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अमेरिका-चीन व्यापार समझौता तो सुलझ गया; अब आगे क्या?
भू-राजनीतिक सतह पर भारत और ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर चीन की राह में रुकावट डालने वाली ट्रम्प की रणनीति के साथ कोई और नहीं है।
एम. के. भद्रकुमार
30 Jun 2020
अमेरिका-चीन

विश्व समुदाय इस बात को लेकर राहत की सांस ले सकता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच कोई नया शीत युद्ध नहीं होने जा रहा है। शीत युद्ध में दो गुटों की ज़रूरत होती है: एक ओर जहां वाशिंगटन किसी और के साथ मिलकर कोई गुट बनाने की हालत में नहीं है, वहीं बीजिंग की दिलचस्पी किसी गुट को बनाने को लेकर बिल्कुल नहीं है, यानी चीन की मानसिकता किसी गुट के निर्माण की नहीं है। लेकिन, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चीन को अलग-थलग करना अब आसान नहीं है, क्योंकि अमेरिका के नेतृत्व वाले वैश्वीकरण की जगह चीन के नेतृत्व वाले वैश्वीकरण ने ले ली है।

चीन-अमेरिकी प्रचंड युद्ध की अब कोई संभावना भी नहीं है। इसके बजाय जो कुछ सामने दिख रहा है, वह ट्रम्प प्रशासन और बीजिंग के बीच एक भू-राजनीतिक शून्य वाला एक गतिरोध है, जिसकी दिशा अब काफ़ी हद तक नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे पर निर्भर करेगी।

हिन्द-प्रशांत के दो देशों को छोड़कर बड़े पैमाने पर विश्व समुदाय इस गतिरोध के पक्ष में कोई भी देश नहीं है, और ये दो देश हैं-ऑस्ट्रेलिया और भारत, जो इस समय अमेरिकी नाव में सवार हैं।

एशिया अपने आप में निरापद है। चीन को उकसाने में जापान की कोई दिलचस्पी नहीं रही है। (मेरा ब्लॉग देखें, जापान-अमेरिका गठबंधन में घटती अंतरंगता।) आसियान देशों ने ट्रम्प प्रशासन और चीन के बीच किसी भी पक्ष की तरफ़ जाने से इनकार कर दिया है। सच्चाई तो यही है कि आसियान ने सिर्फ़ यह तय कर लिया है कि इस वर्ष उस क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता पर हस्ताक्षर किये जायेंगे, जिसमें चीन और जापान दोनों शामिल हैं। इस समझौते का मक़सद एशिया-प्रशांत के क्षेत्रीय एकीकरण को बुनियादी तौर पर बदलना है।

यूरोप भी अलग-थलग खड़ा है और कोविड-19 के दौर के बाद की सामने दिखती हक़ीक़त से संगत बैठाते हुए पहले से कहीं अधिक बराबरी और संतुलित साझेदारी को लेकर चीन के साथ जुड़ाव की शर्तों पर काम करना शुरू कर दिया है,क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था इस महामारी में भी बहुत ही कम नुकसान उठाने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में खड़ी है।

एकदम सामने दिखतीं आशंकायें

अगर संक्षेप में कहा जाय, तो यह सब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में उनके मुख्य प्रचार अभियान में चीन के हौआ को बढ़ा चढ़ाकर पेश किये जाने के फ़ैसले के साथ शुरू हुआ था।

ट्रम्प का अनुमान था कि यह एक स्मार्ट रणनीति होगी, क्योंकि विजेता अपनी जीत के लिए सब कुछ आज़माता है। एक ओर तो ट्रम्प ने यह माना कि जनवरी के व्यापार समझौते का पहला चरण चीन को 200 अरब डॉलर से ज़्यादा के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदने के लिए मजबूर करेगा, जिसमें भारी मात्रा में कृषि उत्पाद शामिल हैं, जो अनिवार्य रूप से उनकी विदेश नीति की कामयाबी के तौर पर दिखायी देगा।

