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चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका की तकनीकी जंग और 5G की युद्धभूमि
कई तकनीकी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ह्यूवेई का खेल ख़त्म हो चुका है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। ह्यूवेई ने दो बार खेल को खत्म होने से टाला है। पहली बार जब गूगल ने उन्हें एंड्रॉयज सिस्टम का उपयोग करने से रोक दिया, दूसरी बार जब ARM प्रोसेसर का प्रतिबंध लगाया गया।
प्रबीर पुरकायस्थ
03 Aug 2020
अमेरिका की तकनीकी जंग

अमेरिका का चीन पर तकनीकी युद्ध जारी है। अमेरिका, चीनी उपकरणों को अपने नेटवर्क में प्रतिबंधित कर रहा है। अमेरिका अपने "5-आइज़ पार्टनर्स" और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के सहयोगी देशों पर भी ऐसा करने के लिए दबाव बना रहा है। बाज़ार और तकनीक को नकारने वाली यह प्रतिबंध व्यवस्था, उस बाज़ार को वापस पाना चाहती है, जिसे अमेरिका और यूरोप चीन से हार चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार मानता है कि दुनिया के किसी भी हिस्से से उपकरण और माल इकट्ठे किए जा सकते हैं। इस नियम का पहला उल्लंघन ह्यूवेई पर पिछले साल लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंध थे। इन प्रतिबंधों के तहत यह प्रावधान किया गया कि जो भी कंपनी 25 फ़ीसदी से ज़्यादा अमेरिकी सामग्री का इस्तेमाल करती है, उसे ह्यूवेई पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करना होगा। इसका मतलब हुआ कि अमेरिकी डिज़ाइन पर बने सॉफ्टवेयर और चिप्स का ह्यूवेई को निर्यात नहीं किया जा सकेगा। 

इस साल मई में नए प्रतिबंध लगाए गए। इनके ज़रिए अब अमेरिकी उपकरणों का इस्तेमाल कर बनाए गए अंतिम उत्पादों को भी अपनी सीमा में ले लिया गया है। इस तरह इन प्रतिबंधों की पहुंच अमेरिकी की सीमाओं से भी परे हो चुकी है।

व्यापारिक वैश्वीकरण के पिछले तीन दशकों में अमेरिका ने निर्माण को दूसरे देशों से आउटसोर्स करवाया है। लेकिन इसके बावजूद दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अमेरिका ने वैश्विक वित्त, बैंक, भुगतान व्यवस्था, बीमा और निवेश निधियों के ज़रिए मजबूत नियंत्रण रखा है। ताजा प्रतिबंधों से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी नियंत्रण की एक और परत का खुलासा हुआ है; यह परत तकनीक की है, जिसमें चिप निर्माण में बौद्धिक संपदा और अहम निर्माण उपकरण शामिल हैं।

अमेरिका ने जो नए प्रतिबंध लगाए हैं, वह विश्व व्यापार संगठन के नियमों के खिलाफ़ जाते हैं। अमेरिका ने WTO में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कड़े विकल्प का सहारा लिया है, जबकि पूरा मामला व्यापार के मुद्दे से जुड़ा है। फिलहाल चीन अवैध अमेरिकी प्रतिबंधों का विवाद सुलझाने के लिए WTO में नहीं जा सकता। क्योंकि विवादों का निपटारा करने वाली ईकाई को अमेरिका लगभग निर्जीव बना चुका है। अब यह बात बहुत हद तक साफ़ हो चुकी है कि आखिर क्यों अमेरिका WTO में डिस्प्यूट सेटलमेंट ट्रिब्यूनल (विवाद निपटारा पीठ) के नए नामों पर सहमति नहीं दे रहा है। 

ह्यूवेई और 5G अब एक नया मैदान बन चुका है, जहां अमेरिका और चीन की तकनीकी जंग (टेक वार) लड़ा जा रहा है। 5G नेटवर्क बाज़ार के 2027 तक 48 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन ज़्यादा अहम बात यह है कि उस वक़्त तक 5G नेटवर्क अपने ऊपर कई ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक गतिविधियां चला रहा होगा। 5G टेक्नोलॉजी पर जिस भी कंपनी या देश का नियंत्रण होगा, उसे दूसरे देशों पर आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में बढ़त हासिल होगी। 

