NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सपा प्रतिनिधिमंडल को न, दूसरे दलों को हां... आख़िर आज़म का प्लान क्या है?
सीतापुर की जेल में बंद आज़म ख़ान से पहले शिवपाल यादव फिर कांग्रेस के आचार्य प्रमोद कृष्णम की मुलाकात नए सियासी समीकरण के संकेत दे रही है।
रवि शंकर दुबे
25 Apr 2022
azam khan

सियासत का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश और यहां का सियासी गणित बड़ा ही दिलचस्प है... एक राजनीतिक खेमा कब दो हो जाए, और फिर कब दो से चार हो जाए, पता ही नहीं चलता। ताज़ा उदाहरण समाजवादी पार्टी का ही ले लीजिए, जो अलग-अलग गुटों में फैलती ही जा रही है। पहले अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल बागी हो गए और अब कद्दावर नेता आज़म ख़ान ने भी अपने तेवर दिखा दिए हैं।

पिछले दिनों जब समाजवादी पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल सीतापुर जेल में बंद आज़म ख़ान से मिलने पहुंचा, तो उसे बैरंग ही लौटना पड़ा। क्योंकि आज़म ख़ान ने उस प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात से साफ इनकार कर दिया। अब राजनीतिक गलियारों में कोई घटना बेबुनियाद तो होती नहीं है, ऐसे में कयास लगने लगे कि आज़म ने फिलहाल टीम बदलने का फैसला कर लिया है।

अब सवाल ये है कि अगर आज़म ख़ान अखिलेश की टीम को छोड़ते हैं तो फिर ऐसा कौन है जिसके साथ वो अपनी नई पारी की शुरुआत करेंगे?

सबसे पहले बात शिवपाल यादव की.....

शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच चाहे कितने भी मतभेद रहे हों, शिवपाल ने भले ही अपना अलग राजनीतिक दल बना लिया हो। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ जब शिवपाल ने अपने बड़े भाई और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव पर खुला हमला बोला हो। लेकिन जब बात अस्तित्व पर आई तब शिवपाल यादव को ये मिथक भी तोड़ना पड़ा... पिछले दिनों जेल में बंद आज़म ख़ान से मिलने पहुंचे शिवपाल यादव ने मुलायम सिंह यादव पर सीधा हमला बोला और कहा कि नेताजी ने आज़म ख़ान के लिए कुछ नहीं किया। लोकसभा और राज्यसभा में भी मामला नहीं उठाया जबकि वे चाहते तो धरना दे सकते थे, छोटी-छोटी धाराओं में आज़म पिछले 26 महीने से जेल में बंद हैं, लेकिन सपा ने कोई संघर्ष नहीं किया।

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि मुलायम सिंह के खिलाफ शिवपाल के मन का गुबार अचानक फूटना महज़ संयोग नहीं है, बल्कि आज़म ख़ान की ओर से किया गया बकायदा प्रयोग है। कहने का अर्थ है कि शिवपाल यादव उन शख्स में एक हो सकते हैं जो आज़म के जेल से बाहर आने पर उनका साथ देंगे। और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के M-Y फैक्टर को आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए चोट दे सकते हैं।

अगर अभी हम किसी तीसरे नेता या खेमें की बात न करें तो शिवापल यादव, आज़म ख़ान को प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में शामिल होने का न्योता दे सकते हैं। क्योंकि शिवपाल एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने सड़कों पर आंदोलन किए हैं, गांव-गांव चौपाले की हैं, और ज़मीनी नेताओं को उनके नाम से पहचानते हैं, कहने का अर्थ ये है कि शिवपाल यादव उत्तर प्रदेश की राजनीतिक में एक हैसियत रखते हैं, और ओबीसी वोटर्स में अच्छी पकड़ रखते हैं, वहीं अगर उन्हें 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को साधने के लिए आज़म का साथ मिल जाता है तो उनके लिए सोने पर सुहागा हो जाएगा। हालांकि आखिरी फैसला आज़म को लेना है।

अब बात जयंत चौधरी की...

रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भी विधानसभा चुनावों में अखिलेश के साथ बराबरी की हुंकार भरी थी, लेकिन दुर्भाग्यवश वो कामयाबी नहीं मिली जिसकी उम्मीद कर रहे थे। समाजवादी पार्टी की हार के बाद भी जयंत चौधरी भले ही अखिलेश के साथ खड़े रहने का दम भरते हों, लेकिन चौधरियों के बीच कहीं उनकी चौधराहट खत्म न हो जाए इसकी भी चिंता दबें पांव ज़रूर कर रहे हैं। जिसकी एक झलक उन्होंने पिछले दिनों आज़म ख़ान के परिवार से मुलाकत कर दिखा दी। हालांकि उन्होंने इस मुलाकात को पारिवारिक बताया लेकिन ये कहना नहीं भूले कि आज़म का परिवार बहुत परेशानियों से गुज़र रहा है। और अब उत्तर प्रदेश को एक नए विकल्प की तलाश है। अब क्या सियासी मायने हैं ये तो भविष्य तय कर देगा। दूसरी ओर अगर ये कयास लगाएं कि जयंत और आज़म सीधे तौर पर गठबंधन कर सकते हैं तो ये ज़रा जल्दबाजी होगी। क्योंकि रालोद जाटों की पार्टी है, और जाटों के बीच आज़म ख़ान की छवि उतनी खरी नहीं है। माने, सीधे तौर पर दोनों के बीच का गठबंधन सफल होने के चांस बेहद कम हैं, हां ये ज़रूर हो सकता है कि किसी दूसरे बड़े दल को दोनों नेता सपा से दूर होकर समर्थन करें।  

अब बात कांग्रेस की...

अखिलेश के खिलाफ बगावत का केंद्र बनते जा रहे आज़म के लिए एक बहुत बड़ा मौका कांग्रेस में जाने का भी है, जिसके कयास पिछले कई दिनों लगाए जा रहे हैं। इन कयासों को और ज्यादा हवा दे दी कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने... जब आज़म ख़ान से मिलने सीतापुर जेल पहुंच गए।

वैसे ये कहना ग़लत नहीं होगा कि अगर आज़म ख़ान कांग्रेस में शामिल होते हैं तो इसका फायदा कांग्रेस और आज़म ख़ान दोनों को हो सकता है। कहने का अर्थ ये है कांग्रेस में शामिल होते ही आज़म को नेशनल पार्टी का टैग मिल जाएगा। और प्रदेश में खुद की ज़मीन तलाश रही कांग्रेस को एक दिग्गज और वरिष्ठ नेता मिल जाएगा। क्योंकि लोकसभा हो या राज्यसभा.. पिछले कुछ सालों में कांग्रेस पांच सीटों से ज्यादा नहीं बढ़ पाई है। जिसका कारण ये है कि अब कांग्रेस को न ही मुसलमान वोट कर रहा है, न ब्राह्मण। मुसलमान और ब्राह्मणों का जिक्र हमने इसलिए किया क्योंकि इन्ही के सहारे कांग्रेस कई सालों तक देश की और प्रदेश की सत्ता संभालती रही है। ऐसे में अगर आज़म ख़ान जैसा नेता जो दस बार विधानसभा के लिए चुना जा चुका हो, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खासकर और पूरे प्रदेश के मुसलमानों में अपनी पकड़ रखता हो, अगर कांग्रेस जैसी डूबती पार्टी में शामिल हो जाए तो कहीं न कहीं पार्टी को फायदा ज़रूर पहुंचेगा और हो सकता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में इसका नतीजा भी देखने को मिले। क्योंकि आज़म के समाजवादी पार्टी छोड़ने पर मुस्लिम वोटर्स तो खिसकेगा ही, साथ में वो यादव भी तितर-बितर हो सकते हैं जो आज़म में विश्वास रखते हैं।  

आज़म ख़ान का समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के लिए इन्कार करना, शिवपाल यादव और आचार्य प्रमोद कृष्णम से मिलना, एक बड़े बदलाव की ओर साफ इशारा कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर आज़म परिवार की चुप्पी भी सियासी तूफान से पहले की ख़ामोशी को बयां कर रही है। क्योंकि कुछ दिनों पहले जिस तरह आज़म के मीडिया प्रभारी फसाहत अली उर्फ सानू ने अखिलेश यादव पर हमला बोला, फिर आज़म समर्थकों ने खून से खत लिखा और यहां तक कह दिया कि अखिलेश को हमारे कपड़ों से बदबू आती है। फिर आज़म से ग़ैर सपाई नेताओं की मुलाकात एक बड़े सियासी फेरबदल के संकेत हैं।

