NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अयोध्या और मथुरा मामले में अविश्वसनीय समानतायें
अयोध्या मामले में 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने को लेकर संघ परिवार के कार्यक्रमों का मथुरा में भी अनुसरण किया जा रहा है। अब मथुरा में शाही ईदगाह को हटाने की मांग की जा रही है।
नीलांजन मुखोपाध्याय
20 Oct 2020
अयोध्या

मथुरा के श्री कृष्ण मंदिर परिसर से सटे शाही ईदगाह को ''हटाये जाने'' के आदेश के ख़ारिज किये जाने के आदेश के ख़िलाफ़ मथुरा ज़िला अदालत द्वारा अपील सुनने पर सहमति जताने के कुछ दिनों बाद इस मुद्दे पर जिस तरह के क़ानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, उससे तो अयोध्या जैसी घटना के दोहराये जाने की भावना ही पैदा होती दिख रही है।

इससे पहले 30 सितंबर को एक सिविल कोर्ट ने इस मुकदमे को ख़ारिज कर दिया था।

जब से सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 9 नवंबर को अयोध्या भूमि विवाद मामले में अपना फ़ैसला सुनाया था, तब से मथुरा (और कुछ हद तक वाराणसी) की घटनायें उसी ‘कामयाब योजना’ का अनुसरण करती दिख रही हैं, जैसा कि अयोध्या में 16वीं शताब्दी में बनी बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने के लिए संघ परिवार द्वारा बनायी गयी थी। कोविड-19 महामारी और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से पैदा हुए हालात ने इस घटनाक्रम पर अस्थायी तौर पर रोक ज़रूर लगा दी थी, लेकिन जुलाई के आख़िरी सप्ताह से इसने फिर से रफ़्तार पकड़ ली है।

अयोध्या में 'राम जन्मभूमि' को 'मुक्त' कराने को लेकर जो रणनीति बनायी गयी थी, ठीक उसकी पुनरावृत्ति होती दिख रही है, क्योंकि बड़ी संख्या में हिंदू धर्मगुरु नये संगठनों को बनाने में लग गये हैं, जबकि अन्य संगठन किसी न किसी मौजूदा संगठनों के साथ काम कर रहे हैं। जुलाई में मथुरा में रहने वाले संतों के एक समूह ने श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति अंदोलन ट्रस्ट की स्थापना की है। कुछ सप्ताह बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ क़रीबी कामकाजी सम्बन्ध रखने वाले अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने इसी तरह की मांग का आह्वान करने के लिए इलाहाबाद में एक बैठक की।

सबसे पहले इन समूहों ने भावी आंदोलन के 'असरदार लोगों' के तौर पर चिह्नित किये जाने के मक़सद से ये कार्य किये हैं। दूसरी बात कि उनका मक़सद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों को इस आंदोलन से जोड़ना है। ग़ौरतलब है कि यही वे तत्व हैं, जिन्होंने अयोध्या आंदोलन की शुरुआत की थी और बाद में जिस आंदोलन में आरएसएस शामिल हो गया था, ये तत्व औपचारिक तौर पर संघ के सदस्य नहीं होते हुए भी हिंदू राष्ट्रवादी परिवेश तंत्र का हिस्सा हैं।

अगर मथुरा में अयोध्या की तरह नतीजा हासिल करने को लेकर उसी तरह की पटकथा पर काम किया जाता है, तो अयोध्या की तरह ही इस आंदोलन के महत्वपूर्ण नेताओं के रूप में पहचाने जाने से सत्ता और संसाधनों की स्थिति हासिल करने का मार्ग प्रशस्त होगा। आंदोलन की धमकी देने वाले मौजूदा किरदारों का आख़िरी लक्ष्य शाही ईदगाह मस्जिद का विध्वंस और चल रही अयोध्या राम मंदिर परियोजना के पैमाने पर एक 'देदीप्यमान' श्री कृष्ण जन्मस्थान मंदिर का निर्माण है।

इन राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा,विकसित क़ानूनी आख्यान भी अयोध्या वाली पटकथा का ही अनुसरण कर रहा है। इस लिहाज़ से सबसे स्पष्ट क़दम वह याचिका दायर करना था, जिसे मथुरा की अदालत ने स्वीकार कर लिया था और सुनवाई के लिए 18 नवंबर की तारीख़ तय की गयी थी, जब इसे सिविल न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दिया गया था। इसी तरह, जुलाई 1989 में एक बिल्कुल ही नये पक्ष ने फ़ैज़ाबाद की अदालत के सामने अयोध्या टाइटल सूट में ख़ुद को ‘राम लला विराजमान’  की तरफ़ से पेश होने वाला बताया था।