इंटरनेट वह आधार है, जिस पर भविष्य की लगभग सभी तकनीकें निर्भर होंगी। 5G नेटवर्क से वायरलेस इंटरनेट की गति 10 से 40 गुना ज़्यादा तक बढ़ाई जा सकती है। उपभोक्ताओं के लिए धीमा इंटरनेट कई एप्लीकेशन्स को चलाने में बाधा बनता है। इन एप्लीकेशन्स में 'वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग' और 'मल्टीप्लेयर ऑनलाइन गेमिंग' शामिल है, जिसमें अपलोड और डॉउनलोड, दोनों की गति तेज होने की जरूरत पड़ती है। यह इंटरनेट पर वीडियो (जैसे नेटफ्लिक्स पर) देखने से अलग है। यहां केवल डॉउनलोड स्पीड की ही जरूरत पड़ती है। 5G नेटवर्क से तेज गति का इंटरनेट, ज़्यादा बड़े इलाके तक फैल पाएगा।

5G से दो दूसरे क्षेत्रों में भी बहुत फायदा होगा। इनमें चालकविहीन कार और 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)' शामिल हैं। IoT में हमारे गैजेट्स वायरलेस नेटवर्क के ऊपर एक-दूसरे से बातचीत करेंगे। जहां चालकविहीन कार अब भी दूर की कौड़ी है, वहीं IoT ज़्यादा अहम साबित हो सकता है। भविष्य की स्मार्ट सिटीज़ में बिजली, ट्रैफिक लाइट्स, पानी और सीवेज सिस्टम की कार्यक्षमता में  IoT के ज़रिए इज़ाफा हो सकता है। इन्हें नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। 

G का मतलब टेलीकॉम क्षेत्र में 'जेनरेशन' से होता है। वायरलेस कम्यूनिकेशन में हर जेनरेशन, रेडियो तरंगों द्वारा ले जा सकने वाली जानकारियों की मात्रा की प्रतिनिधि होती है। 5G नेटवर्क, 4G नेटवर्क से ज़्यादा तेज होते हैं। तुलनात्मक तौर पर किसी एक इलाके में ज़्यादा संख्या में डिवाइस को 5G नेटवर्क पर चलाया जा सकता है। लेकिन 5G, लंबी दूरी तक यात्रा नहीं कर सकता। इसे आगे बढ़ने के लिए कम अंतराल पर "एंटीना, सेल्स या हॉप्स" की जरूरत पड़ती है। 5G नेटवर्क बिना केबल डाले हुए, ठीक वही गति उपलब्ध करवा सकता है, जो हम फॉयबर नेटवर्क के ज़रिए पाते हैं। इस तरह यह कम घनी आबादी वाले ग्रामीण इलाकों में पहुंचकर ज़्यादा तेज इंटरनेट गति, कम कीमत पर उपलब्ध करवा सकता है। 

5G स्पेस में दूसरे खिलाड़ी कौन हैं? ह्यूवेई के अलावा दूसरे खिलाड़ी सैमसंग (दक्षिण कोरिया), नोकिया (फिनलैंड), एरिकसन (स्वीडन) और ZTE (चीन) हैं। एक तरफ नेटवर्क उपकरण स्तर पर कोई भी बड़ी अमेरिकी कंपनी नहीं है, लेकिन वहां की कंपनी क्वॉलकॉम वायरलैस उपकरण और चिपसेट बनाती है और स्मार्टफोन में ऐपल बाज़ार की अग्रणी कंपनी है।

अमेरिकी ने पहले सॉफ्टवेयर में अपनी प्रभावी स्थिति का इस्तेमाल करते हुए, प्रतिबंधों के ज़रिए ह्यूवेई पर हमला किया। गूगल का एंड्रॉयड चीन के ज़्यादातर मोबाइल फोन में इस्तेमाल किया जाता है, बिलकुल वैसे ही जैसे ज़्यादातर गैर-ऐपल फोन में बाकी जगह उपयोग होता है। मोबाइल और एंबेडेड सिस्टम के बाज़ार में सेमीकंडक्टर चिप्स में ARM प्रोसेसर आगे हैं। अब ज़्यादा विकसित स्तर के प्रोसेसर की मांग वाली कंपनियां इंटेल से ARM की ओर आ रही हैं। ARM ब्रिटेन की एक कंपनी है, लेकिन इसका मालिका जापान का सॉफ्टबैंक है। यह कंपनी सीधे चिप्स नहीं बनाती, लेकिन प्रोसेसर में लगने वाले "कोर" की डिज़ाइन तैयार कर देती है। फिर इन्हें ह्यूवेई, क्वॉलकॉम, सैमसंग और ऐपल जैसी कंपनियों को लाइसेंस पर दिया जाता है, जो अपने दो, चार या फिर आठ ARM कोर पर आधारित प्रोसेसर बनाती हैं। फिर इन्हें सिलिकॉन ढलाईखानों में बनाने के लिए भेजा जाता है। यही प्रोसेसर मोबाइल नेटवर्क उपकरणों, मोबाइल और लैपटॉप्स को चलाते हैं 