दूसरी ओर, ट्रम्प ने चीन को लेकर ख़ुद को 'सबसे सख़्त' अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में पेश करने का भी इस्तेमाल किया है। दरअस्ल यह एक ऐसा आत्म-चित्रण था, जिसका इस्तेमाल वह घरेलू स्तर पर अपने मतदाताओं को प्रभावित करने लिए कर सकेंगे। वह इस बात का संकेत देंगे कि उनके संभावित मुख्य प्रतिद्वंद्वी, जॉन हेडेन ट्रम्प के मुक़ाबले एक 'मुखर' चीन के सामने टिक पाने में असमर्थ हैं और इस तरह,ट्रम्प अपने प्रतिद्वंद्वी को अलग-थलग कर सकेंगे

इसके अलावा, कोविड-19 को ‘वुहान वायरस’ का नाम देकर ट्रम्प ने इस महामारी की चुनौती से पार पाने की अपनी उस अक्षमता और निराशाजनक नाकामी से ध्यान भटकाने की उम्मीद की थी, जिसके बारे में माना जा रहा है कि उनके राष्ट्रपति अभियान के लिए संभवत: अभिशाप बनता जा रहा है।

यक़ीक़न, बीज़िंग ने सोचा भी नहीं होगा कि इस चुनावी वर्ष में एक राजनेता के रूप में ‘मज़बूत’ दिखने के लिए ट्रम्प, चीन का इस्तेमाल ग़ुस्सा उतारने वाले देश के तौर पर करेंगे। लेकिन, ट्रम्प प्रशासन के अधिकारी अनुपयुक्त तरीक़े से कूटनीतिक धरातल पर ट्रम्प की सुनियोजित योजना से बाहर जाते हुए तालमेल बनाने के लिए कुछ इस तरह के नज़रिये से आगे बढ़े ताकि  अमेरिकी नेतृत्व में चीन को लेकर भविष्य के शीत-युद्ध जैसी रणनीति की नींव रखी जा सके।

यह पूरी बुनावट इस डरावनी ग़लतफ़हमी पर रची गयी थी कि कोविड-19 महामारी ने चीन को बुरी तरह से कमज़ोर कर दिया है, उसकी आर्थिक प्रगति पटरी से उतर गयी है, और इस वजह से चीन के भीतर सामाजिक असंतोष पैदा हो रहा है और जनता का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से विलगाव हो रहा है, और बतौर नेतृत्व,शी चिनपिंग गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

अमेरिकी धारणा के लिहाज से मौजूदा वक्त ने चीन को बदनाम करने, उसे अलग-थलग करने और अमेरिकी प्रतिद्वंद्वी के रूप में बढ़ते एक महाशक्ति बनने की उसकी संभावनाओं को ख़त्म करने के एक दुर्लभ अवसर के रूप में अपने आपको प्रस्तुत किया है। इस प्रकार, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ (जेम्स मैटिस की जगह लेने वाला अमेरिकी सेना का एक पूर्व सार्जेंट, एक चौकन्ने दिमाग वाला जनरल) की देखरेख में अमेरिकी कूटनीति के मुख्य केन्द्रबिन्दु में चीन विरोधी एजेंडे आ गये।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान जैसे ही ट्रम्प ने अमेरिका-चीन टैरिफ़ युद्ध की शुरुआत की, पोम्पेओ  उस जुनूनी कूटनीतिक एजेंडे में प्रवेश कर गये, जिसे चर्चिल ‘उनके साथ समुद्र में लड़ो’  कहा करते थे, तो इस कूटनीति का विस्तार जहां एक तरफ़ हांगकांग में अशांति के उकसाने से लेकर, उइगर मुसलमानों के कथित दमन पर तीखा हमला, चीन से मुक़ाबला करने के लिए भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ एक गठबंधन प्रणाली बनाने का मज़बूत प्रयास, दक्षिण चीन सागर में तेज़ी से बढ़ते अमेरिकी सैन्य सख़्ती, 1972 की मशहूर ‘वन-चाइना’ नीति प्रतिबद्धताओं से इन्कार, और सोची समझी चाल की एक कड़ी में हुआवेई और चीन की 5 जी तकनीक के ख़िलाफ़ तोहमत लगाने का एक वैश्विक अभियान का रहा, तो वहीं दूसरी तरफ़ अमेरिका-चीन रिश्ते को 'बहुत मज़बूत' करने के लिए एक संभव दीर्घकालिक नीति दृष्टिकोण के भीतर यूएस-चीन द्विपक्षीय सम्बन्धों (हाल ही के आर्थिक प्रतिबंधों और वीजा नियंत्रण सहित) पर पड़ी धूल को व्यापक रूप से साफ़ करके उसे पटरी पर लाना था।

