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लॉकडाउन : असंगठित ऑनलाइन शॉपिंग का इकोसिस्टम ख़त्म हो रहा है
देश भर में हज़ारों लोग अनौपचारिक तौर पर असंगठित रूप से ऑनलाइन शॉपिंग के धंधे में हैं। लॉकडाउन ने उनके इस बिखरे हुए नेटवर्क को पूरी तरह से ठप कर दिया है।
अमय तिरोदकर
02 Apr 2020
ऑनलाइन शॉपिंग

फ्लिपकार्ट और अमेज़न जैसे हज़ारों करोड़ वाले ऑनलाइन शॉपिंग के क्षेत्र में महारथियों के अलावा भी ऐसे हज़ारों लोग हैं जिन्होंने पिछले एक दशक से ऑनलाइन कारोबार में अपनी जगह बना ली है। उनका यह फलता-फूलता धंधा आज लॉकडाउन के दौर में पूरी तरह से ठप पड़ चुका है।

पुणे की अनीता राजगुरु अपने फ़ेसबुक पेज के ज़रिये वस्त्रों और उससे जुड़े सामान के साथ नैन-सौन्दर्य संबंधी उत्पादों के व्यवसाय से जुड़ी हैं। उनके 'शॉपिंग स्टाइल' नामक पेज से संपर्क साधकर लोग ये सामान ख़रीदते आये हैं। इनके उत्पाद नामचीन ब्रांडों की प्रतिकृति होती हैं। इनके फ़ेसबुक पेज से 3000 लोग जुड़े हैं और इसमें से कई लोग उनके नियमित ग्राहक तक हैं। अनीता कहती हैं “इससे मुझे तक़रीबन दस हजार रुपये प्रति माह की आय हो जाती है।“

लेकिन पिछले 15 मार्च के बाद से उनका यह व्यवसाय पूरी तरह से ठप सा पड़ गया है। वे कहती हैं “मैं ख़ुद इन उत्पादों को निर्मित नहीं करती, बल्कि विभिन्न विक्रेताओं से इसे ख़रीदती हूँ। अब उन विक्रेताओं का काम बंद हो गया है और कोरियर सेवाएं भी ठप हैं, इसलिए मेरे पास अब किसी भी उत्पाद को प्रमोट करने का कोई अर्थ नहीं रह गया है। मैंने अपने नियमित ग्राहकों को सूचित कर दिया है कि कोरियर सेवाओं के शुरू होने की सूरत में ही वे उत्पाद दोबारा मिल सकेंगे।”

फ़ेसबुक पर ऑनलाइन शॉपिंग करने के लिए कोई खास मशक्कत की जरूरत नहीं पड़ती, बस इच्छित वस्तु के सर्च के लिए एक क्लिक बटन किसी को भी ढेर सारे फेसबुक ग्रुप्स और पेज से मिला सकने के लिए काफ़ी है। हज़ारों लोग इस धंधे में जुड़े हुए हैं जिसमें से कई ग्रुप तो ऐसे हैं जिनके साथ लाखों सदस्य जुड़े हुए हैं। यह चमक-दमक वाले विज्ञापनों और पीआर से परे, ऑनलाइन अर्थव्यस्था की अपनी ही एक अलग से समानांतर दुनिया है, जो 15 मार्च तक धड़ल्ले से चल रही थी और जो हजारों महिलाओं और पुरुषों को रोजगार मुहैय्या करा रहा था।

उदहारण के लिए साड़ी व्यवसाय का एक उदाहरण लेते हैं। पानेरी नाम की मुंबई के माटुंगा बाज़ार में एक प्रसिद्ध साड़ी की दुकान है। शादी या किसी तीज-त्यौहार के मौकों पर मुंबई भर की महिलाएं खरीदारी के लिए पानेरी को पसन्द करती हैं। लेकिन बहुत कम लोग ही इस बात को जानते हैं कि पानेरी अपने उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री भी करता है। पानेरी के मालिक अजीत पेडनेकर ने बताया "हमारे पास खुद का अपना कोई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म नहीं है, लेकिन हम अपने उत्पाद को ऐसे लोगों को मुहैया कराते हैं जिनका अपना इस तरह का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म होता है।"

पेडनेकर ने बताया कि ये ऑनलाइन बिक्री करने वाले लोग उनके उत्पादों की तस्वीरें खींचकर व्हाट्सएप में इनकी कीमतों के साथ अपने ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिये प्रमोट करते हैं। “इसके जरिये इन प्रमोटरों को इनके ग्राहक माल का ऑर्डर देते हैं। फिर यही आर्डर वे हमें अपने ग्राहकों के पते के साथ भेज देते हैं। कूरियर के ज़रिये हम यह उत्पाद इन ग्राहकों के पते पर भेज देते हैं और हमारे खातों में ऑनलाइन पैसा ट्रांसफर पहुँच जाता है। अजीत आगे कहते हैं "लॉकडाउन के कारण अब हम कोरियर के ज़रिये उत्पाद नहीं भेज पा रहे हैं इसलिए हमने फ़ैसला किया है कि जब तक तालाबंदी ख़त्म नहीं हो जाती, इसे स्थगित रखा जाये।"