ताइवान सिलिकॉन मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) जैसी कंपनियां ARM कोर का इस्तेमाल कर ह्यूवेई, सैमसंग या ऐपल द्वारा बनाई गई डिज़ाइन पर आधारित अंतिम प्रोसेसर बनाती हैं। TSMC दुनिया की सबसे बड़ी सिलिकॉन ढलाईखाना है, जहां इस क्षेत्र के वैश्विक बाज़ार का 48 फ़ीसदी काम होता है। सैमसंग के पास भी बड़ी क्षमता वाला सिलिकॉन ढलाईखाना है, जहां वैश्विक बाज़ार का करीब 20 फ़ीसदी काम होता है। यह अपनी इन क्षमताओं का खुद की जरूरतों को पूरा करने में उपयोग करता है। लेकिन कुछ निर्माण दूसरी कंपनियों के लिए भी किया जाता है। चीन में सेमीकंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन (SMIC) नाम से दुनिया का पांचवी सबसे बड़ा ढलाईखाना है। लेकिन यह TSMC की क्षमता का महज़ दस फ़ीसदी ही है। TSMC और सैमसंग के पास 7 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी (चिप्स में 7 नैनोमीटर आकार का ट्रांजिस्टर) है, जबकि SMIC के पास फिलहाल 14 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी ही है।

ह्यूवेई और चीन पर शुरुआती हमले का मतलब यह हुआ कि ह्यूवेई को गूगल के एंड्रॉयड मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम और गूगल के ऐप स्टोर में उपलब्ध दूसरे एप्लीकेशन्स से हटना पड़ेगा। ह्यूवेई ने इस हमले का अनुमान लगा लिया था और अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम हॉरमनीOS और खुद का ऐप स्टोर- ऐप गैलरी बना लिया था। ह्यूवेई के ग्राहक गूगल ऐप स्टोर के बिना कैसे व्यवहार करते हैं, यह तो वक़्त ही बताएगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या बड़ी संख्या में ऐप डिवेल्पर 'ऐप गैलरी' की तरफ आते हैं या नहीं। यह चाइनीज़ ऐप मेकर्स की गुणवत्ता पर भी निर्भर करेगा, जो चाइनीज़ बाज़ार में खुद को साबित भी कर चुके हैं।

शुरुआत में सोचा गया कि भविष्य में ह्यूवेई के लिए ARM प्रोसेसर उपलब्ध नहीं होंगे। इससे ह्यूवेई के उपकरणों पर सवालिया निशान खड़ा हो गया, क्योंकि कंपनी अपने नेटवर्किंग इक्विपमेंट्स, मोबाइल फोन और लैपटॉप के लिए ARM प्रोसेसर पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। ARM ने शुरुआत में ह्यूवेई को प्रोसेसर की आपूर्ति पूरी तरह रोक दी, क्योंकि अमेरिका ने कहा कि ARM में 25 फ़ीसदी से ज़्यादा अमेरिकी सामग्री है और यह अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आता है। बाद में ARM ने पाया कि अमेरिकी सामग्री 25 फ़ीसदी से कम है, इसलिए यह अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आता।

इन्हीं चीजों के चलते अमेरिका ने नए प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों के तहत, अगर अमेरिका में बनाया गया कोई भी उपकरण, जो ह्यूवेई के लिए कोई भी हिस्सा या ढांचा बनाता है, तो वह भी अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत आता है। TSMC चिप्स बनाने के लिए अमेरिका में बनाई गई मशीनों का इस्तेमाल करती है और अब ह्यूवेई से ऑर्डर लेना बंद कर चुकी है। सैमसंग के पास अमेरिकी मशीनों और गैर अमेरिकी मशीनों का मिश्रण मौजूद है। अगर कंपनी चाहे तो अपने उत्पादन के कुछ हिस्से में सिर्फ़ गैर अमेरिकी मशीनों का ही इस्तेमाल कर सकती है। इससे ह्यूवेई के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों से पार पाने का ज़रिया मिल जाता है। ह्यूवेई के पास अब भी कुछ विकल्प मौजूद हैं। ह्यूवेई, ऊंची कीमत वाले मोबाइल फोन के बाज़ार को सैमसंग के लिए छोड़ सकती है, बदले में ह्यूवेई, सैमसंग की उत्पादन सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकती है। 