पोम्पिओ के रोड मैप को लेकर चीन का दृष्टिकोण काफ़ी हद तक प्रतिक्रियात्मक रहा है। चीन ने अमेरिका को उकसाने या उसके मूल हितों के ख़िलाफ़ क्षेत्रीय या वैश्विक स्तर पर कार्रवाई करने से परहेज किया है। अमेरिका की तरफ़ से चली गयी चालों के विरोध में चीन ने जो 'चाल' चली हैं, उनमें ख़ास तौर पर शामिल हैं:

  • चीन-रूस संधि को मज़बूती देना;
  • पारस्परिक सम्मान और विश्वास के आधार पर पारस्परिक रूप से लाभकारी साझेदारी के लिए यूरोपीय संघ के सदस्य देशों (विशेष रूप से, जर्मनी और फ़्रांस) के साथ तालमेल;
  • अमेरिका से ख़ुद को 'अलग करने' की स्थिति की तैयारी के लिए नयी आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण;
  • ये-नये आविष्कार और प्रौद्योगिकी के स्वदेशी विकास पर ध्यान केंद्रित करना;
  • जापान के साथ तनाव को कम करना;
  • अपनी वैश्वीकरण नीतियों के ‘क्षेत्रीयकरण’ (ASEAN में अमेरिका की जगह चीन अब पहले स्थान का व्यापारिक भागीदार बन गया है);
  • चीन के नेतृत्व वाले वैश्वीकरण (कोविड-19 महामारी में एक वैश्विक स्वास्थ्य नेता के रूप में ख़ुद को स्थापित करने के लिए हाल ही में एक स्वास्थ्य रेशम मार्ग का खाका खींचने सहित) को प्रोत्साहित करने के लिए BRI का इस्तेमाल करना; और निश्चित रूप से
  • हांगकांग या चीन के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप को पूरी ताक़त के साथ ख़ारिज करना और अपनी 'क्षेत्रीय संप्रभुता' के सामने पेश आ रहे कथित ख़तरों का मुक़ाबला करना'।

बेहद बारीक़ी से चले गये इन चीनी चालों को 'अमेरिकी-विरोधी' के रूप में देखना मुमकिन नहीं है।

हवा में उड़ायी गयी अफ़वाहें

हालांकि,सबसे हाल के हफ़्तों और महीनों में चीज़ें बदलने तब लगीं, जब पोम्पेओ के रोडशो में उस चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) पर लगातार निशाना साधा जाने लगा और उसका तिरस्कार करना शुरू कर दिया गया, जिसकी स्थापना माओ द्वारा एक सदी पहले 1921 में की थी। कहा गया कि इस पार्टी की स्थापना धरती पर सभी बुराईयों के स्रोत के रूप में की गयी थी।

वैचारिक रूप से अमेरिकी कूटनीति इस (झूठ) धारणा को बढ़ाती रही कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का सामाजिक आधार कोरोनोवायरस के दौर में तेज़ी के साथ ख़त्म हुआ है और सत्ता पर शी चिनपिंग की पकड़ बहुत ही कमज़ोर पड़ गयी है, और चीनी क्रांति की इस विरासत को ख़त्म करने का यह एक ऐतिहासिक अवसर उसी तरह का है, जिस तरह 1980 के दशक में पूर्व सोवियत संघ को कमज़ोर करने और बोल्शेविक विरासत को दफ़नाने के लिए अमेरिका ने मौक़े का शानदार ढंग से इस्तेमाल किया था।

