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महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा क्वारंटाइन की परवाह नहीं करती
चिकित्साकर्मियों से लेकर अस्पतालों के कपड़े धोने वाले मज़दूरों तक की पहली पंक्ति के कामगारों में हर चार में से तीन महिलाएँ हैं। इन कामगारों की तारीफ़ में थालियाँ और बर्तन बजाना एक बात है लेकिन यूनियन बनाकर इनके हक और मांगों के लिए लड़ना दूसरी बात।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
09 Apr 2020
महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा
शेहज़िल मालिक, सार्वजनिक स्थलों में महिलाएँ, 2012.

SARS-CoV-2 के फैलने के साथ अपंग होती दुनिया में दिन, हफ़्ते, महीने सब कुछ अनिश्चित हो गए हैं। निश्चितता न होने से चिंता बढ़ती जा रही है। अरुंधति रॉय लिखती हैं कि ये वायरस, ‘तीव्र वृद्धि चाहता है, मुनाफ़ा नहीं, और इसलिए इसने अनजाने में, कुछ हद तक, [पूँजी के] प्रवाह की दिशा उलट दी है। इसने आव्रजन (immigration) नियंत्रणों, बायोमेट्रिक्स, डिजिटल निगरानी और हर तरह के डेटा विश्लेषण-प्रणालियों (Data Analytics) का मज़ाक़ उड़ाया है, और-अभी तक- दुनिया के सबसे अमीर, सबसे शक्तिशाली देशों को सबसे बुरी तरह से प्रभावित किया है। पूँजीवाद के इंजन को एक निर्णायक पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दिया है।' दुनिया में सब जगह लॉकडाउन हो रहे हैं; पृथ्वी अब ज़्यादा शांत है, और पक्षियों के गीत ज़्यादा मधुर। लेकिन अब जबकि ये वायरस धारावी (भारत) और सिडेड डी डेयस (ब्राजील) जैसे अत्यधिक अभावग्रस्त इलाक़ों में चक्कर लगाने लगा है, ऐसे में अरुंधति रॉय की दी चेतावनी ‘अभी तक’ अर्थपूर्ण है।

उम्मीद से भरे शीर्षक ‘साझी जिम्मेदारी और वैश्विक एकजुटता’ वाले संयुक्त राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में लिखा गया है कि ये वैश्विक महामारी ‘समाज के मूल आधार पर हमला कर रही है।’ दुनिया के अधिकतर हिस्सों में सामाजिक और राज्य संस्थान इस क़दर खोखले हो चुके हैं कि वे स्वास्थ्य, सामाजिक या आर्थिक किसी भी प्रकार के संकट का प्रबंधन करने में सक्षम नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने कहा है कि 2021 से पहले आर्थिक सुधार की कोई संभावना नहीं है। अभी 2020 का अप्रैल महीना है, ऐसा लगता है जैसे कि 2020 का पूरा साल व्यर्थ हो गया है।1_23.JPG

एलीन अगार, एक भ्रूण की आत्मकथा, 1933-34.

बुर्जुआ व्यवस्था की विफलता से बढ़ती हुई घबराहट और ‘मुक्त बाज़ार’ से संसाधनों के पुन:आवंटन की दिशा में बढ़ता विश्वास तरह-तरह के लोगों को एकीकृत कर रहा है। फ़ाइनेंशियल टाइम्स जैसी पत्रिका भी अब इस पर विचार कर रही हैं:

पिछले चार दशकों से अपनाई जा रही नीतियों की दिशा को उलटने के लिए आमूलचूल सुधारों पर चर्चा करने की ज़रूरत है। सरकारों को अर्थव्यवस्था में अधिक सक्रिय भूमिका स्वीकार करनी होगी। उन्हें सार्वजनिक सेवाओं को देनदारी के बजाये निवेश के रूप में देखना चाहिए, और श्रम बाज़ारों को कम असुरक्षित बनाने के तरीक़ों की तलाश करनी चाहिए। पुनर्वितरण फिर से अहम एजेंडा होगा; बड़े लोगों और धनाढ्यों के विशेषाधिकारों पर प्रश्न उठाने होंगे। न्यूनतम आय और सम्पत्ति करों जैसी अब तक विचित्र मानी जाने वाली नीतियाँ लागू करनी होंगी।

संयुक्त राष्ट्र की अंडर-सेक्रेटरी जनरल और यू एन वीमेन की प्रमुख फुमज़िले मल्म्बो-न्गुका ने हाल ही में लिखा है कि ये वैश्विक महामारी 'हमारे समाजों और अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा आघात कर सार्वजनिक और निजी व्यवस्थाओं की कमियों को उजागर कर रही है, जो वर्तमान में केवल महिलाओं के एक से अधिक और अवैतनिक भूमिकाएँ निभाने के सहारे ही क़ायम है।' यह एक विचारशील कथन है जिसे गंभीरता से समझने की ज़रूरत है।

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शिया यिह यिंग, कुमारी सृष्टि, 2016.

