NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिकी लालच से पैदा हुआ रूस और यूक्रेन का तनाव, दुनिया पर क्या असर डाल सकता है?
अमेरिका के लालच से पैदा हुआ रूस और यूक्रेन का तनाव अगर बहुत लंबे समय तक चलता रहा तो दुनिया के बहुत से मुल्कों में आम लोगों के जीवन जीने की लागत बहुत महँगी हो जाएगी।
अजय कुमार
24 Feb 2022
russia ukrain
Image courtesy : istock

रूस और यूक्रेन की तनातनी युद्ध में तब्दील हो गई है। खबर लिखे जाने तक 40 यूक्रेनी सैनिक, 50 रूसी सैनिक और 6 फाइटर जेट तबाह होने की खबर आ रही है। रूस और यूक्रेन के बीच का तनाव बहुत लंबे समय तक चलता रहा तो इसका असर रूस और यूक्रेन सहित दुनिया के हर एक इलाके पर पड़ेगा। लेकिन इसका सबसे अधिक खतरनाक परिणाम यूक्रेन को झेलना पड़ेगा। यूक्रेन पर यह कहर बनकर टूटेगा।

यूक्रेन की स्थापना 1991 में हुई थी। तब से लेकर अब तक उसकी अर्थव्यवस्था की जीडीपी ने बढ़ोतरी हासिल करने की बजाय 20% की कमतरी हासिल की है। उसकी अर्थव्यवस्था आर्थिक वृद्धि के मामले में कदम आगे रखने की बजाय कदम पीछे रख रही है। वह नेगेटिव ग्रोथ से जुड़ने वाला दुनिया की 5 सबसे बुरी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।

जिंदल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर अनुराधा लिखती हैं कि यूक्रेन पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा है। वहां महंगाई दर बहुत ज्यादा है। रूस से सप्लाई होने वाले गैस का कर्ज बहुत ज्यादा है। तेल के लिए वह पूरी तरह से रूस पर निर्भर देश है। यह एक ऐसा देश है जिसे रूसी समर्थक और रूस विरोधी भावनाओं की प्रबलता ने देश को भीतर से बर्बाद करने का काम किया है। लोगों के बीच रूस और अमेरिका को लेकर मौजूद ध्रुवीकरण ने बहुत अधिक जाहर घोला है। अगर ऐसा देश युद्ध की भेंट चढ़ता है तो पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा। दुनिया के सामने मानवता को लेकर ढेर सारी चुनौतियां हैं, दुनिया को चाहिए कि किसी भी तरह से वह यूक्रेन जैसे देश को बर्बाद होने से रोक ले।

रूस पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं लेकिन अगर दुनिया इससे भी अधिक कठोर प्रतिबंध लगाती हैं तो रूस पर तो इसका असर पड़ेगा ही पड़ेगा लेकिन दुनिया के दूसरे मुल्कों पर भी इसका खतरनाक असर पड़ेगा। रूस, वेनेजुएला और ईरान की अर्थव्यवस्था की तरह नहीं है बल्कि ऊर्जा संसाधनों के मामले में दुनिया की सशक्त अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यूरोप के मुल्कों में रूस की तरफ से जितना निर्यात किया जाता है उससे कम आयात किया जाता है। यानी असर यूरोप और अधिक पड़ेगा और रूस पर कम।

रूस दुनिया का सबसे बड़ा दूसरा तेल निर्यातक और तीसरा तेल उत्पादक देश है। रूस से हर रोज तकरीबन 50 लाख बैरल तेल का निर्यात होता है। इसमें से 48% खरीद यूरोप की होती है। तो तकरीबन 42% खरीद एशिया की होती है। रूस और यूक्रेन की तनातनी की वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति डॉलर बैरल तक पहुंच गई है। ओपेक के देशों ने पहले ही समझौता किया है कि वह अधिक कच्चे तेल का उत्पादन नहीं करेंगे। मतलब कीमतें और अधिक बढ़ने वाली हैं। भारत जैसा देश अपनी जरूरतों का तकरीबन 80% कच्चा तेल दूसरे देशों से आयात करता है। यानी रूस और यूक्रेन की तनातनी का प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था में रुपए के गिरते मूल्य पर कहर ढाने के लिए आगे बढ़ रहा है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी तो पेट्रोल डीजल रसोई गैस बिजली उर्वरक सब महंगा होगा। जब एनर्जी सेक्टर महंगा होगा तो जीवन जीने की लागत महंगी होगी। यानी अमेरिका के लालच से पैदा हुआ रूस और यूक्रेन का संकट भारत के आम लोगों पर कहर बनकर टूट सकता है। इसके अलावा रूस एल्युमीनियम और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों का महत्वपूर्ण उत्पादक देश है।