असल में अमेरिका के चीन विशेषज्ञों (और भारत में विश्लेषकों के बीच) के बीच प्रचलित धारणा है कि बीजिंग अपने आंतरिक मामलों में अव्यवस्था के कारण इतने भारी दबाव में है कि घरेलू मामलों में ताक़तवर होने और अपनी राजनीतिक स्थिरता के पाखंड को रचने के लिए चीन के नेतृत्व को विदेशों में 'बाहें मरोड़ने' की एक रणनीतिक शैली के इजाद के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

हालांकि, व्यावहारिक रूप से जो सूचनायें हमारे सामने हैं,वह इसके ठीक उलट दिखाती है और वह यह है कि ट्रम्प ख़ुद ही मौजूदा चुनावी वर्ष में कई दबाव में हैं। वह दिखाना चाहते हैं कि वे एक निर्णायक के रूप में 'मजबूत' और सक्षम नेता हैं। उनके सामने अमेरिकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ध्रुवीकरण और गृह युद्ध की स्थितियां मुंह बाये खड़ी हैं और कोविड-19 महामारी, गहरी आर्थिक मंदी, नस्लीय अशांति, और घातक राजनीतिक लड़ाई में फंसी दो-पक्षीय प्रणाली, और राष्ट्र का दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजन का ख़तरा है और वे इससे निपटने में ख़ुद को सक्षम दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

जो बिडेन को अपने नवीनतम चुनावों में 19 अंक की बढ़त मिलती दिख रही है, जो कि ट्रम्प के लिए चुनौतीपूर्ण है। अगर आने वाले हफ़्तों और महीनों में अमेरिका में महामारी ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती है, जिसकी संभावना जतायी जा रही है, तो ट्रम्प का राजनीतिक फ़ैसले, ख़ास तौर पर कोविड-19 के ग्राफ़ के सपाट होने से पहले अर्थव्यवस्था को फिर से खोलने का उनका दुर्भाग्यपूर्ण फ़ैसला गंभीर समीक्षा के दायरे में आ जायेगा।

अप्रत्याशित रूप से चीन का धैर्य चुकने लगा है और चीन की नज़र उसी ट्रम्प पर फिर से जा पड़ी है, जहां उसे निशाना साधना है। सैकड़ों अमेरिकी उत्पादों को ख़रीदने के दायित्व से चीन ख़ुद को तबतक अलग करता रहेगा,जब तक कि ट्रम्प बीजिंग के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण नीतियों से पीछे नहीं हट जाता है।

चीन अच्छी तरह यह जानते हुए बदले पर उतारू है कि कृषि लॉबी ट्रम्प के समर्थन का एक महत्वपूर्ण आधार वर्ग है। ऐसे में चीन का यह रवैया ट्रम्प के लिए एक घातक है। (ट्रम्प विस्कॉन्सिन जैसे महत्वपूर्ण राज्य में बिडेन से पीछे हैं।)

इस बीच हाल ही में जारी किये गये व्यापार डेटा से भी यह बात सामने आने लगी है कि चीन के साथ ट्रम्प के बहु चर्चित 'व्यापार युद्ध' की बैलेंस शीट से पता चलता है कि परिणाम बड़े पैमाने पर व्हाइट हाउस के अनुमान के उलट है।

विडंबना ही है कि पिछले हफ़्ते चीन सम्बन्धी दो कार्नेगी विद्वानों ने बताया, "टैरिफ़ से संयुक्त राज्य के अंतर्निहित व्यापार संतुलन में कोई वास्तविक सुधार नहीं हुआ है, जबकि चीन के व्यापार अधिशेष में वृद्धि हुई है और इसके निर्यात बाजार अधिक विविधतापूर्ण हुए हैं।"

आंकड़ों से पता चलता है कि "चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार घाटे में ट्रम्प की तरफ़ से की जाने वाली कमी अमेरिका के लिए महंगी साबित हुई है,क्योंकि इससे आर्थिक गतिविधि में महत्वपूर्ण रूप से कमी आयी है और सोची समझी योजना के उलट चीन के समग्र व्यापार अधिशेष में बढ़ोत्तरी हुई है।"