इन दोनों मुकदमों के बीच का फ़र्क़ महज़ याचिकाकर्ताओं को लेकर है। अयोध्या मामले में याचिकाकर्ता विश्व हिंदू परिषद (VHP) के उपाध्यक्ष और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, देवकीनंदन अग्रवाल थे। मथुरा में यह याचिकाकर्ता अभी तक श्री कृष्ण के भक्तों के एक समूह के रूप में है और इसका नेतृत्व अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री कर रही हैं, जो हिंदू साम्राज्य परिषद की ‘साम्राज्य अध्यक्ष’ भी हैं। औपचारिक रूप से यह संगठन संघ परिवार का हिस्सा तो नहीं हैं, लेकिन इस परिषद जैसे संगठन उसी हिंदूवादी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने सीमित होने के चलते इस पर रोक लगा दिये जाने के बावजूद अपने फ़ैसले में अग्रवाल द्वारा दायर मुकदमे को ‘बरक़रार रखने’ को स्वीकृति दे दी थी। उस मुकदमे को इसलिए रोका जाना चाहिए था, क्योंकि वह मुकदमा 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर षड्यंत्रकारी तरीक़े से राम लला की मूर्ति को स्थापित किये जाने के 12 साल के भीतर क़ायम नहीं किया गया था। लेकिन, शीर्ष अदालत ने तब कहा था कि मुकदमा बरक़रार इसलिए रखा जाय, क्योंकि देवता के उन "हितों और चिंताओं को हिंदू पक्षकारों द्वारा स्थापित किए जाने से पहले के मुकदमों में पर्याप्त रूप से संरक्षित नहीं किया जा रहा था।"

अजीब बात है कि मथुरा ज़िला न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के उसी अयोध्या फ़ैसले के आधार पर अपना फैसला सुनाया। पिछले साल हिंदू पक्षों को पूरी तरह विवादित भूमि को सौंपते हुए सुप्रीम कोर्ट को उम्मीद थी कि आरएसएस-वीएचपी गठबंधन द्वारा दावा किए जा रहे अन्य मंदिरों की रक्षा की जायेगी। सिविल जज ने अपने आदेश में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से रंजना अग्निहोत्री, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और छह भक्तों की ओर से दायर उस याचिका को 1991 में अधिनियमित उस पूजा स्थल अधिनियम का हवाला देते हुए खारिज कर दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि अयोध्या में विवादित स्थल को छोड़कर सभी तीर्थों को उसी स्थिति में बनाये रखा जाना चाहिए, जिस स्थिति में वे 15 अगस्त, 1947 में थे।

शीर्ष अदालत अपने निष्कर्ष पर ज़ोर देते हुए कहा था," क़ानून हमारे राष्ट्र के इतिहास और भविष्य को बताता है। हम अपने इतिहास से अवगत हैं और राष्ट्र को इसका सामना करने की ज़रूरत है, आज़ादी अतीत के इन्हीं घावों को भरने वाला एक ऐतिहासिक क्षण थी। ऐतिहासिक ग़लतियां लोगों द्वारा अपने हाथ में क़ानून को लेकर दूर नहीं की जा सकतीं। सार्वजनिक पूजा-स्थलों के स्वरूप को संरक्षित करने को लेकर संसद ने बिना किसी लाग-लपेट के जनादेश दिया है कि इतिहास और इसकी ग़लतियों का इस्तेमाल वर्तमान और भविष्य पर अत्याचार करने के किसी उपाय के तौर पर नहीं किया जायेगा।"

अयोध्या में सभी बचे धर्मस्थलों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के इस आख़िरी फैसले से निर्देशित होने के बजाय ज़िला न्यायाधीश ने अग्रवाल (उनके बाद अन्य वीएचपी पदाधिकारियों) द्वारा राम लला विराजमान का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति देने की मिसाल दी। इस प्रक्रिया में भानुमती का पिटारा खोला जा चुका है और इस बात की प्रबल संभावना है कि मथुरा की अदालत हिंदुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधि दलों के बीच 1969 के समझौते की फिर से जांच कराये।

अचानक से मंदिर क्षेत्र के भीतर स्थित 13.37 एकड़ भूमि की मांग अब इसके बंद होने के दशकों बाद एक जटिल मामला बनता दिख रही है। अयोध्या मामले की तरह ही सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड और शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट की प्रबंधन समिति इस मामले में भी प्रतिवादी के रूप में सूचीबद्ध हैं। इस बात की मांग की गयी है कि 1968 के उस समझौते, जिसने औरंगज़ेब के शासनकाल के दौरान निर्मित 17वीं शताब्दी की शाही ईदगाह मस्जिद को बरक़रार रखते हुए एक नये मंदिर का निर्माण करने की अनुमति दी थी,  उसे 'अवैध' घोषित किया जाये।

