NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
अपराध
आंदोलन
उत्पीड़न
भारत
राजनीति
उत्तर प्रदेश: निरंतर गहरे अंधेरे में घिरते जा रहे हैं सत्य, न्याय और भाईचारा
उत्तर प्रदेश की मौजूदा दशा के लिए वहां के दल, सरकार, प्रशासन और संस्थाएं तो जिम्मेदार हैं ही लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार है वहां का समाज। उत्तर प्रदेश का समाज घनघोर रूप से सांप्रदायिक और जातिवादी समाज है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
06 Oct 2020
उत्तर प्रदेश: निरंतर गहरे अंधेरे में घिरते जा रहे हैं सत्य, न्याय और भाईचारा

हाथरस की घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार, मीडिया, विपक्षी नेताओं और पूर्व अधिकारियों के बयानों से सत्य, न्याय और भाईचारा निरंतर गहरे अंधेरे में घिरते जा रहे हैं। संविधान और कानून का राज क्या होता है यह किसी को समझ में ही नहीं आ रहा है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि यह प्रदेश के विकास से जलने वालों की करतूत है। वे लोग प्रदेश और देश को जातिवादी और सांप्रदायिक दंगे में झोंकना चाहते थे। यह तो समय रहते साजिश का पता चल गया और उसे रोक लिया गया। दूसरी ओर देश भर के 92 रिटायर आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि वहां के अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वाह कानून और संविधान के अनुसार नहीं कर रहे हैं। उनका व्यवहार पक्षपाती है। जबकि पोस्टमार्टम और फारेंसिक रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन दावा कर रहा है कि लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ ही नहीं और उसकी मौत गले पर चोट लगने के कारण हुई है। उधर बीच में पीड़ित लड़की के लिए सक्रिय हुआ मीडिया सुशांत राजपूत की रपट के बहाने पलटी मारने का बहाना तलाश रहा है।

एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि एक गंभीर पत्रकार मित्र ने दुखी होकर टिप्पणी लिखी है कि हाथरस की घटना के बाद उन्हें जातिसूचक नाम लेकर गालियां दी जा रही हैं। यह हरकतें तबसे और हो रही है जबसे अभियुक्तों के पक्ष में पंचायत हुई है। घटना की सच्चाई सामने लाने के लिए नियुक्त सीबीआई क्या जांच करेगी यह तो राम ही जानें लेकिन थोड़ी बहुत उम्मीद इलाहाबाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से बनती है अगर वह किसी प्रकार के दबाव में न आए।

सवाल उठता है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई और संविधान की शपथ लेकर सत्ता संभालने वाली उत्तर प्रदेश सरकार और उसकी नौकरशाही को क्या हो गया है कि उसकी कार्यप्रणाली पर निरंतर सवाल उठ रहे हैं। क्या वह संविधान भूल गई है? या उसकी नौकरशाही कानून की व्याख्याएं भूल गई है या फिर सब कुछ न्याय की बजाय छवि के लिए किया जा रहा है?

यहां बार बार राष्ट्र की रक्षा की हुंकार भरने वालों के लिए बाबा साहेब आंबेडकर की चेतावनी का स्मरण आवश्यक है। संविधान का मसविदा पूरा होने पर 25 नवंबर 1949 को उन्होंने संविधान सभा में कहा था कि अगर पार्टियां पंथ (जाति) को देश से ऊपर रखेंगी तो स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। इस व्याख्यान में उन्होंने कहा था, `` जातियां राष्ट्र विरोधी हैं। पहली बात तो यह है कि वे सामाजिक जीवन में विभेद पैदा करती हैं। वे राष्ट्र विरोधी इसलिए हैं क्योंकि वे जातियों के बीच ईर्ष्या और नफरत उत्पन्न करती हैं। अगर हम वास्तव में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन प्रवृत्तियों को मिटाना होगा।’’

बाबा साहेब ने यह भी कहा था कि अगर किसी अपराध के पीछे पूरी जाति और संप्रदाय खड़ा हो जाता है तो वहां कानून का राज या संविधान की भावना लागू नहीं हो सकती। क्योंकि विधिशास्त्र व्यक्ति को सजा देता है पूरे समुदाय को नहीं। उन्होंने यह भी आगाह किया था कि जो समाज लोकतांत्रिक नहीं है वहां लोकतांत्रिक सरकार नहीं कायम हो सकती। अगर कोई समाज शासक और शासित वर्ग के बीच विभाजित है तो जो भी सरकार बनेगी शासक वर्ग के लिए ही काम करेगी। यह सोचना भी गलत है कि अच्छी या बुरी सरकार तो नौकरशाहों के आधार पर बनती है जो सरकार की योजनाओं को लागू करती है। दरअसल प्रशासन का चरित्र तो उस सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है जिसमें वह तैयार होता है। अगर सामाजिक परिवेश अलोकतांत्रिक है तो प्रशासन भी अलोकतांत्रिक होने को बाध्य है।

