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वाराणसी : दूसरों का तन ढकने वाला बुनकर आज खुद हैरान-परेशान
'जब हम रोज काम करते हैं तब हमें दो वक्त की रोटी नसीब होती है, अब जब हम लोग बैठकर खाएँगे तो कैसे पेट चलेगा, और अगर सरकार मदद भी करेगी तो कितना?
रिज़वाना तबस्सुम
30 Mar 2020
वाराणसी

"मेरे दो बच्चे हैं, मैं प्रेग्नेंट हूँ, सातवाँ महीना शुरू होने वाला है। मेरे पति साड़ी बुनाई का काम हथकरघा से करते हैं। महीने में पाँच हज़ार तक की कमाई हो जाती है, उसी से हम लोग अपना पेट पालते हैं। दो बार मुझे ऑपरेशन से बच्चा पैदा हुआ है, एक दो महीने बाद फिर ऑपरेशन की नौबत आ जाएगी। आज हमारे पास खाने के लिए नहीं है, कल कहाँ से इलाज करेंगे...!" इतना कहते ही पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के बजरडीहा की आयशा फफक-फफक रोने लगती हैं। 

देश में कोरोना महामारी को बढ़ने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू लगाया, उसके बाद 24 मार्च को अगले 21 दिनों के लिए पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी। अपने विशेष संदेश में प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि 'जिन देशों के पास सबसे बेहतर मेडिकल सुविधाएं हैं, वे भी इस वायरस को रोक नहीं सके और इसे कम करने का उपाय केवल सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी है।'

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प्रधानमंत्री ने कहा, 'आधी रात से पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन हो जाएगा, लोगों को 21 दिनों के लिए उनके घरों से बाहर निकलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों और दूसरे देशों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है। संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ने के लिए 21 दिन आवश्यक हैं।'

आयशा कहती हैं कि, 'हमारे पास जो कुछ भी था, हम उसी से अपना पेट पाल रहे थे, अभी कुछ दिन पहले यहाँ पर सीएए को लेकर प्रोटेस्ट हुआ था जिसमें कई दिनों तक काम बंद था, पुलिस यहाँ पहरा दे रही थी, लोग डर के मारे घर छोड़कर चले गए थे। अब जब धीरे-धीरे सब ठीक होना शुरू हुआ था तो अब सब बंद हो गया। हमें समझ नहीं आ रहा है कि हम अपना और अपने बच्चे का पेट कैसे भरेंगे, आज मुझे तकलीफ है, दर्द है तो मैं डॉक्टर के पास भी नहीं जा पा रही हूँ। सभी तरफ के रास्ते बंद हैं, पैसे भी नहीं हैं। अगर मुझे ज्यादा तकलीफ होगी तो मैं कैसे जाऊँगी।' ये बात कहते हुए आयशा आंसुओं से भरा अपना चेहरा दुपट्टे में छुपा लेती हैं।

बजरडीहा के ही एक और बुनकर लगभग 45 साल के मुख्तार अली पीढ़ियों से बुनाई का काम करते आ रहे हैं, मुख्तार अली कहते हैं कि, 'जब हम रोज काम करते हैं तब हमें दो वक्त की रोटी नसीब होती है, अब जब हम लोग बैठकर खाएँगे तो कैसे पेट चलेगा, और अगर सरकार मदद भी करेगी तो कितना? कुछ चीजें तो हम लोगों को बाज़ार से खरीदनी पड़ेंगी। बाज़ार से सामान खरीदने के लिए पैसा चाहिए, पैसा है नहीं तो काम कैसे चलेगा।' 

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मुख्तार अली कहते हैं कि, 'कारखाना बंद हो गया है। लोगों के पास ताना-बाना नहीं है, ताना-बाना दुकान से खरीद नहीं सकते क्योंकि दुकानें बंद हैं। हम अपनी साड़ी कहीं बेच नहीं सकते क्योंकि कोई खरीददार नहीं आ रहे हैं, किसी को आना-जाना मना है। हम तो सब तरफ से मारे जा रहे हैं, हमारा काम भी बंद पड़ा है, हमारा कारखाना भी खराब हो रहा है। हमें तो चौतरफा मार पड़ रही है। जब हमारा काम शुरू होगा तो हमें कितनी दिक्कत होगी, सब कुछ नए सिरे से शुरू करना पड़ेगा।' 

