NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्यों लगा भारतीय सुप्रीम कोर्ट पर संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा आरोप?
कश्मीर से जुड़े मामलों में सुस्त रहने का गंभीर आरोप लगाते हुए मानवाधिकार से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त रूपर्ट कोलविले ने कहा है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण, आवाजाही की आज़ादी और मीडिया पर प्रतिबंध जैसे मामलों को निपटाने में भारत का सुप्रीम कोर्ट सुस्त रहा है।
प्रेम कुमार
30 Oct 2019
Rupert Colville on kashmir
Image Courtesy: latestly

भारत के सुप्रीम कोर्ट पर संयुक्त राष्ट्र ने अब तक की सबसे गंभीर टिप्पणी की है। कश्मीर से जुड़े मामलों में सुस्त रहने का गंभीर आरोप लगाते हुए मानवाधिकार से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त रूपर्ट कोलविले ने कहा है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण, आवाजाही की आज़ादी और मीडिया पर प्रतिबंध जैसे मामलों को निपटाने में भारत का सुप्रीम कोर्ट सुस्त रहा है। इस आरोप की गम्भीरता इसलिए और बढ़ गयी है क्योंकि यूरोपीय यूनियन का प्रतिनिधिमंडल अनाधिकारिक दौरे पर कश्मीर में है जो यहां अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटा लिए जाने के बाद के हालात का जायजा ले रहा है।

भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था को दुनिया में सम्मान की नज़र से देखा जाता रहा है। इस नजरिये से भारतीय सुप्रीम कोर्ट पर संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। क्या इस टिप्पणी को राजनीतिक मानकर चुप रहा जा सकता है? क्या इसे नज़रअंदाज कर उस चिंता की अनदेखी की जा सकती है जिसे संयुक्त राष्ट्र व्यक्त करना चाहता है? कश्मीर में स्थिति सामान्य करने को लेकर भारत सरकार के दावे और उन दावों पर संदेह बिल्कुल अलग बात है। यूरोपीय यूनियन के सांसदों को कश्मीर आने की अनुमति देना एक तरह से संदेहों को खत्म करने की पहल जैसा है, हालांकि उसे लेकर भी बहुत सवाल हैं। मगर, भारतीय सुप्रीम कोर्ट पर संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी से कैसे निपटा जाए, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।

सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट पर कश्मीर को लेकर सुस्ती के आरोप क्यों लग रहे हैं? इसे समझने के लिए हाल में घटी कुछेक घटनाओं पर गौर करना जरूरी है। कश्मीर मसले पर बड़ी संख्या में विचारार्थ पहुंचीं याचिकाओं पर 30 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा था, “हमारे पास इतने मामलों को सुनने का समय नहीं है। हमारे पास सुनवाई के लिए संविधान पीठ का मामला (अयोध्या विवाद) है।” निश्चित रूप से यह टिप्पणी बहुत हल्की टिप्पणी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी टिप्पणी पर भौहें टेढ़ी होंगी। हालांकि कश्मीर से जुड़ी सभी मामले तत्क्षण न्यायमूर्ति एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ को सौंप दिए गये।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला को हिरासत में लेने से लेकर उन्हें नजरबंद करने और जनसुरक्षा अधिनियम की गिरफ्तारी तक की पूरी घटना भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार और भारतीय न्याय व्यवस्था की ओर उंगली उठाने का अवसर देती है। 5 अगस्त की रात से फारुख अब्दुल्ला समेत जम्मू-कश्मीर के कई नेता नजरबंद कर दिए गये। लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने 4 बार सफाई दी कि फारुख अब्दुल्ला न नजरबंद हैं और न ही उन्हें हिरासत में लिया गया है। खुद फारूख अब्दुल्ला रोते हुए पत्रकारों के सामने आते हैं कि वे आज़ाद नहीं हैं, नज़रबंद हैं। इस विरोधाभासी स्थिति पर भारत सरकार और न्याय व्यवस्था की खामोशी संदेह से परे नहीं हो सकती।

