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उत्तराखंड चुनाव: राज्य में बढ़ते दमन-शोषण के बीच मज़दूरों ने भाजपा को हराने के लिए संघर्ष तेज़ किया
"भाजपा ने छह महीने में तीन मुख्यमंत्री बदले, लेकिन हम मज़दूरों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। बल्कि शोषण बढ़ा ही है, इसलिए हमने इस बार बीजेपी को हराने की अपील की है।"
मुकुंद झा
06 Feb 2022
Uttarakhand

रुद्रपुर: उत्तराखंड में चुनावी शोर है। आगामी 14 फरवरी को पूरे राज्य में एक ही चरण में मतदान होना है। हर दल अपने-अपने विकास के दावे कर रहा है। लेकिन इन सबके बीच मेहनतकश वर्ग कहीं पीछे छूटता दिख रहा है। उसकी मांग और समस्या पर कोई भी राजनैतिक दल खुलकर नहीं बोल रहा है, जबकि आज पूरे प्रदेश में छंटनी, वेतन कटौती, वेतन समझौते को लागू नहीं करना और तालाबंदी जैसे प्रमुख समस्याएं बनी हुई हैं।

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र पंत नगर और रुद्रपुर में कई कंपनियों के कर्मचारी कई सालों से अपने हक़ लिए लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी मांग पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है। यहाँ तक कई मामलों में हाई कोर्ट से भी मज़दूरों के पक्ष में निर्णय आया है, परन्तु कम्पनी मैनेजमेंट उन्हें लागू नहीं कर रहा है। 

इन सब में सरकारी प्रशासन भी मज़दूरों के खिलाफ ही दिख रहा है। 

मज़दूरों ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा कि इस सरकार के दौर में मज़दूरों का दमन-शोषण तेज़ी से बढ़ा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि इससे पहले की सरकार का दौर मज़दूरों के लिए स्वर्ग जैसा रहा था, परन्तु कम से कम वो जी तो रहा था इस सरकार ने तो मज़दूरों को मार ही दिया है। ये हमारे हर हक और हकूक़ पर हमला कर रही है।

इसकी एक तस्वीर उत्तराखंड के मजदूरों के संघर्ष से देखी जा सकती है। कोरोना/लॉकडाउन के बीच, उससे पहले और उसके बाद भी औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल, पंतनगर व सितारगंज के मज़दूर लंबे समय से संघर्षरत हैं। कंपनियों के शोषण के खिलाफ मज़दूरों ने वहाँ श्रमिक संयुक्त मोर्चा बनाया है जिसके अंतर्गत मज़दूर संघर्ष कर रहे हैं।

जहाँ एक तरफ गैर कानूनी छँटनी के खिलाफ दिसंबर 2018 से ही भगवती प्रोडक्ट्स (माइक्रोमैक्स) के मज़दूर संघर्षरत हैं, वहीं वोल्टास, गुजरात अंबुजा, और अमूल मोटर्स में ग़ैरकानूनी गेटबन्दी के खिलाफ भी संघर्ष जारी है, इसके अलावा इंटरार्क के मज़दूर भी ग़ैरकानूनी छंटनी और वेतन समझौते की मांग को लेकर कंपनी गेट पर धरना दिए हुए हैं।

ऐसा ही रूद्रपुर में स्थित इंटरार्क कंपनी में पिछले 171 दिनों में 32 मज़दूरों को काम से बाहर किया गया जिसे मज़दूर ग़ैरकानूनी छंटनी  बताते हुए उसके खिलाफ कंपनी गेट के बाहर धरने पर बैठे हुए है।

इंटरार्क कंपनी के उधम सिंह नगर जिले में दो प्लांट पंतनगर और किच्छा में हैं, जहां 2018 से 32 मज़दूर गैरकानूनी गेट बंदी के शिकार हैं। तबसे मज़दूरों का वेतन भी नहीं बढ़ा है। कंपनी के दोनों गेटों पर मज़दूरों का बेमियादी धरना लगातार जारी है।

इंटरार्क मज़दूर यूनियन के नेता दिलजीत ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए बताया कि हम लोगों ने मैनेजमेंट के सामने वेतन समझौते की बात रखी जिसे पूरा नहीं किया गया बल्कि हमारे कई लोगों को काम से निकाल दिया गया है। उन्होंने दावा किया कि चार सालों से वेतन समझौता नहीं हुआ बल्कि इसकी जगह आवाज़ उठाने वाले कर्मचारियों का टर्मिनेशन, सस्पेंशन और उत्पीड़न किया जा रहा है।

आंदोलन कर रहे कर्मचारियों ने कहा कि नैनीताल कोर्ट ने भी मैनेजमेंट से द्विपक्षी वेतन समझौते करने के लिए कहा परन्तु उन्होंने कोरोना का बहाना बनाकर एकतरफा वर्करों की सैलरी में 1000 से 1200 रुपये की अंतरिम राहत की घोषणा की थी। अंतरिम राहत लेने से यूनियन ने इंकार कर दिया है और कंपनी गेट पर प्रदर्शन शुरू कर दिया।

