NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
उत्तराखंड : चारधाम देवस्थानम बोर्ड को लेकर तीर्थ-पुरोहित और सरकार आमने-सामने
"सरकार के नियंत्रण और निगरानी में चीजें होनी चाहिए, लेकिन लोकतंत्र के इस दौर की विकट स्थिति ये है कि सरकार पर ही किसी को भी भरोसा नहीं है।"
वर्षा सिंह
17 Dec 2019
jagaran pic protest of teerth purohit near vidhansabha

तीर्थ-पुरोहितों का आशीर्वाद लेकर चलने वाली बीजेपी की सरकार से उत्तराखंड में तीर्थ-पुरोहित ही नाराज़ हो गए हैं। शीतकालीन पूजा स्थलों पर परंपराएं पूरी न करने तक की धमकी दे डाली है। तीर्थ-पुरोहितों के तमाम विरोध के बावजूद विधानसभा के शीतकालीन सत्र में राज्य सरकार ने चारधाम प्रबंधन विधेयक-2019 पास कर दिया। जम्मू-कश्मीर और अन्य तीर्थस्थलों पर गठित श्राइन बोर्ड की तर्ज पर इस कानून के ज़रिये राज्य सरकार गढ़वाल के मंदिरों को अपने अधीन लेना चाहती है। तीर्थ-पुरोहितों को डर है कि इससे उनके हक-हकूक छिन जाएंगे। इसलिए वे पिछले एक महीने से लगातार विरोध दर्ज करा रहे हैं। 18 को उत्तरकाशी और 20 दिसंबर को श्रीनगर में तीर्थ-पुरोहितों ने प्रदर्शन की तैयारी की है। साथ ही वे इस विधेयक को नैनीताल हाईकोर्ट में भी चुनौती देने की तैयारी कर रहै हैं।

चारधाम प्रबंधन विधेयक-2019 की जरूरत क्यों

उत्तराखंड में हर साल चार धाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। इस साल चारों धाम समेत हेमुकंड साहिब में 34लाख 10 हज़ार 380 से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। पिछले वर्ष की तुलना में करीब 22.6 प्रतिशत अधिक यात्री चारधाम दर्शन को आए। जून महीने में तो ऐसे हालात हो गए थे कि यात्रा मार्ग पर गाड़ियों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गई थीं। ऐसे में यात्रियों से जुड़ी सुविधाएं, सड़कों को खाली कराना, पेट्रोलपंपों पर ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना, और खासतौर पर चारों धाम में स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती होती है। उस दौरान ये सवाल भी उठा था कि इन धार्मिक स्थलों की Carrying Capacity (वहन करने की क्षमता) क्या है। एक समय में कितने श्रद्धालुओं को प्राकृतिक रूप से संवेदनशील स्थलों पर जाने की अनुमति दी जा सकती है। ये सारी ज़िम्मेदारी सरकार की है। वर्ष 2013 की आपदा हम देख चुके हैं।

चारधाम प्रबंधन विधेयक के ज़रिये चारधाम देवस्थानम बोर्ड बनाया गया है। इसके अध्यक्ष राज्य के मुख्यमंत्री होंगे और इसके संचालन की जिम्मेदारी एक आईएएस अधिकारी के सुपुर्द होगी। जो बोर्ड का सीईओ होगा। बोर्ड में चारों धाम केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री समेत गढ़वाल के 51 मंदिरों को शामिल किया गया है। जानकारी के मुताबिक ये विधेयक अभी राज्यपाल के पास संस्तुति के लिए नहीं भेजा गया है।

हरिद्वार के मठ-मंदिर बोर्ड में शामिल क्यों नहीं

यहां सवाल ये है कि कुमाऊं के मंदिर और हरिद्वार के मठ-मंदिर इस विधेयक के दायरे से बाहर क्यों हैं। कुमाऊं और ख़ासतौर पर हरिद्वार तो मठ-मंदिरों का गढ़ है। फिर सरकार को इन्हें भी नए बोर्ड में शामिल करना चाहिए था। लेकिन ऐसा करने पर साधु-संतों के विरोध को संभालना शायद राज्य सरकार के लिए और मुश्किल हो जाता। राज्य के धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज का ही हरिद्वार में कई एकड़ में फैला आश्रम है। बाकी साधु-संतों के अखाड़े तो हैं ही।
shrine virodh in doon.jpg
तीर्थ-पुरोहितों के डर क्या हैं?