जबकि चीन से अमेरिका के साल-दर-साल होने वाले आयात में 87.3 बिलियन डॉलर की कमी आयी है, यह काफी हद तक चीन के समग्र व्यापार अधिशेष को नुकसान पहुंचाने या अमेरिका के विनिर्माण उद्योग में 'ब्लू-कॉलर' उछाल को प्रोत्साहित करने,जिसकी उम्मीद ट्रम्प ने की थी,उसके बजाय ख़ुदरा विक्रेताओं और घरेलू उपभोक्ताओं की जेब पर इन उच्च क़ीमतों का भार पड़ा है।

चीन ने अमेरिका को होने वाले निर्यात में होने वाली गिरावट की भरपाई भी लगभग सभी देश के लिए बिक्री में बढ़ोत्तरी करके कर ली है। अकेले आसियान में चीनी निर्यात 38.5 बिलियन डॉलर बढ़ गया। अमेरिकी उत्पादों के ख़िलाफ़ बदले में लगये गये चीनी टैरिफ़ से चीन के आयात बिल में  33 बिलियन डॉलर की कमी आयी है।

अब इस बात का संकेत मिल रहा है कि अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के बावजूद, चीन का 2019 में कुल व्यापार संतुलन 60 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का था। और यह हालत इस तथ्य के बावजूद है,जिसके बारे में कार्नेगी अध्ययन बताता है,

“2015 में अपने विनिर्माण के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद से चीनी विनिर्माण अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव के चलते वैश्विक विनिर्माण में चीन का प्रभुत्व धीरे-धीरे कम हो रहा है। इन संरचनात्मक बदलावों में कपड़ों और वस्त्रों जैसे निम्न-कौशल निर्माण से इसकी निरंतर बढ़ोत्तरी, अंतिम रूप से एसेंबल करने के लिहाज से एक स्थान के रूप में चीन की भूमिका में गिरावट, और उपभोग और सेवाओं के प्रति असंतुलन, जो पूंजी निवेश की तुलना में कम व्यापार-प्रमुखता वाले क्षेत्र हैं।”

स्पष्ट रूप से ऊपर जिन रुझानों की बात की गयी है,वह इस बात को रेखांकित करता है कि अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध और महामारी से प्रेरित आपूर्ति श्रृंखला में हुआ बदलाव केवल उन रुझानों में और तेज़ी लायेगा, जिसे बीजिंग ने मझौले आर्थिक देश के रूप में अपनी आर्थिक रणनीति के तौर पर ख़ुद के लिए निर्धारित किये हैं।

संक्षेप में कहा जा जाय,तो व्यापार घाटे को कम करने और चीन की आर्थिक संभावनाओं को कमज़ोर करने के ट्रम्प के लक्ष्य अभी तक हक़ीक़त नहीं बन पाये हैं। निवेश, खपत, और मूल्य स्तरों को देखते हुए चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका से व्यापार और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिहाज से काफी प्रभावित नहीं हुई है।

आज जिन किसी भी कारण से चीन की अर्थव्यवस्था पीड़ित है, उसके पीछे ट्रम्प के किये गये उपाय का हाथ नहीं है, बल्कि जैसा कि किसी चीनी विद्वान ने हाल ही में लिखा है, "इसका कारण घरेलू आपूर्ति और मांग के बीच गिरावट, भूमि वित्तपोषण के कारण पैदा होने वाला वित्तीय बुलबुला, जिसे समाज पूरी तरह पचा नहीं पा रहा है और लंबे समय से लगातार जारी केंस के कुल मांग प्रोत्साहन नीति और M2 (प्रति मौद्रिक स्कूल सिद्धांत) की हद से कहीं ज़्यादा निरंतरता के बीच ऊबड़-खाबड़ आर्थिक चक्र है। "

युद्ध कोई विकल्प नही

कहा तो यह भी जाता है कि बीजिंग ने शक्तिशाली चीनी पोलित ब्यूरो सदस्य और शीर्ष राजनयिक यांग जीची और अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ के बीच हवाई में 17 जून को हुई बैठक में आगे नहीं बढ़ने की सीमा रेखा खींचने के दौरान ही अपना अनुमान लगा लिया था। (देखें मेरा ब्लॉग, व्यापार समझौते को जोखिम में नहीं डालने की ट्रम्प को चीन की चेतावनी।)

