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उत्तराखंड: बारिश से भारी संख्या में सड़कों और पुलों का बहना किसका संकेत?
उत्तराखंड के सभी पहाड़ी जिलों के अधिकांश मुख्य मार्गों पर लैंडस्लाइड की घटनायें हुई हैं, जिससे भारी संख्या में सड़कें बंद हैं, इसके अलावा ग्रामीण इलाकों को जोड़ने वाली सड़कें भी बड़ी संख्या में बंद हैं। लोकनिर्माण विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 30 अगस्त 2021 तक विभिन्न जनपदों में 215 मार्ग पूरी तरह अभी बंद हैं।
सत्यम कुमार
31 Aug 2021
ROAD
सहस्त्रधारा मालदेवता लिंक लिंक रोड (फोटो-अभिषेक)

उत्तराखंड में हो रही लगातार भारी बारिश में भूस्खलन के कारण सड़के बंद होने और नदियों पर बने पुलों के बहने की खबरे आ रही हैं।   इनमें अधिकतर चार धाम परियोजना के अंतर्गत बनी सड़के हैं।  जिस सड़क को सभी मौसम में सुगम यात्रा करने के लिए बनाया गया था, वह बरसात का एक मौसम भी नहीं झेल पायी हैं।  हाल ही में ऋषिकेश गंगोत्री नेशनल हाईवे, फकोट के पास लगभग 20 मीटर से अधिक सड़क धंस जाने के कारण बंद हो गया था, जिसे अभी पहाड़ को काटकर छोटे वाहनों के लिए फिर से शुरू कर दिया गया है।  इसके अलावा बद्रीनाथ नेशनल हाईवे भी तोता घाटी में भारी भूस्खलन होने से बंद है।  राष्ट्रीय राजमार्ग बंद होने की वजह से जगह-जगह यात्री फंसे हुए हैं।  इन घटनाओं से देहरादून भी अछूता नहीं है, यहाँ पर भी रायपुर को ऋषिकेश से जोड़ने वाला रानीपोखरी पुल भी टूट चुका है।  जिससे आम लोगों को आवाजाही के लिए वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ रहा है।  सड़कों के बड़ी संख्या में बंद होने के कारण आमजन को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा हैं।  

सड़को और पुलों की स्थिति 

उत्तराखंड के सभी पहाड़ी जिलों के अधिकांश मुख्य मार्गों पर लैंडस्लाइड की घटनायें हुई हैं, जिससे भारी संख्या में सड़कें बंद हैं, इसके अलावा ग्रामीण इलाकों को जोड़ने वाली सड़कें भी बड़ी संख्या में बंद हैं। लोकनिर्माण विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 30 अगस्त 2021 तक विभिन्न जनपदों में 215 मार्ग पूरी तरह अभी बंद हैं। जिसमें लोकनिर्माण विभाग(PWD) की 93, राष्ट्रीय राजमार्ग(N.H.) की 3 और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना(PMGSY) की 119 सड़के बंद हैं, इसके अलावा 47 पुल भी क्षत्रिग्रस्त हैं।  इन सभी क्षतिग्रस्त सड़कों और पुलों को तत्काल अस्थाई तौर पर खोलने के लिए करीब 50 करोड़ रुपयों की आवयश्कता हैं, जिसके सापेक्ष 30.7 करोड़ रूपये ही प्राप्त हुए हैं, इसके अलावा इन सड़कों और पुलों को पूर्व की स्थिति में लाने के लिए यानी की पूरी तरह स्थाई तौर पर ठीक करने के लिए करीब 220 करोड़ रुपयों की आवश्यकता होगी।

