NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
महामारी की आड़ और मोदी की मंज़ूरी, राज्यों का मज़दूरों के ख़िलाफ़ मोर्चा 
कुछ राज्यों द्वारा कार्य दिवस को बढ़ाकर 12 घंटे किये जाने के बाद, यूपी और एमपी ने कॉर्पोरेट क्षेत्रों को ख़ुश करने के लिए सभी श्रम क़ानूनों में ढील दे दी है।
सुबोध वर्मा
10 May 2020
BJP governemnts attack on workers
Image Courtesy: Scroll.in

भारत में श्रमिक वर्ग इन दिनों एक ऐसे प्राणघातक संकट का सामना कर रहा है,जो उनकी ज़िंदगी को एक शताब्दी पीछे धकेल दे रहा है, और उन्हें आधुनिक ज़माने के दासों में बदल दे रहा है। जैसा कि न्यूज़क्लिक ने पहले इस बात की चेतावनी दे दी थी कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार द्वारा सरपरस्त, संरक्षित, और स्वीकृत कानूनों में बड़े पैमाने पर किये जा रहे बदलाव के ज़रिये श्रमिकों पर एक बर्बर हमला किया जा रहा है, और विभिन्न राज्य सरकारों, ख़ास तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों द्वारा इसे लागू किया जा रहा है।

गुरुवार को बताया गया कि भाजपा के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने चार को छोड़कर सभी श्रम क़ानूनों को समाप्त करने वाला एक अध्यादेश पारित कर दिया है। हाल ही में तख़्तापलट से बनी मध्य प्रदेश की एक और भाजपा सरकार ने नये कारोबार को एक हज़ार दिनों के लिए श्रम क़ानूनों से छूट दे दी है।

इन विधायी बदलावों से पांच राज्यों में हर रोज़ काम करने के समय में 12 घंटे तक का विस्तार हो गया है। इन पांच राज्यों में से तीन राज्य भाजपा नेतृत्व वाले हैं,जबकि दो राज्य कांग्रेस संचालित राज्य हैं।

यह उस समय हो रहा है, जब लगभग 40 दिन पहले शुरू हुए लॉकडाउन से देश भर के श्रमिक और कर्मचारी पहले ही हाशिये पर पहुंच चुके हैं। सेंटर ऑफ़ मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी या सीएमआईई के नवीनतम अनुमानों के मुताबिक़, बेरोज़गारी 27% से भी ज़्यादा हो गयी है, जबकि ऐडवाइज़री के बावजूद लाखों नियोजित श्रमिकों को मज़दूरी से वंचित कर दिया गया है, और लाखों छोटे-मोटे कारोबार शायद स्थायी रूप से बंद हो गये हैं।

मानो दुख का यह पहाड़ काफ़ी नहीं था, और मौत का ख़तरा उन बदक़िस्मत प्रवासी कामगारों का पीछा नहीं छोड़ रहा है, जिनमें से 15 से अधिक कामगारों की उस समय ट्रेन से कटकर जान चली गयी,जब वे महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 65 किलोमीटर पैदल चलने के बाद थक कर रेल की पटरी पर ही सो गये थे, जबकि आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम् स्थित उस पॉलिमर कारख़ाने से हुए रासायनिक गैस के रिसाव में कई ग़रीब ग्रामीणों और श्रमिकों की मृत्यु हो गयी, जो लॉकडाउन के बाद फिर से खुल रहा था।

श्रम क़ानूनों से छूट मतलब क्या होता है ?

कोई भी सरकार अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और उत्पादक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए सभी संभावित उपायों को अमल में ला सकती है, मगर,सवाल है कि घूम-फिरकर श्रम क़ानूनों पर ध्यान केंद्रित क्यों हो जाता है? क्या इससे वास्तव में रोज़गार और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल पायेगी?

इस सिलसिले में यूपी में बताये जा रहे क़ानूनी बदलावों पर एक नज़र डालें: केवल बंधुआ मज़दूरों, निर्माण श्रमिकों और घायल या होने वाली मौत की स्थिति में मिलने वाले मुआवज़े से सम्बन्धित क़ानूनों में छूट दी जायेगी, साथ ही साथ मज़दूरी के भुगतान की धारा 5 में भी छूट दी जायेगी, जिसमें कहा गया है कि मज़दूरी का भुगतान अगले महीने के सातवें दिन किया जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि काम के घंटे, शिफ़्ट, वेतनमान, ओवरटाइम, विभिन्न प्रकार के मिलने वाले लाभों (जैसे कैंटीन) को लेकर अन्य सभी क़ानून अब लागू नहीं रह पायेंगे। इसके अलावा, औद्योगिक विवादों को स्थगित कर दिया जायेगा, जिसका मतलब यह हुआ कि किसी को नौकरी पर रखना या उसे बाहर निकाल देना अब नियोक्ताओं की इच्छा पर निर्भर करेगा। और अंत में ट्रेड यूनियन अधिकार, सामूहिक सौदेबाज़ी और विरोध का अधिकार भी हाथ से निकल जायेगा।

