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स्वास्थ्य
भारत
शहरी विस्तार से नहीं, लापरवाही के चलते भारत में कोरोना संकट बदतर हुआ
घनी आबादी वाले शहरी इलाक़ों में भी महामारी पर क़ाबू पाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए सही रणनीति होनी चाहिए।
रश्मि सहगल
25 Jun 2020
Urban Sprawl Covid 19 India

महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के संक्रमण फैलाव से हमें भारत में महामारियों के फैलने और उनके कारणों का अध्ययन करने का मौका मिला है। अब तक महाराष्ट्र में भारत के सबसे ज़्यादा कोरोना संक्रमित हैं। मध्य-पूर्व मुंबई में स्थित मानखुर्द और गोवंदी सबसे बुरे तरीके से प्रभावित हुए इलाके हैं। मुंबई के यह दो हिस्से देश की सबसे ज़्यादा घनी आबादी वाले इलाकों में से हैं। पिछले महीने के आखिर में इन दो क्षेत्रों में 9.7 फ़ीसदी की सबसे ज़्यादा मृत्यु दर दर्ज की गई थी। 

इस पूरी स्थिति पर मुंबई में रहने वालों का क्या सोचना है? जिनकी आंखों के सामने सारी घटनाएं घट रही हैं। सबसे गंभीर क्षेत्रों में राहत सेवाएं दे रहे लोगों और डॉक्टरों को संक्रमण फैलाव के कारण और इसके समाधान के बारे में क्या कोई जानकारी है? आख़िर घनी आबादी वाले इलाके में महामारी से निपटना पूरे देश में सरकारों के लिए चुनौती है। 

मैंने TISS मुंबई के एक छात्र फहद अहमद से बात की, जो मध्य-पूर्व मुंबई की झुग्गी बस्तियों में राशन पहुंचाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ''इस इलाके को एक खास वजह के चलते गैस चैंबर कहा जाता है। एशिया का सबसे बड़ा कचरा मैदान, ‘’देयोनार लैंडफिल’’ यहीं मौजूद है।''

100 साल पुराना देयोनार मैदान गोवंदी और मानखुर्द से सिर्फ़ दो किलोमीटर दूर है। इसमें मुंबई के ठोस कचरे का 25 फ़ीसदी हिस्सा निस्तारित किया जाता है। 2019 दिसंबर के बाद यहां और ज़्यादा कचरा निष्पादित किया जाना था। लेकिन जनवरी में बीएमसी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक शपथ पत्र दाख़िल कर इस तारीख़ को 2023 तक आगे बढ़ाने की अपील की। बीएमसी के मुताबिक़, 2023 तक ही वह देयोनार में कचरे से ऊर्जा बनाने वाला संयंत्र लगा पाएगी।

कचरा प्रबंधन और बीमारी का संबंध ना तो नया है और ना ही यह सिर्फ़ मुंबई से संबंधित है। लेकिन कोविड-19 ने बहुत सारे गंभीर मुद्दों के साथ-साथ स्वच्छता के सवाल को प्राथमिकता पर ला दिया है। अहमदाबाद में कोरोना वायरस पुराने शहर के बापूनगर, गोमतीपुर और धोरवाड़ा जैसे इलाकों में तेजी से फैला। इन इलाकों में ज़्यादातर कामग़ार वर्ग रहता है।एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन ''अन्हद'' के ट्रस्टी देव देसाई इन इलाकों के कुछ हिस्से में राशन पहुंचा रहे हैं।

उनका कहना है कि गुजरात में कमज़ोर स्वास्थ्य ढांचे के चलते कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। गुजरात के शहरों में गरीब इलाकों पर ज़्यादा बुरी मार पड़ी है। एक हफ़्ते पहले, गुजरात में एक दिन में ही 520 नए मामले सामने आए थे, इनमें से अकेले अहमदाबाद में 330 मामले थे। कुछ दिन बाद गुजरात में एक ही दिन में 580 नए मामले सामने आए, 22 जून को गुजरात में कोरोना वायरस के 563 नए मामले आए। कुल मिलाकर गुजरात में कुल संक्रमितों की संख्या 25,000 पार कर चुकी है।