अगर ह्यूवेई को सिर्फ़ घरेलू स्त्रोतों पर ही निर्भर रहने की नौबत आ जाए, तो भविष्य में इसके उत्पादन पर प्रभाव पड़ सकता है। कंपनी के पास फिलहाल 12 से 18 महीने के उत्पादन के लिए चिप्स का भंडार मौजूद है, इसलिए इसी वक़्त में कंपनी को नया आपूर्तिकर्ता खोजना होगा या फिर कम घनत्व वाली 10 से 14 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करना होगा, जिसकी आपूर्ति SMIC कर सकता है।

लेकिन 5G बाज़ार के लिए सिर्फ़ 7 नैनोमीटर वाली टेक्नोलॉजी ही अहम तत्व नहीं है। ह्यूवेई के पास रेडियो और एंटीना की तकनीक के मामले में बहुत बढ़त मौजूद है, जिनका इस्तेमाल 5G नेटवर्क में होता है। 5G नेटवर्क बड़े स्तर के मल्टी-इन्पुट मल्टी-आउटपुट (MIMO) एंटीना पर निर्भर होते हैं। इस क्षेत्र में ह्यूवेई दूसरी कंपनियों से कोसों आगे है। प्रोसेसर के आकार से इतर, यह चीज ह्यूवेई द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में बड़ी तकनीकी बढ़त दिलवा देती है। नोकिया और एरिक्सन इंटेल चिप्स का इस्तेमाल करते हैं, जो ARM प्रोसेसर की टक्कर में ही नहीं हैं। ह्यूवेई की मदद के साथ चीन की SMIC जल्द ही 10 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी तक पहुंच बना लेगी, इसलिए SMIC के प्रोसेसर और दूसरे प्रोसेसर के बीच का अंतर कम हो जाएगा।

ह्यूवेई 5G के लिए सारी सेवाएं उपलब्ध करवा सकती है, इनमें 5G मोबाइल फोन से लेकर नेटवर्क तक शामिल हैं। ह्यूवेई दूसरी कंपनियों की तुलना में इन्हें ज़्यादा तेजी से ज़मीन पर स्थापित भी कर सकती है। ह्यूवेई का घरेलू बाज़ार दुनिया के किसी भी 5G बाज़ार से बड़ा है। इससे ह्यूवेई अपने विकास का आधार बना सकती है।

कई तकनीकी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ह्यूवेई का खेल खत्म हो चुका है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। ह्यूवेई ने दो बार खेल को खत्म होने से टाला है। पहली बार जब गूगल ने उन्हें एंड्रॉयज सिस्टम का उपयोग करने से रोक दिया, दूसरी बार जब ARM प्रोसेसर का प्रतिबंध लगाया गया। अब इन नए प्रतिबंधों के ज़रिए अमेरिका ने कुछ पश्चिमी खिलाड़ियों को तात्कालिक बढ़त हासिल करवा दी है, लेकिन इनसे अमेरिका से बाहर के निर्माणकर्ताओं को एक प्रोत्साहन भी मिला है कि वे अमेरिकी उपकरणों से दूर हटकर अपनी क्षमताएं विकसित करें। इस तरह के प्रतिबंध हमेशा दोधारी तलवार होते हैं।

तो इस तकनीक युद्ध में ह्यूवेई और चीन का खेल अब भी बरकरार है। दरअसल इस खेल का नतीज़ा राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़ी ताकतें तय करेंगी। किसी भी जंग की तरह, यहां भी सिर्फ़ एक लड़ाई से पूरी जंग का नतीज़ा तय नहीं हो जाएगा। इस जंग में अभी तो कई लड़ाईयां होना बाकी हैं। उन बाकी लड़ाईयों में से कई में चीन की स्थिति मजबूत है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

The US Tech War on China and the 5G Battlefield

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