लेखा पटेल भी इसी दुनिया से आती हैं, और कपड़ों से लेकर बर्तनों तक के उत्पादों की बिक्री से जुड़ी हैं। यह सारा काम वे व्हाट्सएप के ज़रिये करती हैं: "मुझे ये सब एफ़बी पर डालने और एक-एक कर अलग अलग आर्डर को ट्रैक करने का समय नहीं मिल पाता। मैंने अपना सारा ध्यान पुनर्विक्रेताओं (रि-सेलर) को माल बेचने पर केन्द्रित कर रखा है"  लेखा कहती हैं। अब ये रि-सेलर कौन हैं? दरअसल लेखा उन विक्रेताओं से जुड़ी हैं जो कूरियर द्वारा उन्हें अपने उत्पाद भेजते हैं। लेखा इन विक्रेताओं को अपने रि-सेलर की कड़ी से जोड़ देती हैं और अपने लिए मार्जिन रख लेती हैं। लेखा ने बताया “आपको शायद विश्वास न हो लेकिन कई बार इस कड़ी में तीन से चार तक पुनर्विक्रेता (रि-सेलर) हो सकते हैं। लेकिन लोग अभी भी हमसे ही अपने उत्पाद खरीदते हैं क्योंकि तुलनात्मक रूप से हमारे पास से उन्हें सस्ते दाम पर उत्पाद मुहैय्या हो जाते हैं।“

लेखा की ही तरह योगेश गिरमे भी अपने व्यवसाय के लिए कई अन्य लोगों पर निर्भर हैं। उनकी अपनी दूकान है जो नासिक जिले के येओला कस्बे में है। यह शहर प्रतिष्ठित साड़ी ’पैठणी’ के लिए मशहूर है। वे खुद पैठणी बनाते हैं और अपनी दुकान से बेचते हैं। योगेश कहते हैं "इसे बेचने के दो तरीके हैं। एक तो इसे हम अपनी दुकान से बेच सकते हैं। पैठणी साड़ी कोई ऐसी चीज नहीं जिसे महिलाएं हर दूसरे दिन खरीदें। इसलिए सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर ही वे मेरी दुकान पर आती हैं। ऑफ-सीजन के दौरान मेरी कोशिश होती है कि मैं अपने उत्पादों को ऑनलाइन के माध्यम से बेच सकूँ। पहले जहाँ हमारा कारोबार सीजन पर निर्भर करता था लेकिन अब इस ऑनलाइन बाजार ने इसे बारहमासी बना दिया है।"

योगेश बताते हैं, “इस लॉकडाउन ने हमारे धंधे को पूरी तरह से ठप कर दिया है। मुझे एक महीने में 75,000 रुपये से 80,000 रुपये के बीच का नुकसान झेलना पड़ रहा है। अप्रैल और मई में शादी का सीजन होता है। अगर यही हाल रहा तो ये घाटा लाख रुपया महीने तक पहुँच जाने वाला है।”

इन छोटे व्यवसाइयों को इस बात का आभास है कि जब यह तालाबंदी हट जाएगी तो उसके बाद भी उनके धंधे को पटरी पर आने में कम से कम दो से तीन महीने का वक्त तो लग ही जाएगा। अनीता कहती हैं, “लोग आजकल ऑनलाइन से कुछ भी खरीदने से डर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कूरियर पैकेट के माध्यम से कोरोनावायरस कहीं उनके घरों में न पहुँच जाये। जब तक वायरस का डर बना रहेगा, तब तक हमारे धंधे में बरक्कत नहीं होने जा रही।“

ये व्यवसाय असंगठित तौर पर चल रहे हैं और केवल ऑनलाइन प्रोमोटरों और रिसेलरों की कड़ी एक आपसी विश्वास के आधार पर ये टिके हुए हैं। ऐसे मुश्किल दौर में इस असंगठित उद्योग को किसी के पास अपनी विपदा सुनाने का ठौर भी तो नहीं है। लेखा सवाल करती हैं "हमारी कौन सुनेगा? हमारे पास सिर्फ़ एक ही विकल्प है, जो भी घाटा हो रहा उसे चुपचाप सहते रहो।“

चूँकि इन छोटे उद्यमियों के पास ऐसा कोई ज़रिया नहीं कि वे इस बात का अनुमान लगा सकें कि उन्हें कुल कितना नुक़सान उठाना पड़ रहा है, वे आर्थिक तौर पर नुक़सान झेलने के लिए अभिशप्त हैं। इसके साथ ही अपने व्यवसाय पर उनकी पकड़ और उनके अपने व्यक्तिगत नेटवर्क पर उनकी पकड़ भी खिसक रही है, जो उनके सुचारू रूप से काम करने के लिए बेहद ज़रूरी है। वायरस को ख़त्म करने के लिए लॉकडाउन किया जाना बेहद ज़रूरी क़दम है, लेकिन अपने साथ ही यह इस प्रकार की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को भी बर्बाद कर देगा।

अंग्रेजी में लिखे गए मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं

An Unorganized Online Shopping Ecosystem Goes Silent in Lockdown

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