दुनिया के अनाज की सप्लाई में रूस और यूक्रेन महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। काला सागर की सीमा रूस और यूक्रेन से लगती है। इसी काला सागर से होकर युरोप के मुल्कों में अनाज की सप्लाई होती है। अगर रूस और यूक्रेन की तनातनी बढ़ती जाती है तो इसका असर पूरी दुनिया के अनाज की सप्लाई पर पड़ेगा। अनाज की कीमतें महंगी होंगीं। 

अगर आर्थिक संबंधों की बात करें तो रूस और भारत के आर्थिक संबंध बहुत गहरे हैं। रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर देश है। 2020 में तकरीबन 50% हथियार भारत के रूस से आए थे। पिछले 3 सालों में भारत और रूस के बीच रक्षा व्यापार समझौता तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का हुआ है। भारत चाहता है कि रूस के साथ व्यापार संबंध बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का पहुंच जाए। ऐसे में भारत आसानी से रूस के खिलाफ नहीं जा सकता।

जहां तक रूस पर लगे प्रतिबंधों की बात है तो आर्थिक जानकारों का कहना है कि यूक्रेन के पूर्वी हिस्से को स्वतंत्र देश की मान्यता देने के बाद यह अपेक्षा की जा रही थी कि अमेरिका और यूरोप के सशक्त देश रूस पर बहुत अधिक कड़े प्रतिबंध लगाएंगे। लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों की प्रकृति देखकर ऐसा लगता है कि बहुत ने कड़े प्रतिबंध नहीं हैं, जिनकी आबोहवा पूरी दुनिया रूस पर बना रही थी। पूरे रूस पर प्रतिबंध लगने की बजाए रूस की उन कंपनियों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया गया है जिनकी नजदीकियां राष्ट्रपति पुतिन के साथ गहरी मानी जाती हैं। जो राष्ट्रपति पुतिन के नेता और कारोबारी गठबंधन का हिस्सा है। रूस के बड़े नेताओं की आवाजाही और कारोबार पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया गया है। रूस के कुछ बैंकों पर प्रतिबंध लगाया गया है।

इन प्रतिबंधों पर आर्थिक जानकारों का कहना है कि रूस पर इसका असर तो पड़ेगा लेकिन बहुत गहरा असर नहीं पड़ेगा। रूस इस संभावना के साथ बहुत पहले से जीता आया है कि उसके ऊपर आर्थिक प्रतिबंध लग सकते हैं। इसलिए उसने अपने आप को इसके लिए तैयार भी कर के रखा है। उसके पास अच्छा खासा फॉरेक्स रिजर्व है। यानी अच्छा खासा विदेशी मुद्रा का भंडार है। उसने अपनी मुद्रा को डॉलर के मुकाबले मजबूत करने की भरपूर कोशिश की है। इस वजह से रूस को बहुत गहरा असर पड़ने की संभावना नहीं दिखाई दे रही। हाल फिलहाल की स्थिति यह है कि प्रतिबंध लगने के बाद रूस के स्टॉक मार्केट गिरने के बजाय बढ़ गई। सबसे बड़ी बात यह कि यूरोप के ऑस्ट्रिया और इटली जैसे देश के बैंकों का बहुत बड़ा पैसा रूस में लगा हुआ है। इसलिए अमेरिका के दबाव के बावजूद भी यूरोप के देश रूस को अंतर्राष्ट्रीय बैंक की व्यवस्था से काटने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं।

इन प्रतिबंधों में सबसे अधिक चर्चा नॉर्ड स्ट्रीम पर रही। अब बात चली है तो बात को ठीक से समझने के लिए नॉर्ड स्ट्रीम की भी चर्चा कर लेते है। नॉर्ड स्ट्रीम, समुद्र के नीचे सबसे लंबी एक निर्यात गैस पाइपलाइन परियोजना है, जो बाल्टिक सागर के रास्ते होकर रूस से यूरोप तक गैस ले जाती है। इस परियोजना को शुरू हुए तकरीबन 7-8 साल हो गए। यूरोप की प्राकृतिक गैस की जरूरतों को रूस पूरा करता है। लेकिन यह जरूरतें यूक्रेन ओर पोलैंड के जरिए पूरी होती हैं। यूक्रेन और पोलैंड की ट्रांजिशन फीस के तौर पर अच्छी खासी कमाई होती है। अगर नॉर्ड स्ट्रीम की शुरुआत होती है तो यूक्रेन की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को और अधिक धक्का पहुंचेगा। अमेरिका को लगता है कि अगर नॉर्ड स्ट्रीम बन जाता है तो यूरोप के मुल्कों की निर्भरता रूस पर बहुत अधिक बढ़ जाएगी। अगर नॉर्ड स्ट्रीम नहीं बनता है तो प्राकृतिक गैस पहुंचाने का जरिया यूक्रेन रहेगा। यूक्रेन की वजह से अमेरिका का हस्तक्षेप यूरोप के मुल्कों पर रहेगा। रूस के यूक्रेन के पूर्वी इलाके के प्रांतों के लिए उठाए गए कदम की वजह से हाल फिलहाल नॉर्ड स्ट्रीम परियोजना को रोक दिया गया है। 