इसी पृष्ठभूमि में डीएमके नेता वाईको 11 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका डालते हैं। बताते हैं कि उनका अपने मित्र फारूख अब्दुल्ला से संपर्क नहीं हो पा रहा है। 15 सितंबर को अन्ना दुरई के जयंती समारोह में उन्हें शामिल होना है। इस याचिका पर 16 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा। केंद्र सरकार ने 30 सितम्बर को जवाब दिया कि फारूख अब्दुल्ला को जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत 16 सितंबर को तड़के गिरफ्तार किया गया है। इस एक्ट के तहत किसी भी व्यक्ति को 3 महीने से 1 साल तक बिना ट्रायल के हिरासत में रखा जा सकता है।

वाइको की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज हो गयी कि अब इसकी जरूरत नहीं रह गयी है। वाइको चाहें तो गिरफ्तारी को अलग से चुनौती दे सकते हैं। मगर, कई सवाल अनुत्तरित रह गये-

  • 5 अगस्त और 16 सितम्बर से पहले तक फारूख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, तो वे कहां थे? क्या गृहमंत्री अमित शाह के कहे अनुसार वे अपनी मर्जी से मौज कर रहे थे?

  • क्यों नहीं फारूख अब्दुल्ला को हिरासत में लिए जाने के बाद अदालत में पेश किया गया?

  • क्या हमेशा के लिए शासन-प्रशासन को बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिकाओं से निबटने के लिए सुरक्षा कवच नहीं मिल गया है?

इंडियन एक्सप्रेस में 17 सितम्बर को छपी खबर के अनुसार पुलवामा हमले के बाद से 4 अगस्त के बीच यानी जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेशों में बांटे जाने से पहले तक जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की श्रीनगर बेंच में बंदी प्रत्यक्षीकरण की 150 याचिकाएं दाखिल की गईं थीं। इनमें से 39 याचिकाओं पर फैसला आया और 80 फीसदी मामलों में पीएसए के तहत हिरासत में लिए गये लोगों को रिहा करने का आदेश आया। इस परिप्रेक्ष्य में चिंताजनक पहलू ये है कि 5 अगस्त के बाद से 4000 से अधिक लोग हिरासत में लिए गये। इनमें से 300 लोगों को पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया। मगर, बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिकाओं की संख्या अगस्त महीने में 15 भी नहीं पहुंच सकी। इसके कारण को समझना अधिक मुश्किल नहीं है।

16 सितम्बर को ही सुप्रीम कोर्ट के सामने नाबालिग को हिरासत में लिए जाने के मामले में यह तथ्य सामने आया कि जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट तक लोगों की पहुंच मुश्किल हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गम्भीर मानते हुए कहा कि वे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट तलब करेंगे और जरूरत पड़ी तो जम्मू-कश्मीर भी जाएंगे। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मिलने के बाद 20 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट तक लोगों की पहुंच नहीं हो पाने की बात को नकार दिया। मगर, कहा कि इस बारे में उन्हें कुछ ‘परस्पर विरोधी रिपोर्ट’ मिली हैं जिस पर अदालत कोई टिप्पणी करना नहीं चाहती। सुप्रीम कोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि ‘परस्पर विरोधी रिपोर्ट’ पर वह टिप्पणी नहीं करे।

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि 5 अगस्त को हाईकोर्ट में महज 8 फीसदी उपस्थिति थी। क्या यह इस बात का सबूत नहीं है कि अदालत लोगों की पहुंच से दूर हो गयी थी? हालांकि उसी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि 25 सितम्बर तक उपस्थिति 63 फीसदी हो चुकी थी। यह उपस्थिति भी अदालती प्रक्रियाओं के सामान्य होने का प्रमाण नहीं है।

एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 5 अगस्त और 27 सितम्बर के बीच 284 बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिकाएं जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की श्रीनगर विंग में दायर की गयीं। हालांकि ज्यादातर याचिकाएं सितम्बर महीने की हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिला अदालतों ने इस दौरान 30,107 मामले निपटाए और उनके समक्ष 15,533 नये मामले विचार के लिए आए। आम तौर पर आंकड़े उल्टे होते हैं। यानी निपटाए गये मामलों से अधिक नये मामले हुआ करते हैं। साफ है कि अदालतों के कामकाज पर असर पड़ा है और इसके पीछे विघटनकारियों की खुली धमकी और पोस्टर माने गये हैं।