राज्य के घनी आबादी वाले इलाकों की समस्याओं को सार्वजनिक अस्पतालों की हालत ने और पतला कर दिया है। देसाई कहते हैं, ''महामारी 6 महीने से हमारे साथ है, इसके बावजूद अस्पतालों में 65 फ़ीसदी डॉक्टरों, नर्स और पैरा मेडिकल स्टॉफ की पोस्ट खाली हैं। आख़िर गरीब इलाज़ कराने कहां जाएंगे। हम स्वास्थ्य मदद के आभाव में बहुत चुनौतीपूर्ण स्थिति में हैं।''

अहमदाबाद के एच के आर्ट्स कॉलेज में इकनॉमिक्स पढ़ाने वाले प्रोफेसर हेमंत शाह कहते हैं कि महामारी के दौर में वेतन न मिलने के चलते चार बार सरकारी अस्पतालों में काम बंद हुआ। शाह के मुताबिक़, ''स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव के चलते ही गुजरात में इतनी ऊंची मृत्यु दर है, जबकि तुलनात्मक तौर पर मरीज़ों की संख्या कम है।'' यह स्थिति अप्रैल में भी थी, जबकि तब महामारी का पूरे भारत में फैलना बाकी था। 3 अप्रैल को अहमदाबाद मिरर की रिपोर्ट में कहा गया, ''2 अप्रैल तक गुजरात में 88 मामले सामने आए हैं, जिनमें सात लोगों की मौत हुई है। जबकि देश में सबसे ज़्यादा मामले महाराष्ट्र में हैं, जहां 335 लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं, जहां 13 लोगों की मौत हुई है।''

राजधानी दिल्ली भी संक्रमण के मामलों में तेजी से महाराष्ट्र की ओर बढ़ रही है। यहां भी घनी आबादी वाले इलाकों में कोरोना वायरस की मार ज्यादा बुरी पड़ी है। दिल्ली में 675 जरूरत से ज्यादा आबादी और कम विकसित वाले इलाके हैं। इनमें से भलस्वा और जहांगीरपुरी में बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। स्वच्छता और स्वास्थ्य की कमी से दिल्ली में अस्पतालों द्वारा किसी भी बीमारी से ग्रस्त मरीजों को भर्ती न करने की एक और समस्या खड़ी हुई है।

NGO एक्शन इंडिया की सीमापुरी, जनता मज़दूर कॉलोनी और संजय कॉलोनी की समन्वयक सुरेखा सिंह कहती हैं, ''इन इलाकों में कोरोना संक्रमण के मामले ज़्यादा हैं, लेकिन यहां बड़ी संख्या में लोग कैंसर, दिल की बीमारी और मिर्गी जैसी दूसरी बीमारियों से भी ग्रस्त हैं। लेकिन अस्पताल इन रोगों के मरीज़ों को जगह न होने की बात कहकर भर्ती नहीं कर रहे हैं।''

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो कुछ भारतीय राज्यों ने कोरोना संकट के दौर में कुछ बेहतर प्रतिक्रिया दी है, लेकिन इस प्रतिक्रिया में एक समग्र रणनीति की कमी है। समस्या सिर्फ़ घनी आबादी या सुविधाओं की कमी नहीं है। यह देखा गया है कि पहचान किए जा चुके हॉटस्पॉट में भी स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है, जबकि वहां बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है।

जैसे मुंबई की ही बात करें, तो वहां संक्रमण रोकने के लिए चार रणनीतियों पर काम किया जा चुका है। मध्य पूर्व मुंबई और भिवंडी में राहत कार्य कर रहे समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख कहते हैं, ''हम अब तक चार रणनीतियां अपना चुके हैं, जिनके तहत पहले टेस्टिंग की गई, फिर टेस्टिंग बंद कई गई, संक्रमित के संपर्क में आने वालों की टेस्टिंग की गई, फिर संक्रमित के संपर्क में आने वाले लोगों की टेस्टिंग बंद कर दी गई। इस तरह से महामारी से कैसे निपटा जा सकेगा।''

