NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विवेकानंद ने बताया था कि देशभक्ति किसे कहते हैं!
जयंती विशेष: स्वामी विवेकानंद अगर आज ज़िंदा होते तो उनकी नसीहतें सुनकर हिंदू कट्टरता के प्रचारक उन्हें भी सूडो सेकुलर, शहरी नक्सली या हिंदू विरोधी करार देकर पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे रहे होते।
अनिल जैन
12 Jan 2021
विवेकानंद
Image courtesy: Twitter

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके पास अपना कोई ऐसा नायक नहीं है, जिसकी उनके संगठन के बाहर कोई स्वीकार्यता या सम्मान हो। उनके अपने जो 'नायक’ हैं, उनका भी वह एक सीमा से ज्यादा इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने पर राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान किए गए उनके ‘पापों’ का पिटारा खुलने लगता है। इसीलिए उसने पिछले कुछ दशकों से भारत के महापुरुषों और राष्ट्रनायकों का 'अपहरण’ कर उन्हें अपनी विचार-परंपरा का वाहक बताने का हास्यास्पद अभियान चला रखा है।

इस सिलसिले में महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, शहीद भगतसिंह, डॉ. भीमराव आंबेडकर, लोकमान्य तिलक, सरदार वल्लभभाई पटेल आदि कई नाम हैं, जिनका वह समय-समय पर अपनी जरुरत के मुताबिक इस्तेमाल करता रहता है। स्वामी विवेकानंद (जन्म 12 जनवरी, 1863- मृत्यु 4 जुलाई, 1902) का नाम भी ऐसे ही महानायकों में शुमार है। 1960-70 के दशक के दौरान संघ के तत्कालीन सर संघचालक एमएस गोलवलकर ने विवेकानंद को अपनी हिंदुत्ववादी विचारधारा का आइकॉन बनाने की जो निर्लज्ज कोशिश शुरू की थी, वह आज भी जारी है।

निर्लज्जता का चरम तो यह है कि सांप्रदायिक और जातीय नफरत की राजनीति में पले-बढ़े और प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी को भी अब विवेकानंद का 'अवतार’ बताया जा रहा है। बिकाऊ और चापलूस अखबारों में 'नरेंद्र से नरेंद्र तक’ शीर्षक से भाजपा नेताओं के लेख छप रहे हैं।

स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक वक्तव्य के माध्यम से भारत की एक वैश्विक सोच को सामने रखते हुए हिंदू धर्म का उदारवादी चेहरा दुनिया के सामने रखा था। पूरी दुनिया ने उनके भाषण को सराहा था। उस सम्मेलन में विवेकानंद ने कहा था-"सांप्रदायिकता, संकीर्णता और इनसे उत्पन्न भयंकर धार्मिक उन्माद इस पृथ्वी पर काफी समय तक राज कर चुके हैं। इस उन्माद ने अनेक बार मानव रक्त से पृथ्वी को नहलाया है, सभ्यताएं नष्ट कर डाली हैं तथा समस्त जातियों को हताश कर डाला है। यदि ये सब न होता तो तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता।"

स्वामी विवेकानंद विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक व्यक्ति थे और भारतीयता के क्रांतिकारी अग्रदूत भी। उनका हिंदुत्व पाखंड और कर्मकांड विरोधी होने के साथ ही दलित और श्रमिक जातियों को सामाजिक न्याय दिलाने वाला सर्वसमावेशी था। उसमें भारत की आध्यात्मिकता और भौतिक विकास की ललक थी। उसमें सांप्रदायिक और जातीय नफरत की कोई जगह नहीं थी। यद्यपि वे समकालीन राजनीति से दूर रहते थे, लेकिन उनका धर्म सामाजिक सत्ता के सवालों से लगातार टकराता था।

यही कारण है कि राजनीति के प्रति विरक्ति का भाव रखने वाले विवेकानंद कई राजनीतिकर्मियों के लिए प्रेरणास्रोत बनते रहे। इसी वजह से धर्म की आड़ में शोषणकारी समाज-सत्ता को बनाए रखने का कुत्सित इरादा रखने वाली ताकतें बेशर्मी के साथ इस योद्धा-संन्यासी को अपनी विचार-परंपरा का पुरखा बताकर उसे हथियाने की फूहड कोशिशें करती रही हैं और अब भी कर रही हैं, ताकि उनकी प्रखर सामाजिक चेतना का छद्म सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में इस्तेमाल किया जा सके।