स्वास्थ्यकर्मी

चिकित्साकर्मियों से लेकर अस्पतालों के कपड़े धोने वाले मज़दूरों तक की पहली पंक्ति के कामगारों में हर चार में से तीन महिलाएँ हैं। इन कामगारों की तारीफ़ में थालियाँ और बर्तन बजाना एक बात है, लेकिन यूनीयन बनाने, ज़्यादा वेतन और काम की बेहतर परिस्थितियों व अपने काम के क्षेत्रों में नेतृत्व के लिए इनके द्वारा लम्बे समय से उठाई जा रही इनकी माँगों को स्वीकार करना बिलकुल दूसरी। विश्व स्तर पर अस्पताल-क्षेत्र के लगभग सभी प्रशासक पुरुष हैं।

भारत में, स्वास्थ्य-देखभाल से जुड़ी किसी भी प्रकार की आपातकालीन परिस्थिति का भार मुख्यत: 990,000 आशा वर्करों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायक नर्सों पर पड़ता है। इन अधिकांशतः महिला श्रमिकों को बेहद कम वेतन मिलता है (ये कम वेतन भी अक्सर महीनों तक रुका रहता है)। ये पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं हैं और बुनियादी श्रमिक सुरक्षा से भी वंचित हैं (इन्हें सरकार द्वारा घोषित ‘अवैतनिक स्वयंसेवक' की तरह देखा जाता है)। पिछले साल आशा वर्करों ने अपने रोज़गार की स्थिति में सुधार के लिए एक के बाद एक संघर्ष किए। कहीं-कहीं उनको संघर्ष में कामयाबी हासिल हुई, लेकिन अधिकांश जगहों पर इनके संघर्षों की व्यापक रूप से अवहेलना की गई। (इस पर अधिक जानकारी के लिए, जुलाई 2019 में छपे डॉसियर संख्या 18 में भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (CITU) की अध्यक्ष के. हेमलता का साक्षात्कार को पढ़ें)। इस महामारी के दौरान, ये आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ही हैं जो मास्क और सैनिटाइज़रों की बुनियादी सुरक्षा के बिना ही परिवारों की जाँच करने के लिए घर-घर जा रही हैं। ये अग्रणी जन-स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, जिनका कहने को तो धन्यवाद किया जा रहा है, लेकिन जिन्हें यूनियन बनाने के अधिकार, नौकरी की निश्चितता और पर्याप्त वेतन जैसी बिलकुल बुनियादी सुरक्षा भी नहीं दी जाती।
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मोनिका मेयर, दिसंबर का पहला दिन, 1977. 

प्रबल होती लिंग-आधारित भूमिकाएँ

दो साल पहले अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने एक अध्ययन प्रकाशित किया था जिसमें पता चला था कि महिलाएँ अवैतनिक देखभाल के काम का 76.2%  हिस्सा करती हैं - जो पुरुषों की तुलना में तीन गुना अधिक है। ILO ने पाया कि ‘वैतनिक और अवैतनिक देखभाल कार्य के लिंग-विभाजन के प्रति दृष्टिकोण बदल ज़रूर रहे हैं, लेकिन परिवारों का “रोटी कमाने वाला पुरुष" मॉडल और महिलाओं को देखभाल कार्यों के लिए केंद्रीय भूमिका में देखने का नज़रिया समाजों में अभी भी प्रचलित है।’ ये स्थिति ‘सामान्य’ समय में आमतौर पर चलन में रहती है; महामारी के समय में ये संरचनात्मक असमानताएँ और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह यातना बन जाती है।