अदिति आनंद फिल्म बनाती हैं और एक स्वयंसेवी हैं। वे राहत कार्य में लगे NGO धारावी डायरीज़ के लिए फंड इकट्ठा करने की कोशिश में लगी हैं। अदिति का कहना है कि बीएमसी के कर्मचारियों के थके होने से भी समस्या काफ़ी बढ़ गई है। अदिति कहती हैं, ''महामारी को काफ़ी लंबा वक़्त हो चला है, अब उन्हें ज़्यादा लोगों को काम पर लगाने की जरूरत है। थकावट अच्छा संकेत नहीं है,  क्योंकि हमें लंबी लड़ाई लड़नी है।''

लेकिन धारावी के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। इलाके में शुरुआत में 4.1 फ़ीसदी की मृत्यु दर दर्ज की गई थी। जबकि उस वक़्त मुंबई में मृत्यु दर 8.2 फ़ीसदी थी। इसके बाद धारावी में मृत्यु दर में तेज उछाल आया था। लेकिन अब यह घटकर 1.02 फ़ीसदी के स्तर पर आ गई है। धारावी में जनसंख्या घनत्व प्रतिवर्ग किलोमीटर 2,27,316 है। वहां 2000 से ज़्यादा पॉजिटिव केस आ चुके हैं। इस बीच धारावी में पांच लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई, कुछ क्लीनिक खोले गए और संक्रमित लोगों को कोविड सेवा केंद्र ले जाया गया।

लेकिन पूरे मुंबई में यह मॉडल दिखाई नहीं देता। देश की बात तो भूल ही जाइए। भिवंडी के बारे में शेख कहते हैं, ''सफ़ाई का काम ठीक से नहीं हो रहा है। अस्पतालों में बहुत भीड़ है और कोरोना के मरीज़ों को बिस्तर मिलना बहुत मुश्किल है।'' मुंबई के कुछ घनी आबादी वाले इलाकों में टेस्टिंग पूरी तरह रुक चुकी है। जबकि धारावी में शुरुआत में जो रणनीति अपनाई गई थी, यह उसकी बिलकुल उल्टी है। ध्यान रहे धारावी में मज़दूर प्रवास जैसे संकट की शुरुआती मार के बावजूद रणनीति से फायदा हुआ है।

शेख कहते हैं, ''समस्या इस बात की है कि हम सिर्फ़ उन मामलों को रिपोर्ट कर रहे हैं, जिनमें अस्पताल में भर्ती किए जाने की जरूरत हो रही है। सामुदायिक संपर्क को पूरी तरह रोक दिया गया है। यहां आजीविका छिनने से हर कोई नाराज़ है। लोग चाहते हैं कि उद्योग-धंधे चालू हो जाएं, ताकि उन्हें अपनी आजीविका वापस मिल सके।''

लेकिन धारावी दूसरी ओर भी ध्यान आकर्षित करवाती है। दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद या कहीं और की झुग्गी बस्तियां ऐसा करवाने में नाकामयाब रही हैं। दरअसल अब भारत को कुछ चुने हुए हॉटस्पॉट की जगह, ज्यादा लोगों तक पहुंच रखने वाले बड़े विमर्श और संकट से निपटने के लिए स्थानीय नेतृत्व की जरूरत है।

