NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
प्रधानमंत्री के छवि-प्रबंधन से वैक्सीन का संकट गहराया
जिस तरह नोटबंदी और जीएसटी को लेकर केंद्र सरकार के फैसलों से देश की अर्थव्यवस्था तबाह हुई है, उसी तरह सरकार ने अपनी वैक्सीन नीति में भी बार-बार बदलाव करते हुए न सिर्फ देश की जनता के स्वास्थ्य को बल्कि राज्य सरकारों को भी आर्थिक रूप से संकट में डाल दिया है।
अनिल जैन
04 Jun 2021
मोदी

अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि देश में कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए करीब साढ़े चार महीने पहले शुरू हुआ वैक्सीनेशन अभियान बुरी तरह लड़खड़ा गया है। इस स्थिति के लिए स्पष्ट तौर पर केंद्र सरकार जिम्मेदार है, जिसके मुखिया नरेंद्र मोदी ने अपने छवि-प्रबंधन के चक्कर में देश की जनता के साथ ही राज्य सरकारों को भी गंभीर संकट की ओर धकेल दिया है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार की वैक्सीन नीति को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। सर्वोच्च अदालत ने कोविन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता से लेकर वैक्सीन के दाम और राज्यों की खरीद के मसले तक पर केंद्र से सवाल पूछे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर सवाल किया कि पूरे देश में वैक्सीन के दाम एक समान क्यों नहीं होने चाहिए और देश के सभी लोगों को वैक्सीन कब तक लग जाएगी? लेकिन सरकार इन सवालों के कोई तार्किक और संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रही है।

दरअसल दुनिया के तमाम देशों में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी सरकार ने कोरोना की वैश्विक महामारी से निबटने के सिलसिले में हर फैसला अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर और अपनी छवि चमकाने के मकसद से किया है। यही वजह है कि कोरोना की दूसरी लहर के चलते पिछले करीब दो महीने से देश में चौतरफा हाहाकार मचा हुआ है। अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, दवाओं को लेकर सरकारी विशेषज्ञों की तरफ से बनी भ्रम की स्थिति, जरूरी दवाओं और ऑक्सीजन के अभाव में तो बडी संख्या में लोग मरे ही हैं और अभी भी मर रहे हैं। इसके साथ ही कोरोना के वैक्सीनेशन का अभियान भी पटरी से उतर चुका है।

जिस तरह नोटबंदी और जीएसटी को लेकर केंद्र सरकार के फैसलों से देश की अर्थव्यवस्था तबाह हुई है, उसी तरह सरकार ने अपनी वैक्सीन नीति में भी बार-बार बदलाव करते हुए न सिर्फ देश की जनता के स्वास्थ्य को बल्कि राज्य सरकारों को भी आर्थिक रूप से संकट में डाल दिया है। गंभीर सवाल यह खडा हो गया है कि देश के हर नागरिक को निकट भविष्य में वैक्सीन लग पाएगी या नहीं?

पिछले साल अगस्त में दुनिया भर के तमाम देशों ने वैक्सीन के ऑर्डर देने शुरू कर दिए थे। विकसित देशों ने तो अपनी आबादी से कई गुना ज्यादा वैक्सीन की डोज के ऑर्डर दिए थे। उस समय भारत सरकार ने राज्यों से यह तो कह दिया था कि वे वैक्सीन नहीं खरीद सकते हैं, सारी खरीद केंद्र सरकार करेगी, लेकिन एक डोज का भी ऑर्डर नहीं दिया। कुछ समय बाद जब कई देशों में वैक्सीनेशन अभियान शुरू हो चुका था, तब हमारे यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के दूसरे मंत्री विभिन्न मंचों से यह ढींग हांकने में ही लगे थे कि भारत ने कोरोना महामारी पर विजय हासिल कर ली है।

साल खत्म होने तक भारत सरकार ने वैक्सीन का कोई बड़ा ऑर्डर किसी कंपनी को नहीं दिया। हालांकि बताया जा रहा था कि तीन भारतीय कंपनियां वैक्सीन बनाने पर काम कर रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी खुद माइक्रो बायोलॉजिस्ट की तरह तीनों कंपनियों के लैब्स का मुआयना करने गए। जनवरी तक दो कंपनियों की वैक्सीन तैयार भी हो गई, पर प्रधानमंत्री गृह प्रदेश वाली तीसरी कंपनी की वैक्सीन का क्या हुआ, आज तक किसी को पता नहीं।