चूंकि इस खतरे का अंदाजा विवेकानंद को भी था, लिहाजा उन्होंने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान 'कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज्म’ में कहा था- ''कुछ लोग देशभक्ति की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन मुख्य बात है- हृदय की भावना। यह देखकर आपके मन में क्या भाव आता है कि न जाने कितने समय से देवों और ऋषियों के वंशज पशुओं जैसा जीवन बिता रहे हैं? देश पर छाया अज्ञान का अंधकार क्या आपको सचमुच बेचैन करता है? ...यह बेचैनी ही आपकी देशभक्ति का पहला प्रमाण है।’’

चूंकि विवेकानन्द राजनेता नहीं बल्कि संन्यासी थे- समाज विज्ञानी संन्यासी, लिहाजा वे हिंदू समाज की खूबियों और खामियों से भलीभांति परिचित थे। वे योद्धा संन्यासी थे, इसलिए हिंदू समाज में व्याप्त बुराइयों और जड़ता पर निर्ममता से प्रहार करते थे। हिंदू समाज में आज जो कट्टरता व्याप्त है, उसके खतरे को विवेकानन्द की दी हुई चेतावनी से भी समझा जा सकता है।

उन्होंने अपने समय के हिंदू कट्टरपंथियों और पाखंडी धर्माचार्यों को ललकारते हुए ''कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज्म’ में ही कहा है- ''शूद्रों ने अपने हक मांगने के लिए जब भी मुंह खोला, उनकी जीभें काट दी गईं। उनको जानवरों की तरह चाबुक से पीटा गया। लेकिन अब आप उन्हें उनके अधिकार लौटा दो, वरना जब वे जागेंगे और आप (उच्च वर्ग) के द्वारा किए गए शोषण को समझेंगे, तो अपनी फूंक से आप सब को उडा देंगे। यही (शूद्र) वे लोग हैं, जिन्होंने आपको सभ्यता सिखाई है और ये ही आपको नीचे भी गिरा देंगे। सोचिए कि किस तरह शक्तिशाली रोमन सभ्यता गॉलों के हाथों मिट्टी में मिला दी गई।’’

अपने इसी व्याख्यान में भारतीयजनों को आगाह करते हुए विवेकानंद ने कहा- ''सैकड़ों वर्षों तक अपने सिर पर गहरे अंधविश्वास का बोझ रखकर, केवल इस बात पर चर्चा में अपनी ताकत लगाकर कि किस भोजन को छूना चाहिए और किसको नहीं, और युगों तक सामाजिक अत्याचारों के तले सारी इंसानियत को कुचलकर आपने क्या हासिल किया और आज आप क्या है?...आओ पहले मनुष्य बनो और उन पंडे पुजारियों को निकाल बाहर करो जो हमेशा आपकी प्रगति के खिलाफ रहे है, जो कभी अपने को सुधार नहीं सकते और जिनका हृदय कभी भी विशाल नहीं बन सकता। वे सदियों के अंधविश्वास और जुल्मों की उपज है। इसलिए पहले पुजारी-प्रपंच का नाश करो, अपने संकीर्ण संस्कारों की कारा तोड़ो, मनुष्य बनो और बाहर की ओर झांको। देखो कि कैसे दूसरे राष्ट्र आगे बढ़ रहे हैं।’’

सांप्रदायिक नफरत फैलाने के अपने कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके बगल बच्चा संगठन धर्मांतरण का भी खूब शोर मचाते हैं। इस बारे में विवेकानंद ने भी स्वीकारा है कि भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के बाद देश की आबादी के एक बडे हिस्से ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, लेकिन साथ ही वे कहते हैं कि यह सब तलवार के जोर से नहीं हुआ था।