यह उसी तरह की स्थिति है, जो कभी पूंजीवादी जगत में 18 वीं और 19वीं शताब्दी के अंत में हुआ करती थी, और तब से कॉर्पोरेट वर्ग की कल्पनाओं के रूप में यह स्थिति अस्तित्व में बनी रही है।

लेकिन, सवाल है कि श्रम क़ानूनों को लेकर ही ये सनक क्यों है? इसका जवाब है कि यही एकमात्र तरीक़ा है, जिसके ज़रिये कॉर्पोरेट के मुनाफ़ों को उस हालात से बचाये रखा जा सकता है, जिनमें लॉकडाउन के कारण मांग लगभग ग़ायब हो चुकी है।

हालांकि यूपी के मुख्य सचिव को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि प्रवासी श्रमिकों की आमद से निपटने के लिए ये उपाय अपनाये जा रहे हैं और रोज़गार को बनाये रखने की ज़रूरत है, यदि किसी तरह का कोई भ्रम नहीं हो,तो यह तर्क एकदम ग़लत है।

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर सुरजीत मजूमदार पूछते हैं,“जब तक उत्पादों की मांग नहीं होगी, श्रम क़ानूनों के साथ चाहे जितनी भी छेड़छाड़ कर ली जाये,उससे मदद नहीं मिलने वाली है। बड़ा सवाल तो यही है कि आख़िर उत्पादों को ख़रीदेगा कौन? ”

उन्होंने आगे बताया, “रोज़गार बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का एकमात्र तरीक़ा सार्वजनिक व्यय को बड़े पैमाने पर बढ़ाना है। निजी क्षेत्र ऐसा नहीं कर सकते। और किसी भी हालत में श्रम क़ानूनों में शामिल किया गया यह भाग अर्थव्यवस्था का एक अंश मात्र है। इसलिए, श्रम क़ानूनों में किये गये इन बदलावों का रोज़गार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

वास्तव में संभव है कि इन बदलावों से श्रमिकों में ग़ुस्सा और असंतोष बढ़े, और इसका ख़ामियाजा उत्पादन को भुगतना पड़े। कम श्रमिकों के साथ उसी स्तर का उत्पादन प्राप्त करने के लिए कार्य दिवस में 12 घंटे तक की बढ़ोत्तरी एक उपाय ज़रूर है। मगर, फिर तो ऐसी स्थिति में रोज़गार में बढ़ोत्तरी होने का का सवाल ही नहीं पैदा होता है! प्रोफ़ेसर मजूमदार की दलील है कि श्रम क़ानून में बदलाव की इन लचर नीतियों का असली इरादा कठिनाई या शर्मिंदगी से मुंह चुराना है, और इसका असली मक़सद उन कॉरपोरेट के मुनाफ़े को बढ़ाना है, जो इस समय गर्दिश में हैं।

बड़ा विज़न

श्रम क़ानूनों में हुए हाल के बदलावों को भाजपा सरकार के कामगारों या सामान्य रूप से कामकाजी लोगों के समग्र दृष्टिकोण के सिलसिले में देखा जाना चाहिए। पिछले ही साल से मोदी सरकार श्रम क़ानून में बदलाव के लिए ज़ोर देती रही है। इसने 44 अलग-अलग क़ानूनों की जगह चार कोडों को प्रस्तावित किया था और इस प्रक्रिया में मज़दूरी, काम के घंटे, विवाद समाधान और व्यापार संघों के गठन सहित किसी भी पहलू पर बदलाव को अधिसूचित करने को लेकर सरकार की अपार शक्ति को देखते हुए उन सभी को ख़त्म कर दिया गया है। इनमें से दो कोड तो पहले ही लागू हो चुके हैं और अन्य दो कोड लागू होने की प्रक्रिया में हैं।

मोदी सरकार भी न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने से इनकार करते हुए आर्थिक हमला जारी रखे हुई है। ट्रेड यूनियन एक प्रसिद्ध और स्वीकृत फ़ॉर्मूले के आधार पर मज़दूरी के न्यूनतम स्तर के रूप में 18,000 रुपये की मांग कर रहे हैं। सरकार ने एक समिति गठित करने (इसके बाद अपनी सिफ़ारिशों को नामंज़ूर करने) जैसे अन्य सुधारों की चौतरफ़ा काट-छांट करते हुए इसके बारे में बात करने तक से इनकार कर दिया है। बेरोज़गारी को रोक पाने में असमर्थ मोदी सरकार ने फ़ैक्ट्री के दरबाज़े पर बेरोज़गारों की इतनी बड़ी फ़ौज के होने से वेतन का स्तर कम रखने का काम किया है।

मजूमदार कहते हैं, “भारत की समस्या यह है कि यहां मज़दूरी बहुत कम है। एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज के आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले 25 वर्षों में वास्तविक मज़दूरी में गिरावट आयी है। यह मांग को बढ़ने से रोकता है और अर्थव्यवस्था को लगातार संकटग्रस्त रखता है। श्रम क़ानून में छूट कभी भी मज़दूरी में बढ़ोत्तरी नहीं कर सकती है- ऐसा सोच पाना ही हास्यास्पद है।”

