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राजन के समोसे, नन्हे की आमलेट और नौकरी का इंतजार
युवा मानते हैं कि सरकार हर दो महीने पर दो हजार रुपए अगर किसानों मजदूरों के खातों में डालती है तो उससे उनका पेट भरना दूभर है, आत्मनिर्भरता क्या आएगी। वे मानते हैं कि इसमें महामारी का उतना दोष नहीं है जितना सरकार की कार्यप्रणाली का।
अरुण कुमार त्रिपाठी
05 Sep 2020
राजन के समोसे, नन्हें की आमलेट और नौकरी का इंतजार

राजन पकौड़े नहीं बनाता। वह समोसे और पकौड़ियां तलता है और जलेबी छानता है। यही उसका रोजगार है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक गांव में सड़क के किनारे उसकी छोटी सी दुकान है। वहां शाम को गांव के बेरोजगार युवकों का जमघट लगता है। राजन इस जमघट से खुश भी होता है और डरता भी है। खुशी किसे नहीं होगी जिसके सामान हाथों हाथ बिके और जिसके यहां खरीदने वालों की भीड़ लगे।

डर इस बात से कि कोराना के इस दौर में बिना मास्क वाली भीड़ देखकर पुलिस कब डंडा बजाने लगे कुछ कहा नहीं जा सकता। शुक्र है उसकी भट्ठी से सटी हुई एक किराना की दुकान है। इसलिए दोनों एक दूसरे की पूरक हैं। जो राशन, सब्जी, मसाले और दूसरी खिर्ची मिर्ची लेने आता है वह समोसे और जलेबी भी खा लेता है या बंधवा लेता है।

राजन ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है। पच्चीस साल का यह युवक सिर्फ कक्षा एक तक पढ़ा है फिर भी उसकी शब्दावली में अंग्रेजी के शब्द आते हैं। परिवार गरीब रहा इसलिए पढ़ने की उम्र में मुंबई चला गया। वहां पीओपी का काम करता था और हर महीने दस हजार रुपए तक कमा लेता था। लेकिन चार साल पहले बीमार हुआ और मुंबई छोड़नी पड़ी।

उसे यह तो नहीं मालूम कि पकौड़ा तलेगा तो कितनी आमदनी होगी लेकिन समोसे और जलेबी से पूंजी निकाल कर सौ दो सौ रुपये कमा लेता है। क्या करे गांव में उधार खाने वाले भी तो हैं। यही हाल बगल की गुमटी में उबले अंडे और आमलेट बेचने वाले नन्हे का भी है।

दलित बिरादरी के नन्हे अजमेर में तंदूर लगाते थे। अच्छा कमा लेते थे। महामारी फैली तो भागना पड़ा। वे अपनी गुमटी सड़क वालों की मर्जी से हटाते रहते हैं। उनके यहां शाम को पीने वाले की भीड़ लगती है। उनका चखना मशहूर है। लेकिन अगर नन्हे के बेटे होनहार न होते तो वे यह दुकान न चला पाते और न ही इतनी आमदनी से परिवार का पेट पाल सकते थे। आखिर सौ दो सौ रुपये रोज की आमदनी से क्या होता है? इतने में न तो राजन उनके आमलेट खा सकता है और न ही वे उसके समोसे। लेकिन राजन और नन्हे में किसी तरह का रोष नहीं है। उन्होंने इन कामों को अपनी नियति मान लिया है।

इस बीच यह खबर पूरे इलाके में चर्चा में है कि अमेठी के एक युवक को पकौड़े के लिए बैंक से कर्ज नहीं मिला। उस युवक ने यूको बैंक और पीएनबी बैंक में पकौड़े की दुकान खोलने के लिए प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना के तहत एक लाख के कर्ज के लिए आवेदन किया था। बैंक ने मना कर दिया। युवक भाजपा से जुड़ा भी रहा है और उसने इस काम के लिए केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखा। उसने जिले के प्रभारी मंत्री मोहसिन रजा को भी पत्र लिखा। उसे इंतजार है मंत्रियों के जवाब का। इस खबर को स्थानीय अखबारों ने चटखारे लेकर छापा है।

रोष उन युवाओं में जरूर हैं जो सुबह सड़क पर लेट कर योग करते हैं, दोपहर में किसी के खाली घर में ताश खेलते हैं और शाम को इन दुकानों पर समोसे, जलेबी और आमलेट का स्वाद लेते हैं। गौरीशंकर पिछले साल फरवरी से ही सहायक शिक्षक की नौकरी ज्वाइन करने का इंतजार कर रहे हैं।

प्रदेश में सहायक शिक्षकों की 69,000 रिक्तियां आई थीं और उसमें परीक्षा के बाद उनका चयन भी हुआ था लेकिन शिक्षामित्रों ने केस कर दिया। सरकार चाहती थी मेरिट का कटआफ 60 से 65 प्रतिशत पर रुके ताकि गुणवत्ता बने जबकि शिक्षामित्र चाहते थे कि कटआफ 40 से 45 प्रतिशत तक जाए।

