NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उत्तर प्रदेश: हिजाब मामले के बीच, महिलाओं की बेरोज़गारी का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?
उत्तर प्रदेश में तकरीबन 98% महिलाएं कामकाज की दुनिया से बाहर हैं।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
17 Feb 2022
unemployment
Image courtesy : Hindustan

जितनी चर्चा हिजाब पर हुई उतनी चर्चा महिला सशक्तिकरण पर नहीं हुई। जबकि हिजाब के विवाद का समाधान महिला सशक्तिकरण के धरातल से जुड़ा हुआ है। राजनीति जब जनता से कट जाती है तो यही होता है। जनता को सशक्त करने की बजाय जनता को फिजूल की बहस में उलझा देने वाले ज्यादा तैरते हैं।

उत्तर प्रदेश के लोगों की साल भर में औसत आमदनी मुश्किल से ₹45 हजार के आसपास है। इतने कम औसत आमदनी में जीने वाले समाज में सबसे ज्यादा बड़ी मार औरतों पर पड़ती है। उन्हीं औरतों पर जो मर्दों की बनाई दुनिया में रह रही हैं। जिनकी पढ़ाई लिखाई के बारे में लड़कों के बाद में सोचा जाता है। जिन्हें एक ही तरह के काम के लिए मर्दों से कम मेहनताना दिया जाता है। जिन पर महंगाई और बेरोजगारी की सबसे बड़ी मार पड़ती है।

आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की औरतों की उत्तर प्रदेश के कुल कार्यबल में हिस्सेदारी महज 9% है। यानी जिस उत्तर प्रदेश की रोजगार दर भारत के औसत रोजगार दर 40% से कम महज 32% है। वहां पर औरतों की कुल कार्यबल में हिस्सेदारी केवल 9% है। इन्हीं 9% महिलाओं के बीच से किसी को रोजगार मिला है और कोई रोजगार की तलाश में है। यानी उत्तर प्रदेश की 91% महिलाएं रोजगार के दायरे से पूरी तरह से बाहर हैं।

अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के विद्वानों की बातों को मोटे तौर पर समेटा जाए तो औरतों की उन्नति का पैमाना यह हो सकता है कि कितनी औरतों को शिक्षा मिल रही है? कितनी औरतें आर्थिक तौर पर स्वनिर्भर हैं? कितनी औरतें घर की दहलीज लांघकर बाहर काम करने जा सकती है? कितनी औरतों की संपत्ति में भागीदारी है? इसके अलावा भी ढेर सारे पैमाने हो सकते हैं लेकिन इन मोटे पैमानों को आधार बनाकर अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने उत्तर प्रदेश की महिलाओं के हालात का विश्लेषण किया है। उनका विश्लेषण बताता है कि हर साल उत्तर प्रदेश के काम करने लायक आबादी में लाखों लोग शामिल हो रहे हैं। लेकिन रोजगार मिलने का स्तर घट्ता जा रहा है। इसका मतलब यह है कि नौजवानों पर रोजगार का भार कहर ढा रहा है।

साल 2010 में भारत में माध्यमिक शिक्षा में तकरीबन 58% इनरोलमेंट था। 2015 में बढ़कर यह 78% पर पहुंच गया। लेकिन उत्तर प्रदेश में इनरोलमेंट का स्तर साल 2019-20 में भी केवल 66% रहा। इसमें भी लड़कियों का इनरोलमेंट केवल 63% का है। अब जो लड़कियां माध्यमिक शिक्षा का स्तर पार कर ले रही हैं उनकी जीवन की आकांक्षा ऐसी नहीं है कि वह कृषि क्षेत्र में काम करें। उनके जीवन के सपने ऐसे नहीं हैं कि वह घर में बंद रह कर अपनी पूरी जिंदगी गुजार दें। उनके सपने और उम्मीदों में जो बदलाव आया है उसे सरकार पूरा नहीं कर पा रही है। जिन्हें अपना सपना पूरा करना है उनका बहुत छोटा सा हिस्सा अपना सपना पूरा कर पाता है। वह भी उत्तर प्रदेश से बाहर जाकर अपना सपना पूरा करने की तरफ आगे बढ़ता है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 के मुताबिक उत्तर प्रदेश में साक्षर महिलाओं की संख्या 66% के आसपास है। जीवन में 10 साल से अधिक की पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या 39% के आसपास है। 2017 से लेकर 2019 के बीच पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश में तकरीबन 24 लाख महिलाओं की बढ़ोतरी हुई। लेकिन इसी दौरान तकरीबन 63 लाख लेबर वर्क फोर्स में कम हो गई। यानी जितनी महिलाओं का पढ़ने लिखने के क्षेत्र में इजाफा हुआ उसका तकरीबन 3 गुना हिस्सा काम करने लायक आबादी से कम हो गया।