बहरहाल दो कंपनियों की वैक्सीन से जैसे-तैसे जनवरी के तीसरे हफ्ते में बडी धूमधाम से समारोहपूर्वक वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने रोजाना दस लाख लोगों को वैक्सीन लगाने का लक्ष्य घोषित करते हुए दावा किया कि यह दुनिया का सबसे बडा टीकाकरण अभियान है और इस मामले में भी भारत पूरी दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई का वैश्विक नेता बनने के फेर में ही भारत में बनी वैक्सीन कई देशों को निर्यात भी की गई को कुछ देशों को सहायता के तौर पर भी भेजी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि महज तीन महीने बाद ही भारत में जारी वैक्सीनेशन अभियान पटरी से उतर गया। देश भर में वैक्सीन की किल्लत शुरू हो गई।

वैक्सीन को लेकर मचे हाहाकार के बीच ही आ गई कोरोना की दूसरी लहर, जो पहली लहर से भी कहीं ज्यादा मारक साबित हुई। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी पांच राज्यों के चुनाव खासकर बंगाल जीतने के अपने महत्वाकांक्षी अभियान में व्यस्त थे, लिहाजा राज्यों से कह दिया गया कि वे अपनी जरुरत की वैक्सीन खुद खरीदे और वह भी कंपनियों की तय की हुई कीमत पर। लेकिन यह फरमान जारी करते हुए यह भी नहीं सोचा गया कि राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल है। उन्हें जीएसटी से प्राप्त राजस्व में उनका हिस्सा भी केंद्र सरकार से नहीं मिल रहा है। ऐसे में वैक्सीन खरीदने की जिम्मेदारी को वहन करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इस पर अरबों रुपए खर्च होंगे।

वैक्सीनेशन अभियान शुरू होने तक महामारी से निबटने की पूरी कमान अपने हाथ रखने वाली केंद्र सरकार की ओर से कहा जाने लगा कि स्वास्थ्य तो राज्यों का विषय है, इसलिए वे अपने-अपने स्तर पर फैसले लें। हर मौके पर सरकार के ढिंढोरची की भूमिका निभाने वाला कॉरपोरेट मीडिया, जो महामारी की शुरुआत से लेकर वैक्सीनेशन अभियान शुरू होने तक प्रधानमंत्री मोदी को कोरोना के खिलाफ लड़ाई के वैश्विक महानायक के तौर पर पेश कर रहा था, उसने भी सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए कोरोना की दूसरी लहर और वैक्सीन की किल्लत से मचे चौतरफा हाहाकार के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।

बहरहाल सरकार के इस फैसले को एक महीने से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद राज्य सरकारें अभी तक वैक्सीन की एक भी डोज नही खरीद पाई है। भारत में वैक्सीन बना रही कंपनियों से भी उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तो बात करने से ही मना कर दिया है। अमेरिका की कंपनियों ने राज्यों से कहा है कि वे राज्यों के बजाय सीधे भारत सरकार से ही बात करेंगी। यह स्थिति बताती है कि वैक्सीन को केंद्र और राज्यों के बीच जरा भी तालमेल नहीं है। इससे यह भी पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए किस तरह राज्यों को उनके हाल पर छोड दिया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि वायरस का संक्रमण रोकने के लिए वैक्सीन लगाने की जिम्मेदारी राज्यों पर डालना क्या राजनीतिक फैसला है? वैक्सीनेशन के मामले में भारत सरकार को सलाह देने के लिए गठित समूह 'द नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्युनाइजेशन’ के चेयरमैन एनके अरोड़ा का कहना है कि 18 से 44 साल की आयु वालों को वैक्सीन लगाने का फैसला राजनीतिक था। अब अगर भारत सरकार के सलाहकार समूह का मुखिया यह कहे कि 18 से 44 साल वालों के लिए वैक्सीनेशन शुरू करने का फैसला तकनीकी सलाह पर आधारित नही था और यह फैसला राजनीतिक लगता है तो उनका बयान यह मानने का मजबूत आधार बनता है कि केंद्र सरकार वैक्सीनेशन को लेकर भी राजनीति कर रही है। अरोड़ा का कहना है कि तकनीकी समूह का फोकस इस बात पर था कि 45 साल से ऊपर वालों को प्राथमिकता के साथ वैक्सीन लगाई जाए।