उन्होंने कहा है- ''भारत में मुस्लिम विजय ने शोषित, दमित और गरीब लोगों को आजादी का स्वाद चखाया और इसीलिए देश की आबादी का पांचवां हिस्सा मुसलमान हो गया। यह सोचना पागलपन के सिवाय कुछ नहीं है कि तलवार और जोर-जबर्दस्ती के जरिए हिंदुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआ। सच तो यह है कि जिन लोगों ने इस्लाम अपनाया, वे जमींदारों और पुरोहितों के शिकंजे से आजाद होना चाहते थे। बंगाल के किसानों में हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों की तादाद इसलिए है कि बंगाल में बहुत ज्यादा जमींदार थे।’’ संदर्भ:  (Selected Works of Swami Vivekanand,Vol.3,12th edition,1979.p.294)

हिंदू राष्ट्रवाद के झंडाबरदार मुसलमानों के प्रति अपनी नफरतभरी विचारधारा को वैधानिकता का जामा पहनाने के लिए स्वामी विवेकानंद के नाम का इस्तेमाल लंबे समय से करते आ रहे हैं, उनके समय में भी करते थे। लेकिन चूंकि ऐसे लोगों की क्षुद्र मानसिकता और मुसलमानों के प्रति उनकी द्वेष-भावना से विवेकानंद भलीभांति परिचित थे, लिहाजा उन्होंने कहा था- ''इस अराजकता और कलह के बीच भी मेरे मस्तिष्क में संपूर्ण साबूत भारत की जो तस्वीर उभरती है, वह शानदार और अद्वितीय है, उसमें वैदिक दिमाग और इस्लामिक शरीर होगा।’’ इस्लामिक शरीर से उनका तात्पर्य वर्ग और जातिविहीन समाज से था।

कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानंद अगर आज जिंदा होते तो उनकी नसीहतें सुनकर हिंदू कट्टरता के प्रचारक उन्हें भी सूडो सेकुलर, शहरी नक्सली या हिंदू विरोधी करार देकर पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे रहे होते। क्योंकि जिस तरह उनके लिए गांधी, अंबेडकर, सुभाष, सरदार पटेल को पचाना मुमकिन नहीं है, उसी तरह विवेकानंद को हजम करना भी उनके लिए मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

swami vivekanand
Swami Vivekananda Jayanti
Patriotism
BJP
RSS

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • women in politics
    तृप्ता नारंग
    पंजाब की सियासत में महिलाएं आहिस्ता-आहिस्ता अपनी जगह बना रही हैं 
    31 Jan 2022
    जानकारों का मानना है कि अगर राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को टिकट भी देते हैं, तो वे अपने परिवारों और समुदायों के समर्थन की कमी के कारण पीछे हट जाती हैं।
  • Indian Economy
    प्रभात पटनायक
    बजट की पूर्व-संध्या पर अर्थव्यवस्था की हालत
    31 Jan 2022
    इस समय ज़रूरत है, सरकार के ख़र्चे में बढ़ोतरी की। यह बढ़ोतरी मेहनतकश जनता के हाथों में सरकार की ओर से हस्तांतरण के रूप में होनी चाहिए और सार्वजनिक शिक्षा व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हस्तांतरणों से…
  • Collective Security
    जॉन पी. रुएहल
    यह वक्त रूसी सैन्य गठबंधन को गंभीरता से लेने का क्यों है?
    31 Jan 2022
    कज़ाकिस्तान में सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) का हस्तक्षेप क्षेत्रीय और दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बदलाव का प्रतीक है।
  • strike
    रौनक छाबड़ा
    समझिए: क्या है नई श्रम संहिता, जिसे लाने का विचार कर रही है सरकार, क्यों हो रहा है विरोध
    31 Jan 2022
    श्रम संहिताओं पर हालिया विमर्श यह साफ़ करता है कि केंद्र सरकार अपनी मूल स्थिति से पलायन कर चुकी है। लेकिन इस पलायन का मज़दूर संघों के लिए क्या मतलब है, आइए जानने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्होंने…
  • mexico
    तान्या वाधवा
    पत्रकारों की हो रही हत्याओंं को लेकर मेक्सिको में आक्रोश
    31 Jan 2022
    तीन पत्रकारों की हत्या के बाद भड़की हिंसा और अपराधियों को सज़ा देने की मांग करते हुए मेक्सिको के 65 शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License