एक तो अन्याय और दूसरा उस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने में हो रही मुश्किल। जम्मू-कश्मीर के लोगों को न्याय के लिए मुश्किल भरे दौर का सामना करना पड़ रहा है। जम्मू-कश्मीर का हाईकोर्ट हो या फिर सुप्रीम कोर्ट आम लोगों के लिए सहज उपलब्ध नहीं रह गया है। इसकी वजह जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट के मुताबिक दहशत का माहौल हो या फिर जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटा लिए जाने के बाद पैदा हुई स्थिति, इसमें फौरी बदलाव बहुत ज़रूरी हो गया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

UN
United nations
UN High Commissioner for Human Rights
Kashmir crises
Kashmir situation
Supreme Court
Rupert Colville

Related Stories

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

ख़बरों के आगे पीछे: बुद्धदेब बाबू को पद्मभूषण क्यों? पेगासस पर फंस गई सरकार और अन्य

कार्टून क्लिक: पर्यटन की हालत पर क्यों मुस्कुराई अर्थव्यवस्था!

नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

नगालैंड व कश्मीर : बंदूक को खुली छूट

नज़रिया: जस्टिस बोबडे पूरे कार्यकाल के दौरान सरकार के रक्षक-प्रहरी बने रहे

बतकही: अब तुमने सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल उठा दिए!

किसान आंदोलन को खालिस्तानी से जोड़ना क्यों मोदी जी ?

शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट...! लेकिन हमें इतनी 'भलाई' नहीं चाहिए


बाकी खबरें

  • tikoniya
    लाल बहादुर सिंह
    मोदी भारी राजनीतिक कीमत चुका कर ही अब अजय मिश्रा टेनी को मंत्री बनाये रख सकते हैं
    12 Oct 2021
    आज अंतिम अरदास के मौके पर पूरा देश लखीमपुर खीरी के शहीद किसानों को श्रद्धांजलि दे रहा है तथा घटनास्थल तिकोनिया में पूरे देश से आये किसानों का विराट संगम हो रहा है।
  • New Service Rules in Jammu and Kashmir
    डॉ राधा कुमार
    ज़ुल्म के दरवाज़े खोलते जम्मू-कश्मीर के नये सेवा नियम
    12 Oct 2021
    बर्ख़ास्त किये गये ज़्यादातर लोगों के ख़िलाफ़ जो आरोप क़ायम किये गये हैं, वे गंभीर हैं, लेकिन चूंकि आम लोगों के सामने इसे लेकर कोई सबूत नहीं रखा गया है, इसलिए यह साफ़ नहीं है कि इन आरोपों में दम है…
  • facebook
    प्रबीर पुरकायस्थ
    एक व्हिसलब्लोअर की जुबानी: फेसबुक का एल्गोरिद्म कैसे नफ़रती और ज़हरीली सामग्री को बढ़ावा देता है
    12 Oct 2021
    बेशक, यह सवाल पूछा जा सकता है कि जब फेसबुक के सिलसिले में ये सभी सवाल पहले भी उठाए जाते रहे हैं, तो इसमें नया क्या है। इस सब में बड़ी खबर यह है कि अब हमारे पास इसके सबूत हैं कि फेसबुक को इसकी पूरी…
  • Fb
    सोनाली कोल्हटकर
    समझिए कैसे फ़ेसबुक का मुनाफ़ा झूठ और नफ़रत पर आधारित है
    12 Oct 2021
    फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ़्रांसेस हौगेन द्वारा किए गए खुलासों से पता चलता है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अच्छी तरह जानता है कि उसके प्लेटफॉर्म का समाज पर किस तरह नकारात्मक प्रभाव…
  • attack on dalit
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान में दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या, तमिलनाडु में चाकू से हमला कर ली जान
    12 Oct 2021
    दलित समाज के लोगों पर हमलों की घटना लगातार सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां राजस्थान के हुनुमानगढ़ जिले में दलित युवक जगदीश की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, वहीं तमिलनाडु के तंजावुर में दलित युवक प्रभाकरण की…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License