आपको बता दें कि पिछले दो सालों से आज़म ख़ान सीतापुर जेल में बंद हैं और उनपर करीब 80 से ज्यादा मुकदमें दर्ज हैं। इसके बावजूद समाजवादी प्रमुख अखिलेश यादव महज़ एक बार उनसे मुलाकात करने पहुंचे हैं, जबकि आज़म की ज़मानत के लिए कोई खास संघर्ष नहीं किया गया। जिसके कारण आज़म खेमा बुरी तरह नाराज़ है। और अब तो आज़म ने बगावती तेवर भी दिखा दिए हैं।  

आपको याद दिलाते चलें साल 2009 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी अमर सिंह को लेकर आज़म ख़ान ने समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ दिया था, लेकिन तब न ही वो किसी राजनीतिक दल में गए थे, न ही खुद का कोई राजीतिक दल बनाया था। लेकिन इस बार बग़ावत की ये चिंगारी समाजवादी पार्टी के कई नेताओं को उकसा रही है। और अब मुद्दा सपा द्वारा आज़म का साथ छोड़ने और मुस्लिमों की बात नहीं करने तक पहुंच गया है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में धीरे-धीरे घट रहे इस पूरे घटनाक्रम की वजह अखिलेश यादव को माना जा रहा है, जो फिलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। जिसे लेकर लोग अखिलेश यादव के लिए बड़े नुकसान की बात कर रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव में उनका एम-वाई फैक्टर टूट सकता है। जिसके कारण उन्हें पिछली बार से भी कम सीटें मिल सकती हैं।

सीएसडीएस की एक रिपोर्ट कहती है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में 87 फीसदी मुसलमानों के वोट सीधे तौर पर सपा के खाते में गए थे। यानी समाजवादी पार्टी द्वारा जीती गईं 111 सीटों में बड़ा योगदान मुसलमानों का था जो महज़ 20 फीसदी हैं। बाकी योगदान यादव वोटर्स व अन्य का है। अब वो इसे कैसे कायम रख पाते हैं और इसमें और किन जाति-वर्गों का वोट जोड़ पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। हालांकि अखिलेश जैसे कद्दावर नेता की चुप्पी को भी कमतर आंकना फिलहाल बेईमानी होगी। जो भी हो, यूपी की राजनीति में जल्दी ही कुछ दिलचस्प नज़ारे देखने को मिल सकते हैं।

UttarPradesh
AZAM KHAN
SAMAJWADI PARTY
AKHILESH YADAV
Congress
BJP
UP POLITICS

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • MNREGA
    अजय कुमार
    मोदी सरकार जब मनरेगा में काम दिलवाने में नाकाम है, तो रोज़गार कैसे देगी?
    13 Nov 2021
    मनरेगा की योजना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खिल्ली उड़ाते हैं। लेकिन उनके काल में भारत की अर्थव्यवस्था की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि मनरेगा का बजट साल खत्म होने से पहले ही खत्म हो जा रहा है।
  • altaf
    अनिल सिन्हा
    उत्तर प्रदेश: क्या योगी आदित्यनाथ अल्ताफ़ को न्याय देंगे?
    13 Nov 2021
    हम अल्ताफ़ की मौत की तुलना पुलिस हिरासत में अक्सर होने वाली मौतों के साथ नहीं कर सकते हैं।
  • cop 26
    बी. सिवरामन
    काॅप 26 और काॅरपोरेट
    13 Nov 2021
    वैश्विक काॅरपोरेट घरानों के लिए कार्बन नियंत्रण के कोई लक्ष्य नहीं तय किये गए हैं, क्योंकि यह मुद्दा काॅप 26 के ऐजेन्डे में आया ही नहीं।
  • poisonous liquor
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार: "ज़हरीली शराब का तांडव जारी, सरकार कर रही केवल बयानबाजी"
    13 Nov 2021
    माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि मुजफ्फरपुर के कांटी प्रखंड के श्रीसिया व बरियारपुर गांव में जहरीली शराब से कल अबतक 6 लोगों की मौत के साथ यह आंकड़ा 62 पहुंच गया है। हकीकत में मरने वालों की संख्या कहीं…
  • book
    शिरीष खरे
    तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र :  भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन का दस्तावेज़
    13 Nov 2021
    ज़ाहिद ख़ान की हालिया किताब की समीक्षा और उसके बारे में कुछ अहम बातें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License