बीते बुधवार,  25 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी की जनता से मुखातिब हुए। देश में जारी लॉकडाउन के बीच दिल्ली से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों को कोरोना वायरस से लड़ने के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि 21 दिन में हमें कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई को जीतना है। इसमें काशीवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस कार्यक्रम में जब वाराणसी के एक टेक्सटाइल व्यापारी ने पीएम से पूछा कि सरकार के पास उसके कर्मचारियों के लिए क्या मदद है तब पीएम मोदी का जवाब था, "कोरोना से लड़ने के लिए करुणा।"

वाराणसी के कोटवा में हथकरघा का काम करने वाले बुनकर नईम बताते हैं कि, 'हम लोग रोज कुआं खोदने वाले, रोज पानी पीने वाले इंसान हैं। अब अचानक से सब कुछ बंद हो गया, हमारा काम भी बंद हो गया, हमपर दोहरी मार पड़ रही है, एक तो हमारा काम बंद हो गया है दूसरा बैठकर खाना है। इससे तो हमारी गृहस्थी टूट जाएगी।' नईम के घर में चार बच्चे और बीवी हैं, इनके बच्चे पढ़ने के लिए जाते हैं। करखाना बंद होने से नईम की रोजी-रोटी बिलकुल ठप है।

अपने कारखाने की तरफ हाथ दिखाते हुए नईम कहते हैं, 'मौसम इतना खराब चल रह है, ऐसे मौसम में वो कारखान भी परेशान करता है जो रोज चलता है। यहाँ तो कारखाना ही बंद कर दिया गया है, पता नहीं कब तक ऐसे ही बंद रहना है, मुझे तो समझ नहीं आ रहा है कि काम दोबार कैसे शुरू होगा, कहीं ऐसा ना हो कि ताना-बाना सब खराब हो जाये, और जो साड़ी का नुकसान होगा वो अलग।' 

बुनकर नेता और व्यापार मण्डल के प्रदेश सचिव हाजी बदरुद्दीन अहमद कहते हैं,  'बुनकर तो बेचारा पूरी तरह तबाह है, सरकार की तरफ से किसी तरह की कोई मदद तो मिल नहीं रही है। वाले और दावे सिर्फ कागज पर दिखाई दे रहे हैं, जमीन पर कोई भी चीज नहीं है। अब तो बुनकरों का काम भी बंद है, अगर ताना है तो बाना नहीं है, बाना है तो ताना नहीं है।

हाजी बदरुद्दीन अहमद कहते हैं कि, 'ये सरकार कभी भी बुनकरों के लिए नहीं सोचती है। बुनकर कपड़ा बनाकर दूसरों के तन ढकने का काम करता है, अपनी मामूली सी मजदूरी में अपने बाल-बच्चों की परवरिश करता है। दूसरों का तन ढकने वाला बुनकर आज खुद नंगा हो गया है, उसके पास कुछ भी नहीं है।' 

वाराणसी के बुनकर अधिकारी नीतीश धवन बताते हैं, 'वाराणसी में करीब पाचीस हज़ार हथकरघा बुनकर हैं, जबकि पिचहत्तर (75) हज़ार पावरलूम के बुनकर हैं। वाराणसी से बुनकरों के टर्नओवर के बारे में नितीश धवन बताते हैं कि इसका कोई ऑथेन्टिक डेटा तो नहीं है लेकिन हम लोग ये मानकर चलते हैं कि छह सौ करोड़ का टर्नओवर है।' 

नुकसान के बारे में बात करते हुए अधिकारी कहते हैं, 'नुकसान का अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है क्योंकि जो बुनकर है वो असंगठित क्षेत्र से हैं। वो डेली वेज पर काम करते हैं, महीने की नौकरी तो नहीं करते। इसलिए ये कह सकते हैं कि जितने महीने के लिए बंद होगा उसका महीने का लॉस तो होगा ही होगा, और फिर जो मार्केट की एक सप्लाई डिमांड चेन होती है वो ब्रेक हो जाती है, उसको पटरी पर आने में वक्त लगता है।'

बुनकारी से सरकार के मदद के बारे में बात करते हुए नीतीश धवन बताते हैं, 'ये (बुनकर) देश की जो अर्थव्यवस्था है उसकी जीडीपी में कॉन्ट्रीब्यूट करते हैं। उदाहरण के तौर पर बनारस की साड़ियाँ पूरे विश्वभर में जाती हैं, लॉकडाउन की वजह से पूरा देश प्रभावित है और लोकल इकोनोमी भी प्रभावित होगी, निर्यात पर भी फर्क पड़ेगा और मार्केट भी इसकी डाउन होगी।' 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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