ध्यान रहे 45 साल से ऊपर वालों को वैक्सीन लगाने के लिए पर्याप्त मात्रा में डोज उपलब्ध थीं। इसके अलावा लोगों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में और निजी अस्पतालों में बहुत कम कीमत पर वैक्सीन लगाई जा रही थी। सीरम इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक सुरेश जाधव का भी कहना है कि सरकार ने बिना सोचे समझे 18 से 44 साल के लोगों के लिए वैक्सीनेशन की इजाजत दे दी, जबकि उसे पता था कि इनके लिए वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। सरकार के इस फैसने ने ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिससे निकलना फिलहाल मुश्किल ही है। इस फैसले पर केंद्र में स्वास्थ्य सचिव रहीं के. सुजाता राव ने हैरानी जताते हुए कहा कि इससे पहले हर वैक्सीनेशन या महामारी के समय दवा और वैक्सीन का इंतजाम भारत सरकार ने किया है। यह पहली बार हो रहा है कि सरकार ने इस तरह से महामारी के समय राज्यों पर जिम्मेदारी डाली हो।

ऐसे में सवाल यही है कि राज्यों पर जिम्मेदारी डालने का यह फैसला क्या यह सिर्फ छवि बचाने के लिए किया गया है, या केंद्र सरकार को अंदाजा हो गया था कि वैक्सीन उपलब्ध नहीं होगी और होगी तो बहुत ऊंची कीमत पर, इसलिए उसने अपनी जिम्मेदारी राज्यों पर थोप दी? जो भी वजह रही हो, लेकिन यह तो तय है कि एक बेहद बुरी मिसाल कायम हुई है। इस मिसाल से जहां दुनिया भर में भारत की छवि पर बट्टा लगा है, वहीं देश में वैक्सीनेशन को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना है और लोगों के स्वास्थ्य को लेकर भी एक तरह का संकट खडा हो गया है।

अब इसका कोई अंदाजा नही लगा सकता है कि देश के हर नागरिक को वैक्सीन लगाने पर कितना खर्च आएगा। भारतीय स्टेट बैंक ने एक मॉडल बना कर खर्च का अनुमान लगाया है। उसने पांच डॉलर से लेकर 40 डॉलर तक वैक्सीन की कीमत का पैमाना तय करके जो अनुमान लगाया है उसके मुताबिक देश के सभी नागरिकों को वैक्सीन लगवाने में अधिकतम तीन लाख 70 हजार करोड़ रुपया खर्च होगा। उसके आकलन के मुताबिक बिहार में कुल बजट खर्च का 12 फीसदी हिस्सा सिर्फ वैक्सीनेशन पर खर्च हो सकता है। उसने इसी तरह के अनुमान अलग-अलग राज्यों के लिए भी जाहिर किए हैं। इस अनुमान को भी अंतिम नहीं माना जा सकता, क्योंकि किसी को पता नहीं है कि आने वाले दिनों में वैक्सीन किस दर पर मिलेगी।

कई राज्यों ने वैक्सीन के लिए जो ग्लोबल टेंडर डाले हैं और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों से उनकी जो बात हो रही है, उससे पता चल रहा है कि कंपनियां कई गुना ज्यादा दाम बता रही हैं। ऐसे में सवाल है कि अगर ग्लोबल टेंडर में भारत की कंपनियां नहीं शामिल होती हैं या कम वैक्सीन की आपूर्ति करती है और विदेशी कंपनियां कई गुना ज्यादा कीमत मांगती है तो राज्य सरकारें क्या करेंगी? दुनिया की ज्यादातर वैक्सीन बनाने वाली कंपनियो ने अन्य देशों के साथ पहले से करार किया हुआ है और एडवांस लिया हुआ है। उन्हे पहले अपना वह करार पूरा करना होगा। इसलिए आने वाले दिनों में वैक्सीन का बड़ा संकट खड़ा होगा। यह स्वास्थ्य का संकट भी होगा और आर्थिक संकट भी।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

COVID-19
Covid Vaccination
Narendra modi
Modi government
Vaccine Shortage in India
BJP
modi's image
Vaccination policy

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License