श्रम के प्रति इस शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण के हिस्से के रूप में यह क़दम ऐसा ही कुछ है, जिसकी ज़ड़ें आरएसएस या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा में हैं, और मोदी सरकार उन जड़ों में खाद पानी डालने के लिए ही सत्ता में है। इस सरकार के लिए मौजूदा महामारी या अचानक लगाया गया लॉकडाउन किसी सुनहरे अवसर से कम नहीं है, जब बिना सोचे विचारे योजना को थोप दिया जाय। यह सरकार इस मौक़े का इस्तेमाल उन सभी कार्यों को जल्दी-जल्दी आगे बढ़ाने लिए कर रही है, जो सामान्य समय में कर पाना मुश्किल था। भारत में कॉर्पोरेट वर्ग के लिए, कल के सपने आज की हक़ीक़त हैं। कामकाजी लोगों के लिए यह किसी डरावने सपने के सच होने की तरह है।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख आप नीचे लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Under Pandemic Garb and Modi Sanction, States Unleash War on Workers

Lockdown Impact
Labour Laws
COVID-19
Corporate Profits
Working Hours
Labour Law Relaxation
Modi Govt
Wage Cuts
Job Losses

Related Stories

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

मनरेगा: ग्रामीण विकास मंत्रालय की उदासीनता का दंश झेलते मज़दूर, रुकी 4060 करोड़ की मज़दूरी

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

किसानों ने देश को संघर्ष करना सिखाया - अशोक धवले

कटाक्ष: किसानो, कुछ तो रहम करो...लिहाज करो!

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

किसानों की ऐतिहासिक जीत के मायने

सरकार ने फिर कहा, नहीं है आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों का 'आंकड़ा'


बाकी खबरें

  • शर्मनाक: अब धमकी की भाषा पर उतर आई है बीजेपी!
    मुकुल सरल
    शर्मनाक: कार्टून नहीं, किसानों को बीजेपी की खुली धमकी!
    30 Jul 2021
    यह कार्टून देखिए। यह बीजेपी उत्तर प्रदेश के ऑफिशयल ट्विटर हैंडल पर 29 जुलाई को प्रसारित किया गया और अभी तक बरकरार है। इसे देखकर कोई भी कह सकता है कि यह सीधे-सीधे किसान नेता राकेश टिकैत को धमकी है।
  • बैंक निजीकरण से धन्नासेठों को फायदा
    न्यूज़क्लिक टीम
    बैंक निजीकरण से धन्नासेठों को फायदा
    30 Jul 2021
    52 साल पहले बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। अब इन्ही बैंकों को वापस प्राइवेट सेक्टर को बेचने की तैयारी की जा रही है। इससे सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट घरानों और धन्नासेठों को फायदा होगा
  • इज़रायली सैनिकों ने क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में एक अन्य फ़िलिस्तीनी युवक की हत्या की
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायली सैनिकों ने क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में एक अन्य फ़िलिस्तीनी युवक की हत्या की
    30 Jul 2021
    20 वर्षीय शौकत अवाद को उस समय गोली मारी गई जब इज़रायली सैनिकों ने 12 वर्षीय मोहम्मद अल-अलामी के अंतिम संस्कार में भाग लेने वाले लोगों पर गोलियां चलाई थीं। अलामी को इन सैनिकों ने एक दिन पहले गोली मार…
  • रियो टिंटोस द्वारा बड़े पैमाने पर खनन निविदा के ख़िलाफ़ सर्बिया में विरोध प्रदर्शन तेज़
    पीपल्स डिस्पैच
    रियो टिंटोस द्वारा बड़े पैमाने पर खनन निविदा के ख़िलाफ़ सर्बिया में विरोध प्रदर्शन तेज़
    30 Jul 2021
    पर्यावरण समूहों, प्रगतिशील राजनीतिक समूहों और स्थानीय लोगों के समूह ने पूरे सर्बिया से लिथियम समृद्ध जादराइट अयस्क के बड़े पैमाने पर खनन के लिए खनन दिग्गज रियो टिंटो की योजनाओं के ख़िलाफ़ विरोध तेज़…
  • आमागढ़ क़िला: आदिवासी मीणा समुदाय और हिंदूवादी संगठन आमने-सामने
    अवधेश
    आमागढ़ क़िला: आदिवासी मीणा समुदाय और हिंदूवादी संगठन आमने-सामने
    30 Jul 2021
    आमागढ़ जिसे आंबागढ़ भी कहा जाता है का क़िला मीणा समुदाय की अस्मिता से जुड़ा है लेकिन आज इसके साथ भगवे झंडे का विवाद भी जुड़ गया है, जिसे लेकर एक दूसरे को चुनौती दी जा रही है। इससे सामाजिक सौहार्द…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License