इसलिए उत्तर प्रदेश की मौजूदा दशा के लिए वहां के दल, सरकार, प्रशासन और संस्थाएं तो जिम्मेदार हैं ही लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार है वहां का समाज। उत्तर प्रदेश का समाज घनघोर रूप से सांप्रदायिक और जातिवादी समाज है। लेकिन सांप्रदायिकता को राष्ट्रवाद बताकर राजनीति करने वाले यह दावा करते हैं कि उससे कम से कम जातिवाद तो दब जाता है। हकीकत इसके ठीक विपरीत है। सांप्रदायिक व्यक्ति बाहर से धर्म की रक्षा और एकता का चाहे जितना ढकोसला करे लेकिन भीतर से वह घनघोर जातिवादी भी होता है। वह पुरुषवादी भी होता है यानी स्त्री विरोधी तो होगा ही। दूसरी ओर जो लोग यह समझ कर राहत की सांस लेते हैं कि बहुसंख्यक समाज के भीतरी अंतर्विरोधों के कारण सांप्रदायिकता कमजोर होगी वे गलतफहमी में हैं। जातिवाद न तो धर्मनिरपेक्षता की गारंटी हो सकता है और न ही लोकतंत्र की।

दरअसल हाथरस में होने वाले स्त्री विरोधी और दलित विरोधी अपराध के पीछे एक जातिवादी समाज का योगदान है और वह समाज सांप्रदायिक भी है। उस प्रदेश में कहीं आनर किलिंग होती है तो कहीं सांप्रदायिक हिंसा। इसलिए यह कहना कि कोई बाहरी एजेंसी प्रदेश में दंगा कराने वाली थी विश्वसनीय कथन नहीं लगता। क्योंकि उसकी बाहर से आयात करने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस प्रदेश में टूटते कानून के राज और गिरती संवैधानिक नैतिकता को बचाने का उपाय क्या है? कुछ लोगों को लगता है कि जिस तरह से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने या तृणमूल कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के नेताओं ने आगे बढ़कर पीड़िता के लिए न्याय की गुहार की उससे लोकतांत्रिक व्यवहार और इंसाफ की एक उम्मीद बनती है। यानी राजनीतिक दलों के सड़क पर उतरने से व्यवस्था का व्यवहार कम से कम लोकतांत्रिक हो जाएगा।

संभव है कि विपक्षी दलों और मीडिया के दबाव में सत्तारूढ़ दल और सरकार फौरी तौर पर किसी को बर्खास्त करने वाला कदम उठा ले या एसआईटी से लेकर सीबीआई तक किसी तरह की जांच भी करा दे। लेकिन उन सभी में किसी तरह के पक्षपात की आशंका बनी हुई है और विपक्षी दलों पर राजनीति करने का आरोप लगाने वाला सत्तारूढ़ दल स्वयं में हर जगह राजनीति ही करता दिख रहा है। उसने प्रशासन को राजनीति करना सिखा दिया है या यूं कहें कि प्रशासन उसकी राजनीति में खुल्लमखुल्ला शामिल है।

यह स्थितियां सिर्फ राजनीतिक धरने प्रदर्शन से नहीं सुधरने वाली हैं। इन स्थितियों को सुधारने के लिए जाति उन्मूलन का अभियान चलाना होगा और साथ ही सांप्रदायिक सद्भाव का सामाजिक आंदोलन शुरू करना होगा। यह सब कैसे होगा जब सरकार हर छोटी छोटी गतिविधि पर पाबंदी लगाने को तैयार रहती है? इसके लिए उन सूत्रों को पकड़ना होगा जो पिछली सदी में अस्सी और नब्बे के दशक में सक्रिय थे और जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदल कर रख दिया था। लेकिन उन सूत्रों ने सामाजिक स्तर पर बदलाव को रिसने नहीं दिया। राजनीति भले थोड़े समय के लिए बदली लेकिन समाज नहीं बदले।