चारधाम तीर्थ पुरोहितों के प्रवक्ता डॉ. बृजेश सती कहते हैं कि गढ़वाल के 51 मंदिरों से जुड़े करीब 25 हजार तीर्थ-पुरोहित इससे प्रभावित होंगे। सरकार उन्हें विधेयक की प्रति तक दिखाने को तैयार नहीं है। इस विधेयक के बिंदुओं को लेकर हमसे कोई बातचीत नहीं की गई। एक बैठक कर आपत्तियां और सुझाव जरूर मांगे गए, लेकिन इस पर कोई अमल नहीं हुआ।

डॉ. सती कहते हैं कि हमने एक कोर कमेटी बनाई है, जो विधि विशेषज्ञों से सलाह करेगी। हम सरकार के इस फैसले को नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। उन्होंने बताया कि 6 जनवरी वर्ष 2014 में चिदंबरम मंदिर ट्रस्ट बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था, जिसमें कहा गया कि सरकार किसी ट्रस्ट का अधिग्रहण नहीं कर सकती है। उस समय कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के फ़ैसले को ख़ारिज किया था। गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिर समिति ट्रस्ट हैं। जबकि बद्रीनाथ और केदारनाथ ब्रिटिश काल में बनी मंदिर समिति है। ये स्ववित्तपोषित संस्थाएं हैं। ऑटोनोमस बॉडी हैं। इन मंदिरों में सरकार का कुछ भी अंशदान नहीं है। इनके अलावा सरकार ने चंद्रबदनी मंदिर समिति, देवप्रयाग की रघुनाथ मंदिर समिति जैसे 47 अन्य मंदिर को भी बोर्ड में शामिल कर लिया है।

मंदिरों का अधिग्रहण कर रही सरकार

श्राइन बोर्ड को लेकर तीर्थ-पुरोहितों ने आपत्ति जतायी तो सरकार ने विधेयक पास करने से ठीक पहले उसका नाम बदलकर देवस्थानम बोर्ड कर दिया। डॉ. सती कहते हैं मंदिर के दान में आने वाले रुपए-पैसे से इसका संबंध नहीं है बल्कि ये भावनाओं से जुड़ा मसला है। जो बद्रीनाथ मंदिर की गाय पालता है, जिससे भगवान का अभिषेक होता है, जो मंदिर की मालाएं बनाता है या बद्रीनाथ में जब तीस फुट तक बर्फ़ गिरती है, उस समय जो लोग वहां मंदिर की सुरक्षा करते थे, ये लोग मंदिर से जुड़े हक-हकूकधारी हैं। इनका दानपात्र से कोई लेना-देना नहीं है।

उनका कहना है कि सरकार धार्मिक स्थलों का विकास तो नहीं कर रही, संचार सेवाएं, बिजली आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवाएं तो सरकार मुहैया नहीं करा पा रही, बल्कि अब उसका अधिग्रहण करने की कोशिश कर रही है। डॉ. सती के मुताबिक खुद सरकार में भ्रम की स्थिति में है, वह क्या करना चाह रहे हैं, उन्हें ही स्पष्ट नहीं है।

“चारधाम की पूजा से जुड़ी परंपराएं इस बार टूटेंगी”

18 को उत्तरकाशी और 20 दिसंबर को भी उत्तरकाशी और श्रीनगर में तीर्थ-पुरोहितों ने प्रदर्शन की तैयारी की है। अगले वर्ष 10 फ़रवरी को वसंत पंचमी के दिन बदरीनाथ के कपाट खुलने की तारीख तय की जाती है। उसी दिन डिंबर गांव से गाडू-घड़ा आता है, जिसमें भगवान के लिए तेल निकाला जाता है। डॉ. सती कहते हैं कि इस बार ये परंपरा टूटेगी, डिंबर गांव से तेल नहीं आएगा। न ही चारों धाम से इस बार डोलियां उठेंगी। वह कहते हैं कि अब सरकार खुद ही परंपराएं भी करा लें। तीर्थ-पुरोहित चारधाम यात्रा का बहिष्कार करने की चेतावनी दे रहे हैं।

दरअसल सरकार इन दिनों कई फैसले बेहद जल्दबाज़ी में ले रही है और फिर उसे मुंह की खानी पड़ रही है। तीर्थ-पुरोहितों के विरोध को देखते हुए सरकार को बातचीत की टेबल पर आना चाहिए था। जिस समय सरकार की ओर राज्यमंत्री डॉ धनसिंह रावत तीर्थ-पुरोहितों की महापंचायत से बात कर रहे थे। उसी समय विधानसभा में अनुपूरक बजट में श्राइन बोर्ड के लिए दस करोड की धनराशि का प्रावधान किया जा रहा था। यानी तीर्थ-पुरोहितों की बात सुनने का सरकार का इरादा नहीं था।

