NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उत्तराखंड: 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा की ‘डबल इंजन’ सरकार को बेहद मुश्किलों का सामना करना होगा
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बेहद संक्षिप्त मंत्रिमंडल में ज्यादातर संख्या कांग्रेस से दल-बदलकर आने वाले लोग हैं, के पास अभी भी तमाम क्षेत्रों में किये गए कई वायदों को पूरा करना बाकी है।
एस.एम.ए. काज़मी
06 Feb 2021
उत्तराखंड

देहरादून: सी-वोटर द्वारा हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को देश में मौजूदा मुख्य मंत्रियों में सबसे ख़राब रेटिंग मिली है। जबकि एक अन्य टेलीविज़न चैनल द्वारा किए गए एक अन्य सर्वेक्षण में उनका उल्लेख एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री के तौर पर भी नहीं किया गया है।

सर्वेक्षण से हासिल निष्कर्षों ने विपक्षी दलों के हाथ में, राज्य के लोगों द्वारा भाजपा को व्यापक जनादेश दिए जाने के बावजूद उनके साथ दगाबाजी करने के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और खासकर इसके मौजूदा मुख्यमंत्री के खिलाफ जवाबी हमले करने का भरपूर मसाला दे डाला है।

फरवरी 2022 में होने वाले उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में जहाँ अब सिर्फ 12 महीने बचे हैं, मुख्यमंत्री रावत के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ भाजपा राज्य सरकार के पास जमीन पर उपलब्धियों के नाम पर दिखाने के लिए कुछ ख़ास नहीं है।

फरवरी 2017 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 70 विधानसभा सीटों में से रिकॉर्ड 57 सीटों पर जीत दर्ज कर भाजपा ने कांग्रेस को हराकर अभूतपूर्व जनादेश हासिल कर सत्ता हासिल की थी। तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष और वर्तमान में केन्द्रीय गृह मंत्री, अमित शाह के साथ अपनी नजदीकियों के चलते राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व ‘प्रचारक’ त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति का अवसर मिल सका था।

रावत शाह की संगठनात्मक टीम का हिस्सा थे और वे झारखण्ड में पार्टी मामलों के प्रभारी भी रहे। पार्टी के भीतर उनके इस उत्थान को लेकर मतभेद भी बने हुए थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मौजूदा शासनकाल को देखते हुए किसी में भी इस चयन पर सवाल खड़े करने का साहस नहीं था।

एक पर्वतीय राज्य होने के नाते उत्तराखंड को स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली एवं सड़कों तक पहुँच न बना सकने जैसी बुनियादी ढांचे वाली विशिष्ट समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतीत में जबसे नवंबर 2000 में राज्य का गठन हुआ है, के बाद से कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही बारी-बारी से राज्य में अपनी सरकारें बनाई हैं।

2017 में भाजपा राज्य में “डबल इंजन” सरकार के दावे के साथ सत्ता में आई थी, जिसमें उसका दावा था कि केंद्र में भाजपा शासित सरकार होने के कारण राज्य में वह जोरदार विकास कार्यों को बढ़ावा देने में सक्षम है। लेकिन ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। पार्टी और स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा किये गए अधिकाँश वादे अभी भी जस के तस हैं।

राज्य में सत्ता की बागडोर हाथ में लेने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने स्वयं भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की घोषणा की थी। लेकिन उनकी खुद की छवि तब तार-तार हो गई जब एक याचिका में सुनवाई के दौरान नैनीताल उच्च न्यायालय ने उनके करीबियों के निजी खातों में धन के हस्तांतरण के मामले की जाँच के लिए केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दे दिए थे।

जाँच का सामना करने के बजाय राज्य सरकार भागी-भागी सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गई, ताकि हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई जा सके। रोचक तथ्य यह है कि राज्य सरकार, जो अपना चार साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है, ने अभी तक राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की है। लोकायुक्त के अभाव में 1,500 से अधिक शिकायतों पर सुनवाई का काम अटका पड़ा है।

राज्य के आम आदमी पार्टी (आप) के प्रवक्ता रविंदर सिंह आनंद का आरोप है “मुख्यमंत्री द्वारा खुद से 18 मार्च, 2017 से लेकर 9 नवंबर, 2020 तक विकास कार्यों को लेकर की गई कुल 2,266 घोषणाओं में से सिर्फ 1,300 घोषणाओं पर ही काम शुरू हो सका है, जिनमें से 549 कामों को अभी भी पूरा किया जाना बाकी है।”

राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद निराशाजनक बनी हुई है। पहाड़ी क्षेत्रों में डाक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों एवं बुनियादी ढाँचे का घोर अभाव बना हुआ है और सड़कों पर ही नवजात शिशुओं के जन्म की कई घटनाएं प्रकाश में आई हैं। 2019 में नीति आयोग द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दी गई रैंकिंग में राज्य 21 राज्यों के बीच में 17वें स्थान पर लुढ़क गया था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के राज्य सचिव इन्द्रेश मैखुरी ने दावा किया कि “पिछले एक साल से राज्य में प्रसव के दौरान औसतन हर महीने एक महिला ने अपनी जान गंवाई है। राज्य सरकार की पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड के जरिये स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की कोशिशें पूरी तरह से विफल रही हैं। राज्य सरकार का समूचा ध्यान सिर्फ शराब और नदियों के तट से खनन के जरिये राजस्व इकट्ठा करने पर बना हुआ है।”

