज से लदे वाहनों के जरिए शराब की खेप ला रहे हैं।

उत्तर प्रदेश उन राज्यों में शामिल है जहां शराबबंदी लागू नहीं है उसके बावजूद इतने बड़े पैमाने पर यदि यहां अवैध शराब का कारोबार हो रहा है तो यह योगी सरकार के उस "सुशासन" पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न है, जिसका गुणगान हर अवसर पर करने से सरकार नहीं चूकती। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन शराब माफियाओं पर अपना सख्त रूप दिखाते हुए उन पर न केवल गैंगस्टर एक्ट लगाने की बल्कि उनकी संपत्ति भी जब्त करने की बात कहते हैं, साथ ही आला अधिकारियों को ऐसे लोगों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश भी दिए गए हैं जो प्रतिबंध के बावजूद बिना लाइसेंस के अवैध तरीके से शराब बनाकर धडल्ले से बेच रहे हैं। मुख्यमंत्री कहते हैं अवैध शराब पीने की वजह से प्रदेश में यदि एक भी व्यक्ति की मौत होती है तो न सिर्फ शराब बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी बल्कि उस क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों और पुलिस कर्मियों पर भी सख्त एक्शन लिया जाएगा। परंतु इतने सब प्रयासों और सख्ती के बावजूद आख़िर कैसे अवैध शराब की खेप जिलों तक पहुंच जा रही है, आख़िर कैसे दूसरे राज्यों से तस्कर बैखौफ यूपी के भीतर प्रवेश कर रहे हैं और कैसे गांव गांव तक ये मिलावटी कच्ची शराब बांटी जा रही है, ये सारे सवाल उठना लाज़िमी है।

पंचायतीराज को सत्ता के विकेंद्रीकरण के खयाल से लागू किया गया था। लेकिन हकीकत में यह भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण की व्यवस्था में तब्दील हो गया है। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां जमीनी लोकतंत्र बेहद कमजोर है। आज हर ग्राम पंचायत को साल में एक करोड़ रुपये से ज्यादा मिल रहे हैं। अगर यह पूरी रकम गांवों और गांववालों के विकास पर खर्च हो जाए, तो तस्वीर बदल जाए। लेकिन इसके एक बड़े हिस्से की पंचायत के जनप्रतिनिधियों और ब्लॉक व जिला प्रशासन के बीच बंदरबांट हो जा रही है। कहा जाता है कि जो ग्राम प्रधान ज्यादा हाथ-पैर नहीं मारता, उसके हिस्से में भी 10 परसेंट बतौर दस्तूरी चला आता है। जब इतनी मोटी कमाई हर साल हो, तो प्रधान का चुनाव जीतने के लिए किस कदर पैसा बहाया जाता होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

सबसे बड़ा प्रहसन तो त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में विभिन्न पदों के लिए उम्मीदवारों द्वारा किये जा सकने वाले खर्च की सीमा है। राज्य चुनाव आयोग के मुताबिक ग्राम पंचायत सदस्य दस हजार रुपये खर्च कर सकता है। ग्राम प्रधान और बीडीसी के लिए यह सीमा 75 हजार रुपये की है। जिला पंचायत सदस्य एक लाख रुपये अपने चुनाव में खर्च कर सकता है। वहीं, ब्लाक प्रमुख के लिए दो लाख रुपये और जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए चार लाख रुपये की सीमा है। उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात में 75 हजार रुपये में ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने की कल्पना तक नहीं की जा सकती। इतना रुपया तो एक दिन में उड़ रहा है, मतदाताओं की दावतों और तोहफों में।

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है।)

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