NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
नज़रिया
मज़दूर-किसान
संस्कृति
समाज
भारत
राजनीति
सोचिए, सब कुछ एक जैसा ही क्यों हो!
बंगाल से गुजरात तक और जम्मू से तमिलनाडु तक बीजेपी नेता “जै श्रीराम” का जयकारा लगा ही देते हैं। लेकिन भारतीय समाज की पहचान उसका वैविध्य है, उसकी एकरूपता नहीं।
शंभूनाथ शुक्ल
06 Mar 2021
kisan protest
विविधता और एकता को दर्शाने के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार: एनडीटीवी

कानपुर के जिस गोविंद नगर मोहल्ले में मैं पला-बढ़ा, उसमें पश्चिमी पंजाब (जो बाद में पाकिस्तान बना) से आए पंजाबी रिफ़्यूजी रहते थे। उनमें से दो बुड्ढों को सब लोग खब्ती कहते थे। उनमें एक को सीता-राम कहने से चिढ़ होती और दूसरे को राधे-श्याम से। दरअसल एक को राम से प्रीति थी और दूसरे को कृष्ण से। दोनों एक ही समुदाय से, एक जैसी बोली बोलने वाले और एक ही उम्र के लेकिन पसंद अपनी-अपनी। इसी पंजाबी समुदाय में बहुत-से लोग देवी दुर्गा के उपासक थे और वे वैष्णो देवी की यात्रा करते। कुछ को हनुमान जी से अनुराग था। जो सिख रिफ़्यूजी थे, उनमें भी कुछ नीली पगड़ी वाले अकाली, कुछ नामधारी, कुछ सहजधारी, कुछ सफ़ेद साफ़े जैसा फाटा लपेटने वाले सतनामी और कुछ निर्मल सम्प्रदाय के थे। सिंधियों में झूलेलाल को मानने वाले, कुछ समुद्र के देवता वरुण देव के उपासक, बलूचिस्तान की हिंग्लाज देवी की आराधना करने वाले और कुछ श्रीकृष्ण प्रणामी सम्प्रदाय (गांधी जी का परिवार भी इसी संप्रदाय का था) के थे।

लेकिन सबको पंजाबी ही कहा जाता। पंजाबी एक पहचान थी और उन सबकी निजी आस्थाएँ अलग-अलग। ठीक इसी तरह भारतीय एक पहचान है और यहाँ हर एक की आस्था भिन्न है, बोली अलग है और कई बार तो परस्पर विपरीत भी है। फिर भी देखिए हज़ारों वर्ष से लोग रह रहे हैं इस जंबू द्वीपे, भरतखंडे, आर्यावर्त में। कोई भी किसी को उसकी आस्था से नहीं डिगा सका। समाज सुधार के आंदोलन हुए, उनमें से कुछ चीजें स्वीकारीं किंतु नीचे के स्तर पर उनके बीच यह मत-भिन्नता बनी रही। और यही किसी समाज के जीवंत बने रहने का शाश्वत सबूत है। लेकिन अब सरकार और उसके कर्णधार पूरे देश को एक झंडे, एक आस्था, एक पूजा-पद्धति, एक जैसा सामाजिक आचार-विचार मानने के लिए दबाव बना रही है। लोग बेचैन हैं।

यही कारण है कि बंगाल से गुजरात तक और जम्मू से तमिलनाडु तक बीजेपी नेता “जै श्रीराम” का जयकारा लगा ही देते हैं। लेकिन भारतीय समाज की पहचान उसका वैविध्य है, उसकी एकरूपता नहीं। उसकी राष्ट्रीय एकता उसके वैविध्य से ही उपजी है। यह वैविध्य के अंदर एकता का सूत्र कोई समझौता नही बल्कि स्वाभाविक है। इसे समझने के लिए उसको समझना आवश्यक होगा किंतु बीजेपी की समझ से यह परे है। यह उस समाज से बना देश है जहाँ मेवाड़ के राणा प्रताप से युद्ध के समय दिल्लीश्वर अकबर के सेनापति राजा मान सिंह होते है और सेनापति का सहायक बादशाह अकबर का बेटा शहज़ादा सलीम। उधर राणा प्रताप के सेनापति हाकिम सूर हैं। यानी धर्म, आस्था बीच में आड़े नहीं आती। ठीक इसी तरह शिवाजी जब अज़मल ख़ाँ से निहत्थे मिलने जा रहे थे तब शिवाजी के एक  मुस्लिम अंगरक्षक ने उन्हें सलाह दी थी कि अज़मल ख़ाँ का भरोसा नहीं किया जा सकता इसलिए आप अपने दाएँ हाथ की चारों अंगुलियों और अंगूठे में बघनख यूँ धारण कर लीजिए कि वे अँगूठी जैसी दिखें।

शिवाजी को कितनी बार गाय खाने वाले पुर्तगालियों से समझौता करना पड़ता और टीपू सुल्तान ने सूअर खाने वाले फ़्रांसीसियों से समझौता किया। इसलिए एक संस्कृति, एक भाषा, एक जैसा खान-पान और एक जै श्रीराम कोई हल नहीं है।

फ़र्ज़ कीजिए एक बार को बीजेपी उन्माद के ज़रिए अपने मक़सद में सफल हो भी जाए तो क्या यह एकरूपता स्थायी होगी? जवाब है क़तई नहीं। क्योंकि इस देश की प्रकृति में कहीं भी एकरूपता नहीं है। उत्तर में पहाड़ हैं, पश्चिम में रेगिस्तान, दक्षिण में समुद्र है और पूर्व तक फैला विशाल उपजाऊ मैदान। सैकड़ों दो-आबे हैं। तब कैसे किसी एक सार्वभौमिक संस्कृति की बात की जा सकती है!