विशेष तौर पर गांव अभी भी उतने ही जातिवादी हैं जितने पहले हुआ करते थे। उल्टे पंचायती राज व्यवस्था ने उन्हें भ्रष्ट और अपराधी भी बना दिया है। यहां गांव के बारे में डॉ. आंबेडकर और गांधी की बहस फिर प्रासंगिक हो जाती है। गांधी गांवों को आदर्श बनाने पर जोर देते थे और अपने सफाई अभियान से लेकर, कुटीर उद्योग और नई तालीम तक सारी योजनाएं गांवों को केंद्र में रखकर बनाते थे। उनके ठीक विपरीत डॉ. आंबेडकर ने गांवों को अज्ञानता और जातिवाद का केंद्र बताया था। आज आजादी के सत्तर सालों बाद गांव बहुत कुछ बदले हैं। वहां भी प्रौद्योगिकी पहुंची है और लोगों का जीवन स्तर और रहन सहन बदला है। वे अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुए हैं। लेकिन लोगों की सोच लोकतांत्रिक होने की बजाय जाति और धर्म के मामले में टकराव और भेदभाव वाली ही है। यानी न आंबेडकर के सुझावों के अनुसार सारी छोटी जातियों ने गांव छोड़कर शहर का रास्ता पकड़ा और न ही गांधी के अनुसार गांवों में सद्भाव और आत्मनिर्भरता आई है।

छुआछूत वहां अभी भी जिंदा है। इसलिए उत्तर प्रदेश जैसे गांवों वाले प्रदेश को अगर लोकतांत्रिक बनाना है तो उसके समाज को लोकतांत्रिक बनाना होगा। यहां पर गांधी और आंबेडकर के विवाद से एक बात प्रासंगिक हो जाती है। पूना समझौते के समय जब विवाद हुआ तो आंबेडकर आरक्षण को 20 साल तक रखने पर अड़े थे। जबकि गांधी का कहना था कि अगर समाज को आरक्षण के भरोसे छोड़ देंगे तो वहां पर समाज सुधार का काम रुक जाएगा। आज गांधी की यह बात सही निकली। लोगों ने आरक्षण को जातिवाद की सारी समस्याओं का समाधान मान लिया है और निश्चिंत होकर बैठ गए हैं। जबकि हाथरस जैसी घटना ने दिखा दिया है कि उसके अलावा अभी बहुत कुछ करने को शेष है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

UttarPradesh
CRIMES IN UP
UP Law And Order
communal violence
Caste Violence
Casteism
Unequal society
Dalits
lower caste
upper caste
patriarchal society
Secularism
Aisi Taisi Democracy
UP Hathras GangRape
Hathras
UP police
Yogi Adityanath
yogi sarkar
BJP

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

सवर्णों के साथ मिलकर मलाई खाने की चाहत बहुजनों की राजनीति को खत्म कर देगी


बाकी खबरें

  • Goa
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोवा चुनावः क्या है मछली बेचने वालों के मुद्दे और भाजपा का रिपोर्ट कार्ड?
    04 Feb 2022
    गोवा एक तटीय प्रदेश है। बड़ी आबादी मछली कारोबार से जुड़ी हैं। लेकिन बावजूद इसके इनके मुद्दे पूरी चुनाव चर्चा से गायब हैं। हमने मापसा की मछली मार्केट में कुछ मछली बेचने वालों के साथ बात की है कि उनके…
  • journalist bodies
    ऋत्विका मित्रा
    प्रेस की आजादी खतरे में है, 2021 में 6 पत्रकार मारे गए: रिपोर्ट 
    04 Feb 2022
    छह पत्रकारों में से कम से कम चार की कथित तौर पर उनकी पत्रकारिता से संबंधित कार्यों की वजह से हत्या कर दी गई थी। 
  • Modi
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    उत्तर प्रदेश चुनाव: बिना अपवाद मोदी ने फिर चुनावी अभियान धार्मिक ध्रुवीकरण पर केंद्रित किया
    04 Feb 2022
    31 जनवरी को अपनी "आभासी रैली" में प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में पिछले समाजवादी पार्टी के "शासनकाल के डर का जिक्र" छेड़ा, जिसके ज़रिए कुछ जातियों और उपजातियों को मुस्लिमों के साथ मिलने से…
  • russia china
    एम. के. भद्रकुमार
    रुस-चीन साझेदारी क्यों प्रभावी है
    04 Feb 2022
    व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के बीच शुक्रवार को होने वाली मुलाक़ात विश्व राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने जा रही है।
  •  Lucknow
    असद रिज़वी
    यूपी चुनाव: लखनऊ में इस बार आसान नहीं है भाजपा की राह...
    04 Feb 2022
    वैसे तो लखनऊ काफ़ी समय से भगवा पार्टी का गढ़ रहा है, लेकिन 2012 में सपा की लहर में उसको काफ़ी नुक़सान भी हुआ था। इस बार भी माना जा रहा है, भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License