जैसे अयोध्या में निर्मोही अखाड़ा और अन्य हिंदू पक्षों को उस मामले में दरकिनार कर दिया गया था, उसी तरह मौजूदा याचिका में कहा गया है कि श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, जो मंदिर परिसर का शासी निकाय है (और जो शाही ईदगाह ट्रस्ट के साथ समझौते में शामिल हुई थी), उसने देवता और भक्तों के हित के ख़िलाफ़ काम किया है और देवता और ट्रस्ट से सम्बन्धित संपत्ति के काफ़ी हिस्से को उसने स्वीकार कर किया था।

सिविल जज के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील को स्वीकार करके ज़िला न्यायालय ने उस मामले की फिर से जांच करने की संभावना के दरवाज़े खोल दिये हैं, जो साढ़े चार दशक से अधिक समय से सुलझा हुआ था।

कोई शक नहीं कि एक लंबी क़ानूनी दौड़ के चलने की संभावना है, और इस बात की भी संभावना है कि राजनीतिक क्षेत्र में पर्याप्त सार्वजनिक दबाव बनाने के बाद पूजा स्थल अधिनियम को ही ख़त्म करने की दिशा में कोशिश की जाये। किसी अन्य मामले में भी इस साल के जून महीने से सर्वोच्च न्यायालय में इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका लंबित पड़ी है। शाही ईदगाह के 'हटाये जाने' की मांग निश्चित रूप से धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ेगी, लेकिन भारत की नज़र इस खेल के आख़िरी चरण की ओर है।

(टिप्पणीकार पत्रकार और लेखक हैं। आपकी आख़िरी किताब, “द आरएसएस: आइकन्स ऑफ़ द इंडियन राइट” है। आप इस समय अयोध्या मुद्दे और इस मुद्दे ने भारतीय राजनीति को किस तरह बदल दिया है, इस विषय पर अपनी अगली किताब पर काम कर रहे हैं। आपका ट्वीटर एकाउंट है: @NilanjanUdwin )

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Uncanny Parallels Between Ayodhya and Mathura

BJP
RSS
mathura
Mathura Case
Ramjanambhoomi Case

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • ntpc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : रेलवे परीक्षा परिणाम में धांधली का आरोप लगाते हुए अभ्यर्थियों का दूसरे दिन भी प्रदर्शन
    25 Jan 2022
    भारी संख्या में अभ्यर्थियों ने बिहार की राजधानी पटना और आरा में रेलवे ट्रैक पर गत सोमवार को प्रदर्शन किया वहीं आज मंगलवार को नालंदा, बक्सर, नवादा समेत अन्य स्टेशनों पर उन्होंने रेलवे ट्रैक पर…
  • Biden
    पीपल्स डिस्पैच
    बाइडेन का पहला साल : क्या कुछ बुनियादी अंतर आया?
    25 Jan 2022
    जनआंदोलनों के दबाव की प्रतिक्रिया में बाइडेन ने अपने कार्यकाल के लिए ऊंचे-ऊंचे लक्ष्य तय किए थे। लेकिन इनमें से कितने पूरे हुए?
  • Sudha Bharadwaj
    एजाज़ अशरफ़
    सामाजिक कार्यकर्ताओं की देशभक्ति को लगातार दंडित किया जा रहा है: सुधा भारद्वाज
    25 Jan 2022
    जेल में अपने तजुर्बों का हवाला देते हुए और कामगारों की नुमाइंदगी करने वाली एक वकील के तौर पर जानी-मानी कार्यकर्ता कहती हैं कि भारत अब भी संविधान में किये गये इंसाफ़ और बराबरी के वादों को साकार करने…
  • Netaji
    सबरंग इंडिया
    नेताजी पर कब्ज़ा ज़माने की हिन्दू राष्ट्रवादी कवायद
    25 Jan 2022
    नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती (23 जनवरी) के अवसर पर देश भर में अनेक आयोजन हुए. राष्ट्रपति भवन में उनके तैल चित्र का अनावरण किया गया. केंद्र सरकार ने घोषणा की कि नेताजी का जन्मदिन हर वर्ष '…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,55,874 नए मामले, 614 मरीज़ों की मौत 
    25 Jan 2022
    देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 97 लाख 99 हज़ार 202 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License