देखभाल कार्य के भार को हल्का करने वाले समाज के संस्थान और सामाजिक संरचनाएँ अब बंद हैं। स्कूल बंद होने के कारण बच्चे घर पर हैं और उन्हें घर पर ही पढ़ाने (होम-स्कूलिंग) का दबाव बढ़ रहा है। बुज़ुर्ग अब पार्कों में एक-दूसरे से मिल नहीं पा रहे, इसलिए उनका ख़याल रखने के साथ-साथ अब उन्हें घर में ख़ुश रखना एक और काम है। ख़रीदारी ज़्यादा दूभर है और सफ़ाई ज़्यादा ज़रूरी भी। हम सब जानते हैं कि ऐसे काम का भार महिलाओं के ही कंधों पर ही पड़ता है।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा

कोरोना आपदा से पहले दुनिया भर में हर दिन औसतन 137 महिलाएँ परिवार के किसी सदस्य द्वारा मार दी जाती थीं। ये चौंकाने वाला आँकड़ा है। रीता सेगातो बताती हैं कि न केवल कोरोना आपदा के बाद से महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा लगातार बढ़ी है, बल्कि हिंसा और भी क्रूर हुई है, क्योंकि महिलाओं की मुक्ति के प्रगतिशील विचार पर महिला अधीनता के नव-फासीवादी विचारों ने ग्रहण लगा रखा है। अर्जेंटीना में इस्तेमाल हो रहा कथन — el femicido no se toma cuarentena— यानी ‘नारीसंहार क्वारंटाइन की परवाह नहीं करता', स्पष्ट रूप से वैश्विक लॉकडाउन के द्वारा सुलगाई गई हिंसा की ओर इशारा करता है। हर एक देश से महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा की ख़बरें आ रही हैं। हेल्पलाइन नम्बर लगातार व्यस्त हैं और आश्रयघरों तक पहुँचाना मुश्किल।
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रीता सेगातो

ट्रेंटो (इटली) में जज सैंड्रो रैमोंडी ने निर्णय दिया है कि महिला-हिंसा के मामलों में, हिंसा करने वाले को घर छोड़ना चाहिए न कि पीड़ित को। इटली के श्रमिक परिसंघ ने कहा है कि ‘कोरोनावायरस के कारण घर में क़ैद होना हर किसी के लिए मुश्किल है, लेकिन यह लिंग आधारित हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए एक वास्तविक दुःस्वप्न बन गया है।’ महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के विरोध में इस तरह के रचनात्मक दृष्टिकोण ज़रूरी हैं।

लैटिन अमेरिका के कुऑर्डिनाडोरा फेमिनिस्टा 8M (नारिवादी समन्वयक 8एम) ने कोरोनावायरस के संकट के लिए नारिवादी आपात्कालीन परियोजना तैयार की है। यह योजना इंटरनेशनल असेंबली ऑफ़ द पीपल्स और ट्राईकॉनटिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान द्वारा निर्मित प्लेटफ़ॉर्म की योजनाओं से मिलती है। इसमें से चार आवश्यक बिंदु हैं:

  1. महिलाओं के पक्ष में सामूहिक और पारस्परिक सहायता की रणनीति विकसित करनी चाहिए: व्यक्तिवाद को रोकने और इस परिस्थिति में सामाजिक दूरी बनाने के लिए एकजुटता और पारस्परिक सहायता नेटवर्क का निर्माण करें। इस नेटवर्क के अंतर्गत तीन तरह के काम हो सकते हैं: अपने पड़ोस का सर्वेक्षण करना, बच्चों की देखभाल के लिए टीमों का निर्माण करना और समुदाय की सहायता के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को संगठित करना।
  2. पितृसत्तात्मक हिंसा का मुक़ाबला करना: महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों पर सामूहिक प्रतिक्रिया दर्ज करने के लिए एक प्रणाली निर्मित करें। महिलाओं और बच्चों को ख़तरनाक स्थितियों से निकालने के लिए पड़ोस-आधारित आपातकालीन योजनाएँ, जैसे कि आपातकालीन फ़ोन हेल्पलाइन और आश्रय-घर बनाएँ।
  3. ‘एक आम हड़ताल’ का आह्वान करें: उन सभी उत्पादक गतिविधियों के ख़िलाफ़ हड़ताल करें जो स्वास्थ्य-देखभाल से जुड़ी हुई नहीं हैं। महामारी के दौरान घर पर रहने के अधिकार की हिफ़ाज़त करें और ऐसी व्यवस्था स्थापित करें जो विभिन्न रूपों के आवश्यक देखभाल-कार्य करते हैं, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, वैसे लोगों को पूरा मेहनताना दे। स्वास्थ्य और परिवहन क्षेत्र के श्रमिकों के लिए काम की सुरक्षित और बेहतर स्थिति की मांग करें।
  4. सभी आपातकालीन उपायों की मांग करें जहाँ हमारी देखभाल महत्वपूर्ण हो, उनका पैसा नहीं: जीवन अनमोल है इसलिए हमें निम्नलिखित मांगें करनी चाहिए: वैतनिक मेडिकल लीव, ​​मुफ़्त चाइल्ड-केअर, जेलों में बंद लोगों की घर में गिरफ़्तारी, बुनियादी वस्तुओं और सैनिटरी उत्पादों की क़ीमतों में गिरावट, मुनाफ़े की सोचे बिना सामाजिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए योजनाबद्ध उत्पादन, औपचारिक या अनौपचारिक सभी तरह के देखभाल-कार्य करने वालों के लिए मेहनताना, सभी के लिए मुफ़्त उच्च-गुणवत्ता की स्वास्थ्य देखभाल, हर तरह के करों और लाभांशों पर तत्काल रोक, सभी के लिए मुफ़्त पानी और बिजली और किसी भी क्षेत्र के वर्करों को नौकरी से निकालने पर रोक।