यह मामला पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गया और अभी तक फैसला नहीं आया। गौरीशंकर की बहन की शादी नहीं हो पाई। उनका घर टूटा है उसकी भी मरम्मत नहीं हुई। उसकी अपनी शादी का नंबर इन सबके बाद है। इसलिए वह भी लटक गई।

इसी तरह की बेचैनी उन युवाओं में भी है जिन्होंने कर्मचारी चयन आयोग की गैर तकनीकी श्रेणी की परीक्षा 4 जून 2019 को दी थी। इसके परिणाम अभी तक नहीं आए। उन्हें डर है कि सरकार जिस तेजी से रेलवे का निजीकरण कर रही है कहीं वह परीक्षा रद्द न कर दे।

इस मामले से नाराज युवाओं ने # speakupforrailwaystudent अभियान तेजी से चलाया। उसकी धूम दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर गांव के चौराहों तक थी। मंगलवार को एक ही दिन में 30 लाख ट्वीट आए और आखिर में आयोग को चार अक्तूबर को परिणाम घोषित करने का आश्वासन देना पड़ा।

वे युवा भी बुरी स्थिति में हैं जो प्रयागराज, दिल्ली के मुखर्जी नगर और कोटा वगैरह में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। लाकडाउन के कारण घर आना पड़ा और सामान उन्हीं मकानों में छोड़ दिया जो किराए पर थे। मकान मालिक किराया मांग रहे हैं और युवाओं के अभिभावक देने की स्थिति में नहीं हैं। उनमें इस बात पर गुस्सा है कि सिर्फ जेईई और नीट की परीक्षा कराई जा रही है बाकी सारी परीक्षाएं अटकी हैं।

राजाराम शर्मा (30) दुबई में लकड़ी यानी बढ़ईगीरी का काम करते थे। उन्हें वहां भारतीय मुद्रा के लिहाज से 40,000 रुपये महीने मिलते थे। छह महीने पहले घर आए थे। इस दौरान कोराना आ गया। सरकार के बार बार इस एलान के बाद कि किसी का वेतन नहीं काटा जाएगा, उनकी कंपनी उन्हें वेतन नहीं दे रही। इस बीच वीजा भी समाप्त हो गया। अब गांव और कस्बे में इधर उधर निठल्ला घूमने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा।

शरद शुक्ला और उनके भाई दिल्ली और गुड़गांव के एक बड़े होटल समूह में काम करते थे। तकरीबन 20,000 रुपये महीने मिल जाते थे। इसके अलावा रोजाना 500 रुपये तक टिप भी नसीब हो जाती थी। महामारी और लाकडाउन से होटल उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए और उन्हें घर लौटना पड़ा। उन्होंने अपने घर के पास किराना की दुकान खोल ली। दुकान चल नहीं रही। जब लोगों के पास कमाई ही नहीं है तो खरीदेगा कौन।

गांवों में मनरेगा के काम का जो हल्ला मचाया जा रहा है उसकी जमीनी हकीकत निराश करने वाली है। अप्रैल में मनरेगा का काम तेज हुआ और मई में ठप हो गया। इस बीच बारिश ने भी दिक्कत पैदा की। बहुत सारे घरों में मनरेगा के जॉब कार्ड रखे हैं लेकिन उनका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा।

कुछ प्रधानों, कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि इसमें सरकार ढोल ज्यादा पीट रही है लेकिन काम कम हो रहा। भ्रष्टाचार ऊपर से है। ग्राम प्रधान फर्जी काम दिखा देते हैं और लोगों के खाते में पैसा डाल देते हैं। फिर उनके लिए पांच सौ रुपये छोड़कर बाकी सारा पैसा उनसे ले लेते हैं। भ्रष्टाचार की यह जंजीर सफाई कर्मचारियों से लेकर मनरेगा के काम तक फैली है। उसकी गुलामी में क्या अधिकारी या लाभार्थी सभी कैद हैं।

आत्मनिर्भरता की कहानी का युवा मजाक उड़ाते हैं। उनका कहना है कि आत्मनिर्भर होने के लिए पूंजी चाहिए। जो कुछ कमा कर रखा था वह छह महीने में समाप्त हो गया। बैंकों में कर्ज देने की रफ्तार घटी है (या घटाई गई है) इस बात को कुछ वकील और बैंक अधिकारी भी स्वीकार करते हैं कि कर्ज मंजूर करने की गति धीमी की गई है।

युवा मानते हैं कि सरकार हर दो महीने पर दो हजार रुपए अगर किसानों मजदूरों के खातों में डालती है तो उससे उनका पेट भरना दूभर है, आत्मनिर्भरता क्या आएगी। वे मानते हैं कि इसमें महामारी का उतना दोष नहीं है जितना सरकार की कार्यप्रणाली का।

सरकार महामारी से बेहतर तरीके से लड़ सकती थी लेकिन बदइंतजामी, घमंड और भ्रष्टाचार उसे कुछ करने नहीं दे रहा है। इसलिए अमेठी के युवक को पकौड़े की दुकान के लिए कर्ज भले न मिले लेकिन राजन की छोटी पूंजी से बने समोसे और जलेबी तो खाई ही जा सकती है। इसी चकल्लस में बेरोजगारों का समय कट रहा है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। 

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