महामारी के दौर में 6 लाख लोगों को अपने हिस्से का राशन लेने में मदद करने वाले NGO C-FAR के चीफ अखिला शिवदास कहती हैं, ''हमें सामुदायिक स्तर पर मजबूत नेतृत्व की जरूरत है। ताकि जिन संसाधनों का प्रावधान गरीबों के लिए किया गया है, उन तक गरीबों की पहुंच हो सके।'' उनका मानना है कि केंद्र सरकार को NGOs के साथ अपने विरोधी व्यवहार को खत्म करने की जरूरत है। अखिला कहती हैं, ''NGO सरकार के संसाधनों का मुकाबला नहीं कर सकते। जैसे बंगलुरू में 200 वार्ड हैं, लेकिन हम सिर्फ़ पांच में ही मौजूद हैं। लेकिन हम ज़मीनी हक़ीकत और जानकारी को मुहैया करा सकते हैं, क्योंकि हमारे कर्मचारी इन्हीं समुदायों से आते हैं।''

डॉक्टरों का भी मानना है कि राज्यों को बिना कमज़ोरी वाली ''बुलेट प्रूफ रोकथाम'' रणनीतियां लागू करने की जरूरत है। गुड़गांव में कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट डॉ मोनिक मेहता सभी संक्रमित क्षेत्रों के लिए भीलवाड़ा मॉडल की पैरवी करती हैं। वे आगे कहती हैं, ''लेकिन यह कहना आसान है, क्योंकि दिल्ली में अकेले ही 240 संक्रमण रोकथाम क्षेत्र हैं।''

राजस्थान में स्थित भीलवाड़ा भारत के शुरुआती कोरोना हॉटस्पॉट में से एक था। लेकिन वहां लोगों को स्वास्थ्य और खाद्यान्न जैसी बुनियादी चीजें मुहैया करवाकर महामारी पर काबू पा लिया गया। वहां कुछ लोगों को तकलीफ़ पहुंचाने वाली रोकथाम रणनीतियों के लिए एक बेहतर संचार रणनीति पर भी जोर दिया गया, ताकि लोगों का समर्थन हासिल किया जा सके।

लेकिन यह सब कहना आसान है। इस हफ़्ते तक केवल तेलंगाना के हैदराबाद में ही 1,100 संक्रमण रोकथाम क्षेत्र हैं। वृहद हैदराबाद नगर निगम (GHMC) निराशा में अपने हाथ खड़े कर चुका है। इसके लिए नगर निगमों और राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग में समन्वय की कमी को वज़ह बताया जा रहा है। 23 जून को तेलंगाना में एक दिन में ही 872 नए मामले सामने आए। जिसमें से 713 हैदराबाद में ही थे। तब एक रिपोर्ट में छपा था, ''सार्वजनिक स्वास्थ्य के निदेशक के मुताबिक़ पिछले 24 घंटे में रविवार शाम पांच बजे से सोमवार शाम की अवधिक के 3,189 सैंपल की जांच की गई थी। इसमें से 2,317 नेगेटिव आए, वहीं 872 मामलों में कोरोना की पुष्टि हुई।''  वहीं एक दूसरी रिपोर्ट में कहा गया, ''समन्वय और संचार भीलवाड़ा मॉडल का अहम हिस्सा था, इसके बाद भी महीनों गुजरने के बावजूद शहरों को इसे समझने में दिक्कत हो रही है।''

भारत में कोरोना के 4,41,924 से ज़्यादा मामले हैं। संक्रमण में जान गंवाने वालों का आंकड़ा भी 14,000 पार कर चुका है। 60 फ़ीसदी कोरोना के मामले सिर्फ़ सात मेट्रो शहरों में सामने आए हैं। चूंकि इन शहरों में कोरोना की दर तेज है, इसलिए इनमें स्वच्छ पानी, फेस मास्क और सेनेटाइज़र जैसी बेहतर सुविधाओं की जरूरत है। इन चीजों पर तुरंत मदद दी जानी चाहिए, नहीं तो Unlock-1 से सिर्फ़ कोरोना संक्रमण में तेजी आएगी और इससे एक और लॉकडाउन का डर सच साबित हो सकता है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

मूल आलेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Not Urban Sprawl, Neglect Worsens India’s Covid-19 Crisis

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