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सेसिलिया विकुना, हड़ताल, 2018.

उपरोक्त प्रत्येक उपाय स्वाभाविक हैं और न केवल लैटिन अमेरिका में बल्कि पूरी दुनिया के लिए उपयोगी हैं। लेकिन यह आपात्कालीन परियोजना - जैसा कि अल्जीरियाई कवयित्री रबीआ जलती ने अपनी कविता शिज़ोफ्रेनिया में लिखा है - एक रास्ता; दूसरा रास्ता हमेशा मौजूद रहता है।

मैं दो रास्ते बन गई हूँ

एक से मैं देखती हूँ खुबानी के पेड़ और नर्गिस,

और कविताओं का सवेरा।

ये ले जाता है भाषा के समुद्र में।

और दूसरा

वो है जिसका नाम टंगा है दहलीज़ पर और रोटी के रंग में,

जिसके चेहरे ने सभी दिशाओं में बाड़ लगा दी है,

जिसकी साँसों ने सभी दायरे बंद कर दिए हैं

ये अक्सर मेरा गला पकड़ता है।
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झुग्गी वासी

ये वही रास्ता है जिसपर चलकर डरबन (दक्षिण अफ्रीका) की स्थानीय सरकार झुग्गी वासियों का गला दबाकर उनके रहने की जगहों से जबरन बेदख़ल कर रही है। लेकिन क्योंकि हम पहले रास्ते में विश्वास रखते हैं, इसलिए अरुंधति रॉय, नोम चॉम्स्की, नाओमी क्लेन, यानिस वरौफैकिस और मैंने इस पर आपत्ति जताई है। इसी रास्ते के लोग ज़मीन के लिए भूखे हैं, न केवल अपना घर बनाने के लिए बल्कि उसपर खेती करने के लिए भी। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत और ब्राजील तक पेट की भूख ज़मीन की भूख को बढ़ाती है।

हमारे अप्रैल 2020 में प्रकाशित डोजियर नं. 27 ‘ब्राज़ील के लोक-सम्मत कृषि सुधार और भूमि-संघर्ष’, में हमने दिखाया है कि कैसे ज़मीन की भूख न केवल भूमि-संघर्ष को बल्कि सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष को भी प्रेरित करती है। हमारे साओ पाउलो कार्यालय के शोधार्थी लिखते हैं कि इस संघर्ष का मूल उद्देश्य 'सामाजिक संबंधों को पुनर्परिभाषित करना है -उदाहरण के लिए जिनमें: मर्दानगी और होमोफ़ोबिया को तोड़ते हुए लैंगिक संबंधों का पुनर्निर्माण करना भी शामिल है- और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के सभी स्तरों की पहुँच बनाने की मांग भी।'

भूमि-संघर्ष पर और अधिक जानकारी हम अगले हफ़्ते के न्यूज़लेटर में देंगे; जिसे आप हमारी वेबसाइट पर अंग्रेज़ी, स्पैनिश, पुर्तगाली, हिंदी, फ़्रेंच, मंदारिन, रूसी और जर्मन भाषाओं में पढ़ सकते हैं।

कोरोना आपदा से पहले, जब आप इस न्यूज़लेटर पत्र को पढ़ रहे होते थे तो दुनिया में कहीं-न-कहीं दो महिलाएँ मारी जा रही होती थीं, अब ये संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। नारी-संहार ख़त्म होना चाहिए।

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