संस्कृति बनती है किसी भी देश की भौगोलिक परिस्थिति से, वहाँ के उत्पादन के साधनों से तथा उनकी आस्थाओं से। इसे बनने में सैकड़ों साल का वक्त लगता है। इसे कोई एक संगठन, राजनीतिक दल या गिरोह सोचे कि वह इसे बदल देगा तो इसे उसकी हठधर्मिता ही कहा जाएगा।

इसीलिए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जै श्रीराम का नारा लोगों को पच नहीं रहा। अगर बीजेपी ने असम, केरल, तमिलनाडु और पुद्दिचेरी में ऐसे ही नारों का आह्वान किया तो उसके नियंताओं की राजनैतिक दृष्टि पर संदेह ही होगा। श्रीराम बहुत से लोगों की आस्था के केंद्र हो सकते हैं किंतु पूरे देश की आस्था से उन्हें कोई मतलब नहीं। कई बार तो यह भी लगता है कि आज़ादी के पहले जब अंग्रेज भारत की एकता को तोड़ना चाहते थे तब उन्होंने सबसे पहले भारत के इस वैविध्य को नष्ट करने की चाल चली थी। हिंदू-मुस्लिम को बाँटा और फिर उनके फ़िरक़ों को। इसके लिए उन्होंने भी हिंदू का अर्थ श्रीराम को ही बताया था। अन्यथा क्या कारण है कि जो हिंदू-मुसलमान बाबर से बहादुर शाह ज़फ़र तक राम मंदिर के नाम पर कभी नहीं लड़े वे अचानक बाबरी मस्जिद प्रकरण को ले आए और उधर पाकिस्तान बनाने के प्रबल पक्षधर शायर इक़बाल राम को ही इमामे-हिंद बताने लगे। इनके पहले भी हिंदू थे, मुसलमान थे, ब्राह्मण थे, दलित थे, शूद्र थे किंतु फिर भी एक थे।

लेकिन अब राम का अर्थ हिंदू है और रहीम के मायने मुसलमान। यह परस्पर उन्माद फैलाने के तरीक़े हैं। लेकिन इसे भी समझने के लिए एक कथा को सुन लेना चाहिए। एक बार एक गुरुकुल से निकला स्नातक प्रयागराज में संगम घूमने गया। शाम ढल रही थी और वह नाविक को लेकर संगम स्थल की तरफ़ चला जा रहा था। अचानक उसने नाविक से पूछा, कि हे नाविक! तुमने धर्मशास्त्र पढ़ा है? नाविक ने कहा नहीं। “तब तो तुम्हारा चौथाई जीवन व्यर्थ गया” यह कहते हुए उसने नाविक से पूछा, कि तुमने तर्क शास्त्र पढ़ा है? नाविक का जवाब नहीं था। नाविक का आधा जीवन व्यर्थ बताते हुए उस बटुक ने अगला सवाल किया, नाविक तुमने गणित पढ़ा है?फिर नाविक का जवाब नहीं में था और बटुक ने उसके तीन चौथाई जीवन को व्यर्थ बता दिया। अचानक आसमान में बादल घिर आए और बिजली चमकने लगी। नाविक ने पूछा, हे ब्राह्मण! तूने तैरना सीखा है? बटुक बोला, नहीं। नदी में छलाँग लगाते हुए नाविक बोला, युवक तेरा तो समूचा जीवन व्यर्थ गया।

ग्रीक दार्शनिक प्लेटो राज्य चलाने वाले तंत्र की व्याख्या करते हुए कहता है, कि जब कुछ लोग नाव में बैठे हों तब नाव चलाने के लिए नाविक का चयन वोट से नहीं, नाव चलाने की उसकी योग्यता से होता है। यही प्रक्रिया वे राज्य के तंत्र को चलाने के लिए योग्य नायक पर लागू करते हैं। यानी समाज का वह छोटा-सा वर्ग जो राज्य को चला सकता है। इसे ही बाद में रिस्टोक्रेसी कहा गया। इसके विपरीत डेमोक्रेसी वह है, जहां तंत्र को चलाने वाले का चयन हम चुनाव से करते हैं। प्लेटों के अनुसार एरिस्टोक्रेसी में नेतृत्त्व क्रमशः कमजोर होने लगता है, क्योंकि शासक के मन में लोभ, वंशवाद और सत्ता के केंद्रीकरण की इच्छा पैदा होने लगती है। उधर डेमोक्रेसी की अनिवार्य परिणिति तानाशाही या एकाधिकारवाद है क्योंकि वहाँ कोई भी चतुर नेता लोगों को धर्म, संप्रदाय और जाति के नाम पर भड़का कर सत्ता पर क़ाबिज़ रहने की चेष्टा करने लगता है।

