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भारत
राजनीति
उत्तराखंड: देवस्थानम बोर्ड वापसी, एक चुनावी फ़ैसला!
“भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे कि जब कोई निर्वाचित सरकार किसी विधेयक को विधानसभा में ध्वनिमत से पारित करे और वही सरकार अपने बनाए हुए अधिनियम को वापस ले। निश्चित रूप से ये एक ऐतिहासिक घटनाक्रम है”।
वर्षा सिंह
02 Dec 2021
Sadhu Sants
देवस्थानम् बोर्ड अधिनियम वापस लेने के फ़ैसले के बाद मुख्यमंत्री धामी का आभार जताने पहुंचे तीर्थ-पुरोहित और साधु-संत

विधानसभा चुनाव ठीक सामने हैं और ये फ़ैसला वापसी का समय है। या कहें कि चुनाव के लिहाज से फ़ैसले लेने का समय है। देश ने कृषि कानून वापस लिए जाने के फ़ैसले का स्वागत किया। उत्तराखंड के मैदानी ज़िलों के किसानों ने भी केंद्र के इस फ़ैसले का स्वागत किया।

अगली बारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की थी। 30 नवंबर 2021 को देवस्थानम बोर्ड अधिनियम का फ़ैसला वापस लेने की घोषणा की गई। 9 और 10 दिसंबर को देहरादून में विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित हो रहा है। जिसमें कानून वापसी की प्रक्रिया पूरी किए जाने की संभावना है।

राज्य आंदोलन के बाद दूसरा सबसे लंबा आंदोलन!

चारधाम तीर्थ-पुरोहित हक-हकूक धारी महापंचायत के प्रवक्ता ब्रजेश सती कहते हैं कि चारों धाम के तीर्थ पुरोहित इस कानून के खिलाफ पिछले 734 दिनों से लगातार धरना प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे थे। सरकार ने देर से ही सही तीर्थ-पुरोहितों की भावनाओं को समझा। उसका आदर किया और यह अधिनियम वापस लिया। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बाद, ये सबसे लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन रहा।

वह कहते हैं “भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे कि जब कोई निर्वाचित सरकार किसी विधेयक को विधानसभा से ध्वनिमत से पारित करे और वही सरकार अपने बनाए हुए अधिनियम को वापस ले। निश्चित रूप से ये एक ऐतिहासिक घटनाक्रम है”।

जन-भावना के विपरीत लिया गया फ़ैसला

कृषि कानून बिना किसानों को साथ लिए एक तरफा तरीके से बनाए गए थे। देवस्थानम बोर्ड भी चारधाम यात्रा मार्ग से जुड़े तीर्थ-पुरोहितों और स्थानीय लोगों को साथ में लिए बिना, एक तरफा तरीके से लिया गया सरकार का फ़ैसला साबित हुआ।

केदारनाथ से कांग्रेस विधायक मनोज रावत न्यूज़क्लिक से बातचीत में कह चुके हैं कि सरकार ने जनता को विश्वास में लिए बिना देवस्थानम बोर्ड बनाने का फ़ैसला लिया था। विधानसभा में चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड अधिनियम को स्टैंडिंग कमेटी में भेजने की मांग की गई थी। केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री की पूजा पद्धतियां अलग-अलग हैं। इनका प्रबंधन भी अलग-अलग है। बदरीनाथ और केदारनाथ मंदिर समिति 1939 के एक्ट के तहत संचालित हो रहे थे। सरकार ने सोचा कि ये मंदिर उनकी कमाई का अड्डा बनेंगे”।

डर था कि ये कानून चुनाव में हार का सबब बनेंगे!

सीपीआई-एम के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी इस पर कहते हैं “केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून वापसी और उत्तराखंड सरकार द्वारा देवस्थानम एक्ट की वापसी के जो संकेत हैं, उन्हें भी समझा जाना चाहिए। दोनों ही मामलों में साम्यता यह है कि भाजपा को महसूस हो रहा था कि ये कानून उसकी हार के सबब बनेंगे। इसका आशय यह है कि यदि हार का डर न हो तो भाजपा कैसा भी जन विरोधी कृत्य कर सकती है। कैसा भी जन विरोधी कानून बना सकती है! और कुर्सी पर खतरा मंडराएगा तो उसे बचाने के लिए उतनी ही विपरीत दिशा में किसी भी हद तक जा सकती है”।

गढ़वाल के तीन पर्वतीय ज़िलों के लोगों की आजीविका चारधाम यात्रा से जुड़ी हुई है।

फ़ैसले का समय

दिसंबर 2019 में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर देवस्थानम बोर्ड लेकर आए थे। वे इसे पिछले 20 साल का सबसे सुधारात्मक कदम मानते थे। विधानसभा में जब ये विधेयक पेश किया गया तो विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष के बहुत से विधायक भी अचंभित रह गए थे। इसका विरोध देहरादून से लेकर पर्वतीय ज़िलों तक हुआ।

देवस्थानम बोर्ड वापस लेने के फ़ैसले पर त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक कार्यक्रम के दौरान प्रतिक्रिया दी “मुझे पता है आप लोग क्या पूछेंगे, मैं तो आपके सामने हंस भी नहीं सकता”।