शिक्षा के क्षेत्र में भी हालात उतने ही निराशाजनक बने हुए हैं। राज्य सरकार की उदासीनता के चलते सरकारी स्कूल एक के बाद एक तेजी से बंद होते जा रहे हैं। मैखुरी का कहना था कि “पिछले कुछ वर्षों में 3,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, और सरकार का सारा ध्यान आरएसएस द्वारा संचालित शिशु मंदिरों पर केन्द्रित है।”

उत्तराखंड जिसे 2013 में आये भीषण जल-प्रलय के कारण भारी पैमाने पर बर्बादी का सामना करना पड़ा था, जिसके कारण राज्य के पर्वतीय इलाकों में रहने वाले लोग आज भी टूटी सड़कों, पुलियों और बांधों के निर्माण कार्य की मांग कर रहे हैं। थराली विधानसभा क्षेत्र के लोग पिछले दो महीनों से 19 किलोमीटर नंदप्रयाग-घाट सड़क के चौड़ीकरण की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) के दिन 19 किमी लंबी मानव श्रृंखला बनाने के साथ-साथ ‘तिरंगा यात्रा’ तक का आयोजन किया था, लेकिन इस सबका कोई फायदा नहीं हुआ।

2018 में एक औद्योगिक शिखर सम्मेलन का आयोजन कर उद्योगपतियों एवं उद्यमियों को आमंत्रित करने के लिए बहु-प्रचारित विशाल प्रयास भी पर्यटन, बागवानी, सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैविक खेती के क्षेत्रों में बहु-प्रचारित औद्योगिक विकास और निवेश को बढ़ावा दे पाने में विफल रहे हैं। 2018 के औद्योगिक शिखर सम्मेलन के बाद इस बात का दावा किया गया था कि राज्य में 1.25 लाख करोड़ रूपये तक के निवेश की संभावना है, लेकिन कुल-मिलाकर परिणाम उत्साहजनक नहीं रहे हैं। 

उत्तराखंड में कांग्रेस के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का कहना है “राज्य सरकार कुछ हजार करोड़ रुपयों तक के निवेश को नहीं दिखा सकती है।”

इसके साथ ही साथ उत्तराखंड में सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है, क्योंकि मुख्यमंत्री रावत पिछले चार वर्षों से एक सीमित मंत्रालय के साथ काम चला रहे हैं। कुल 11 मंत्रिस्तरीय स्थानों के होते हुए भी राज्य को 2017 के बाद से सिर्फ नौ मंत्रियों के सहारे चलाया जा रहा है। 2019 में राज्य के वित्त मंत्री प्रकाश पन्त की मृत्यु के बाद से इस संख्या में और कमी आ चुकी है। 

बिजली और स्वास्थ्य जैसे ज्यादातर महत्वपूर्ण विभागों को मुख्यमंत्री ने अपने पास ही रखा हुआ है, और वर्तमान स्थिति को देखते हुए मंत्रालय में किसी प्रकार का विस्तार संभव होता नहीं दिखता।

कुल आठ मंत्रियों में से पांच मंत्री - सतपाल महाराज, यशपाल आर्य, हरक सिंह रावत, रेखा आर्य और सुबोध उनियाल कांग्रेस से दलबदल कर आये हैं, जो 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्त्व में भाजपा के खेमे में कूदे थे। इनमें से एकमात्र सतपाल महाराज ही हैं, जिन्होंने 2014 में भाजपा का दामन थामा था। 

अब इन सभी पूर्व कांग्रेसी मंत्रियों के बारे में कहा जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री की कथित तानशाही रवैये से नाराज चल रहे हैं। उनमें से ज्यादातर लोग खुद को अपमानित महसूस करते हैं, लेकिन पार्टी में उनके पास अपना दुखड़ा सुनाने के लिए कोई कन्धा मौजूद नहीं है। भाजपा के भीतर चल रही इस प्रकार की रस्साकसी ने पहले से ही राज्य सरकार की एकजुटता पर प्रतिकूल असर डालने का काम किया है।

इस बारे में भाजपा के उपाध्यक्ष देवेंदर भसीन का दावा है “त्रिवेंद्र रावत सरकार सबसे स्थिर और साफ़-सुथरी छवि के साथ अपना कामकाज करने वाली सरकार साबित हुई है। लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप गैरसैण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने के फैसले और आगामी बजट सत्र का गैरसैण में आयोजन मुख्यमंत्री की वचनबद्धता को दर्शाता है।”