इस मामले की ख़ास बात यही है कि चूंकि आज आर्थिक ताक़त के लिहाज से चीनी और अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं के बीच कोई बड़ी ग़ैर-बराबरी नहीं है, इसलिए चीन के ख़िलाफ़ युद्ध अब वाशिंगटन के लिए कोई विकल्प नहीं रह गया है। ट्रम्प का व्यापार युद्ध, विज्ञान और प्रौद्योगिकी युद्ध या विचारधारा का युद्ध, इन सभी से अब चीन और अमेरिका के बीच की ताक़त पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि यह फ़र्क़ तेज़ी के साथ कम हो रहा है।

बल्कि, इसके विपरीत, महामारी के प्रकोप ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है, क्योंकि अमेरिकी स्टॉक बाज़ार के लिहाज से यह बात अब सामने आ चुकी है, जैसा कि हम जानते हैं कि मार्च के बाद की अवधि में अमेरिकी स्टॉक बाज़ारों के सर्किट-ब्रेकर प्रणाली को सक्रिय कर दिया गया है। इसके अलावा, बेहद उच्च बेरोज़गारी दर और 1,00,000 से ज़्यादा अमेरिकियों की मौत का मिला जुला प्रभाव अमेरिका की सामाजिक स्थिरता पर बहुत घातक होने वाला है।

भू-राजनीतिक सतह पर भारत और ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर चीन की राह में रुकावट डालने वाली ट्रम्प की रणनीति के साथ कोई और नहीं हैं। अमेरिका को अलग-थलग करने वाली जो बात है, वह यह है कि यूरोपीय संघ और चीन के बीच ज़ोरदार आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद यूरोप के सहयोग और चीन के साथ साझेदारी पर ज़ोर देने के साथ-साथ अपने विशिष्ट हितों को आगे बढ़ाने के लिए चीन की ओर एक स्वतंत्र क़दम बढ़ा रहे हैं।

यूरोपीय संघ ज़ोर देकर कहता है कि चीन के साथ संलग्नता और उसका संचालन करना इस समय के "अवसर और एक ज़रूरत" दोनों हैं, जबकि चीन के अनुचित तौर-तरीक़ों को दुरुस्त किये जाने के मज़बूत प्रयास भी जारी रहेंगे। असल मुद्दा यह है कि यूरोप व्यापार और निवेश के लिहाज से चीन पर बहुत अधिक निर्भर है और यूरोप, अमेरिका की जुनूनी भू-राजनीति में साझेदारी नहीं कर सकता है और न ही करेगा। यूरोप चीन के ख़िलाफ़ किसी भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में भाग नहीं लेगा। यहां तक कि अपने बयानबाज़ी में भी यूरोपीय नेताओं ने चीन को लेकर किसी तरह के टकराव, हठ, दंडात्मक मुहावरे से हमला करने से परहेज किया है। अहम बात तो यह है कि यूरोपीय देशों के भीतर ट्रम्प प्रशासन को लेकर गहरे में अविश्वास बैठा है और वे ट्रम्प को अविश्वसनीय और अप्रत्याशित मानते हैं।

यह कहना पर्याप्त होगा कि ट्रम्प प्रशासन की चीन को दबाने की मौजूदा नीति और प्रभावी रूप से उस देश की व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के और अधिक विकास का कोई भविष्य नहीं है। ट्रम्प को एक ऐसे 'हारे हुए शख़्स' के रूप में देखा जाना चाहिए, जो कड़वाहट के साथ नफ़रत फैलाता रहा है। उनकी कड़वाहट दिखती भी है। यह कड़वाहट हाल में दिये गये ट्रम्प की उस व्यक्तिगत टिप्पणी में भी दिखी है, जो इस हफ़्ते व्हाइट हाउस में उनके ग़ैर-मामूली ग़ुस्से के रूप में सामने आयी है। ट्रम्प ने शी चिनपिंग की तुलना जोसफ़ स्टालिन के साथ करते हुए एक तानाशाह और एक छंटा हुआ मार्क्सवादी-लेनिनवादी बताया, ये शब्द ट्रम्प की राजनीतिक शब्दाववली के चरम के हल्के शब्द थे