अवैज्ञानिक निर्माण और आपदाएं  

जानकारों का कहना है कि पहाड़ में लगातार हो रहे भूस्खलन का मुख्य कारण विकास के नाम पर अवैज्ञानिक तरीक़े से हो रहा निर्माण ही है।  उत्तराखंड राज्य में साल 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी को कोई भुला नहीं सकता, साल 2014 में डॉ. रवि चौपड़ा की अध्यक्षता में आयी एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट (असेसमेंट ऑफ़ एनवायर्नमेंटल डिग्रिडेशन एंड इम्पैक्ट ऑफ़ हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट) के अनुसार केदारनाथ आपदा के विकराल रूप होने का एक बड़ा कारण राज्य में बनायीं गयी जल विधुत परियोजनाओं को ही माना गया है, रिपोर्ट के अनुसार अलकनंदा और भागीरथी नदी पर बनी 24 जल विधुत परियोजनाओं में से 23 परियोजना प्रकृति के लिये बहुत ही खतरनाक हैं, जिनको तत्काल रूप से बंद करने का सुझाव एक्सपर्ट कमेटी के द्वारा दिया गया था, लेकिन वर्तमान में इन सभी 23 परियोजनाओं में से 22 जल विधुत परियोजनायें अभी कार्यरत हैं। 

इसी वर्ष 07 फरवरी को रैणी गांव में ऋषिगंगा में आयी बाढ़ का कारण भी अत्यधिक संवदेनशील इलाकों में हो रहे अत्यधिक निर्माण को ही माना जा रहा है, जानकारों के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एक के नीचे एक बन रही जलविद्युत परियोजनाएं या बाँध, दुर्घटनाओं को आमंत्रित करने जैसा है, वर्ष 2003-04 में तपोवन-विष्णुगाड परियोजना प्रस्तावित हुई थी, स्थानीय लोगों ने कई वर्षों तक इस परियोजना का विरोध किया था लेकिन फिर भी प्रशासन द्वारा इस का निर्माण जारी रखा गया। 

चार धाम सड़क परियोजना का मुख्य उद्देशय सभी प्रकार के मौसम में एक सुगम यातायात देना था लेकिन परियोजना में शुरुवात से ही भूस्खलन की समस्याएं देखने को मिली, चार धाम परियोजना में हुये निर्माण में पहाड़ों की अधिक कटाई के कारण नये भूस्खलन क्षेत्रों में बढ़ोतरी देखने को मिली, जिस कारण बरसात के मौसम में भूस्खलन से सड़कें बंद होने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।  चार धाम सड़क परियोजना में एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट को दरकिनार करना प्रकृति के प्रति सरकार की नीति को साफ दर्शाता है। 

इसे भी पढ़ें: चारधाम परियोजना में पर्यावरण और खेती-किसानी को हो रहे नुकसान की भारी अनदेखी

आवाजाही में समस्या 

पहाड़ी रास्तों में जगह जगह रास्ते बंद होने से जनता को आवाजाही में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, लोगो का कहना है कि यदि उनको श्रीनगर से देहरादून आना है, तो उस के लिये श्रीनगर से पहले कोटद्वार और फिर हरिद्वार होते हुए देहरादून आते हैं, जिसमें समय और किराया दोनों ही अधिक लगते हैं।  ऐसे में सबसे अधिक प्रभावित वह व्यक्ति हुए है जिनको किसी भी प्रकार की चिकित्सा सेवा के लिए देहरादून या फिर ऋषिकेश आना है।  इसके अतिरिक्त इसी समय देहरादून में कुछ परीक्षाएं भी थीं, इन्हीं में से 29 अगस्त को असिस्टेंट इंजीनियर (UPCL) की परीक्षा देने आये अभ्यर्थी अमित कुमार का कहना है कि श्रीनगर से ऋषिकेश मार्ग बंद होने से उनको श्रीनगर से चम्बा, मसूरी होते हुए देहरादून आना पड़ा जो कि बहुत लम्बा रास्ता है, इस पर भी यातायात अधिक होने के कारण जाम की स्थिति बनी हुई थी जिससे उनको डर था कि कहीं मेरी परीक्षा छूट न जाये। आगे अमित बताते हैं कि इस रास्ते से देहरादून आने के लिये उन्हें दोगुना किराया देना पड़ा। 

क्या कहते है पर्यावरणविद?