ऐसे ही काम से निकाले गए मज़दूर संजय सिंह ने बताया कि मैनजमेंट अपनी मनमानी कर रहा है लेकिन हम भी आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। हम अपनी मांगों को पूरा कराए बिना यहाँ से नहीं जाएंगे।

27 दिसंबर 2018 को माइक्रोमैक्स प्रोडक्ट्स बनाने वाले भगवती प्रोडक्ट्स लिमिटेड ने 303 श्रमिकों की गैर कानूनी छंटनी कर दी थी। जबकि 47 अन्य कर्मचारियों को ले-ऑफ दे दिया गया था। एक लंबे संघर्ष के बाद मज़दूरों ने औद्योगिक न्यायाधिकरण से लेकर उच्च न्यायालय तक जीत हासिल करी जहाँ छँटनी गैरकानूनी घोषित हो चुकी है। लेकिन इसके बाद भी मामला उलझा हुआ ही है। मैनेजमेंट ने रुद्रपुर प्लांट उतपादन पूरी तरह से बंद कर दिया है जबकि भिवानी और हैदराबाद प्लांट में बड़ी संख्या में उत्पादन किया जा रहा है।  

निकाले गए कर्मचारी गणेश सिंह के मुताबिक साल 2018 के दिसंबर में क्रिसमस के मौके पर उन्हें दो-तीन दिन की छुट्टी दी गई थी, जिसके बाद मज़दूर अपने काम पर आए तो उन्हें गेट पर एक नोटिस लगा मिला, जिसमें 300 से अधिक कर्मचारियों का नाम लिखा था। बताया गया कि इनकी सेवाएं अब समाप्त कर दी गईं।

सिंह जिन्होंने इस कंपनी में लगभग पांच साल तक काम किया लेकिन जब उन्हें निकाला गया तो वो हैरान थे । उन्होंने कहा अचानक बिना किसी नोटिस के ऐसा फैसला कैसे लिया जा सकता था इससे सभी कर्मचारी हैरान थे और मैनेजमेंट के इस फैसले से काफी गुस्से में भी थे।

उन्होंने मैनेजमेंट से इस गैर क़ानूनी छंटनी पर सवाल किया तो कहा गया कि फैक्ट्री में अब इतने लोगों का काम नहीं है इसलिए इनको हटाया जा रहा है, जबकि वहाँ काम करने वाले मज़दूरों का कहना है जब वो वहाँ काम कर रहे थे तब मज़दूरों से उनकी क्षमता से अधिक काम लिया जाता था। अचानक यह कहना कि काम नहीं है समझ से बिल्कुल परे है।

तब से ही भगवती प्रोडक्ट्स (माइक्रोमैक्स) के मज़दूर छँटनी के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। कंपनी गेट पर रात-दिन का धरना जारी है। इस दौरान मैनेजमेंट ने तमाम तरह की दिक्कतें पैदा की और कई धाराओं में मजदूरों पर केस भी दर्ज कराया। कर्मचारी क्रमिक अनशन पर भी बैठे थे, हालाँकि अभी कोरोना महामारी के कारण उन्होंने अपना धरना प्रदर्शन स्थगित कर दिया है।

इस कंपनी के कर्मचारी पिछले तीन साल से अपने परिवार के गुज़र-बसर के लिए परेशान हैं क्योंकि एक तो कंपनी ने इन्हें काम से निकाल दिया और दूसरा इन्हेइन्हें कोई काम पर रख नहीं रहा है। इस कंपनी में अधिकतर मज़दूर बीएससी और आईटीआई डिप्लोमा किए हुए थे। 

ऐसे ही एक मज़दूर धीरज सिंह खाती हैं जो अभी वर्तमान मेंनरुद्रपर में श्रम उपायुक्त में चाय बेच रहे हैं। उन्होंने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, "मैं पहले माइक्रोमैक्स के मोबाईल बनाता था लेकिन आज चाय पकौड़े बेचकर अपने परिवार गुज़र-बसर करने का प्रयास कर रहा हूँ।"

धीरज एक प्रशिक्षित कर्मचारी थे वो करीब साढ़े चार साल से उस कंपनी में कार्यरत थे। लेकिन अचानक ही कंपनी ने बिना नोटिस के उन्हें वहां से हटा दिया। 