अंतरराष्ट्रीय जानकारों का कहना है कि अमेरिका की हथियार लॉबी को छोड़कर दुनिया के तकरीबन सभी मुल्क यह चाहते हैं कि यूक्रेन और रूस के बीच की तनातनी शांति में बदल जाए। वह नहीं चाहते कि दुनिया एक ध्रुवीय या द्वि ध्रुवीय व्यवस्था में बदल जाए। यह पूरी तरह से साफ है कि सदी की चुनौतियां जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक तंत्र में हो रहे परिवर्तन, महामारी और सामाजिक न्याय से जुड़ी हुई चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों पर काम करने की बजाय युद्ध में शामिल होना दुनिया को अंधकार में धकेलने जैसा होगा।

ये भी पढ़ें: यूक्रेन की बर्बादी का कारण रूस नहीं अमेरिका है!

Russia
ukraine
Russia-Ukraine crisis America
vladimir putin
Joe Biden

Related Stories

बाइडेन ने यूक्रेन पर अपने नैरेटिव में किया बदलाव

डेनमार्क: प्रगतिशील ताकतों का आगामी यूरोपीय संघ के सैन्य गठबंधन से बाहर बने रहने पर जनमत संग्रह में ‘न’ के पक्ष में वोट का आह्वान

रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने के समझौते पर पहुंचा यूरोपीय संघ

यूक्रेन: यूरोप द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाना इसलिए आसान नहीं है! 

पश्चिम बैन हटाए तो रूस वैश्विक खाद्य संकट कम करने में मदद करेगा: पुतिन

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

90 दिनों के युद्ध के बाद का क्या हैं यूक्रेन के हालात

यूक्रेन युद्ध से पैदा हुई खाद्य असुरक्षा से बढ़ रही वार्ता की ज़रूरत

खाड़ी में पुरानी रणनीतियों की ओर लौट रहा बाइडन प्रशासन


बाकी खबरें

  • Tilka Majhi
    जीतेंद्र मीना
    आज़ादी का पहला नायक आदिविद्रोही– तिलका मांझी
    13 Jan 2022
    ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के बाद प्रथम प्रतिरोध के रूप में पहाड़िया आदिवासियों का यह उलगुलान राजमहल की पहाड़ियों और संथाल परगना में 1771 से लेकर 1791 तक ब्रिटिश हुकूमत, महाजन, जमींदार, जोतदार और…
  • marital rape
    सोनिया यादव
    मैरिटल रेप को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, क्या अब ख़त्म होगा महिलाओं का संघर्ष?
    13 Jan 2022
    गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि मैरिटल रेप के लिए भी सज़ा मिलनी चाहिए। विवाहिता हो या नहीं, हर महिला को असहमति से बनाए जाने वाले यौन संबंध को न कहने का हक़…
  • muslim women
    अनिल सिन्हा
    मुस्लिम महिलाओं की नीलामीः सिर्फ क़ानून से नहीं निकलेगा हल, बडे़ राजनीतिक संघर्ष की ज़रूरत हैं
    13 Jan 2022
    बुल्ली और सुल्ली डील का निशाना बनी औरतों की जितनी गहरी जानकारी इन अपराधियों के पास है, उससे यह साफ हो जाता है कि यह किसी अकेले व्यक्ति या छोटे समूह का काम नहीं है। कुछ लोगों को लगता है कि सख्त कानूनी…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव 2022: बीजेपी में भगदड़ ,3 दिन में हुए सात इस्तीफ़े
    13 Jan 2022
    सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया है कि रोजाना राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार के एक-दो मंत्री इस्तीफा देंगे और 20 जनवरी तक यह…
  • fact check
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के फ़ैक्ट चेक का फ़ैक्ट चेक
    13 Jan 2022
    सूचना एवं लोक संपर्क विभाग का फ़ैक्ट चेक ग़लत और भ्रामक है। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठता है कि उत्तर प्रदेश का सूचना एवं लोक संपर्क विभाग भाजपा की आइटी सेल की तरह व्यवहार क्यों कर रहा है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License