इस बीच विधानसभा चुनावों में अपने भाग्य को चमकाने के लिए भाजपा ने अपनी सारी उम्मीद, प्रसिद्ध चार धाम मंदिरों को जोड़ने वाले आल वेदर रोड परियोजना और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट पर लगा रखा है, जो कि मुख्यतया केंद्र सरकार की परियोजनाएं हैं।

हालाँकि राज्य सरकार को हाल ही में झटका तब लगा जब शिवालिक हाथी वन अभयारण्य को जॉली ग्रांट हवाई अड्डे के विस्तार के लिए डीनोटिफाई करने के उसके निर्णय पर नैनीताल उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी। 

राज्य चुनावों के मद्देनजर उत्तराखंड में अपने विशाल संसाधनों, पार्टी अनुशासन, जमीनी स्तर पर आरएसएस से मिलने वाले समर्थन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सवर्ण जातियों के बीच में अपील को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अभी से अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। मुख्यमंत्री रावत जिन्होंने मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के प्रकोप के बाद से ही खुद को अपने सरकारी आवास तक सीमित कर रखा था और आराम फरमा रहे थे, ने अब राज्य का दौरा करना शुरू कर दिया है।

लेकिन उत्तराखंड भाजपा के मुखिया बंशीधर भगत ने अपने ही पार्टी विधायकों को इस बीच कुछ नसीहत दी है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर उन्हें चेता दिया है कि यदि वे आम लोगों की समस्याओं को हल कर पाने में विफल रहते हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी तक उन्हें अगले चुनावों में जीत दर्ज करा पाने में सक्षम साबित नहीं होने जा रहे हैं। 

लेखक देहरादून स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं, जिनका ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द ट्रिब्यून’ के साथ चंडीगढ़, अमृतसर, मेरठ, जम्मू कश्मीर, हरियाणा और उत्तराखंड में काम करने का तीन दशकों से अधिक का अनुभव रहा है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Uttarakhand: BJP’s ‘Double Engine’ Govt Faces Uphill Task in 2022 Assembly Polls

Trivendra Singh Rawat
BJP Uttarakhand
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • केवल बढ़ती अव्यवस्था के कारण
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    बढ़ती अव्यवस्था के कारण
    14 Sep 2021
    हम कैसे समय में जी रहे हैं जहाँ हमसे एक ऐसी दुनिया में तर्कसंगत रहने की बात कही जाती है जहाँ केवल अव्यवस्था ही एकमात्र आदर्श है, युद्ध और बाढ़ के कारण अव्यवस्था, किसी-न-किसी महामारी के कारण अव्यवस्था।
  •  'मैं देश नहीं बिकने दूंगा' से 'मैं शेष नहीं बचने दूंगा' तक का सफर
    प्रभात पटनायक
    'मैं देश नहीं बिकने दूंगा' से 'मैं शेष नहीं बचने दूंगा' तक का सफर
    14 Sep 2021
    भारत में मोदी सरकार का अपना ही विचित्र एजेंडा है। हरेक चीज को एक माल में तब्दील कर देने का एजेंडा। कुछ भी पवित्र नहीं हैं, कुछ भी पूजनीय नहीं है, कुछ भी बाजार से ऊपर नहीं है, सब कुछ बिकाऊ है।
  • farmers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिमाचल: सेब के उचित दाम न मिलने से गुस्साए किसानों का प्रदेशव्यापी विरोध प्रदर्शन
    14 Sep 2021
    संयुक्त किसान मंच ने सरकार को चेताया है कि अगर आगामी 15 दिनों के भीतर सरकार बागवानों और किसानों के साथ मिलकर उनकी मांगों पर अमल नहीं करती है तो संयुक्त किसान मंच, अन्य संगठनों के साथ मिलकर 27 सितंबर…
  • इको गॉर्डन, लखनऊ में 10 सितंबर को युवाओं को सम्बोधित करते किसान नेता डॉ. दर्शन पाल।
    लाल बहादुर सिंह
    युवा रोज़गार आंदोलन किसान-मज़दूर आंदोलन के साथ जुड़कर नवउदारवाद और फ़ासीवाद के लिए चुनौती बनेगा
    14 Sep 2021
    27 सितम्बर का भारत बन्द इस मिशन का अहम पड़ाव है। इसके अलावा मोदी जी के जन्मदिन 17 सितंबर को इस वर्ष भी युवाओं ने जुमला दिवस-बेरोजगार दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया है।
  • अर्जेंटीना में भूख से निपटने में मदद करते सामुदायिक संगठन, उनकी हमदर्दी और एकजुटता
    जूलियन इंजुगारट, एना डागोरेट
    अर्जेंटीना में भूख से निपटने में मदद करते सामुदायिक संगठन, उनकी हमदर्दी और एकजुटता
    14 Sep 2021
    महामारी अपने साथ पहले से कहीं ज़्यादा ग़ैर-बराबरी और नाइंसाफ़ी लेकर आयी। लेकिन,ज़मीनी स्तर के आंदोलनों ने संघर्ष कर रहे लोगों को एकजुट किया, संगठित किया और उनके लिए खाने-पीने का इंतज़ाम किया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License