शिक्षा का फैलाव होने की वजह से सैलरी के आधार पर नौकरी करने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। लेकिन काम की गुणवत्ता का स्तर पहले से कम हुआ है। साल 2018-19 आकड़ा बताता है कि उत्तर प्रदेश में काम करने वाली औरतों के बीच तकरीबन 55% औरतें बिना किसी लिखित अनुबंध पर काम कर रही हैं। इन्हें किसी तरह की सोशल सिक्योरिटी नहीं मिली है। मतलब महीने में सैलरी के अलावा इन्हें किसी भी तरह का लाभ नहीं दिया जाता है। मालिक जब चाहे जिस तरह से इन्हें बाहर निकाल सकता है। इनकी नौकरी छीन सकता है। इनके काम को किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा योजना का सहारा नहीं मिला होता है।

यह बात ठीक है कि महिलाओं के नाम से प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जितने दावे किए गए हैं उतने तो नहीं लेकिन फिर भी मकान बने हैं। घरों तक पहले के मुकाबले बिजली की पहुंच बढ़ी है। भले ही रसोई गैस की कीमत 1000 तक पहुंच गई है और आने वाले दिनों में 1000 से भी ऊपर जाने वाली है, फिर भी रसोई गैस का इस्तेमाल करके खाना बनाने वाले घरों की संख्या पहले से बढ़ी है। लेकिन सभी ठीक-ठाक बातों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि योगी काल के दौरान उत्तर प्रदेश की पर व्यक्ति आमदनी में महज 0.43 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। इतने कम इजाफे का मतलब है कि बहुत बड़ी मात्रा में लोग गरीब हुए हैं। और इस गरीबी की मार सरकार के कुछ ठीक-ठाक कामों के मुकाबले पहाड़ के बराबर है।

जो काम सेल्फ एंप्लॉयड कैटेगरी में आता है। जिसके लिए सरकार मुद्रा लोन योजना का ढोल पीटते हैं। जिसकी हकीकत सरकार के ढोल की आवाज से कई गुना बेकार है। उस योजना के बाद भी उत्तर प्रदेश में काम करने वाली महिलाओं के बीच शहर में काम करने वाली सेल्फ एंप्लॉयड महिलाओं की संख्या 2012 में तकरीबन 60% के आसपास थी। यह 2019 में घटकर 41% पर पहुंच गई है।

अंत में अगर एक लाइन में समेट कर कहा जाए तो हाल फिलहाल की स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं की कुल आबादी तकरीबन 8 करोड़ 47 लाख के आसपास है। इनमें से महज 1 लाख 51 हजार महिलाएं किसी ना किसी तरह का काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में महिलाओं के बीच रोजगार दर महज 1.88% का है। यानी तकरीबन 98% महिलाएं उत्तर प्रदेश में कामकाज की दुनिया से बाहर है।

ये भी देखें: महंगाई-बेरोज़गारी को ख़त्म करने में क्या फ़ेल हुई मोदी सरकार?

UttarPradesh
Hijab
unemployment
Increase female unemployment
women empowerment

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

विशेष: क्यों प्रासंगिक हैं आज राजा राममोहन रॉय

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है


बाकी खबरें

  • veto
    एपी/भाषा
    रूस ने हमले रोकने की मांग करने वाले संरा के प्रस्ताव पर वीटो किया
    26 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 और विपक्ष में एक मत पड़ा। चीन, भारत और संयुक्त अरब अमीरात मतदान से दूर रहे।
  • Gujarat
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!
    26 Feb 2022
    छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है।
  • Leander Paes and Rhea Pillai
    सोनिया यादव
    लिएंडर पेस और रिया पिल्लई मामले में अदालत का फ़ैसला ज़रूरी क्यों है?
    26 Feb 2022
    लिव-इन रिलेशनशिप में घरेलू हिंसा को मान्यता देने वाला ये फ़ैसला अपने आप में उन तमाम पीड़ित महिलाओं के लिए एक उम्मीद है, जो समाज में अपने रिश्ते के अस्तित्व तो लेकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022: किस तरफ होगा पूर्वांचल में जनादेश ?
    26 Feb 2022
    इस ख़ास बातचीत में परंजॉय गुहा ठाकुरता और शिव कुमार बात कर रहे हैं यूपी चुनाव में पूर्वांचाल की. आखिर किस तरफ है जनता का रुख? किसको मिलेगी बहुमत? क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पायेगी? जवाब ढूंढ रहे हैं…
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता
    26 Feb 2022
    ड्रग्स, अफस्पा, पहचान और पानी का संकट। नतीजतन, 5 साल की डबल इंजन सरकार को अब फिर से ‘फ्री स्कूटी’ का ही भरोसा रह गया है। अब जनता को तय करना है कि उसे ‘फ्री स्कूटी’ चाहिए या पीने का पानी?    
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License