वहीं, देहरादून में मीडिया प्रतिनिधियों से बातचीत में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा “राज्य सरकार ने जनहित को ध्यान में रखते हुए उत्तराखण्ड देवस्थानम प्रबन्धन बोर्ड अधिनियम को वापस लिये जाने का निर्णय लिया है”। 

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारी लेने के बाद से ही देवस्थानम बोर्ड को लेकर चारधाम से जुडे तीर्थ पुरोहित, रावल, पंडा समाज, हक हकूधारियों और जनप्रतिनिधियों के स्तर पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रिया सामने आई। जिसके बाद पूर्व सांसद मनोहर कान्त ध्यानी की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। समिति ने 3 महीने में अपनी अन्तरिम रिपोर्ट राज्य सरकार को उपलब्ध कराने के साथ ही अंतिम रिपोर्ट में ये कानून वापस लेने का निर्णय लिया। 

हालांकि इस कमेटी को लेकर भी तीर्थ-पुरोहितों ने नाराजगी दर्ज करायी थी। नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ दौरे से ठीक पहले चारों धाम में तीर्थ पुरोहितों ने विरोध प्रदर्शन कर बाजार बंद कराए थे। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को केदारनाथ नहीं जाने दिया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक और मंत्री धन सिंह रावत का घेराव किया। साथ ही प्रधानमंत्री के दौरे के विरोध की चेतावनी भी दी थी। तकरीबन दो साल तक तीर्थ-पुरोहितों के विरोध-प्रदर्शनों को सरकार झेल गई। लेकिन चुनाव के लिए घटता समय और तीर्थ-पुरोहितों की बढ़ती नाराजगी सरकार की मुश्किलें बढ़ा रही थी। 

तीर्थ-पुरोहितों की आजीविका का था सवाल

वरिष्ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला कहते हैं “देवस्थानम बोर्ड से तीर्थ-पुरोहितों, स्थानीय लोगों को अपनी आजीविका का ज़रिया खोने का डर था और उनका ये डर जायज था। पूजा-पाठ, पुरोहित, घोड़े-खच्चर वालों, डंडी-कंडी, फूल-प्रसाद बेचने वालों से लेकर पार्किंग तक के टेंडर जारी कर गिने-चुने लोगों को रोजगार मिलता। कमीशन का चक्कर होता। पौड़ी, टिहरी जैसे ज़िलों में रोजगार नहीं होने के चलते पलायन है। गढ़वाल में चारधाम यात्रा से जुड़े चमोली, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग से पलायन नहीं है। क्योंकि यहां यात्रा के चलते लोगों के पास 6 महीने का रोजगार है। अगर ये आमदनी भी नहीं रहेगी तो इन क्षेत्रों से भी पलायन होगा। पहाड़ सूने हो जाएंगे”।

वह कहते हैं कि सरकार को अपने लोगों और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से नियम बनाने चाहिए। “जम्मू-कश्मीर के श्राइन बोर्ड की तर्ज पर देवस्थानम बोर्ड बनाने का फ़ैसला किया। सिंगापुर-मॉरीशस की टूरिज्म पॉलिसी को उत्तराखंड में अपनाने की कोशिश करते हैं। जबकि सरकार को चारधाम यात्रा मार्ग पर बुनियादी सुविधा बेहतर बनाने के लिए कार्य करना चाहिए। केदारनाथ धाम में अब भी यात्रियों के बैठने के लिए शेड नहीं है। शौचालय नहीं है। पर्यटकों के साथ प्लास्टिक कचरा उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। उसके निस्तारण की व्यवस्था नहीं है”। 

देहरादून की संस्था एसडीसी फाउंडेशन ने उत्तराखंड के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर से मिले डाटा के आधार पर ये फैक्ट शीट जारी की है

चुनावी गणित

चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से उत्तरकाशी में 3, चमोली में 3 और रुद्रप्रयाग में 2 विधानसभा सीट हैं। उत्तरकाशी में कुल 227,377 मतदाता (2.9%), चमोली में 292,810 मतदाता (3.7%)और रुद्रप्रयाग में 188,084 मतदाता (2.4%) हैं। ज्यादातर मतदाता राज्य के तीन मैदानी ज़िलों देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर में हैं। लेकिन राज्य के 9% मतदाता यानी 7 लाख से अधिक आबादी वाले ज़िले के एक बड़े वर्ग को नाराज़ करना 8 विधानसभा सीटों पर भारी पड़ सकता था।

मंदिरों के संचालन की बात हरिद्वार के साधु-संतों को भी पसंद नहीं आ रही थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के देवस्थानम बोर्ड प्रबन्धन अधिनियम वापस लेने की घोषणा के बाद चारधाम तीर्थ पुरोहितों, रावल समाज, पंडा समाज, हक हकूक धारियों ने मुलाकात की। उनके साथ ही अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष महंत रवीन्द्र पुरी, अखाड़ा परिषद् के महामंत्री मंहत हरिगिरी आचार्य, महामण्डलेश्वर स्वामी कैलाशानन्द महाराज समेत हरिद्वार के साधु-संत भी आभार जताने पहुंचे।

(देहरादून से स्वतंत्र पत्रकार वर्षा सिंह)

ये भी पढ़ें: पहाड़ों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी, कैसे तीसरी लहर का मुकाबला करेगा उत्तराखंड?

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