ऐसे कई मज़दूर हैं जो काम के लिए भटक रहे हैं। ऐसे ही एक मज़दूर सूरज सिंह हैं जिनकी उम्र अभी 30 साल है। उन्हें भी कंपनी ने निकाल दिया है। वो पहाड़ से आकर रुद्रपुर में काम की तलाश में अपना रेज़्यूमे लेकर एक कंपनी से दूसरे कंपनी में धक्के खा रहे हैं, लेकिन कोई भी उन्हें काम नहीं दे रहा है। क्योंकि वो अनुभवी है और उन्हें ज़्यादा वेतन देना पड़ेगा इसलिए कंपनियां उनकी जगह नए लड़कों को रखती हैं जिनसे वो 7 से 8 हज़ार में काम करा लें।

सिडकुल पंतनगर स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी एचपी इंडिया ने अपना प्लांट अचानक ग़ैरकानूनी रूप से बंद कर दिया। कंपनी ने पहले श्रमिकों को कोविड-19 के वक़्त छुट्टी देकर सवेतन घर बैठाया। दूसरी ओर वह मज़दूरों को वीआरएस, ट्रांसफर आदि का लॉलीपॉप भी देता रही।

इस बीच उसने बहुत से ठेका मज़दूरों की छँटनी कर दी जिसके फलस्वरूप 185 स्थाई श्रमिक अचानक बंदी के बाद से सड़क पर हैं, लगातार संघर्ष कर रहे हैं। हल्द्वानी श्रम विभाग में उनका धरना जारी है।

वोल्टास लिमिटेड पंतनगर में 9 मज़दूरों की गैरकानूनी सेवा समाप्ति को लेकर पिछले ढाई सालों से संघर्ष जारी है। यूनियन नेताओं ने कहा कि उन्होंने नए वेतन समझौते के लिए मांग पत्र दिया था और प्रबंधन ने दबाव बनाने के लिए यूनियन के अध्यक्ष महामंत्री सहित 9 मज़दूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

श्रमिक संयुक्त मंच के अध्यक्ष दिनेश तिवारी ने न्यूज़क्लिक से इस पूरे मसले पर विस्तार से बात की और बताया कि यहां किसी एक प्लांट या उद्दोग की ही ये समस्या नहीं बल्कि हर दूसरी कंपनी में ऐसा ही हो रहा है क्योंकि यह सब एक रणनीति के तहत किया जा रहा है।

मज़दूर नेता ने कहा कि यहां दो तरीके की समस्या है। पहली समस्या तो ये कि मैनेजमेंट केवल सब्सिडी और टैक्स की रियायतों का लाभ उठाकर कंपनी बंद कर दूसरे राज्य में पलायन कर रही हैं। दूसरा प्रबंधन नियमित कर्मचारियों को हटाकर केंद्र सरकार द्वारा लागू किये गए सस्ते श्रम की नीति अपना रही है। जिसके तहत नियमित मज़दूरों को हटाकर संविदा पर और नीम कानून के तहत सस्ते श्रमिक रखे जा रहे हैं। इसके खिलाफ जहाँ कर्मचारी संगठित होकर यूनियन बनाना चाहता है तो उसपर हमला और तेज़ कर दिया जाता है।

आपको बता दें कि उत्तराखंड और कई पहाड़ी राज्यों में सरकारों ने नए उद्दोगों को स्थापित करने के लिए टैक्स में छूट और अन्य सब्सिडी दी थी जिसकी अवधि अब खत्म हो रही है। इसके बाद ये कम्पनियां दूसरे राज्यों में पलायन कर रही हैं। श्रमिकों ने इसे गलत बताते हुए इसका विरोध किया है।

तिवारी ने साफ किया कि ये सब बीजेपी सरकार के संरक्षण में हो रहा है पिछले चार साल में परिस्थितियां बद्तर हुई हैं। इस सरकार में काम लगातार कम हुआ है और रोज़गार के अवसर लगातार कम हुए हैं। सरकार दावा कर रही है कि उसने लाखों लोगों को रोज़गार दिया है जबकि सच्चाई यह है कि आर्थिक मंदी और कोरोना महामारी में बड़ी संख्या में जो काम कर रहे थे वो भी बेरोज़गार हो गए हैं। नए रोज़गार की तो बात ही छोड़ दीजिए। 

तिवारी ने कहा, "हम मज़दूर की समस्याओं को लेकर कई बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिले, लेकिन हमें केवल आश्वासन ही मिला है। बीजेपी ने छह महीने में तीन मुख्यमंत्री बदले लेकिन हम मज़दूरों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। बल्कि शोषण बढ़ा ही है इसलिए हमने इस बार बीजेपी को हराने की अपील की है। हमारे हज़ारों-हज़ार पीडीटी परिवार के लाखों मतदाता बीजेपी के खिलाफ मतदान देने और दिलवाने के लिए अभियान चला रहे हैं।"

हालांकि मजदूरों ने कहा वैसे हमारे लिए कोई भी पार्टी नहीं लड़ती है, कांग्रेस ने भी वही किया है जो आज बीजेपी कर रही है। हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।

(सभी तस्वीर अविनाश सौरभ ने ली है )

BJP
Anti Labour Policies
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Uttarakhand Elections

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