इसके अतिरिक्त पूँजीवादी क्रांति के बाद एक और शब्द आया रिपब्लिक। अर्थात् वह शासन व्यवस्था जब जनता ही अपने लोगों के बीच से कुछ लोगों का चयन तंत्र को चलाने के लिए करते हैं। इसके साथ ही कम्युनिज़्म आया, जिसमें राज्य की समस्त जनता को समान माना गया। इसी के साथ ऑटोक्रेसी, ऑलीग्राकी, थियोक्रेसी और फ़ासिज़्म का उदय हुआ। इनमें से किसी को भी बहुत पुराना या नया नहीं कहा जा सकता। तंत्र के सभी प्रकार आज भी मौजूद हैं। लेकिन तंत्र जब फ़ासिज़्म की तरफ़ आ जाता है तो वह समाज के लिए घातक तो हो ही जाता है ख़ुद के लिए भी आत्म-हंता साबित होता है। 19वीं और 20वीं सदी का इतिहास इसका गवाह है। जब मानव ने चौपाये से दोपाये की शक्ल ली होगी और लाखों वर्ष तक विकसित होते-होते इस मानव में परिवार और निजी सम्पत्ति बनाने की समझ आई होगी, तब से ही राज्य का तंत्र भी खड़ा हुआ होगा। किंतु सदैव वही तंत्र बेहतर माना गया है, जिसमें सभी का हित करने की क्षमता हो। लेकिन अब नए हुक्मरान यह बात समझने को राज़ी नहीं हैं कि राज का मतलब है लोक-कल्याण।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

indian society
Unity in Diversity
Jai Shri Ram
religion
culture
Socialism
farmers protest

Related Stories

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला

लखीमपुर कांड की पूरी कहानी: नहीं छुप सका किसानों को रौंदने का सच- ''ये हत्या की साज़िश थी'’

इतवार की कविता : 'ईश्वर को किसान होना चाहिये...

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

जीत कर घर लौट रहा है किसान !


बाकी खबरें

  • कमलप्रीत
    भाषा
    टोक्यो ओलंपिक: कमलप्रीत ने फाइनल के लिए क्वालीफाई किया, सीमा पूनिया और श्रीशंकर चूके
    31 Jul 2021
    पच्चीस वर्ष की कमलप्रीत ने चक्का फेंक के अपने तीसरे प्रयास में 64 मीटर का थ्रो फेंका जो क्वालीफिकेशन मार्क भी था। क्वालीफिकेशन में शीर्ष रहने वाली अमेरिका की वालारी आलमैन के अलावा वह 64 मीटर या अधिक…
  • टोक्यो ओलंपिक: चार दशक बाद ओलंपिक सेमीफाइनल में जगह बनाने से एक कदम दूर भारतीय हॉकी टीम
    भाषा
    टोक्यो ओलंपिक: चार दशक बाद ओलंपिक सेमीफाइनल में जगह बनाने से एक कदम दूर भारतीय हॉकी टीम
    31 Jul 2021
    ओलंपिक में भारत को आखिरी पदक 1980 में मॉस्को में मिला था जब वासुदेवन भास्करन की कप्तानी में टीम ने पीला तमगा जीता था। उसके बाद से भारतीय हॉकी टीम के प्रदर्शन में लगातार गिरावट आई।
  • सनबोर शुलई
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    मुर्गा, बकरा या मछली के बजाय बीफ ज़्यादा खाओ : भाजपा मंत्री
    31 Jul 2021
    पिछले हफ्ते ही मेघालय सरकार में पशुपालन और पशु चिकित्सा मंत्री की शपथ लेने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता सनबोर शुलई ने बीफ ज़्यादा से ज़्यादा खाने की वकालत कर सबको चौंका दिया है।
  • सिंधू
    भाषा
    टोक्यो ओलंपिक: सिंधू का स्वर्ण पदक का सपना टूटा, कांस्य के लिये बिंग जियाओ से भिड़ेगी
    31 Jul 2021
    रियो ओलंपिक की रजत पदक विजेता सिंधू ने ताइ जु को पहले गेम में कड़ी चुनौती पेश की लेकिन आखिर में उन्हें 40 मिनट तक चले मैच में 18-21, 12-21 से हार का सामना करना पड़ा।
  • बिहार: काम का दाम मांग रहे वार्ड सचिवों पर बर्बर लाठीचार्ज को लेकर आक्रोश
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार: काम का दाम मांग रहे वार्ड सचिवों पर बर्बर लाठीचार्ज को लेकर आक्रोश
    31 Jul 2021
    "विगत चार सालों से सरकार राज्य के 1 लाख 14 हजार वार्ड सचिवों से वार्ड स्तर पर नल-जल एवं गली-नली योजना में काम कराती रही है लेकिन आज तक इन लोगों को एक रुपया तक नहीं दिया गया है। जब वे अपने काम का दाम…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License