विरोधी पर हमला करने की कला एक अलग बात है, यह कहकर ट्रम्प ने जता दिया है कि वे एक ऐसे यथार्थवादी है, जिन्हें शायद मालूम है कि अपने पहले कार्यकाल के दौरान चीन के ख़िलाफ़ उनकी दमन की प्रशासनिक नीति न सिर्फ़ उनके चुनाव की संभावनाओं को बढ़ाने को लेकर वांछित नतीजे तक पहुंचाने में नाकाम है, बल्कि चीनी अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा को किसी भी तरह से गंभीर नुकसान पहुंचाने की उनकी मंशा को भी धक्का लगा है। अगर ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल के लिए जीत जाते हैं, तो यह एहसास उन्हें अपनी चीन नीति को समायोजित करने के लिए प्रेरित कर सकता है। एक नयी विदेश-नीति वाली नयी टीम के साथ एक नयी शुरुआत संभव है और चुनावी मजबूरियों के दिखावे की भी तब उन्हें कोई ज़रूरत नहीं होगी। अगर ऐसा होता है, तो चीन किसी भी संधि-प्रस्ताव का अनुकूल जवाब देगा।

दूसरी तरफ़, अगर बिडेन राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत जाते हैं, तो वास्तव में एक ज़बरदस्त बदलाव का होना लगभग निश्चित है। बिडेन की चीन नीति के तर्कसंगत और व्यावहारिक होने की उम्मीद की जा सकती है, हालांकि वह बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहने के दौरान एशिया में ‘पुनर्संतुलन’ रणनीति के शिल्पियों में से एक थे। आम तौर पर बिडेन और डेमोक्रेट्स का अमेरिका-चीन के बीच कम होते ताक़त के अंतर के साथ इस समस्याग्रस्त अवधि में चीन के साथ आगे बढ़ने को लेकर अपेक्षाकृत अधिक सकारात्मक और खुला रवैया रहा है।

संवाद के रास्ते फिर से खुलेंगे, जो ट्रम्प के राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उस रवैये की जगह लेगे, जिसमें संवाद की संभावना ख़त्म हो गयी है और जो एक अस्तित्ववादी ख़तरे के सिलसिले में चीन को किसी शैतान की तरह देखता है। बिडेन के राष्ट्रपति पद पर आते ही अमेरिका-चीन सम्बन्धों के पूरे माहौल में निश्चित ही रूप से सुधार हो सकता है। हालांकि अमेरिका और चीन के बीच उच्च तकनीकी क्षेत्रों और वैश्विक मानकों को स्थापित करने क्षेत्रों में उग्र प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी, क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था त्वरित तकनीकी प्रगति और नये प्रयोगों का युग है, जिनके तेज़ी से इस्तेमाल और प्रसार से समाज में अचानक बदलाव होते हैं।

कुल मिलाकर लब्बोलुआब यही है कि यूरोपीय देशों की तरह बिडेन भी जलवायु परिवर्तन, नस्लीय मुद्दे, सामाजिक न्याय, महामारी के बाद घरेलू आर्थिक सुधार आदि जैसे उन आंतरिक मुद्दों पर ध्यान देंगे, जो एक ऐसे व्यूह की रचना करते हैं जिसमें बीजिंग के साथ सहयोग और समन्वय एक रणनीतिक ज़रूरत बन जायेगा और चीन का मौजूदा अमेरिकी आर्थिक और तकनीकी दमन एक बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में घरेलू मुद्दों से निपटने की प्राथमिकता के लिहाज से संयमित होने के लिए मजबूर होगा।

सौजन्य: इंडियन पंचलाइन

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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    क्षेत्रीय नेताओं के लिए शुरूआती बिंदु होना चाहिए कि, वे इस मूल वास्तविकता को आंतरिक करें कि दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे असमान और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में से एक है।
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CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License