वानिकी कॉलेज रानीचौरी में एनवायर्नमेंटल साइंस के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. एसपी सती द्वारा हाल हीं में एक वेबिनार जिसका शीर्षक “हिमालय में आपदाएं, कौन जिम्मेदार में” उन्होंने कहा कि हिमालययी क्षेत्र में साल दर साल बरसात से होने वाली घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है और बड़े दुःख की बात है कि किसी का ध्यान इस ओर नहीं है।  सभी लोग विकास चाहते हैं, लेकिन किसी भी विकास को हम तभी भोग सकते है जब हम जिन्दा होंगे, प्रो. सती ने 2013 में आयी केदारनाथ आपदा का उदाहरण देते हुए बताया कि उत्तराखंड जैसे राज्य में अधिक बारिश होना एक आम बात हैं, लेकिन उस बारिश को आपदा का विकराल रूप देने में, जल विधुत परियोजनाओं के निर्माण के तहत निकलने वाले मलवे का भी पूर्ण योगदान था, जिसने पानी के साथ मिलकर तबाही मचायी। आगे वह बताते हैं कि पहाड़ में एक किलोमीटर सड़क बनाने में 30 हजार से 60 हजार घनमीटर मलवा निकलता है, यदि उत्तराखंड में पिछले एक दशक की बात करें तो लगभग 250 घनमीटर मलवा नदियों में डाला जा चूका है, जो कहीं ना कहीं किसी बड़ी घटना का कारण बनता है, इन सभी के अतरिक्त भी पहाड़ काट कर सड़क को चौड़ा करने के बाद सही प्रकार से पहाड़ का उपचार नहीं हो पाने के कारण भूस्खलन जोन की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सरकार का इस ओर कोई ध्यान ही नहीं है, सभी लोग बस विकास की अलाप जापने में लगे है। 

इसे भी पढ़ें: पर्यावरणीय पहलुओं को अनदेखा कर, विकास के विनाश के बोझ तले दबती पहाड़ों की रानी मसूरी

ह्यूमन राइट्स लॉयर और कंज़र्वेशन एक्टिविस्ट रीनू पॉल का कहना है कि इस प्रकार की घटनाओं के लिए कहीं ना कहीं सरकार भी जिम्मेदार है क्योंकि किसी नदी के मुहाने में कोई भवन निर्माण प्रशासन की अनुमति के बिना नहीं होता है।  और किसी भी निर्माण को करने से पहले सरकार को उस निर्माण से होने वाले नुकसान का पूर्व अवलोकन करना बहुत जरुरी है लेकिन सरकार अपने फायदे के लिये ऐसा नहीं करती हैं।  यदि देहरादून की ही बात करें तो यहाँ की नदियों पर बहुत ज्यादा अतिक्रमण और अवैध खनन देखने को मिलता है, जिस कारण बरसात के मौसम में नदियों का स्तर बहुत ज्यादा हो जाता है और इस प्रकार की घटनाये घटित होती हैं, ऐसे लगता है जैसे सरकार प्रकृति के प्रति संवेदनशील नहीं है, सरकार प्रकृति द्वारा घटित होने वाली घटनाओं को काबू नहीं कर सकती, परन्तु प्रकृति के प्रति संवेदनशील होकर अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए प्राकृतिक घटनाओ से होने वाले नुकसान को कम कर सकती है। 

इसे भी पढ़ें: क्या उत्तराखंड में लगातार हो रही अतिवृष्टि के लिये केवल प्रकृति ज़िम्मेदार है?

उत्तराखंड राज्य में घटित इन घटनाओं को पूर्ण रूप से प्राकृतिक नहीं कहा जा सकता, हिमालय एक बहुत ही संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है, यहाँ किया गया छोटे से छोटा निर्माण भी पहाड़ पर बहुत अधिक प्रभाव डालता है, इसलिए पहाड़ में विकास केवल उतना ही होना चाहिये जितनी की अत्यंत आवयश्कता हो। 

लेखक देहरादून स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं , लेख में निहित विचार उनके निजी हैं। 

 

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