सदन में विधेयक पेश करने के बाद धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि इस विधेयक से तीर्थ-पुरोहितों के अधिकार सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के साथ अन्य प्रसिद्ध मंदिरों में अवस्थापना से जुड़ी सुविधाओं को बेहतर किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस बार चारों धाम में 32.40 लाख श्रद्धालु आए। आने वाले समय में ये संख्या और बढ़ेगी। सतपाल महाराज का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य प्रशासनिक है।

क्या तीर्थ-पुरोहितों डर और विरोध जायज़ है?

ऐसा माना जा सकता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंदिर-मस्जिद हों या कोई भी अन्य संस्थाएं, सरकार की निगरानी होनी चाहिए। जब केदारनाथ में वर्ष 2013 में आपदा आई तो वहां व्यवस्थाएं दुरुस्त न होने का दोष सरकार को ही दिया गया। तीर्थ-पुरोहितों को कहीं न कहीं ये डर है कि सरकार अपना बोर्ड बना लेगी तो उनके अधिकार छिन जाएंगे। उनका रोजगार न छिन जाए। उनकी आर्थिकी पर इस नए विधेयक का असर पड़ेगा। लेकिन किस तरह ये स्पष्ट नहीं है।

स्कूल-अस्पताल का निजीकरण और मंदिरों का अधिग्रहण

देहरादून में सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला कहती हैं कि अभी तो ये स्पष्ट ही नहीं है कि विधेयक में है क्या। सरकार इसे पब्लिक फोरम में क्यों नहीं ला रही है। सरकार की मंशा स्पष्ट नहीं हो रही है। वे तीर्थ-पुरोहितों के आंदोलन को समर्थन देती हैं। गीता मानती हैं कि बहुत छोटे स्तर पर आर्थिक तौर पर कमजोर लोग इन मंदिरों से जुड़कर अपना परिवार चला रहे हैं। वे जम्मू-कश्मीर के श्राइन बोर्ड के तहत दी गई सुविधाओं का स्वागत तो करती हैं। लेकिन ये भी मानती हैं कि फिर मंदिरों के पंडे-पुजारी एक तरह से सरकार के वेतन पर काम करने वाले कर्मचारी हो जाएंगे। घोड़े-खच्चर वालों का कॉन्ट्रैक्ट होगा, वो कॉन्ट्रैक्ट किसे मिलेगा। क्योंकि फिर लोग अपने जाननेवालों को कॉन्ट्रैक्ट देंगे।

गीता कहती हैं कि तीर्थ-पुरोहित से ज्यादा गरीब तबके के लोग इससे प्रभावित होंगे। वह कहती हैं कि पहाड़ में वही गांव अभी आबाद हैं जो इन मंदिरों के पास बसे हैं। ज्यादातर जगह से तो पलायन हो रहा है। ये भी जोड़ती हैं कि सरकार स्कूल और अस्पताल का तो निजीकरण कर रही है। सबकुछ पीपीपी मोड में चला रही है और मंदिरों का अधिग्रहण कर रही है।

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल कहते हैं कि उत्तराखंड के मंदिर आय के साधन हैं। अभी यहां जो आमदनी हो रही है वो पुजारियों को जा रही है, बोर्ड बना तो वो आमदनी अधिकारियों-नेताओं को जाएगी। उन्हें लगता है कि सत्ता में बैठे लोगों का इरादा साफ नहीं है। आप अनावश्यक कानून से लोगों को जकड़ देना चाहते हैं। विधेयक में ये भी कहा गया है कि बोर्ड का अध्यक्ष कोई हिंदू अधिकारी ही होगा। तो ये धार्मिक व्यापार की सोच है। आप धार्मिक बिजनेस पर कब्जा करना चाहते हैं।

दरअसल, ये मानते हुए भी कि सरकार के नियंत्रण और निगरानी में चीजें होनी चाहिए, लेकिन लोकतंत्र के इस दौर की विकट स्थिति ये है कि सरकार पर ही किसी को भी भरोसा नहीं है। सरकारें अपने-अपने राजनीतिक एजेंडों में ज्यादा यकीन कर रही हैं और लोकतंत्र में लोग अपनी ही सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

Uttrakhand
चारधाम देवस्थानम बोर्ड
Chardham Devasthanam Board
uttrakhand government
BJP
Chardham Management
haridwar
privatization

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License